फाहियान की भारत यात्रा: गुप्तकालीन समाज, धर्म और प्रशासन का सजीव चित्र

फाहियान और गुप्तकालीन भारत

 

गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का एक स्थिर, संगठित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध युग माना जाता है। इस काल को समझने के लिए केवल अभिलेखों और साहित्यिक ग्रंथों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विदेशी यात्रियों के विवरण इस युग की सामाजिक-धार्मिक वास्तविकताओं को उजागर करने में विशेष भूमिका निभाते हैं। इन्हीं यात्रियों में चीनी बौद्ध भिक्षु फाहियान की भारत यात्रा अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

399 ईस्वी से 414 ईस्वी के बीच फाहियान ने भारत के अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया। यद्यपि वह अपने समकालीन शासक का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लेता, फिर भी उसका यात्रा-वृत्तांत गुप्तकालीन भारत की शांति, सुव्यवस्था, नैतिक जीवन और धार्मिक सहिष्णुता का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। इतिहासकारों के लिए फाहियान का विवरण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक प्रत्यक्षदर्शी विदेशी पर्यवेक्षक की दृष्टि से लिखा गया है, जो तत्कालीन भारतीय समाज को बाहरी दृष्टिकोण से देखता है

फाहियान की भारत यात्रा पर आधारित चीनी बौद्ध भिक्षु फाहियान
चीनी बौद्ध यात्री फाहियान, जिसकी भारत यात्रा गुप्तकालीन समाज और धर्म को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

फाहियान का परिचय और बौद्ध पृष्ठभूमि

 

फाहियान का जन्म चीन के वु-यांग (Wu-yang) नामक स्थान में हुआ था। बचपन से ही वह बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित हुआ और युवावस्था में उसने भिक्षु जीवन अपना लिया। बौद्ध संघ में प्रवेश के बाद उसने विनय-पिटक और बौद्ध आचार-संहिता का गंभीर अध्ययन किया। उसका व्यक्तित्व एक साधारण यात्री का नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और बौद्धिक जिज्ञासा से प्रेरित भिक्षु-विद्वान का था।

चीन में उस समय उपलब्ध बौद्ध ग्रंथ अधूरे और अप्रामाणिक माने जाते थे। विशेष रूप से विनय-ग्रंथों की शुद्ध प्रतियों का अभाव था। इसी कमी ने फाहियान को भारत यात्रा के लिए प्रेरित किया। उसके लिए भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि बुद्ध की भूमि और धर्म का मूल स्रोत था। इसलिए फाहियान की भारत यात्रा को केवल तीर्थ-यात्रा कहना उचित नहीं होगा; यह एक धार्मिक-बौद्धिक अभियान था।

 

भारत यात्रा का उद्देश्य: ग्रंथ, तीर्थ और परंपरा

 

फाहियान की भारत यात्रा के पीछे तीन स्पष्ट उद्देश्य दिखाई देते हैं।

  • पहला, बौद्ध विनय-ग्रंथों की प्रामाणिक प्रतियाँ प्राप्त करना।
  • दूसरा, बुद्ध के जीवन से जुड़े पवित्र स्थलों के दर्शन करना।
  • तीसरा, विभिन्न देशों में बौद्ध धर्म की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करना।

यह ध्यान देने योग्य है कि फाहियान का दृष्टिकोण मिशनरी नहीं था। वह भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने नहीं आया, बल्कि सीखने और संकलन करने के उद्देश्य से आया था। यही कारण है कि उसके विवरण में अतिशयोक्ति कम और प्रेक्षण (observation) अधिक दिखाई देता है। इस कारण फाहियान की भारत यात्रा से प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी को अपेक्षाकृत विश्वसनीय माना जाता है

फाहियान की भारत यात्रा का चीन से भारत तक मार्ग
यह मानचित्र फाहियान की भारत यात्रा के स्थल और समुद्री मार्ग को दर्शाता है, जिससे भारत–चीन संपर्क की ऐतिहासिक दिशा स्पष्ट होती है।

फाहियान की भारत यात्रा की तिथि और ऐतिहासिक संदर्भ

 

इतिहासकारों में इस बात पर सामान्य सहमति है कि फाहियान भारत में लगभग 399 ईस्वी में पहुँचा और 414 ईस्वी में चीन लौटा। यह काल गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल से मेल खाता है। यद्यपि फाहियान अपने वृत्तांत में किसी शासक का नाम नहीं लेता, फिर भी जिस राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक शांति का वह वर्णन करता है, वह चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन की विशेषताओं से पूरी तरह मेल खाती है। यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि फाहियान के विवरण में युद्ध, विद्रोह या अराजकता का कोई उल्लेख नहीं मिलता। यह मौन अपने-आप में इस बात का संकेत है कि गुप्तकालीन भारत उस समय राजनीतिक रूप से सुरक्षित और संगठित था। इसलिए इतिहासकार उसके विवरण को एक प्रकार का negative evidence भी मानते हैं, जहाँ अशांति का अभाव ही स्थिरता का प्रमाण बन जाता है।

 

फाहियान की भारत यात्रा का मार्ग: मध्य एशिया से उत्तर-पश्चिम भारत

 

फाहियान की भारत यात्रा का मार्ग केवल एक भौगोलिक विवरण नहीं है, बल्कि यह पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में भारत, मध्य एशिया और चीन के बीच विकसित सांस्कृतिक, धार्मिक और बौद्धिक संपर्कों को समझने की कुंजी है। फाहियान जिस मार्ग से भारत पहुँचा, वह प्राचीन काल से व्यापार, विचार और धर्म के आदान-प्रदान का प्रमुख मार्ग रहा था। इस यात्रा-पथ से यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध धर्म केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक परंपरा का रूप ले चुका था, जिसके केंद्र भारत, गंधार और मध्य एशिया में फैले हुए थे।

महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि फाहियान ने इस मार्ग को किसी राजकीय संरक्षण में नहीं, बल्कि भिक्षु-संघों और विहारों के सहारे पार किया। इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय बौद्ध संस्थाएँ इतनी संगठित और समृद्ध थीं कि वे दूर-दराज़ से आने वाले यात्रियों को आश्रय, भोजन और सुरक्षा प्रदान कर सकती थीं। अतः फाहियान का यात्रा मार्ग हमें गुप्तकालीन भारत की राजनीतिक स्थिरता, सीमा क्षेत्रों की सुरक्षा, और बौद्ध धर्म की संस्थागत शक्ति, तीनों का अप्रत्यक्ष प्रमाण देता है।

इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में फाहियान की भारत यात्रा का मार्ग केवल “कहाँ-कहाँ गया” का विवरण न रहकर, समकालीन विश्व-व्यवस्था में भारत की केंद्रीय भूमिका को भी रेखांकित करता है।

 

मध्य एशिया में बौद्ध धर्म की स्थिति

फाहियान ने अपनी यात्रा चीन की राजधानी चांगान से प्रारम्भ की और शान-शान पहुँचा। यहाँ उसने लगभग 4,000 हीनयान भिक्षुओं का उल्लेख किया है। यह विवरण इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि पाँचवीं शताब्दी तक मध्य एशिया बौद्ध धर्म का एक सक्रिय क्षेत्र बन चुका था।

इसके बाद उसने करशहर, खोतान और काशगर की यात्रा की। खोतान का वर्णन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ उसने गोसती विहार में लगभग 10,000 महायान भिक्षुओं को देखा। इससे यह स्पष्ट होता है कि महायान बौद्ध धर्म का प्रसार भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि मध्य एशिया में भी उसकी गहरी जड़ें थीं।

 

गंधार और उत्तर-पश्चिम भारत में प्रवेश

सिंधु नदी पार कर फाहियान ने उद्यान, गंधार, तक्षशिला और पेशावर की यात्रा की। पेशावर में उसने कनिष्क द्वारा निर्मित प्रसिद्ध चैत्य को देखा। उसके अनुसार यह क्षेत्र स्तूपों, विहारों और स्मारकों से भरा हुआ था। यह विवरण गंधार क्षेत्र की दीर्घकालीन बौद्ध परंपरा की पुष्टि करता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि फाहियान का यह मार्ग वही है जिसे प्राचीन काल में व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क मार्ग के रूप में प्रयोग किया जाता था। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत और मध्य एशिया के बीच संपर्क केवल धार्मिक नहीं, बल्कि बहुआयामी था।

 

मध्यदेश की अवधारणा और उसका ऐतिहासिक महत्त्व

 

फाहियान की भारत यात्रा में “मध्यदेश” (Middle Kingdom) का वर्णन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यही वह क्षेत्र था जिसे वह भारतीय सभ्यता का मूल केंद्र मानता है। मध्यदेश का उल्लेख केवल एक भौगोलिक सीमा के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और नैतिक इकाई के रूप में किया गया है। फाहियान के अनुसार, पंजाब पार करने के बाद वास्तविक “भारत” आरम्भ होता है, जहाँ ब्राह्मण धर्म का प्रभाव, सामाजिक अनुशासन और राजनीतिक स्थिरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

मध्यदेश की यह अवधारणा इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि गुप्तकालीन भारत में राजनीतिक एकरूपता के साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी विद्यमान था। यह वही क्षेत्र था जहाँ से प्रशासनिक आदर्श, सामाजिक मान्यताएँ और धार्मिक परंपराएँ पूरे उत्तर भारत में प्रसारित होती थीं।

 

फाहियान के अनुसार गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था

 

फाहियान के विवरण में प्रशासनिक संस्थाओं का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता, परंतु उसकी टिप्पणियाँ गुप्तकालीन शासन की प्रकृति और चरित्र को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। उसका विवरण प्रत्यक्ष न होकर अनुभवजन्य संकेतों पर आधारित है, जो इसे और भी महत्त्वपूर्ण बनाता है।

 

राज्य और नागरिक के संबंध

फाहियान मध्यदेश का वर्णन विस्तारपूर्वक करता है। यह ब्राह्मणों का देश था जहाँ लोग सुखी एवं समृद्ध थे। फाहियान के अनुसार नागरिकों को न तो अपने निवास का पंजीकरण कराना पड़ता था और न ही उन्हें न्यायालयों में अनावश्यक रूप से उपस्थित होना पड़ता था। लोग जहाँ चाहें, वहाँ स्वतंत्र रूप से जा-आ सकते थे। यह विवरण इस बात का प्रमाण है कि गुप्तकालीन राज्य अत्यधिक नियंत्रणवादी नहीं था, बल्कि समाज को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान करता था।

यह स्थिति आधुनिक शब्दों में कहें तो minimum interference governance का संकेत देती है, जहाँ राज्य की भूमिका सुरक्षा और स्थिरता तक सीमित थी, न कि दैनिक जीवन में हस्तक्षेप तक।

 

दंड व्यवस्था और कानून की प्रकृति

फाहियान के अनुसार गुप्तकालीन दंड विधान अत्यंत मृदु था। मृत्यु-दंड और शारीरिक यंत्रणाओं का सामान्यतः अभाव था। अधिकांश अपराधों में आर्थिक दंड लगाए जाते थे। केवल बार-बार राजद्रोह करने वाले व्यक्ति का दायाँ हाथ काटे जाने का उल्लेख मिलता है।

यह विवरण दो महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करता है:

  • पहला, अपराधों की संख्या कम थी।
  • दूसरा, राज्य का उद्देश्य दमन नहीं, बल्कि निवारण और सुधार था।

इस प्रकार, फाहियान का वर्णन गुप्तकालीन प्रशासन को मानवीय, स्थिर और नैतिक शासन के रूप में प्रस्तुत करता है

 

गुप्तकालीन समाज: फाहियान की दृष्टि में

 

फाहियान द्वारा प्रस्तुत सामाजिक चित्रण गुप्तकालीन भारत को एक अनुशासित, नैतिक और धार्मिक समाज के रूप में दर्शाता है। यद्यपि यह दृष्टिकोण पूर्णतः निष्पक्ष नहीं है, फिर भी इससे तत्कालीन सामाजिक मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।

 

जाति व्यवस्था और सामाजिक बहिष्करण

फाहियान स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है कि चाण्डालों को समाज से बहिष्कृत माना जाता था। वे नगरों से बाहर रहते थे और सामान्य समाज से उनका संपर्क सीमित था। यह विवरण गुप्तकालीन समाज की वर्ण-आधारित संरचना को उजागर करता है, जहाँ सामाजिक शुद्धता की अवधारणा अत्यंत प्रबल थी।

यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर समाज नैतिक और अहिंसक दिखता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक असमानता भी स्पष्ट रूप से विद्यमान थी।

 

नैतिक आचार-विचार और जीवन-शैली

फाहियान के अनुसार मध्यदेश में लोग मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करते थे। जीव-हत्या को सामाजिक रूप से निषिद्ध माना जाता था। बाजारों में न तो बूचड़खाने थे और न ही मदिरालय।

यह विवरण गुप्तकालीन समाज की अहिंसा-प्रधान नैतिक चेतना को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था, बल्कि दैनिक जीवन को नियंत्रित करने वाली शक्ति था।

 

दान, धर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व

फाहियान के अनुसार धनी और कुलीन वर्ग मंदिरों और विहारों का निर्माण कराते थे तथा उनके निर्वाह के लिए दान देते थे। धार्मिक परिवार भिक्षुओं के लिए भोजन और वस्त्र की व्यवस्था करते थे। यह सामाजिक दानशीलता गुप्तकालीन समाज में धर्म और कर्तव्य के गहरे संबंध को दर्शाती है

 

गुप्तकालीन आर्थिक जीवन और नगरीय व्यवस्था

 

फाहियान का आर्थिक विवरण प्रत्यक्ष न होकर सामाजिक व्यवहार के माध्यम से सामने आता है, परंतु यह विवरण अत्यंत मूल्यवान है।

 

कृषि, भूमि और कर व्यवस्था

उसके अनुसार जो लोग सरकारी भूमि पर खेती करते थे, उन्हें उपज का एक भाग राजा को देना पड़ता था। यह एक नियमित और व्यवस्थित कर-प्रणाली का संकेत है। कहीं भी अत्यधिक कर या उत्पीड़न का उल्लेख नहीं मिलता, जिससे कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की स्थिरता स्पष्ट होती है।

 

नगर, बाजार और मुद्रा प्रणाली

बाजारों में क्रय-विक्रय के लिए कौड़ियों का प्रयोग होता था। पशुओं का व्यापार और शिकार केवल चाण्डालों तक सीमित था। यह विवरण नगरीय जीवन की नैतिक और नियंत्रित प्रकृति को दर्शाता है। नगर केवल व्यापारिक केंद्र नहीं थे, बल्कि धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के भी प्रमुख स्थल थे।

 

गुप्तकालीन भारत की धार्मिक स्थिति: फाहियान की दृष्टि

 

फाहियान की भारत यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उसका धार्मिक अवलोकन है, क्योंकि वह स्वयं एक बौद्ध भिक्षु था और भारत को मुख्यतः धर्म की भूमि के रूप में देखता है। उसके विवरण से यह स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल में धार्मिक जीवन केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक आचरण और राज्य-व्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ था। फाहियान ने कपिलवस्तु नगर को उजड़ा हुआ पाया।

फाहियान यह स्वीकार करता है कि यद्यपि भारत में बौद्ध धर्म विद्यमान था, फिर भी ब्राह्मण धर्म का प्रभुत्व अधिक था। यह तथ्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह गुप्तकाल को केवल “बौद्ध काल” के रूप में देखने की धारणा को खंडित करता है। वास्तव में यह काल धार्मिक सहअस्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

 

बौद्ध धर्म की स्थिति और संघ संगठन

फाहियान ने जहाँ-जहाँ यात्रा की, वहाँ बौद्ध विहार, स्तूप और भिक्षु-संघ सक्रिय अवस्था में पाए गए। श्रावस्ती का जेतवन विहार, संकिसा, वैशाली, कुशीनगर और बोधगया जैसे स्थल बौद्ध आस्था के प्रमुख केंद्र बने हुए थे। भिक्षुओं के लिए भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था समाज द्वारा की जाती थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध संघ को सामाजिक समर्थन प्राप्त था।

 

ब्राह्मण धर्म का प्रभाव और सहअस्तित्व

यद्यपि फाहियान बौद्ध था, फिर भी वह यह स्वीकार करता है कि मध्यदेश मुख्यतः ब्राह्मण धर्म का क्षेत्र था। धार्मिक आचार-विचार, सामाजिक नियम और नैतिक संहिताएँ ब्राह्मण परंपरा से प्रभावित थीं। इसके बावजूद बौद्ध धर्म के प्रति किसी प्रकार का दमन या शत्रुता दिखाई नहीं देती। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि गुप्तकालीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता राज्य-नीति का अंग थी।

 

मगध, पाटलिपुत्र और नालन्दा: गुप्तकालीन समृद्धि का केंद्र

 

फाहियान का मगध और पाटलिपुत्र का विवरण गुप्तकालीन भारत की राजनीतिक, धार्मिक और बौद्धिक उन्नति को सर्वाधिक स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। वह मगध को मध्य भारत का सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र मानता है।

पाटलिपुत्र में उसने अशोक के राजमहल को देखा, जिसकी भव्यता से वह अत्यंत प्रभावित हुआ। वह लिखता है कि यह महल मानो दैत्यकृत हो। यह वर्णन केवल स्थापत्य प्रशंसा नहीं है, बल्कि मौर्यकालीन परंपराओं की गुप्तकाल तक निरंतरता का संकेत भी देता है। फाहियान मगध साम्राज्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मध्य भारत के समस्त क्षेत्रों में यहीं सबसे अधिक नगरीय बस्तियाँ थीं। यहाँ के लोग सुख-समृद्धि से परिपूर्ण थे तथा वे धार्मिक अनुष्ठानों और कर्तव्य पालन में आपस में प्रतिस्पर्धा करते थे। धनाढ्य लोगों ने यहाँ चिकित्सा केंद्र स्थापित किए थे, जहाँ रोगियों को नि:शुल्क भोजन और दवाइयाँ उपलब्ध कराई जाती थीं।

नालन्दा, राजगृह और बोधगया के उसके विवरण से यह स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल में शिक्षा और धर्म परस्पर गहराई से जुड़े थे। नालन्दा न केवल एक बौद्ध विहार था, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक केंद्र के रूप में उभर रहा था, जहाँ दूर-दराज़ से विद्यार्थी आते थे।

 

ताम्रलिप्ति और समुद्री संपर्क

 

फाहियान की भारत यात्रा का अंतिम चरण ताम्रलिप्ति (तामलुक) से जुड़ा है, जो उस समय एक प्रमुख बंदरगाह था। यहाँ 24 विहार थे। यहाँ उसने दो वर्षों तक निवास किया और बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार कीं। यह तथ्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत न केवल स्थल मार्गों से, बल्कि समुद्री मार्गों द्वारा भी चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ा हुआ था। ताम्रलिप्ति से लंका और पूर्वी द्वीपों की ओर उसकी यात्रा गुप्तकालीन भारत की समुद्री व्यापारिक और सांस्कृतिक क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत करती है।

 

फाहियान का यात्रा-वृत्तांत: ऐतिहासिक स्रोत के रूप में मूल्यांकन

 

इतिहासलेखन की दृष्टि से फाहियान का विवरण अत्यंत मूल्यवान है, परंतु इसे अंध-स्वीकृति के साथ नहीं अपनाया जा सकता।

एक ओर, उसका विवरण प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण गुप्तकालीन भारत की शांति, सुव्यवस्था, सामाजिक नैतिकता और धार्मिक सहिष्णुता को प्रमाणित करता है। दूसरी ओर, उसका दृष्टिकोण पूर्णतः बौद्ध-केंद्रित है। उसने ब्राह्मण धर्म, प्रशासनिक संस्थाओं और राजकीय संरचना का विस्तृत वर्णन नहीं किया। फिर भी, जहाँ अभिलेख और साहित्य मौन हैं, वहाँ फाहियान की भारत यात्रा से प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी गुप्तकालीन भारत को समझने का एक अनिवार्य साधन बन जाती है

 

फाहियान की भारत यात्रा का समग्र ऐतिहासिक महत्त्व

 

निष्कर्षतः, फाहियान की भारत यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थ-यात्रा नहीं थी, बल्कि यह गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और नैतिक संरचना का दर्पण है। उसके विवरण से यह स्पष्ट होता है कि यह काल राजनीतिक स्थिरता, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक अनुशासन का युग था। इसी कारण फाहियान का यात्रा-वृत्तांत गुप्तकालीन इतिहास का एक मूलभूत और अपरिहार्य स्रोत माना जाता है।

 

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