रामगुप्त की ऐतिहासिकता: क्या गुप्त इतिहास में उसका अस्तित्व वास्तविक था?

गुप्तकालीन इतिहास के अध्ययन में रामगुप्त की ऐतिहासिकता एक ऐसा प्रश्न है जिसने आधुनिक इतिहासलेखन को गहराई से प्रभावित किया है। लंबे समय तक इतिहासकारों का यह मत रहा कि समुद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् सीधे चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य गुप्त साम्राज्य की गद्दी पर आरूढ़ हुए। परंतु बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जैसे-जैसे साहित्यिक, अभिलेखीय तथा मुद्रात्मक साक्ष्य सामने आए, यह सरल धारणा असंतोषजनक सिद्ध होने लगी।

आज अधिकांश विद्वान इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय के मध्य रामगुप्त नामक शासक का अल्पकालिक शासन रहा था। यही स्वीकारोक्ति रामगुप्त की ऐतिहासिकता को एक अकादमिक विवाद से आगे बढ़ाकर गुप्त इतिहास की राजनीतिक संरचना को समझने का माध्यम बनाती है।

रामगुप्त का उल्लेख न तो प्रयाग प्रशस्ति में है और न ही उदयगिरि अभिलेखों में, इसी कारण प्रारंभिक विद्वानों ने उसे काल्पनिक माना। किंतु इतिहास केवल आधिकारिक प्रशस्तियों पर आधारित नहीं होता। साहित्य, स्मृति, परंपरा और सिक्के, ये सभी इतिहास के समान रूप से वैध स्रोत हैं। इसी पृष्ठभूमि में रामगुप्त विवाद का पुनर्मूल्यांकन अनिवार्य हो जाता है।

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता प्रमाणित करती गुप्तकालीन ताम्र मुद्रा
एरण–भिलसा क्षेत्र से प्राप्त यह ताम्र मुद्रा रामगुप्त के गुप्तवंशी शासक होने की ऐतिहासिक पुष्टि करती है।

स्रोत-आधारित अध्ययन और रामगुप्त की ऐतिहासिकता

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता का मूल्यांकन तीन प्रमुख स्रोत-श्रेणियों के आधार पर किया जाता है,

  1. साहित्यिक स्रोत
  2. अभिलेखीय साक्ष्य
  3. मुद्रात्मक प्रमाण

इन तीनों का संयुक्त अध्ययन ही किसी निष्कर्ष तक पहुँचने में सहायक हो सकता है।

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता के प्रमुख स्रोत

स्रोत का प्रकारग्रंथ / साक्ष्यरामगुप्त से संबंधित सूचनाऐतिहासिक महत्त्व
साहित्यिकदेवीचन्द्रगुप्तम्रामगुप्त की पराजय, ध्रुवदेवी प्रसंगमुख्य कथा का आधार
साहित्यिकहर्षचरितस्त्रीवेषधारी चन्द्रगुप्त द्वारा शकपति-वधसमकालोत्तर पुष्टि
साहित्यिककाव्यमीमांसा‘शर्मगुप्त’ का उल्लेखऐतिहासिक स्मृति
अभिलेखीयसंजन अभिलेखभाई-हत्या और राज्य-हरण का संकेतअप्रत्यक्ष समर्थन
अभिलेखीयदुर्जनपुर अभिलेख“महाराजाधिराज रामगुप्त”प्रत्यक्ष प्रमाण
मुद्रात्मकएरण–भिलसा सिक्केरामगुप्त नाम व गरुड़ चिह्नगुप्तवंशी पहचान

 

साहित्यिक स्रोतों का ऐतिहासिक महत्व

रामगुप्त से संबंधित साहित्यिक परंपरा को लंबे समय तक मात्र काव्यात्मक कल्पना मानकर अस्वीकार किया गया। किंतु यह दृष्टिकोण आधुनिक इतिहास-लेखन की कसौटी पर टिकता नहीं। गुप्तकाल से संबंधित अनेक घटनाएँ, जैसे पुष्यमित्र द्वारा बृहद्रथ की हत्या या शशांक द्वारा राज्यवर्धन की हत्या भी हमें साहित्यिक ग्रंथों से ही ज्ञात होती हैं, और उनकी ऐतिहासिकता निर्विवाद है।

अतः जब अनेक स्वतंत्र साहित्यिक ग्रंथ रामगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय से जुड़ी एक ही घटना की ओर संकेत करते हैं, तो उन्हें पूर्णतः काल्पनिक कहना उचित नहीं।

 

रामगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय: परंपरागत कथा का ऐतिहासिक ढाँचा

 

उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर जो कथा उभरती है, वह संक्षेप में इस प्रकार है,

समुद्रगुप्त के दो पुत्र थे, रामगुप्त और चन्द्रगुप्त। ज्येष्ठ होने के कारण रामगुप्त को उत्तराधिकारी बनाया गया। किंतु वह सैन्य दृष्टि से दुर्बल और राजनीतिक रूप से अनिर्णायक सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में पश्चिमी भारत से आए शक शासकों ने गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किया। पराजय के बाद रामगुप्त को एक अत्यंत अपमानजनक संधि स्वीकार करनी पड़ी, जिसकी शर्तों में अपनी पत्नी ध्रुवदेवी (ध्रुवस्वामिनी) को शकपति को सौंपना शामिल था।

यही प्रसंग आगे चलकर रामगुप्त और ध्रुवदेवी का ऐतिहासिक विवाद कहलाता है। चन्द्रगुप्त ने इस शर्त को कुल-मर्यादा के विरुद्ध मानते हुए स्त्रीवेष धारण कर शत्रु शिविर में प्रवेश किया और शकपति की हत्या कर दी। इस साहसिक कृत्य से उसकी लोकप्रियता बढ़ी, जबकि रामगुप्त की प्रतिष्ठा और गिर गई। अंततः चन्द्रगुप्त ने रामगुप्त की हत्या कर सत्ता संभाली और ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया। यह कथा गुप्तकालीन सत्ता-संघर्ष को उजागर करती है, जिसे सही रूप में गुप्त वंश के उत्तराधिकार संघर्ष के रूप में समझा जाना चाहिए।

 

देवीचन्द्रगुप्तम् और रामगुप्त की ऐतिहासिकता

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता के संदर्भ में देवीचन्द्रगुप्तम् सबसे अधिक विवादित, किंतु उतना ही महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है। यह ग्रंथ न केवल रामगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय के बीच हुए सत्ता-संघर्ष का संकेत देता है, बल्कि गुप्तकालीन राजनीति में नैतिकता, कूटनीति और शक्ति के अंतर्संबंध को भी उजागर करता है। यद्यपि यह एक नाट्यकृति है, फिर भी इसे मात्र कल्पना कहकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि गुप्तकालीन इतिहास की अनेक निर्णायक घटनाएँ साहित्यिक स्रोतों के माध्यम से ही संरक्षित हुई हैं।

इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि देवीचन्द्रगुप्तम् में वर्णित कथा गुप्त दरबार की वास्तविक राजनीतिक घटनाओं पर आधारित थी, जिसे काव्यात्मक रूप दिया गया। यदि ऐसा न होता, तो बाद के ग्रंथों में इसी कथानक की पुनरावृत्ति संभव नहीं थी। इस प्रकार, यह ग्रंथ रामगुप्त विवाद को समझने का मूलाधार प्रदान करता है और उसकी ऐतिहासिकता पर गंभीर विचार करने के लिए बाध्य करता है।

 

विशाखदत्त का नाटक: कल्पना या इतिहास?

रामगुप्त की ऐतिहासिकता के अध्ययन में विशाखदत्त कृत देवीचन्द्रगुप्तम् का स्थान केंद्रीय है। यद्यपि यह नाटक मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, किंतु इसके अंश नाट्यदर्पण में सुरक्षित हैं। इन उद्धरणों की ओर सर्वप्रथम सिल्वा लेवी ने विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया। इन अंशों में रामगुप्त को कायर, अक्षम और कुल के लिए कलंक के रूप में चित्रित किया गया है। शक आक्रमण, ध्रुवदेवी की मांग और स्त्रीवेषधारी चन्द्रगुप्त द्वारा शकपति-वध, ये सभी तत्व इस नाटक में स्पष्ट रूप से उपस्थित हैं।

कुछ इतिहासकारों ने इसे दरबारी नाट्य-कथा कहकर अस्वीकार किया, किंतु यह ध्यान देने योग्य है कि विशाखदत्त स्वयं एक सामंतकुल से संबंधित थे और राजसभा से जुड़े थे। उनके पिता और पितामह दोनों उच्च पदों पर रहे थे। अतः राजनैतिक घटनाओं की जानकारी उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवश्य रही होगी।

 

बाणभट्ट और राजशेखर के साक्ष्य

 

देवीचन्द्रगुप्तम् के अतिरिक्त, रामगुप्त की ऐतिहासिकता को बल देने वाले साक्ष्य गुप्तोत्तर काल के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के ग्रंथों में भी मिलते हैं। विशेष रूप से बाणभट्ट और राजशेखर जैसे लेखकों का उल्लेख इस विवाद को एक व्यापक ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ देता है। इन लेखकों का महत्व इस कारण और बढ़ जाता है क्योंकि वे न तो विशाखदत्त के समकालीन थे और न ही गुप्त दरबार से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। इसके बावजूद, यदि वे एक ही घटना की ओर संकेत करते हैं, तो उसे पूरी तरह काल्पनिक कहना कठिन हो जाता है।

इन ग्रंथों में प्रयुक्त रूपक, उपनाम और संकेतात्मक भाषा यह दर्शाती है कि रामगुप्त की स्मृति एक दुर्बल शासक के रूप में जीवित थी, जबकि चन्द्रगुप्त द्वितीय को साहसी और निर्णायक व्यक्तित्व के रूप में देखा गया। इस प्रकार, बाणभट्ट और राजशेखर के उल्लेख रामगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय के बीच सत्ता संघर्ष की ऐतिहासिकता को अप्रत्यक्ष किंतु सशक्त रूप से पुष्ट करते हैं।

 

हर्षचरित का ऐतिहासिक संकेत

बाणभट्ट के हर्षचरित में उल्लेख है कि “अरिपुर में दूसरे की पत्नी की इच्छा रखने वाले शकपति की हत्या स्त्रीवेषधारी चन्द्रगुप्त ने की।” यह उल्लेख अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बाण ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति सजग लेखक थे। यदि बाण पुष्यमित्र और शशांक जैसे ऐतिहासिक हत्याकांडों का उल्लेख कर सकते हैं, तो चन्द्रगुप्त-ध्रुवदेवी प्रसंग को पूर्णतः असत्य मानने का कोई ठोस आधार नहीं रह जाता। यही कारण है कि रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर इतिहासकारों के मत धीरे-धीरे सकारात्मक होते गए।

 

काव्यमीमांसा और शर्मगुप्त

दसवीं शताब्दी के लेखक राजशेखर की काव्यमीमांसा में रामगुप्त को ‘शर्मगुप्त’ कहा गया है। यह उपनाम स्वयं इस बात का संकेत है कि रामगुप्त की स्मृति एक दुर्बल और अपमानित शासक के रूप में जीवित थी। यहाँ चन्द्रगुप्त को ‘कार्तिकेय’ रूपक के माध्यम से विजेता और रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। काव्यात्मक भाषा के पीछे छिपी यह ऐतिहासिक स्मृति संस्कृत साहित्य में रामगुप्त का उल्लेख होने का सशक्त प्रमाण है।

 

अभिलेखीय साक्ष्य और रामगुप्त की ऐतिहासिकता

 

साहित्यिक स्रोतों के अतिरिक्त, रामगुप्त की ऐतिहासिकता के समर्थन में जो सबसे ठोस आधार प्रस्तुत करता है, वह है अभिलेखीय साक्ष्य। यद्यपि रामगुप्त का कोई प्रत्यक्ष गुप्तकालीन राजकीय अभिलेख अभी तक उपलब्ध नहीं है, फिर भी राष्ट्रकूट काल के अभिलेखों में जिस प्रकार से एक गुप्त शासक द्वारा भाई-हत्या, राज्य-हरण और पत्नी-ग्रहण का संकेत मिलता है, वह देवीचन्द्रगुप्तम् की कथा से उल्लेखनीय समानता रखता है।

इतिहास-लेखन में यह स्वीकार किया गया है कि बाद के अभिलेख यदि किसी पूर्ववर्ती घटना की स्मृति सुरक्षित रखते हैं, तो उन्हें पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से तब, जब वे एक से अधिक हों और भिन्न-भिन्न स्थानों से प्राप्त हुए हों। इस दृष्टि से संजन, काम्बे और संगली अभिलेख रामगुप्त विवाद को केवल साहित्यिक कल्पना मानने की धारणा को गंभीर चुनौती देते हैं।

 

संजन, काम्बे और संगली अभिलेखों का ऐतिहासिक संकेत

संजन अभिलेख (871 ई.), जो राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम के काल का है, उसमें गुप्त वंश के एक ऐसे राजा का उल्लेख मिलता है जिसने अपने भाई की हत्या कर उसके राज्य और पत्नी दोनों पर अधिकार कर लिया। यद्यपि यहाँ रामगुप्त का नाम प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता, किंतु घटना का स्वरूप देवीचन्द्रगुप्तम् से अत्यंत साम्य रखता है। काम्बे (930 ई.) और संगली (933 ई.) अभिलेख, जो गोविंद चतुर्थ के शासनकाल से संबंधित हैं, एक ऐसे ‘साहसांक’ राजा का उल्लेख करते हैं, जिसने साहस और त्याग में प्रसिद्धि पाई, किंतु साथ ही भाई के प्रति क्रूरता, भाई की पत्नी से विवाह और भयवश किए गए धार्मिक अनुष्ठानों के कारण आलोचना का पात्र बना। इन पंक्तियों का सूक्ष्म अध्ययन यह संकेत देता है कि यहाँ ‘साहसांक’ से तात्पर्य चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य से है।

इन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि नौवीं-दसवीं शताब्दी तक गुप्त वंश के उत्तराधिकार संघर्ष की स्मृति जीवित थी और उसमें रामगुप्त-चन्द्रगुप्त प्रसंग एक केंद्रीय तत्व के रूप में विद्यमान था।

 

दुर्जनपुर अभिलेख: रामगुप्त की प्रत्यक्ष ऐतिहासिक पहचान

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता के पक्ष में सबसे निर्णायक साक्ष्य विदिशा (प्राचीन बेसनगर) के निकट दुर्जनपुर से प्राप्त जैन प्रतिमाओं के अभिलेख हैं। इन प्रतिमाओं की चरण-पादिकाओं पर उत्कीर्ण अभिलेखों में स्पष्ट रूप से ‘महाराजाधिराज रामगुप्त’ नामक शासक का उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों की लिपि का तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह समुद्रगुप्त के एरण अभिलेख और चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि अभिलेखों से अत्यंत साम्य रखती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह रामगुप्त उसी कालखंड का शासक था, न कि किसी उत्तरवर्ती या स्थानीय राजवंश का।

 

जैन मत और रामगुप्त का राजनीतिक व्यक्तित्व

दुर्जनपुर की जैन प्रतिमाओं से जुड़ा यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि रामगुप्त संभवतः जैन मतानुयायी था। यदि यह स्वीकार कर लिया जाए, तो उसकी शांतिप्रिय प्रवृत्ति और सैन्य दुर्बलता को समझना सरल हो जाता है।

इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ धार्मिक झुकाव ने शासकों की राजनीतिक और सैन्य नीतियों को प्रभावित किया। इस संदर्भ में राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष द्वारा रामगुप्त के प्रति सहानुभूति और चन्द्रगुप्त की आलोचना को भी समझा जा सकता है। इस प्रकार, दुर्जनपुर अभिलेख रामगुप्त का ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं है।

 

मुद्रात्मक साक्ष्य और रामगुप्त की ऐतिहासिकता

 

अभिलेखों के साथ-साथ मुद्राएँ भी रामगुप्त की ऐतिहासिकता को सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं। मालवा क्षेत्र के एरण और भिलसा से प्राप्त तांबे की मुद्राओं पर ‘राम’, ‘रामगु’, ‘मगुप्त’ जैसे अक्षरों का स्पष्ट अंकन मिलता है। इन मुद्राओं की लिपि, भार और शैली गुप्तकालीन सिक्कों से पूर्णतः मेल खाती है। मुद्राशास्त्र में यह सिद्धांत स्वीकार किया जाता है कि यदि किसी सिक्के पर शासक का नाम और राजचिह्न अंकित हो, तो वह उसके संप्रभु शासक होने का प्रमाण होता है। इस दृष्टि से रामगुप्त की मुद्राओं को किसी स्थानीय या अधीनस्थ शासक की उपज मानना कठिन है।

 

सिंह और गरुड़ चिह्न का महत्व

रामगुप्त की मुद्राओं पर सिंह और गरुड़ की आकृतियाँ विशेष ध्यान आकर्षित करती हैं। सिंह-चिह्न ध्रुवदेवी की वैशाली मुद्रा पर भी मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह राजपरिवार की साझा प्रतीक-परंपरा थी।

गरुड़ गुप्त वंश का राजकीय चिह्न था, जिसका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में ‘गरुत्मदेक’ के रूप में मिलता है। एरण से प्राप्त कुछ सिक्कों पर गरुड़ की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि रामगुप्त गुप्त वंश की केंद्रीय सत्ता से संबद्ध था। इस प्रकार, मुद्रात्मक साक्ष्य क्या रामगुप्त वास्तव में गुप्त शासक था, इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक दिशा में देते हैं।

 

शकपति की पहचान और युद्ध का ऐतिहासिक संदर्भ

 

रामगुप्त की कथा में वर्णित शकपति की पहचान रामगुप्त और ध्रुवदेवी के ऐतिहासिक विवाद को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस विषय पर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं, किंतु अधिकांश साहित्यिक और ऐतिहासिक संकेत पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों की ओर संकेत करते हैं। समुद्रगुप्त द्वारा शकों की अधीनता स्वीकार कराए जाने के पश्चात्, उत्तराधिकारी के काल में उनका पुनः सशक्त होना अस्वाभाविक नहीं था। रामगुप्त की दुर्बलता ने संभवतः उन्हें आक्रमण के लिए प्रेरित किया।

 

युद्ध-स्थल की समस्या

युद्ध के स्थान को लेकर भी मतभेद हैं हर्षचरित में अरिपुर, शृंगारप्रकाश में अलिपुर और काव्यमीमांसा में कार्तिकेय नगर का उल्लेख मिलता है। इन विभिन्न नामों से यह निष्कर्ष निकलता है कि युद्ध रामगुप्त की राजधानी से दूर, किसी सीमांत या पर्वतीय क्षेत्र में हुआ।

इससे यह संभावना प्रबल होती है कि रामगुप्त सैनिक अभियान पर था और पराजय की स्थिति में उसने राजनीतिक समझौते का मार्ग चुना।

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर विरोधी मत और उनका मूल्यांकन

 

रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर इतिहासकारों के मत सर्वसम्मत नहीं रहे हैं। स्मिथ, रायचौधरी और मजूमदार जैसे विद्वानों ने गुप्त अभिलेखों में नामोल्लेख के अभाव, स्वर्ण-सिक्कों की अनुपस्थिति और भाई-हत्या की नैतिक आपत्ति के आधार पर रामगुप्त को काल्पनिक माना। किन्तु आधुनिक शोध इन आपत्तियों को निर्णायक नहीं मानता। सभी शासकों के नाम अभिलेखों में सुरक्षित रहें, यह आवश्यक नहीं। इसके अतिरिक्त, दुर्जनपुर अभिलेख और तांबे की मुद्राएँ अब इन तर्कों को कमजोर कर देती हैं।

 

स्मृति-शास्त्र और ध्रुवदेवी-विवाह

स्मृति-ग्रंथों में निर्दिष्ट परिस्थितियों क्लीबत्व, परित्याग या अयोग्यता में स्त्री के पुनर्विवाह को मान्यता दी गई है। देवीचन्द्रगुप्तम् में रामगुप्त को ‘क्लीब-जनोचित’ कहा गया है। अतः ध्रुवदेवी का विवाह शास्त्र-विरुद्ध नहीं ठहराया जा सकता।

इस प्रकार, नैतिक आधार पर रामगुप्त की ऐतिहासिकता को अस्वीकार करना विद्वतापूर्ण दृष्टि से दुर्बल प्रतीत होता है।

 

निष्कर्ष: रामगुप्त की ऐतिहासिकता का संतुलित मूल्यांकन

 

साहित्यिक, अभिलेखीय और मुद्रात्मक साक्ष्यों के समन्वित अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर अब संदेह बनाए रखना कठिन है। यद्यपि देवीचन्द्रगुप्तम् में उसका चरित्र अतिरंजित प्रतीत होता है, किंतु उसका अस्तित्व, शासन और पतन ऐतिहासिक यथार्थ पर आधारित था। संभवतः रामगुप्त एक शांतिप्रिय, धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था, जो अधिक कुशल और महत्वाकांक्षी चन्द्रगुप्त द्वितीय की राजनीति का शिकार हुआ। गुप्तकालीन उत्तराधिकार विवाद में रामगुप्त की भूमिका को समझे बिना चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदय को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

 

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