समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष: काच विवाद और प्रयाग प्रशस्ति का ऐतिहासिक विश्लेषण

 

गुप्त काल का अध्ययन करते समय समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष इतिहासकारों के बीच सबसे अधिक विवादित और विचारोत्तेजक विषयों में से एक रहा है। चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया न केवल चन्द्रगुप्त प्रथम का इतिहास को समझने में सहायक है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि समुद्रगुप्त जैसे शक्तिशाली सम्राट की सत्ता वैधता किन ऐतिहासिक परिस्थितियों में स्थापित हुई।

 

प्रयाग प्रशस्ति और समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष

 

प्रयाग प्रशस्ति के प्रारम्भिक भाग में कुल आठ श्लोक प्राप्त होते हैं, जिनमें से कुछ खंडित अवस्था में हैं। इनमें से चतुर्थ श्लोक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी चुने जाने का विवरण सुरक्षित है। प्रशस्तिकार के अनुसार, चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने सभासदों की एक सभा बुलाकर सार्वजनिक रूप से समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी घोषित किया।

सभा में समुद्रगुप्त के गुणों से अभिभूत होकर चन्द्रगुप्त प्रथम ने उसे गले लगाते हुए कहा,
आर्य! तुम योग्य हो, पृथ्वी का पालन करो।”

इस घोषणा से जहाँ एक ओर दरबारी प्रसन्न हुए, वहीं कुछ तुल्यकुलज राजकुमारों के मुख म्लान हो गए। इसी वाक्यांश को आधार बनाकर अनेक विद्वानों ने यह अनुमान लगाया कि समुद्रगुप्त के उत्तराधिकार का मार्ग पूर्णतः शांतिपूर्ण नहीं था और संभवतः उसे किसी प्रकार के उत्तराधिकार संघर्ष का सामना करना पड़ा। प्रयाग प्रशस्ति में वर्णित यह प्रसंग गुप्त वंश के इतिहास के स्रोत की उस परंपरा को उजागर करता है, जिसमें अभिलेखीय साक्ष्य राजनीतिक वैधता को स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

 

क्या वास्तव में उत्तराधिकार युद्ध हुआ था?

 

समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष क्या वास्तव में एक सशस्त्र युद्ध था, यह प्रश्न आधुनिक इतिहासलेखन में लंबे समय से विचार-विमर्श का विषय रहा है। प्रशस्ति में उल्लिखित तुल्यकुलज शब्द की व्याख्या ही इस विवाद का मूल केंद्र है। कुछ इतिहासकारों ने इसे समुद्रगुप्त के भाइयों अथवा गुप्त वंश के अन्य राजकुमारों के रूप में देखा और यह निष्कर्ष निकाला कि समुद्रगुप्त को अपने ही परिवार के सदस्यों से संघर्ष करना पड़ा। इसी संदर्भ में काच (Kacha) नामक व्यक्ति को उसके प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया गया।

काच नामधारी कुछ स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनका अध्ययन समुद्रगुप्त के इतिहास के स्रोत के अंतर्गत सिक्कों के ऐतिहासिक महत्व को समझने में विशेष सहायता करता है, जिनके अग्रभाग पर राजा की आकृति तथा मुद्रालेख-
काचो गामवजित्य दिव कर्मभिरुत्तमैर्जयति”
अर्थात काच पृथ्वी को जीतकर उत्तम कर्मों द्वारा स्वर्ग को जीतता है”, अंकित है। पृष्ठभाग पर सर्वराजोच्छेता’ विरुद उत्कीर्ण है, जिसका अर्थ है समस्त राजाओं का उन्मूलन करने वाला”

काच नामधारी स्वर्ण सिक्का, समुद्रगुप्त कालीन उत्तराधिकार संदर्भ
काच नामधारी स्वर्ण सिक्का, जिसे समुद्रगुप्त के उत्तराधिकार और सत्ता वैधता से जोड़कर देखा जाता है।

काच विवाद और इतिहासकारों के मत

 

इस संदर्भ में समुद्रगुप्त और काच के बीच सत्ता संघर्ष की परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है, यद्यपि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं। काच की पहचान को लेकर विद्वानों में तीव्र मतभेद है, जो गुप्त वंश की उत्पत्ति से जुड़े व्यापक वंशगत प्रश्नों की ओर भी संकेत करता है।

  • डी.आर. भंडारकर ने काच को रामगुप्त से समीकृत करने का प्रयास किया, किंतु यह मत इस कारण स्वीकार्य नहीं ठहरता कि रामगुप्त एक निर्बल शासक था और ‘सर्वराजोच्छेता’ जैसे विरुद का अधिकारी नहीं हो सकता।
  • रैप्सन और हेरास का मत है कि काच चन्द्रगुप्त प्रथम का बड़ा पुत्र था, जिसने प्रारंभ में सिंहासन प्राप्त किया, किंतु बाद में समुद्रगुप्त द्वारा पराजित कर दिया गया।

परंतु इन मतों के समर्थन में कोई ठोस समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए केवल अनुमान के आधार पर समुद्रगुप्त और काच के बीच सशस्त्र उत्तराधिकार युद्ध की परिकल्पना करना ऐतिहासिक दृष्टि से जोखिमपूर्ण प्रतीत होता है।

 

काच और समुद्रगुप्त: एक ही व्यक्ति?

 

काच और समुद्रगुप्त के सिक्कों में आश्चर्यजनक समानता पाई जाती है। इसी आधार पर एलन जैसे विद्वानों ने यह मत प्रस्तुत किया कि काच वस्तुतः समुद्रगुप्त का ही प्रारंभिक नाम था। संभव है कि समुद्रतटीय क्षेत्रों तक अपने अधिकार का विस्तार करने के बाद उसने समुद्रगुप्त नाम धारण किया हो।

यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सर्वराजोच्छेता’ विरुद का प्रयोग संपूर्ण गुप्त वंश में केवल समुद्रगुप्त के लिए ही मिलता है। इसके अतिरिक्त, काच के सिक्कों पर अंकित वाक्य और समुद्रगुप्त के अश्वमेध सिक्कों तथा प्रयाग प्रशस्ति के वर्णनों में गहरी वैचारिक समानता दृष्टिगोचर होती है।

अश्वमेध सिक्कों पर लिखा है, राजाधिराजो पृथिवीं विजित्य दिवं जयति”, जबकि प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की कीर्ति को पृथ्वी से इन्द्रलोक तक व्याप्त बताया गया है। यह समानता इस निष्कर्ष को और बल देती है कि काच और समुद्रगुप्त दो अलग व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व के दो नाम थे। इन तथ्यों के आलोक में समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष किसी दीर्घ गृहयुद्ध से अधिक, सत्ता वैधता से जुड़ा एक सीमित राजनीतिक विरोध प्रतीत होता है।

 

‘तुल्यकुलज’ शब्द की पुनर्व्याख्या

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आर.पी. त्रिपाठी ने तुल्यकुलज शब्द की एक भिन्न और अधिक तर्कसंगत व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके अनुसार, संस्कृत में तुल्य शब्द का अर्थ ‘सम’ या ‘सदृश’ होता है। अतः यहाँ इसका तात्पर्य समुद्रगुप्त के भाई नहीं, बल्कि समान स्तर के अन्य राजवंशों के शासक हो सकते हैं।

इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त के राज्यारोहण से जिन शासकों के मुख म्लान हुए, वे उसी राजनीतिक वातावरण की उपज थे, जिसकी पृष्ठभूमि गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनैतिक दशा में स्पष्ट दिखाई देती है। वे गुप्त कुल के आंतरिक सदस्य नहीं, बल्कि वे समकालीन राजा थे जिन पर समुद्रगुप्त के भावी दिग्विजय अभियानों का खतरा मंडराने लगा था। इनमें कोतकुलज, अच्युत, नागसेन आदि शासकों को सम्मिलित किया जा सकता है।

 

निष्कर्ष: संघर्ष की संभावना और ऐतिहासिक यथार्थ

 

अंततः समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष, चाहे जितना भी सीमित या अल्पकालिक रहा हो, गुप्त साम्राज्य में सत्ता संक्रमण की प्रकृति को समझने के लिए एक अनिवार्य ऐतिहासिक प्रसंग है। उपलब्ध प्रमाण किसी स्पष्ट गृहयुद्ध की पुष्टि नहीं करते। परंतु इतना स्पष्ट है कि यदि किसी प्रकार का विरोध या संघर्ष हुआ भी हो, तो समुद्रगुप्त उसमें पूर्णतः सफल रहा और शीघ्र ही अपनी सत्ता को सुदृढ़ कर लिया।

इस प्रकार समुद्रगुप्त का राज्यारोहण एक कमजोर उत्तराधिकारी का नहीं, बल्कि एक ऐसे सम्राट का उदय था जिसने आरंभ से ही अपनी शक्ति, वैधता और राजनीतिक दूरदर्शिता को स्थापित कर दिया, और यही तथ्य आगे चलकर उसे गुप्त साम्राज्य का महानतम शासक बनाता है।

 

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