समुद्रगुप्त के विजय अभियान की पृष्ठभूमि
राजधानी पाटलिपुत्र में अपनी सत्ता को सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् समुद्रगुप्त ने जिन सैन्य कार्रवाइयों का आरम्भ किया, वे केवल उत्तराधिकार की सुरक्षा तक सीमित नहीं थीं। समुद्रगुप्त के विजय अभियान एक सुविचारित साम्राज्यवादी नीति का परिणाम थे, जिनका उद्देश्य राजनीतिक वर्चस्व, शक्ति-संतुलन का पुनर्निर्माण और गुप्त राज्य की सर्वोच्चता को स्थापित करना था। चौथी शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में गंगा घाटी और मध्य भारत में अनेक स्थानीय शक्तियाँ, विशेषतः नागवंशी शासक और छोटे क्षेत्रीय वंश अब भी सक्रिय थे। ऐसे वातावरण में किसी भी उभरती शक्ति के लिए व्यापक विजय अभियान अपरिहार्य हो जाते हैं।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि समुद्रगुप्त का काल केवल राजनीतिक विखंडन का नहीं, बल्कि राजकीय वैधता के नए प्रतिमानों के निर्माण का काल था। इसी कारण उसके विजय अभियानों को केवल युद्धों की शृंखला के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक राज्य-निर्माण प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक उपयुक्त होगा। समुद्रगुप्त के विजय अभियानों को समझने के लिए समुद्रगुप्त का उत्तराधिकार संघर्ष और काच विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है।
प्रयाग प्रशस्ति और ‘धरणिबन्ध’ की अवधारणा
समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत प्रयाग प्रशस्ति है, जिसमें उसे ‘धरणिबन्ध’ अर्थात सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला कहा गया है। इस पद का शाब्दिक अर्थ भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो, किंतु इसका वास्तविक आशय तत्कालीन राजनीतिक जगत में सार्वभौम सत्ता की घोषणा से था। प्रशस्ति-लेखन की परंपरा में इस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग केवल सैन्य सफलता का वर्णन करने के लिए नहीं, बल्कि शासक की वैधता, पराक्रम और दैवी संरक्षण को स्थापित करने के लिए किया जाता था। प्रयाग प्रशस्ति, सिक्कों और अभिलेखों के माध्यम से प्राप्त जानकारी को विस्तार से समझने के लिए समुद्रगुप्त के इतिहास के स्रोत का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।
अतः ‘धरणिबन्ध’ को भौगोलिक सर्वविजय के रूप में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक क्षेत्र के संदर्भ में समझना चाहिए, जिसमें समुद्रगुप्त ने स्वयं को निर्विवाद सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। यही अवधारणा उसके विजय अभियानों की दिशा और क्रम को समझने की कुंजी प्रदान करती है। समुद्रगुप्त के विजय अभियान इसी व्यापक दृष्टि का प्रतिफल थे।

आर्यावर्त का प्रथम युद्ध
समुद्रगुप्त की दिग्विजय का प्रथम चरण आर्यावर्त के प्रथम युद्ध के रूप में सामने आता है। प्रयाग प्रशस्ति की तेरहवीं–चौदहवीं पंक्तियों में जिन तीन शासकों अच्युत, नागसेन और कोतकुलज का उल्लेख है, वे उत्तर भारत में गुप्त सत्ता के लिए प्रारम्भिक चुनौती का प्रतिनिधित्व करते थे। इस साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया को सही रूप में समझने के लिए गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनैतिक दशा पर भी दृष्टि डालना आवश्यक है। यह युद्ध किसी विस्तृत साम्राज्यवादी अधिग्रहण से अधिक सीमित किंतु रणनीतिक सैन्य कार्रवाई था, जिसका उद्देश्य संभावित प्रतिरोधी शक्तियों को प्रारम्भिक अवस्था में ही निष्क्रिय करना था।
इस संघर्ष का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहीं से समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का वास्तविक क्रम आरम्भ होता है। यह चरण शक्ति-परीक्षण का था, जिसमें समुद्रगुप्त ने यह स्पष्ट कर दिया कि गंगा घाटी और दोआब क्षेत्र में अब निर्णायक शक्ति उसके हाथों में केन्द्रित होने वाली है।
आर्यावर्त की भौगोलिक और राजनीतिक परिभाषा
‘आर्यावर्त’ की संकल्पना केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थों से युक्त थी। मनुस्मृति के अनुसार हिमालय और विन्ध्याचल के बीच तथा पूर्वी और पश्चिमी समुद्रों तक फैला क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था। इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना किसी भी शासक को सार्वभौम सत्ता का नैतिक आधार प्रदान करता था।
समुद्रगुप्त द्वारा आर्यावर्त में विजय अभियान चलाने का अर्थ था, उत्तर भारत के उस भूभाग पर प्रभुत्व स्थापित करना, जिसे परंपरागत रूप से वैध और श्रेष्ठ राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था। इस प्रकार आर्यावर्त का प्रथम युद्ध केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकात्मकता से भी जुड़ा हुआ था।
उत्तर भारत में गुप्त सत्ता के लिए प्रारम्भिक चुनौती
गुप्तों के उदय से पूर्व उत्तर भारत में नागवंशी शासकों का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय था। अहिच्छत्र, पद्मावती और दिल्ली-पंजाब क्षेत्र में नाग शक्तियाँ और स्थानीय क्षत्रप सक्रिय थे। समुद्रगुप्त के विजय अभियानों के प्रारम्भिक लक्ष्य इन्हीं शक्तियों की ओर केन्द्रित होना स्वाभाविक था, क्योंकि ये गंगा घाटी में गुप्त विस्तार के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन सकती थीं।
अच्युत, नागसेन और कोतकुलज की पहचान
अच्युत को सामान्यतः अहिच्छत्र का नागवंशी शासक माना जाता है। बरेली जनपद के रामनगर क्षेत्र से प्राप्त ‘अच्यु’ नामांकित सिक्के इस पहचान को पुष्ट करते हैं। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि सिक्के न केवल राजनीतिक सत्ता, बल्कि क्षेत्रीय नियंत्रण के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
नागसेन पद्मावती (आधुनिक पद्मपवैया, ग्वालियर जिला) का शासक था और उसका नागवंशी होना नाम और स्थल, दोनों से स्पष्ट होता है। पद्मावती स्वयं नाग शक्ति का एक प्रमुख केंद्र रही थी।
तीसरे शासक, कोतकुलज, का उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में व्यक्तिगत नाम के रूप में नहीं, बल्कि वंश-सूचक रूप में मिलता है। दिल्ली और पूर्वी पंजाब से प्राप्त ‘कोत’ नामधारी सिक्कों के आधार पर यह अनुमान किया जाता है कि वह इन्हीं क्षेत्रों का अधिपति था। यह क्षेत्र गुप्तों के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि यह उत्तर-पश्चिमी मार्गों से जुड़ा हुआ था।
क्या आर्यावर्त का प्रथम युद्ध एक संयुक्त संघर्ष था?
के. पी. जायसवाल ने यह मत प्रस्तुत किया है कि अच्युत, नागसेन और कोतकुलज ने एक संयुक्त संघ बनाकर समुद्रगुप्त का सामना किया और यह युद्ध कौशाम्बी के समीप हुआ। यह मत आकर्षक अवश्य है, किंतु इसकी समस्या यह है कि प्रयाग प्रशस्ति न तो किसी संघ का उल्लेख करती है और न ही युद्ध-स्थल का।
अतः अधिक संतुलित निष्कर्ष यही प्रतीत होता है कि समुद्रगुप्त ने इन शासकों को अलग-अलग या क्रमिक अभियानों में पराजित किया। यहाँ निर्णायक प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध संयुक्त था या पृथक, बल्कि यह है कि इस संघर्ष के माध्यम से नागवंशी शक्ति का प्रथम सैन्य दमन सम्पन्न हुआ।
आर्यावर्त के प्रथम युद्ध की प्रकृति
इस युद्ध की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि समुद्रगुप्त ने इन शासकों का पूर्ण उन्मूलन नहीं किया। उसने केवल उन्हें पराजित कर अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध की। यह तथ्य आगे चलकर आर्यावर्त के द्वितीय युद्ध को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। जहाँ चन्द्रगुप्त प्रथम का इतिहास गुप्त साम्राज्य की स्थापना को स्पष्ट करता है, वहीं समुद्रगुप्त के विजय अभियान उसके वास्तविक विस्तार को दर्शाते हैं।
इस चरण में समुद्रगुप्त की नीति स्पष्टतः प्रदर्शनात्मक पराक्रम की थी। वह यह संकेत देना चाहता था कि अंतिम सत्ता उसके हाथ में है, किंतु प्रशासनिक विलय को उसने इस समय आवश्यक नहीं समझा। यही कारण है कि बाद में उत्तर भारत में पुनः संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई।
समुद्रगुप्त का दक्षिणापथ अभियान: दिशा परिवर्तन के कारण
आर्यावर्त में प्रारम्भिक स्थिरता स्थापित करने के बाद समुद्रगुप्त ने अपने विजय अभियानों की दिशा दक्षिणापथ की ओर मोड़ी। यह निर्णय आकस्मिक नहीं था। उत्तर भारत में शक्ति-संतुलन स्थापित कर लेने के बाद दक्षिण की ओर बढ़ना उसे एक ऐसे विजेता के रूप में प्रस्तुत करता था, जिसकी प्रतिष्ठा सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में स्थापित हो सके।
इतिहासकार लेवी का यह मत विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत के अभियानों के पीछे आर्थिक उद्देश्य भी कार्य कर रहे थे। पूर्वी और दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्रों के समृद्ध बंदरगाह, समुद्री व्यापार और संचित संपत्ति गुप्त साम्राज्य के लिए अत्यंत आकर्षक थे। इस प्रकार दक्षिणापथ अभियान समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीति का एक स्वाभाविक और परिपक्व चरण था।
इस प्रकार आर्यावर्त का प्रथम युद्ध और उसके पश्चात् दक्षिण की ओर बढ़ना, समुद्रगुप्त के विजय अभियानों की प्रारम्भिक रूपरेखा को स्पष्ट करता है। यह चरण शक्ति-परीक्षण, वैचारिक उद्घोषणा और रणनीतिक दिशा-निर्धारण का था। यहीं से समुद्रगुप्त उस मार्ग पर अग्रसर होता है, जो आगे चलकर दक्षिणापथ की दिग्विजय, उत्तर भारत के निर्णायक पुनर्गठन और गुप्त साम्राज्य की वास्तविक स्थापना में परिणत होता है।
दक्षिणापथ अभियान: समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का निर्णायक चरण
आर्यावर्त में प्रारम्भिक शक्ति-संतुलन स्थापित करने के पश्चात् समुद्रगुप्त ने अपने विजय अभियानों की दिशा दक्षिणापथ की ओर मोड़ी। यह अभियान न तो आकस्मिक था और न ही केवल प्रतिष्ठा-प्रदर्शन तक सीमित। प्रयाग प्रशस्ति की उन्नीसवीं और बीसवीं पंक्तियों में दक्षिणापथ के बारह राज्यों तथा उनके शासकों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें समुद्रगुप्त ने पराजित किया, परन्तु बाद में कृपा कर पुनः सत्ता में प्रतिष्ठित कर दिया।
यह तथ्य दक्षिणापथ अभियान को आर्यावर्त के युद्धों से भिन्न बनाता है। उत्तर भारत में जहाँ समुद्रगुप्त ने प्रत्यक्ष उन्मूलन और विलय की नीति अपनाई, वहीं दक्षिण में उसने विजय के पश्चात् अनुग्रह को प्राथमिकता दी। इसी कारण दक्षिणापथ अभियान को उसके विजय अभियानों का सर्वाधिक परिपक्व और दूरदर्शी चरण माना जाता है।
दक्षिणापथ की भौगोलिक सीमा और राजनीतिक संदर्भ
‘दक्षिणापथ’ से तात्पर्य विन्ध्य पर्वत के दक्षिण से लेकर कृष्णा-तुंगभद्रा नदियों के बीच फैले प्रदेश से है। तमिल राज्य चोल, चेर और पाण्ड्य, इस परिधि से बाहर थे। महाभारत में भी विदर्भ और कोसल के दक्षिण के प्रदेश को दक्षिणापथ कहा गया है। इस भौगोलिक क्षेत्र में अनेक छोटे-बड़े राज्य विद्यमान थे, जो उत्तर भारत और दक्कन के बीच सांस्कृतिक तथा आर्थिक सेतु का कार्य करते थे। गंगा घाटी में विजय के पश्चात् समुद्रगुप्त का दक्षिण की ओर बढ़ना उसकी दिग्विजय नीति का स्वाभाविक विस्तार था।
दक्षिणापथ के बारह राज्य: विजय और पुनः प्रतिष्ठा
प्रयाग प्रशस्ति में जिन बारह शासकों का उल्लेख मिलता है, वे इस प्रकार हैं, कोसल का महेन्द्र, महाकान्तार का व्याघ्रराज, कौराल का मण्टराज, पिष्टपुर का महेन्द्रगिरि, कोट्टूर का स्वामीदत्त, एरण्डपल्ल का दमन, काञ्ची का विष्णुगोप, अवमुक्त का नीलराज, वेङ्गी का हस्तिवर्मा, पालक्क का उग्रसेन, देवराष्ट्र का कुबेर तथा कुस्थलपुर का धनञ्जय। इन राज्यों की विशेषता यह थी कि समुद्रगुप्त ने इन्हें जीतने के बाद अपने प्रत्यक्ष शासन में सम्मिलित नहीं किया। प्रयाग प्रशस्ति में स्पष्ट उल्लेख है कि उन्मूलित राजवंशों को पुनः प्रतिष्ठित करने से उसकी कीर्ति सर्वत्र फैल गई। यही नीति इतिहासकारों द्वारा उसकी धर्मविजय नीति कही जाती है।
राज्यों की पहचान और ऐतिहासिक साक्ष्य
दक्षिणी कोसल से तात्पर्य आधुनिक रायपुर, बिलासपुर और सम्भलपुर क्षेत्रों से है। महाकान्तार सम्भवतः उड़ीसा का वनप्रदेश था, जिसे ‘महावन’ कहा गया है। पिष्टपुर की पहचान आन्ध्र प्रदेश के गोदावरी जनपद स्थित पिठापुरम् से की जाती है।
काञ्ची स्पष्टतः आधुनिक काञ्चीवरम् है और विष्णुगोप को पल्लव वंश से सम्बद्ध माना जाता है। वेङ्गी कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच स्थित था, जहाँ हस्तिवर्मा सालंकायन वंश का शासक था। देवराष्ट्र की पहचान डूब्रील ने विशाखापट्टनम् जनपद के एलमचिली परगने से की है, जबकि कुस्थलपुर को बार्नेट ने उत्तरी आर्काट के पोलूर के समीप स्थित माना है। इन सूक्ष्म भौगोलिक पहचानों से यह स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त का दक्षिणापथ अभियान कोई प्रतीकात्मक यात्रा नहीं, बल्कि सुविचारित और व्यापक विजय अभियान था।
क्या दक्षिण में समुद्रगुप्त को पराजय मिली थी?
इतिहासकार डूब्रील ने यह मत प्रस्तुत किया कि पूर्वी दक्कन के शासकों, विशेषतः विष्णुगोप के नेतृत्व में एक संघ बना, जिसने समुद्रगुप्त को कोल्लेर झील के समीप पराजित किया। इसी आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि समुद्रगुप्त को उड़ीसा के तटीय प्रदेशों से लौटना पड़ा।
किन्तु यह मत प्रयाग प्रशस्ति के स्पष्ट कथनों से मेल नहीं खाता। प्रयाग प्रशस्ति में विष्णुगोप सहित दक्षिण के शासकों की पराजय का स्पष्ट उल्लेख है और यह भी कहा गया है कि समुद्रगुप्त काञ्ची तक विजय करता हुआ पहुँचा। यदि उसे कोई निर्णायक पराजय मिली होती, तो प्रयाग प्रशस्ति का पूर्ण मौन रहना असंगत प्रतीत होता है।
मार्ग-विवाद और वाकाटक प्रश्न
कुछ विद्वानों का मत है कि समुद्रगुप्त पूर्वी घाट से दक्षिण गया और वापसी में पश्चिमी घाट से लौटा। परन्तु यह मत भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि पश्चिमी दक्कन में उस समय वाकाटक एक शक्तिशाली सत्ता थे। यदि समुद्रगुप्त का वाकाटकों से प्रत्यक्ष संघर्ष हुआ होता, तो उसका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में अवश्य मिलता।
वास्तविकता यह प्रतीत होती है कि समुद्रगुप्त ने वाकाटकों से सीधा संघर्ष टालते हुए मध्य भारत में उनके सामन्तों को पराजित किया। प्रयाग प्रशस्ति का व्याघ्रराज वस्तुतः वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन का सामन्त व्याघ्रदेव था। एरण अभिलेख भी मध्य भारत में गुप्त प्रभुत्व की पुष्टि करता है। इस विजय से मध्य भारत में वाकाटक प्रभाव समाप्त हुआ और वे पश्चिमी दक्कन तक सीमित रह गए।
दक्षिणापथ अभियान की नीति: दूरदर्शिता और व्यावहारिकता
समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के राज्यों को अपने प्रत्यक्ष शासन में सम्मिलित न कर एक व्यावहारिक नीति अपनाई। ये राज्य राजधानी से अत्यधिक दूर थे और तत्कालीन आवागमन की कठिनाइयों के कारण उन्हें नियंत्रित रखना कठिन था। अतः अधीनता स्वीकार करवाकर उन्हें स्वतंत्र छोड़ देना अधिक उपयुक्त था।
यही नीति उसकी महानता का प्रमाण है। उसने स्थायी प्रशासन के स्थान पर राजनैतिक वर्चस्व और श्रद्धा को प्राथमिकता दी, जिससे दक्षिण के राज्य उसे सम्राट स्वीकार करते रहे।
दक्षिणापथ अभियान का आर्थिक उद्देश्य
इतिहासकार लेवी का मत है कि दक्षिणापथ अभियान के पीछे आर्थिक उद्देश्य भी निहित थे। दक्षिण और पूर्वी तटीय क्षेत्रों के समृद्ध बंदरगाह समुद्री व्यापार से अपार संपत्ति अर्जित कर चुके थे। इस संदर्भ में खारवेल द्वारा पाण्ड्य राज्य से मुक्तामणियों की प्राप्ति का उदाहरण उल्लेखनीय है। मध्यकालीन यात्रियों और लेखकों ने भी दक्षिण भारत की विपुल संपत्ति का उल्लेख किया है। अतः यह अनुमान स्वाभाविक है कि समुद्रगुप्त को दक्षिण अभियान से भेंट, उपहार और संभवतः लूट के रूप में पर्याप्त धन प्राप्त हुआ होगा, जिसने गुप्त साम्राज्य की आर्थिक नींव को सुदृढ़ किया।
दक्षिणापथ अभियान का ऐतिहासिक महत्व
दक्षिणापथ अभियान समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का वह चरण है, जहाँ उसकी रणनीतिक परिपक्वता, कूटनीतिक कौशल और आर्थिक दृष्टि एक साथ दिखाई देती है। यह अभियान यह स्पष्ट करता है कि समुद्रगुप्त केवल तलवार के बल पर नहीं, बल्कि विवेक और नीति के माध्यम से साम्राज्य का निर्माण कर रहा था। यहीं से गुप्त साम्राज्य एक क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़कर उपमहाद्वीपीय राजनीतिक सत्ता के रूप में उभरता है।
आर्यावर्त का द्वितीय युद्ध
दक्षिणापथ के अभियान से लौटने के बाद समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत में पुनः एक युद्ध लड़ा, जिसे ‘आर्यावर्त का द्वितीय युद्ध’ कहा जाता है। ऐसा लगता है कि प्रथम युद्ध में उन्होंने उत्तर भारत के राजाओं को केवल पराजित ही किया था, उनका पूर्ण उन्मूलन नहीं। सम्राट की राजधानी से अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उत्तर के शासकों ने फिर से स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया। इसलिए, दक्षिण की विजय से वापस आने पर समुद्रगुप्त ने उन्हें पूरी तरह से उखाड़ फेंका। इस नीति को प्रयाग प्रशस्ति में ‘प्रसभोद्धरण‘ कहा गया है। यह दक्षिण में अपनाई गई ‘ग्रहण-मोक्ष-अनुग्रह‘ नीति के विपरीत थी। समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के राजाओं का विनाश कर उनके राज्यों को अपने विशाल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।
प्रत्यन्त (सीमावर्ती) राज्यों की विजय और अधीनता
समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी सीमावर्ती शक्तियों के साथ अपनाई गई नीति में दिखाई देता है। प्रयाग प्रशस्ति की बाईसवीं पंक्ति में जिन प्रत्यन्त राज्यों का उल्लेख हुआ है, उनके विषय में यह स्पष्ट कहा गया है कि वे समुद्रगुप्त को कर देते थे, उसकी आज्ञाओं का पालन करते थे तथा राजधानी में उपस्थित होकर प्रणाम करते थे। यह विवरण इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि इन राज्यों पर गुप्त सत्ता का स्वरूप प्रत्यक्ष प्रशासन का नहीं, बल्कि पराक्रम-जनित अधीनता का था।
इन राज्यों ने संभवतः किसी निर्णायक युद्ध के बिना ही समुद्रगुप्त की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली थी। इसका कारण यह था कि आर्यावर्त और दक्षिणापथ में प्राप्त उसकी विजयों ने उसे उस स्तर की प्रतिष्ठा प्रदान कर दी थी, जिसके सामने प्रतिरोध व्यर्थ प्रतीत होता था। इस प्रकार प्रत्यन्त राज्यों की अधीनता समुद्रगुप्त के विजय अभियानों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को भी उजागर करती है।
उत्तर और उत्तर-पूर्वी सीमाएँ: राजतंत्रीय राज्य
प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित समतट, डवाक, कामरूप, कर्तृपुर और नेपाल, ये सभी उत्तर और उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित राजतंत्रीय राज्य थे। समतट से तात्पर्य पूर्वी बंगाल के समुद्रतटीय प्रदेश से है, जबकि डवाक की पहचान प्रायः असम के नौगाँव क्षेत्र से की जाती है। कामरूप आधुनिक असम का केन्द्रीय भाग था और नेपाल गण्डक तथा कोसी नदियों के बीच स्थित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता था, जहाँ उस समय लिच्छवियों का शासन था। इन राज्यों की अधीनता का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इससे समुद्रगुप्त को न केवल सामरिक सुरक्षा मिली, बल्कि पूर्वी भारत के व्यापारिक मार्गों पर भी प्रभाव स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ। यह स्थिति आगे चलकर गुप्त साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि में सहायक सिद्ध हुई।
पूर्वी सीमाएँ और ताम्रलिप्ति का व्यापारिक महत्त्व
पूर्वी बंगाल और समतट क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित होने का एक प्रत्यक्ष परिणाम यह था कि समुद्रगुप्त को ताम्रलिप्ति जैसे समृद्ध बंदरगाहों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त हुआ। ताम्रलिप्ति से मलय प्रायद्वीप, लंका, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों तक नियमित समुद्री व्यापार होता था। स्थल मार्गों द्वारा भी यह बंदरगाह बंगाल और उत्तर भारत के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ था।
इस प्रकार प्रत्यन्त राज्यों की अधीनता केवल राजनीतिक विस्तार नहीं थी, बल्कि उसने गुप्त साम्राज्य के लिए व्यापारिक और आर्थिक लाभ के नए द्वार खोल दिए। समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का यह पक्ष यह दर्शाता है कि साम्राज्य-निर्माण में आर्थिक कारक कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी सीमा पर गणराज्य
प्रत्यन्त राज्यों की दूसरी श्रेणी में वे गणराज्य आते हैं, जो पंजाब, राजस्थान, मालवा और मध्य भारत में फैले हुए थे। प्रयाग प्रशस्ति में मालव, अर्जुनायन, यौधेय, मद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानीक, काक और खरपरिक गणराज्यों का उल्लेख मिलता है। ये राज्य समुद्रगुप्त के साम्राज्य की पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित थे और अपनी सैन्य परंपराओं के लिए प्रसिद्ध थे।
इन गणराज्यों की अधीनता का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि ये पूर्ण राजतंत्र नहीं थे, बल्कि सामूहिक शासन की परंपरा से जुड़े हुए थे। समुद्रगुप्त द्वारा इनकी अधीनता यह सिद्ध करती है कि उसके विजय अभियानों का प्रभाव केवल कमजोर राजाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने संगठित गणतांत्रिक शक्तियों को भी अपनी श्रेष्ठता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

विदेशी शक्तियाँ और समुद्रगुप्त की अंतरराज्यीय प्रतिष्ठा
समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर तक दिखाई देता है। प्रयाग प्रशस्ति में जिन विदेशी शक्तियों कुषाण, शक, मुरुण्ड और सिंहल का उल्लेख है, उनके विषय में यह कहा गया है कि वे विभिन्न उपायों द्वारा समुद्रगुप्त की सेवा करते थे और गरुड़-मुद्रा से अंकित राजाज्ञा की प्रार्थना करते थे।
‘देवपुत्रषाहिषाहानुषाहि’ शब्दावली से कुषाण शासकों का संकेत मिलता है। कुषाण गुप्तो के समय पश्चिमी पंजाब में निवास करते थे तथा उनका शासक देवपुत्र, षाहि एवं वाहानुषाहि की उपाधियाँ ग्रहण करता था। समुद्रगुप्त का समकालीन कुषाण नरेश किदार कुषाण था जो पेशावर क्षेत्र का राजा था। कुछ विद्वानों का विचार है कि देवपुत्र, षाहि तथा षाहानुषाहि से तात्पर्य तीन कुषाण राजाओं से है। प्रत्येक शासक एक-एक उपाधि ग्रहण करता था। डी. आर. भण्डारकर के अनुसार यह एक (देवपुत्र+षाहि+षाहानुषाहि) संयुक्त पद है, जो कुषाणों की प्रसिद्ध उपाधि ‘देवपुत्रमहाराजाधिराज’ से संबंधित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कुषाण शासक समुद्रगुप्त की श्रेष्ठता स्वीकार कर चुके थे। शक शासकों के सिक्कों पर गुप्त प्रकार का प्रभाव भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करता है। समुद्रगुप्त का समकालीन शक शासक रुद्रसिंह तृतीय (348-378 ईस्वी) था।
मुरुण्ड और उत्तर भारत का प्रश्न
मुरुण्डों की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। टालमी के भूगोल और चीनी स्रोतों से ज्ञात होता है कि पूर्वी भारत में मुरुण्डों का एक शक्तिशाली राज्य था। सुधाकर चट्टोपाध्याय का मत है कि इन्हीं मुरुण्डों ने समुद्रगुप्त के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित किया होगा। एलन ने उन्हें पाटलिपुत्र से जोड़ा है, यद्यपि यह मत पूर्णतः निर्विवाद नहीं है। इन मतभेदों के बावजूद इतना स्पष्ट है कि मुरुण्ड शक्ति भी समुद्रगुप्त के प्रभुत्व से अछूती नहीं रही।
सिंहल और समुद्रपार संबंध
सिंहल (लंका) के नरेश मेघवर्ण द्वारा समुद्रगुप्त के पास दूतमंडल भेजा जाना और बोधिवृक्ष के समीप बौद्ध विहार के निर्माण की अनुमति प्राप्त करना गुप्त साम्राज्य की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सशक्त प्रमाण है।
प्रयाग प्रशस्ति में ‘आदि सर्वद्वीपवासिभिः’ का उल्लेख यह संकेत देता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों के साथ भी भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध बने हुए थे। जावा से प्राप्त तन्त्रिकामन्दक ग्रंथ में उल्लिखित ऐश्वर्यपाल द्वारा स्वयं को समुद्रगुप्त का वंशज बताना इस प्रभाव की व्यापकता को दर्शाता है।

अश्वमेध यज्ञ: सैन्य विजय की वैचारिक परिणति
समुद्रगुप्त के विजय अभियानों की वैचारिक पूर्णता उसके अश्वमेध यज्ञ में परिलक्षित होती है। यद्यपि प्रयाग प्रशस्ति में इसका उल्लेख नहीं मिलता, परन्तु स्कन्दगुप्त के भितरी लेख और अश्वमेध प्रकार के सिक्के इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि समुद्रगुप्त ने इस यज्ञ का आयोजन किया था। गुप्तो के पूर्व पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किये थे। प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रलेख मे समुद्रगुप्त को ‘अनेक अश्वमेध यज्ञों को करने वाला भनेकाश्वमेधयाजिन) कहा गया है।
समुद्रगुप्त के ‘अश्वमेध-पराक्रमः’ उत्कीर्ण सिक्के यह स्पष्ट करते हैं कि यह यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि सार्वभौम सत्ता की राजनीतिक घोषणा भी था। इससे समुद्रगुप्त के विजय अभियानों को वैदिक वैधता प्राप्त हुई।
समेकित विश्लेषण: समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का ऐतिहासिक महत्व
यदि समुद्रगुप्त के विजय अभियानों को समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि वे किसी एकरूप नीति पर आधारित नहीं थे। उत्तर भारत में उसने उन्मूलन और प्रत्यक्ष शासन की नीति अपनाई, दक्षिण में विजय के बाद अनुग्रह की, सीमावर्ती राज्यों के साथ भय-जनित अधीनता की और विदेशी शक्तियों के साथ कूटनीतिक प्रभुत्व की। यही बहुस्तरीय रणनीति समुद्रगुप्त को साधारण विजेता से अलग करती है और उसे भारतीय इतिहास के महानतम साम्राज्य-निर्माताओं की श्रेणी में स्थापित करती है।
निष्कर्ष
समुद्रगुप्त के विजय अभियान केवल युद्धों की श्रृंखला नहीं थे, बल्कि वे सत्ता, वैधता, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के समन्वय से निर्मित एक सुविचारित साम्राज्यवादी परियोजना थे। इसी कारण वह गुप्त साम्राज्य को न केवल विस्तृत कर सका, बल्कि उसे स्थायित्व और प्रतिष्ठा भी प्रदान कर सका।
इस प्रकार समुद्रगुप्त भारतीय इतिहास में उस शासक के रूप में उभरता है, जिसने तलवार के साथ-साथ नीति और विवेक के माध्यम से भारत का प्रथम सुदृढ़ साम्राज्य निर्मित किया।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
