मौर्यकालीन सामाजिक जीवन: जाति व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति और संस्कृति का यथार्थ

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन: एक परिचय

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें समाज की संरचना में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे। इस काल में जाति व्यवस्था, पारिवारिक संरचनाएं, और सामाजिक वर्गों का स्पष्ट रूप से विभाजन हुआ था। मौर्य साम्राज्य के दौरान, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के शासन में समाज में सुधारों के साथ-साथ कई प्रथाओं का विकास हुआ। मौर्यकालीन सामाजिक व्यवस्था में सुधारों और परंपराओं का समन्वय देखा जा सकता है। मौर्य साम्राज्य के दौरान, चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासन में समाज को एक नया रूप मिला। मौर्यकालीन समाज में दार्शनिकों का महत्वपूर्ण स्थान था, वहीं कृषक, कारीगर, और सैनिक वर्ग भी विशेष रूप से अपनी भूमिकाओं में व्यस्त रहते थे। इस लेख में, हम मौर्य काल में सामाजिक संरचना, विभिन्न वर्गों और उनके अधिकारों पर चर्चा करेंगे, जिससे समाज की जटिलता और विकास को समझा जा सके।

 

Here is an illustration of Mauryan society, depicting the four varnas—Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras—engaged in their respective roles within a detailed and harmonious setting
मौर्यकालीन समाज में चारों वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की भूमिका को दर्शाता चित्र।  

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन और जाति व्यवस्था

 

मौर्य काल तक आते-आते भारतीय समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था एक स्थिर रूप ले चुकी थी। इस समय तक जाति व्यवस्था भी जन्म आधारित हो गई थी, यानी व्यक्ति की जाति उसके जन्म से तय होती थी। मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था का विशेष महत्व रखने लगी थी। मौर्य काल  की सामाजिक स्थिति को जानने के लिए युनानी लेखक मेगस्थनीज के विवरणों से कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उन्होंने भारतीय समाज में सात वर्गों का उल्लेख किया था। ये वर्ग थे: दार्शनिक, कृषक, पशुपालक, कारीगर, योद्धा, निरीक्षक और मंत्री।

 

वर्ण और जाति व्यवस्था का प्रभाव

 

वर्ण व्यवस्था के आधार पर व्यक्ति को अपनी जाति के बाहर न तो विवाह करने की अनुमति थी और न ही अन्य पेशे अपनाने की। हालांकि, दार्शनिक इस नियम से बाहर थे, वे किसी भी वर्ग से संबंध रखते हुए समाज में शिक्षा और संस्कृति के रक्षक माने जाते थे। मेगस्थनीज के विवरण से स्पष्ट होता है कि मौर्यकालीन समाज में व्यवसाय ही जाति की पहचान बन गया। इस वर्गीकरण से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में सभी जातियों और वर्गों का विवरण नहीं मिलता।

 

मौर्यकालीन समाज में दार्शनिक वर्ग का महत्व

 

दार्शनिक समाज के बुद्धिजीवी वर्ग थे। इनका समाज में एक अहम स्थान था। उन्हें राजदरबार में भी सम्मान मिलता था और राज्य अपने राजस्व का एक हिस्सा इनकी भरण-पोषण पर खर्च करता था। वे समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यह वर्ग ब्राह्मण और श्रमण दोनों से मिलकर बनता था।

 

दार्शनिकों का सादा जीवन और अध्ययन परंपरा

 

दार्शनिक मौर्यकालीन समाज की सादगी और ज्ञानप्रियता के प्रतीक थे। दार्शनिक अपना समय अध्ययन और शास्त्रार्थ में ही बिताते थे। कुछ दार्शनिक तो जंगलों में निवास करते थे, जहां वे कन्दमूल फल खाते थे और वृक्षों की छाल पहनते थे। इन सन्यासियों का उल्लेख यूनानी लेखकों के अलावा अशोक के अभिलेखों में भी मिलता है। अशोक के अभिलेखों में गृहस्थ सन्यासियों और वनों में विचरण करने वाले श्रमणों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे मौर्यकालीन धार्मिक और सामाजिक संतुलन झलकता है।

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में चार आश्रमों की परंपरा

 

मौर्यकालीन समाज में चार आश्रमों की व्यवस्था भी प्रचलित थी। यह व्यवस्था समाज के जीवन के चार प्रमुख चरणों को निर्धारित करती थी। इनमें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के आश्रम शामिल थे। इन आश्रमों का उद्देश्य जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की दिशा में संतुलित करना था। यह व्यवस्था मौर्यकालीन सामाजिक जीवन के नैतिक और अनुशासित स्वरूप को दर्शाती है।

 

मौर्यकालीन समाज में वर्ग व्यवस्था और सामाजिक स्थिति

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन का आधार कृषक वर्ग था। वे सरल जीवन जीते थे और नगरों की हलचल से दूर रहते थे। मेगस्थनीज के अनुसार, कृषक हमेशा अपने कामों में व्यस्त रहते थे, यहाँ तक कि जब सैनिक युद्ध करते थे, तब भी वे अपनी कृषि कार्य में लगे रहते थे। उनका जीवन बहुत सादा था, और वे पूरी तरह से अपनी खेती में ही व्यस्त रहते थे। मेगस्थनीज के अनुसार, वे समाज की आर्थिक रीढ़ थे।

 

मौर्यकालीन समाज में क्षत्रिय वर्ग की भूमिका

 

कृषकों के बाद, समाज में सबसे अधिक संख्या क्षत्रियों की थी। क्षत्रिय समाज की सुरक्षा और शासन के उत्तरदायी थे। वे मुख्यतः सैनिक कार्य करते थे और उनका जीवन भी बहुत ही अनुशासित था। वे समाज की सुरक्षा के लिए समर्पित होते थे और हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहते थे। कृषि, कारीगरी और व्यापार जैसे अन्य पेशे से वे मुक्त थे।

 

ग्राम्य जीवन और कारीगर वर्ग का योगदान

 

कृषक, कारीगर और व्यापारी वर्ग मौर्यकालीन सामाजिक जीवन की आर्थिक सक्रियता का केंद्र थे। वे  सैनिक कार्यों से मुक्त रहते थे और ज्यादातर गांवों में निवास करते थे। वहीं, पशुपालक और शिकारी खानाबदोश जीवन जीते थे। कुछ शिकारी तो राज्य की ओर से कृषि को नुकसान पहुँचाने वाले जंगली जानवरों को मारने के लिए नियुक्त किए जाते थे और इसके बदले उन्हें पारितोषिक मिलता था। यह समाज की न्यायप्रियता को दर्शाता है।

 

कारीगरों और श्रमिकों की स्थिति

 

कारीगरों का समाज में विशेष स्थान था और उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाता था। यदि किसी ने कारीगरों के अंग-क्षति की, तो राज्य की ओर से उसे दंडित किया जाता था। अर्थशास्त्र से यह भी पता चलता है कि समाज में दासों की स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक थी। उन्हें अपनी संपत्ति रखने और बेचने का अधिकार था। जो लोग उनके साथ अनुचित व्यवहार करते थे, उन्हें दंडित किया जाता था। यह सामाजिक न्याय और श्रम की प्रतिष्ठा को दर्शाता है।

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में शूद्रों की स्थिति

 

शूद्र वर्ग मौर्यकालीन समाज का एक आवश्यक अंग था। मौर्यकाल में समाज में शूद्रों की स्थिति को लेकर विभिन्न आधुनिक इतिहासकारों की अलग-अलग राय रही है। कुछ इतिहासकारों, जैसे रोमिला थापर और आर. एस. शर्मा, का मानना है कि मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति बहुत दयनीय थी। वे इसे यूनान और रोम के दासों के समान मानते हैं। इनका कहना है कि मौर्यकाल में शूद्रों को कठोर राजकीय नियंत्रण का सामना करना पड़ा और उन्हें एक प्रकार की दासता की स्थिति में रखा गया। हालांकि, इस पर अन्य इतिहासकारों के मत भिन्न हैं, जो इसे अतिवादी दृष्टिकोण मानते हैं।

 

इतिहासकारों की दृष्टि में मौर्यकालीन शूद्र वर्ग

 

रोमिला थापर और आर. एस. शर्मा का कहना है कि मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति बेहद कठिन थी। वे यह मानते हैं कि मौर्यकाल में राजकीय नियंत्रण बहुत कठोर था और शूद्रों की स्थिति रोम के हेलाटो (Heylots) जैसी थी। थापर के अनुसार, अशोक ने कलिंग युद्ध में बंदी बनाए गए डेढ़ लाख लोगों को बंजर भूमि को साफ करने और नई बस्तियों को बसाने के लिए काम में लगाया था। शर्मा भी मौर्यकालीन समाज की तुलना यूनान और रोम से करते हुए कहते हैं कि भारतीय समाज में दास जैसी स्थिति शूद्रों के साथ थी। वे यह मानते हैं कि शूद्रों का काम भी वही था जो यूनान और रोम में दासों का था, यद्यपि भारतीय समाज को दास समाज नहीं माना जाता था।

 

लेकिन क्या मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति वाकई इतनी दयनीय थी? 

 

यह विचार कुछ हद तक अतिवादी हो सकता है। कई पुरानी रिपोर्ट्स और ग्रंथों में हमें यह जानकारी मिलती है कि भारत में दास-प्रथा का प्रचलन यूनान और रोम जैसा नहीं था। उदाहरण के लिए, यूनानी लेखक मेगस्थनीज ने भारतीय समाज में दास-प्रथा के अस्तित्व का कोई उल्लेख नहीं किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में दासों की स्थिति यूनान और रोम के दासों से कहीं बेहतर थी। इससे सिद्ध होता है कि मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में शूद्रों की स्थिति तुलनात्मक रूप से स्वतंत्र थी।

 

कलिंग युद्ध के बाद सामाजिक परिवर्तन

 

अशोक के बारे में यह कहा गया है कि उसने कलिंग युद्ध के बंदियों को बंजर भूमि को साफ करने में लगाया था। हालांकि, इस बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता कि इन बंदियों को विशेष रूप से शूद्रों के समान दास जैसी स्थिति में रखा गया था। इसके बजाय, यह संभव है कि इन बंदियों को उनके स्थान से हटाकर उन्हें अन्य कार्यों में लगाया गया हो, जैसे कि विद्रोह की संभावना को समाप्त करना। अतः इस मत को प्रमाणित करना मुश्किल है कि इन लोगों को केवल शूद्रों की तरह ही काम में लगाया गया था। अशोक द्वारा युद्धबंदियों को श्रम कार्य में लगाना प्रशासनिक आवश्यकता थी, दासता नहीं। यह मौर्यकालीन समाज के मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।

 

दासता और श्रमिक व्यवस्था का तुलनात्मक विश्लेषण

 

इतिहासकार डॉ. ओम प्रकाश ने स्पष्ट किया है कि दास और श्रमिकों में अंतर है। उन्होंने कहा कि दास वह होते हैं जिनका स्वामित्व दूसरे के पास होता है, जबकि बंधुआ मजदूर या औद्योगिक मजदूरों का स्वामित्व किसी और के पास नहीं होता। इस प्रकार, यदि हम शूद्रों को केवल कार्य करने के कारण दास मानते हैं, तो यह गलत होगा। वास्तव में, शूद्रों के पास भूमि खरीदने, संपत्ति रखने और अन्य अधिकारों की भी सुविधा थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे सामाजिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

 

मौर्यकालीन शूद्रों के अधिकार और कर्तव्य

 

मौर्यकाल में शूद्रों को कृषि, पशुपालन और वाणिज्य के कार्यों में संलग्न होने का अधिकार था। “अर्थशास्त्र” और “गौतम धर्मसूत्र” में  शूद्रों को इन कार्यों का पालन करने का निर्देश दिया गया है। मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में उन्हें संपत्ति का अधिकार और सेना में भर्ती का अवसर भी प्राप्त था। इस प्रकार, मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति इतनी भी खराब नहीं थी जैसी कि यूनान और रोम के दासों की थी।

 

शूद्रों के सामाजिक-आर्थिक अधिकार

 

गौतम धर्मसूत्र” और “मनुस्मृति” में भी शूद्रों को संपत्ति का अधिकार दिया गया था। “अर्थशास्त्र” में शूद्रों को “वार्ता” अर्थात् कृषि और व्यापार के कार्य करने की अनुमति दी गई है। यह दिखाता है कि मौर्यकाल में शूद्रों के पास कुछ अधिकार थे, जिन्हें हम यूनान और रोम के दासों के समान नहीं मान सकते। इसके अलावा, मनुस्मृति में यह भी कहा गया है कि शूद्रों को संपत्ति का अधिकार था, जो उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर को दर्शाता है।

मौर्य काल में भारतीय समाज बहुत ही संरचित और विभिन्न वर्गों में विभाजित था। कृषक, कारीगर, व्यापारी, और क्षत्रिय प्रत्येक वर्ग अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। शूद्रों को भी समाज में सम्मान और अधिकार प्राप्त थे। ये कहना गलत होगा की मौर्यकाल में शूद्रों की स्थिति यूनान और रोम के दासों जैसी थी। शूद्रों के पास संपत्ति रखने का अधिकार था, वे कृषि और व्यापार में संलग्न हो सकते थे और उन्हें अन्य अधिकार भी प्राप्त थे। यद्यपि मौर्यकाल में राजकीय नियंत्रण था, परंतु शूद्रों की स्थिति दास की तरह नहीं थी। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि मौर्यकालीन समाज में शूद्रों की स्थिति यूनान और रोम के समाज से कहीं बेहतर थी। मौर्य काल का समाज एक संतुलित और समृद्ध समाज था, जहां विभिन्न वर्गों को अपनी-अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिला था। इससे यह स्पष्ट होता है कि मौर्यकालीन समाज में दासता के स्थान पर श्रम का सम्मान था।

 

मौर्यकालीन सामाजिक और पारिवारिक जीवन

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन का आधार संयुक्त परिवार था। यह प्रथा काफी सामान्य थी और परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते थे। इस समय में लड़कों के लिए वयस्कता की आयु 36 वर्ष और कन्याओं के लिए 12 वर्ष मानी जाती थी। समाज में विवाह की कई प्रथाएं प्रचलित थीं। इस समय तलाक की प्रथा भी थी, जो पति-पत्नी की संपत्ति से संबंधित थी। अगर पति लंबे समय तक विदेश में रहता या उसकी शारीरिक स्थिति खराब होती, तो पत्नी उसे त्याग सकती थी। इसके साथ ही, यदि पत्नी अवैध संबंधों में लिप्त होती या बांझ होती, तो पति उसे त्याग सकता था।

 

मौर्यकालीन समाज में स्त्रियों के अधिकार

 

मौर्यकालीन स्त्रियाँ समाज में सम्मानजनक स्थान रखती थीं। अगर पति की मृत्यु हो जाती थी, तो स्त्री पुनर्विवाह कर सकती थी। विवाहिता के द्वारा प्राप्त उपहार और आभूषण को उसकी संपत्ति, अर्थात स्त्रीधन माना जाता था। इसके अलावा, यदि पति ने पत्नी के साथ अत्याचार किया होता, तो वह न्यायालय में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कर सकती थी। ऐसी स्थिति में, राज्य की ओर से पति को दंडित किया जाता था। कुलीन परिवारों में बहुविवाह की प्रथा भी थी।

 

मौर्यकालीन समाज में विवाह और सामाजिक प्रथाएं

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में अंतरजातीय विवाह भी प्रचलित थे। उच्च जाति के व्यक्ति का निम्न जाति में विवाह को ‘अनुलोम‘ और उच्च जातीय कन्या का निम्न जाति के व्यक्ति से विवाह को ‘प्रतिलोम‘ कहा जाता था। चंद्रगुप्त मौर्य का यूनानी कन्या से विवाह मौर्यकालीन सामाजिक जीवन की उदारता का उदाहरण था। यूनानी लेखकों के अनुसार, स्त्रियों को सम्राट की अंगरक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता था। मौर्यकालीन सामाजिक व्यवस्था में पर्दा प्रथा भी प्रचलित थी, जो विशेष रूप से उच्च वर्गों में सीमित थी।

 

मौर्यकालीन समाज में अन्तःपुर और गणिकाओं की स्थिति

 

अर्थशास्त्र में स्त्रियों के लिए ‘असूर्यपश्या’ (सूर्य को न देखने वाली), ‘अवरोधन’ और ‘अन्तःपुर’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि पर्दा-प्रथा का समाज में प्रचलन था। इसके अतिरिक्त, गणिकाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनकी देखभाल के लिए ‘गणिकाध्यक्ष‘ नामक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। इन गणिकाओं में नर्तकियां, गायिकाएं और अभिनेत्री शामिल थीं। यह मौर्यकालीन संस्कृति की संगठित सामाजिक प्रणाली को दर्शाता है।

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन में भोजन और मितव्ययिता

 

यूनानी लेखकों ने भारतीयों के मितव्ययी और सरल जीवन का उल्लेख किया है। मेगस्थनीज के अनुसार, भारतीय लोग सत्य और गुणों का समान रूप से आदर करते थे। उनका भोजन अन्न, फल, दूध और मांस से बना होता था। अन्न में गेहूं, चावल और जौ का उपयोग होता था। मेगस्थनीज ने भारतीयों के खाने के तरीके का वर्णन करते हुए कहा कि जब वे खाने बैठते थे, तो उनके सामने एक सोने का प्याला रखा जाता था, जिसमें सबसे पहले चावल डाले जाते थे, फिर अन्य पकवान परोसे जाते थे।

 

मौर्यकालीन समाज में वस्त्र, आभूषण और मनोरंजन

 

मौर्यकालीन भारतीय वस्त्रों और आभूषणों के शौकिन थे। उनके कपड़े सोने और बहुमूल्य पत्थरों से जड़े होते थे। बड़े लोग अक्सर छत्र धारण किए हुए सेवकों के साथ चलते थे। इसके अलावा, रथ-दौड़, घुड़दौड़, सांड़-युद्ध और हाथी-युद्ध जैसे खेलों से मनोरंजन किया जाता था। नट, नर्तक, गायक और विदूषक जैसे लोग समाज में मनोरंजन का एक अहम हिस्सा थे। अशोक ने हिंसक खेलों पर रोक लगाकर मौर्यकालीन समाज में नैतिकता को प्रोत्साहित किया।

 

अशोक के सामाजिक सुधार और उत्सव परंपरा

 

राज्य की ओर से अनेक उत्सवों और मेलों का आयोजन किया जाता था। इन आयोजनों से समाज का मनोरंजन और सांस्कृतिक विकास होता था। हालांकि, अशोक ने कुछ हिंसक मनोरंजन के साधनों पर पाबंदी लगाई थी। इसके तहत अशोक ने धार्मिक सहिष्णुता और अहिंसा के सिद्धांतों को सामाजिक जीवन में लागू करने का प्रयास किया।

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन का सारांश

 

मौर्यकालीन सामाजिक जीवन विविधता, अनुशासन और नैतिकता का संगम था। इसमें पारिवारिक संरचना से लेकर सामाजिक प्रथाओं तक हर पहलू पर विशेष ध्यान दिया गया था। महिलाओं के अधिकारों को लेकर समाज में कई सुधार थे, जैसे कि संपत्ति का अधिकार और न्याय के लिए क़ानूनी समर्थन। भारतीय समाज का जीवन बहुत ही मितव्ययी, नैतिक और अनुशासित था। इसके साथ ही, समाज में विभिन्न प्रकार के मनोरंजन और उत्सव भी आयोजित किए जाते थे। अशोक के समय में कुछ सुधारों के कारण समाज में हिंसा और अत्याचार को कम करने की कोशिश की गई। इन सबने मौर्यकालीन समाज को एक सशक्त और समृद्ध स्वरूप दिया।

संक्षेप में कहा जाए तो, मौर्यकालीन सामाजिक जीवन भारतीय इतिहास की सबसे सुव्यवस्थित और संतुलित सामाजिक व्यवस्थाओं में से एक था।

 

 

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