दिल्ली सल्तनत का स्वरूप : राज्य, धर्म, सत्ता और समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण

 

किसी भी राज्य के स्वरूप को समझने के लिए उसे केवल शासन की संरचना या सत्ता के केंद्रीकरण तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होता। राज्य को उन लोगों की परंपराओं, विचारों और विश्वासों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिन पर वह शासन करता है। इसके साथ-साथ समाज की संरचना, विशेषतः शासक वर्ग का चरित्र, अन्य शक्ति-सम्पन्न कुलीनों तथा जनसाधारण के साथ उसके संबंध और उत्पादन की प्रणाली तथा उत्पादन संबंध भी राज्य की प्रकृति को निर्धारित करते हैं।

दिल्ली सल्तनत का स्वरूप केवल यह प्रश्न नहीं है कि सुल्तान कितना शक्तिशाली था या प्रशासन कितना केंद्रीकृत था। यह उससे कहीं अधिक व्यापक प्रश्न है, कि मध्यकालीन भारत में राज्य की प्रकृति क्या थी, वह किन सामाजिक-आर्थिक शक्तियों पर आधारित था, और उसने शासक वर्ग तथा जनसाधारण के बीच किस प्रकार के संबंध निर्मित किए।

दिल्ली सल्तनत का स्वरूप समझने के लिए आवश्यक है कि हम उसे केवल सैन्य विजय या इस्लामी शासन के रूप में न देखें, बल्कि एक ऐसे राज्य के रूप में समझें जो भारतीय परंपराओं, इस्लामी राजनीतिक चिंतन, और व्यावहारिक शासन आवश्यकताओं के बीच विकसित हुआ। इस दृष्टि से, दिल्ली सल्तनत न तो पूर्णतः धर्मतांत्रिक थी और न ही मात्र सैनिक निरंकुशता; उसका राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्वरूप निरंतर परिवर्तनशील रहा।

 

भारत में राज्य की प्रकृति पर वैचारिक परंपरा

 

भारत में राज्य की प्रकृति, उसके उद्भव, राजतंत्र के स्वरूप, शासक का प्रजा के प्रति दृष्टिकोण, धर्म तथा धार्मिक संस्थाओं के साथ संबंध, और यहाँ तक कि विद्रोह के अधिकार जैसे प्रश्नों पर विचार अत्यंत प्राचीन है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र इस बात का प्रमाण है कि भारत में राजनीतिक चिंतन की एक समृद्ध परंपरा पहले से मौजूद थी, जिसमें अनेक ऐसी विचारधाराओं का उल्लेख मिलता है जो आज हमारे लिए लुप्त हो चुकी हैं। राज्य की प्रकृति पर यह विमर्श महाभारत, जैन ग्रंथों और धर्मशास्त्रों में भी दिखाई देता है। सामान्यतः राजनीति (राजनीति-नीति) और धर्मनीति को अलग-अलग, किंतु परस्पर निर्भर इकाइयों के रूप में देखा गया। यह वैचारिक पृष्ठभूमि बाद के कालों में भी भारतीय समाज में सक्रिय रही।

 

इस्लामी राजनीतिक चिंतन और राज्य की अवधारणा

 

मुस्लिम राजनीतिक विचारधारा किसी एक निश्चित रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल ऐतिहासिक विकास के माध्यम से आकार ग्रहण करती है। अबू यूसुफ याकूबी, अल-फाराबी, अल-मावर्दी और अल-ग़ज़ाली जैसे विचारकों ने विशेष रूप से उस दौर में राज्य की अवधारणा को स्पष्ट किया जब अब्बासी खलीफात का पतन हो रहा था और वास्तविक सत्ता स्वतंत्र सुल्तानों के हाथों में केंद्रित हो रही थी।

सैद्धांतिक रूप से खलीफा या इमाम में आध्यात्मिक और सांसारिक सत्ता की एकता का सिद्धांत बनाए रखा गया, किंतु व्यवहार में सुल्तानों को स्वतंत्र स्थिति दी गई, बशर्ते वे खलीफा की सैद्धांतिक श्रेष्ठता को स्वीकार करें। इस प्रकार, इस्लामी एकता की धारणा बनी रही, जबकि राजनीतिक व्यवहार में सुल्तान काफी हद तक स्वतंत्र रहे, जब तक वे खुले रूप से शरिया का उल्लंघन न करें।

 

भारत आए तुर्क और व्यावहारिक राजनीति

भारत आए तुर्क शासक इस इस्लामी वैचारिक ढाँचे से परिचित थे, किंतु वे अपनी जनजातीय और कुल परंपराओं से भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके। उन्होंने अपनी राजनीतिक व्यवहार में स्वयं को अत्यंत व्यावहारिक सिद्ध किया, साथ ही इस्लामी कानून (शरिया) के ढाँचे के भीतर रहने का प्रयास भी किया। यही व्यावहारिकता आगे चलकर दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्वरूप की एक प्रमुख विशेषता बनी।

 

राज्य की कानूनी और राजनीतिक प्रकृति

 

कानूनी दृष्टि से दिल्ली सल्तनत को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में तब देखा जा सकता है जब 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक, जो मुहम्मद गोरी का गुलाम था, सत्ता में आया और ग़ज़नी की अधीनता का अंत हुआ। हालाँकि, इल्तुतमिश द्वारा सत्ता के सुदृढ़ीकरण तक ग़ज़नी के शासकों ने दिल्ली सल्तनत के क्षेत्रों पर संप्रभुता का दावा बनाए रखा। वास्तव में, यह स्थिति मंगोल नेता चंगेज़ ख़ान द्वारा ग़ज़नी की विजय के बाद बदली। इसके परिणामस्वरूप मुहम्मद गोरी के उत्तराधिकारी याल्दुज को उत्तर भारत की ओर पीछे हटना पड़ा। 1215-16 ई. में इल्तुतमिश ने उसे पराजित किया, जिसके बाद वह सिंध क्षेत्र की ओर भाग गया, जहाँ उसे क़ुबाचा ने बंदी बनाकर समाप्त कर दिया। इस घटना के बाद दिल्ली सल्तनत की स्वतंत्रता निर्विवाद हो गई।

 

खलीफा से संबंध : कानूनी नहीं, नैतिक प्रश्न

स्वतंत्रता के बावजूद दिल्ली के सुल्तान इस्लामी दुनिया के साथ अपने संबंध बनाए रखना चाहते थे। इसका एक प्रमुख माध्यम बग़दाद के अब्बासी खलीफा से मंशूर (निवेश पत्र) प्राप्त करना था। 1229 ई. में इल्तुतमिश ने खलीफा से मंशूर और सम्मान-वस्त्र प्राप्त किए। इसके बाद दिल्ली के सुल्तानों ने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित किया और जुमे की नमाज़ के ख़ुतबे में उसका उल्लेख कराया। जिसने उसकी स्थिति को इस्लामी विश्व में नैतिक और प्रतीकात्मक वैधता प्रदान की, न कि कानूनी अधीनता।

सुल्तान स्वयं को नासिर-ए-अमीर-उल-मोमिनीन अर्थात् खलीफा का प्रतिनिधि कहने लगे। कुछ इतिहासकारों ने इसे दिल्ली के सुल्तानों की कानूनी अधीनता का प्रमाण माना है, किंतु समकालीनों की दृष्टि में यह प्रश्न मुख्यतः नैतिक और प्रतीकात्मक था। मंशूर प्राप्त करने से पहले भी दिल्ली के सुल्तानों की स्वतंत्रता पर कोई प्रश्न नहीं उठा था, और न ही तब जब मुबारक शाह खिलजी ने खलीफा की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर स्वयं को इमाम घोषित किया।

 

तुगलक काल और खलीफात की घटती प्रासंगिकता

मुहम्मद बिन तुगलक ने आंतरिक विद्रोहों के दौर में, 1343 ई. में काहिरा में रह रहे अब्बासी वंशज से निवेश प्राप्त किया। उसने अपने सिक्कों से अपना नाम हटाकर खलीफा का नाम अंकित कराया, किंतु इन कदमों का विद्रोही सरदारों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा।

फिरोजशाह तुगलक ने भी दो बार मंशूर और सम्मान-वस्त्र प्राप्त किए, किंतु इस समय तक अब्बासी खलीफा की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी। आगे चलकर तैमूर और मुगल शासकों ने स्वयं इमाम या खलीफा की उपाधि ग्रहण कर ली। इस प्रकार, भारत के संदर्भ में खलीफात की संस्था धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो गई।

 

तुर्की राज्य की स्थापना और सत्ता-संरचना का प्रारंभिक स्वरूप

 

तुर्कों के आगमन के साथ उत्तर भारत में एक ऐसे राज्य की स्थापना हुई जो पूर्ववर्ती राजपूत राज्यों से संरचनात्मक रूप से भिन्न था। प्रारंभिक चरण में सल्तनत का स्वरूप एक विजयकारी सैन्य राज्य का था, जिसमें सुल्तान के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अंतर्गत एक केंद्रीय सेना रखी गई, जबकि सैन्य सरदारों को देश के विभिन्न भागों में विजय और नियंत्रण के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान की गई।

इस अवस्था में राज्य को एक प्रकार की ढीली या विकेंद्रित निरंकुशता (loose despotism) के रूप में देखा जा सकता है। यह व्यवस्था विस्तार के लिए उपयुक्त थी, किंतु स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुई।

 

केंद्रीकरण की प्रक्रिया : बलबन का प्रयोग

 

राज्य की इस प्रारंभिक ढीली संरचना को सबसे निर्णायक रूप से बदलने का प्रयास बलबन ने किया। उसने सल्तनत को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राज्य में परिवर्तित करने का प्रयास किया, जहाँ सुल्तान की सर्वोच्चता निर्विवाद हो।

बलबन का उद्देश्य केवल विद्रोहों को दबाना नहीं था, बल्कि कुलीन वर्ग की सामूहिक शक्ति को तोड़कर सत्ता को सुल्तान के हाथों में केंद्रित करना था। उसके शासनकाल में यह स्पष्ट हो गया कि सुल्तान और कुलीनों के बीच सत्ता-संघर्ष का निर्णय सुल्तान के पक्ष में हो चुका है।

 

कुलीन वर्ग की विफलता और सुल्तान की विजय

तुर्की कुलीन एक संगठित वर्ग के रूप में कार्य करने में असफल रहे। वे न तो किसी एक वजीर के नेतृत्व में एकजुट हो सके, और न ही सुल्तान की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए कोई स्थायी संस्थागत व्यवस्था विकसित कर पाए। इसका परिणाम यह हुआ कि सत्ता का केंद्रीकरण सुल्तान के पक्ष में तय हो गया, और यह प्रवृत्ति 14वीं शताब्दी के अंत तक बनी रही।

 

केंद्रीकरण की सीमाएँ : तुगलक और लोदी काल

 

यद्यपि बलबन के बाद सल्तनत का स्वरूप मुख्यतः केंद्रीकृत बना रहा, फिर भी यह केंद्रीकरण न तो पूर्ण था और न ही निरंतर। जलालुद्दीन खिलजी के अधीन कुछ शिथिलता दिखाई देती है, और तुगलक काल के अंत तक यह संरचना गंभीर दबाव में आ गई।

तुगलकों के पतन और लोदियों के सत्ता में आने के बाद विकेंद्रित निरंकुशता की दिशा में एक संक्षिप्त प्रयोग हुआ। अफगान जनजातीय सरदारों ने सत्ता में अधिक हिस्सेदारी का दावा किया, जिससे सुल्तान और कुलीनों के बीच नए संघर्ष उत्पन्न हुए। यही संघर्ष अंततः 1526 ई. में में पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी की पराजय और सल्तनत के अंत का एक प्रमुख कारण बना।

 

13वीं-14वीं शताब्दी में राज्य की बदलती प्रकृति

 

यद्यपि दिल्ली सल्तनत को प्रायः एक समान राजनीतिक संरचना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वास्तविकता यह है कि 13वीं और 14वीं शताब्दियों के बीच उसके स्वरूप में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। विदेशी विजय से संस्थागत शासन की ओर संक्रमण, तथा शासक वर्ग और समाज के संबंधों में आया यह बदलाव, सल्तनत की प्रकृति को अधिक जटिल बनाता है।

 

13वीं शताब्दी : विदेशी विजय का संस्थानीकरण

13वीं शताब्दी में सल्तनत मुख्यतः एक विदेशी विजय का संस्थागत रूप थी। शासक वर्ग, जो अधिकांशतः तुर्की मूल का था, देश के समाज और ग्रामीण संरचना से सीमित रूप से जुड़ा हुआ था।
ग्रामीण क्षेत्रों पर नियंत्रण शहरों और किलों में स्थित सैन्य छावनियों के माध्यम से किया जाता था।

इसी संदर्भ में सूफी संतों, विशेषतः चिश्ती संप्रदाय के संतों, ने नई शासक वर्ग और जनसाधारण के बीच सेतु का कार्य किया। उनकी भूमिका राजनीतिक नहीं थी, किंतु सामाजिक समन्वय में उनका योगदान निर्णायक रहा।

 

शासक वर्ग की जातीय और सामाजिक संरचना

 

13वीं शताब्दी को व्यावहारिक रूप से तुर्की प्रभुत्व का काल कहा जा सकता है। अधिकांश कुलीन चाहे स्वतंत्र हों या गुलाम, वे तुर्क थे जो मुहम्मद गोरी के साथ भारत आए थे।

 

तुर्क, खिलजी और ताजिक तत्व

तुर्कों के अतिरिक्त खिलजी भी एक महत्वपूर्ण समूह थे, यद्यपि उन्हें प्रारंभिक काल में दिल्ली के शासन में अपेक्षित स्थान नहीं मिला और उन्होंने उत्तर बंगाल में अर्ध-स्वतंत्र सत्ता विकसित की। इल्तुतमिश के अधीन प्रशासन में ताजिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। फारसी भाषा और प्रशासनिक दक्षता के कारण उन्हें केंद्रीय प्रशासन में वरीयता दी गई। इल्तुतमिश का वजीर निजामुल मुल्क जुनैदी इसका प्रमुख उदाहरण है। तुर्कों और ताजिकों के बीच तनाव इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद खुलकर सामने आया, जब अधिकांश ताजिकों का नरसंहार कर दिया गया। इससे प्रशासन पर तुर्की प्रभुत्व और सुदृढ़ हो गया।

 

जातीय बहिष्कारवाद और उसके विरोधाभास

 

तुर्की कुलीनों की प्रवृत्ति गैर-तुर्क तत्वों को सत्ता से बाहर रखने की थी। रजिया के शासनकाल में हब्शी मलिक याकूत के प्रति उनका विरोध इसी मानसिकता को दर्शाता है। हालाँकि, वही तुर्की कुलीन अपने हितों की पूर्ति के लिए भारतीय मुस्लिम इमादुद्दीन रेहान जैसे व्यक्तियों का उपयोग करने से नहीं हिचके।

 

बलबन के अंतर्विरोध

बलबन ने एक ओर चिहलगानी तुर्कों की शक्ति को नष्ट किया, वहीं दूसरी ओर उसने भारतीय मुसलमानों को ‘नीच जन्म’ का कहकर प्रशासन से दूर रखा। साथ ही, उसने स्वयं को ईरानी नायक अफ्रासियाब का वंशज घोषित किया और पूर्व-इस्लामी ईरानी शाही प्रतीकों को अपनाया। इस प्रकार, उसके शासन में तुर्की प्रभुत्व और ईरानी शाही आदर्शों का एक विचित्र संयोजन दिखाई देता है।

 

‘गुलाम राज्य’ की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन

 

गुलामी की संस्था ने विभिन्न जातीय समूहों, विशेषतः तुर्कों, को एक साथ जोड़ने में भूमिका अवश्य निभाई, किंतु इससे सल्तनत को ‘गुलाम राज्य’ कहना ऐतिहासिक रूप से भ्रामक है। अधिकांश कुलीनों ने अपने करियर की शुरुआत गुलाम के रूप में की, किंतु उच्च पद प्राप्त करने से पूर्व उन्हें मुक्त कर दिया जाता था। स्वयं इल्तुतमिश ने सिंहासन पर बैठने के बाद अपना मुक्ति-पत्र उलेमा को प्रस्तुत किया। इस्लामी सिद्धांत के अनुसार, केवल एक स्वतंत्र व्यक्ति ही शासक हो सकता था। इसलिए ‘गुलाम वंश’ या ‘गुलाम राज्य’ जैसे पद अब इतिहासलेखन में त्याग दिए गए हैं।

 

तुर्की प्रभुत्व का क्षरण और परिवर्तन

 

बलबन के जीवनकाल में ही तुर्की प्रभुत्व कमजोर पड़ने लगा। उसे मंगोलों और खलजियों को कुलीनता में शामिल करना पड़ा।  बंगाल अभियान के दौरान उसने तुर्की सैनिकों को अविश्वसनीय पाया और स्थानीय शक्तियों का सहारा लिया।

खिलजियों के उदय के साथ तुर्की बहिष्कारवाद की नीति समाप्त हुई। अलाउद्दीन खिलजी के शासन में गैर-तुर्कों, यहाँ तक कि भारतीय मुसलमानों, के लिए सत्ता के द्वार खुले। मलिक काफूर, नुसरत ख़ान और जफ़र ख़ान इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह परिवर्तन केवल व्यक्तियों या वंशों के बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि शासक वर्ग की सामाजिक संरचना और राज्य की समावेशिता में आए व्यापक बदलावों को दर्शाता था।

 

उलेमा और राज्य : एक ऐतिहासिक बहस

 

धर्म और सत्ता के इस संबंध ने दिल्ली सल्तनत का स्वरूप औपचारिक इस्लामी, पर व्यवहारिक राजनीतिक राज्य के रूप में निर्धारित किया। दिल्ली सल्तनत के स्वरूप को समझने में उलेमा की स्थिति और उनके राज्य के साथ संबंध का प्रश्न केंद्रीय महत्व रखता है। यह बहस केवल भारतीय संदर्भ तक सीमित नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण इस्लामी विश्व में सत्ता और धर्म के संबंधों को लेकर निरंतर चली आ रही थी।

पैग़म्बर के बाद प्रारंभिक चार ख़लीफाओं के शासनकाल में आध्यात्मिक और सांसारिक सत्ता की एकता का आदर्श प्रस्तुत किया गया। किंतु उमय्यद काल में राजनीतिक सत्ता दमिश्क स्थानांतरित होने के साथ यह एकता कमजोर होने लगी। अब्बासियों द्वारा बग़दाद को राजधानी बनाने और स्वयं को पैग़म्बर के वंशज के रूप में प्रस्तुत करने से आध्यात्मिक और राजनीतिक सत्ता को पुनः एकीकृत करने का प्रयास किया गया, पर व्यवहार में राजनीतिक तत्व ही प्रभावी रहा।

9वीं शताब्दी के अंत तक अब्बासी ख़िलाफ़त के विघटन और स्वतंत्र राज्यों के उदय के साथ यह एकता निर्णायक रूप से समाप्त हो गई। इसी पृष्ठभूमि में उलेमा-सुल्तान संबंधों की नई व्याख्याएँ विकसित हुईं।

 

उलेमा की स्थिति और सुल्तानों का दृष्टिकोण

 

तुर्क सुल्तान, जो इस्लाम में अपेक्षाकृत नए थे, उलेमा को धार्मिक मार्गदर्शक के रूप में सम्मान देते थे। वे समुदाय को इस्लाम की व्याख्या करने वाले माने जाते थे। किंतु यह सम्मान राजनीतिक अधीनता में परिवर्तित नहीं हुआ। सुल्तानों ने प्रभावी सत्ता अपने हाथों में रखी और उच्च राजनीतिक मामलों में उलेमा की सलाह को अनिवार्य नहीं माना। यही प्रवृत्ति दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्वरूप की एक स्थायी विशेषता बन गई।

 

उलेमा और प्रशासकीय वर्ग के प्रति तुर्की दृष्टिकोण

जियाउद्दीन बरनी, जिन्होंने अपना राजनीतिक लेख, फतावा-ए-जहांदारी, फिरोज तुगलक के प्रारंभिक वर्षों के दौरान जेल में लिखा, के विवरण से स्पष्ट होता है कि तुर्क शासक उलेमा और लेखन-वर्ग (नवीसंदान) को नैतिक या धार्मिक मार्गदर्शन तक सीमित मानते थे, और उन्हें उच्च राजनीतिक निर्णयों के लिए उपयुक्त नहीं समझते थे। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा दिल्ली के कोतवाल अलाउल मुल्क की सलाह को अस्वीकार करना और उसे एक “नवीसंदा और नवीसंदा का बेटा” कहकर तिरस्कृत करना इसी मानसिकता को दर्शाता है। बरनी की कटु टिप्पणी कि ये वर्ग “घोड़े के सिर को उसकी पूँछ से अलग नहीं कर सकते” शासक वर्ग की मानसिकता को उजागर करती है, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य को।

 

क्या दिल्ली सल्तनत एक धर्मतंत्र थी?

 

कुछ इतिहासकारों ने यह तर्क दिया है कि चूँकि सल्तनत शरिया पर आधारित थी और शरिया की व्याख्या उलेमा करते थे, इसलिए यह एक धर्मतांत्रिक राज्य था। किंतु यह निष्कर्ष कई स्तरों पर समस्याग्रस्त है। धर्मतंत्र की अवधारणा मूलतः उस राज्य के लिए प्रयुक्त होती है जहाँ सत्ता प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर या संगठित पादरी वर्ग के माध्यम से संचालित हो। इस अर्थ में न तो इस्लामी दुनिया में और न ही भारत में कोई स्थायी धर्मतंत्र अस्तित्व में रहा। इस्लाम में किसी संगठित चर्च की अनुपस्थिति ने उलेमा को राजनीतिक सत्ता से स्वाभाविक रूप से अलग रखा। अतः दिल्ली सल्तनत को धर्मतंत्र कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।

 

शरिया और राज्य : सिद्धांत बनाम व्यवहार

 

वास्तविक प्रश्न यह नहीं था कि सल्तनत धर्मतंत्र थी या नहीं, बल्कि यह था कि भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में शरिया को किस सीमा तक लागू किया जा सकता है। यही प्रश्न सल्तनत काल में बार-बार उभरा। दिल्ली सल्तनत को पूर्ण अर्थों में धर्मतंत्र नहीं कहा जा सकता, क्योंकि राज्य संचालन उलेमा के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं था।

 

सुल्तान की स्वतंत्रता और शरिया की सीमाएँ

इल्तुतमिश ने रजिया को उत्तराधिकारी घोषित करते समय उलेमा से परामर्श नहीं किया। बलबन ने सिजदा और पाबोस जैसे पूर्व-इस्लामी ईरानी दरबारी रीतियों को अपनाया, जिन्हें उलेमा ने गैर-इस्लामी माना।

अलाउद्दीन खिलजी के काल में यह टकराव सबसे स्पष्ट रूप में सामने आया। काजी मुगीस द्वारा देवगिरि से प्राप्त खजाने को बैत-उल-माल घोषित करने और सुल्तान को सीमित अधिकार देने की सलाह को अलाउद्दीन ने अस्वीकार कर दिया।

बरनी द्वारा उद्धृत अलाउद्दीन के कथन, कि वह शरिया से नहीं, बल्कि राज्य की भलाई से निर्देशित होता है, शब्दशः ऐतिहासिक नहीं, बल्कि बरनी की वैचारिक प्रस्तुति हैं। स्वयं बरनी स्पष्ट करता है कि अलाउद्दीन नियमित रूप से शरिया की अवहेलना नहीं करता था, बल्कि शासन और प्रशासन को शरिया से काफी हद तक स्वतंत्र मानता था।

 

तुगलक और फिरोजशाह तुगलक काल : धर्मनिरपेक्ष आदेशों की निरंतरता

 

मुहम्मद बिन तुगलक ने शरिया के पूरक के रूप में अनेक धर्मनिरपेक्ष आदेश (जवाबित) जारी किए।
फिरोजशाह तुगलक, जिसे प्रायः रूढ़िवादी कहा जाता है, ने भी शरिया द्वारा अनुमत शारीरिक दंडों पर रोक लगाई। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि शासक वर्ग ने शरिया को राज्य संचालन का एकमात्र आधार नहीं माना।

 

बरनी का निष्कर्ष : दुनिया-दारी बनाम दीन-दारी

 

इन सभी अनुभवों के आधार पर जियाउद्दीन बरनी इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि भारत में विश्वास (दीन-दारी) पर आधारित एक सच्चा इस्लामी राज्य संभव नहीं था। जो संभव था, वह था दुनिया-दारी पर आधारित एक इस्लामी राज्य, जहाँ शासक ईश्वर-भयभीत हो, उलेमा और सैय्यदों को सम्मान दिया जाए, किंतु राज्य संचालन व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाए।

बरनी स्पष्ट करता है कि सुल्तान का निजी आचरण या नागरिक का निजी जीवन राज्य का विषय नहीं होना चाहिए। यह विचार दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक स्वरूप को औपचारिक इस्लामी राज्य, किंतु व्यवहारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष सत्ता के रूप में परिभाषित करता है।

 

उलेमा और सुल्तान : स्थायी तनाव

 

इस प्रकार, दिल्ली सल्तनत का स्वरूप न तो उलेमा-नियंत्रित था और न ही शरिया-प्रधान। उलेमा को सम्मान अवश्य दिया गया, पर राज्य उनके निर्देशों पर नहीं चला। सत्ता का संचालन राजनीतिक विवेक, सैन्य आवश्यकता और शासक वर्ग के हितों द्वारा निर्देशित रहा। यही अंतर्विरोध आगे चलकर हिंदुओं की स्थिति, धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और सामाजिक संरचना को प्रभावित करता है, जिसका विश्लेषण आगे किया जाएगा।

धर्म और सत्ता के इस व्यावहारिक संतुलन का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव गैर-मुस्लिम प्रजा, विशेषतः हिंदुओं की स्थिति पर पड़ा। इसलिए दिल्ली सल्तनत के स्वरूप को समझने के लिए अब हिंदू समाज के साथ राज्य के संबंधों की ओर दृष्टि डालना आवश्यक है।

 

दिल्ली सल्तनत और हिंदुओं की स्थिति : वैचारिक आधार

 

दिल्ली सल्तनत के स्वरूप को समझने में हिंदुओं की स्थिति एक केंद्रीय प्रश्न है। यह प्रश्न केवल धार्मिक नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य की राजनीतिक प्रकृति, सामाजिक संरचना और प्रशासनिक व्यवहार से गहराई से जुड़ा हुआ है।

सल्तनत काल में उन हिंदुओं को, जिन्होंने मुस्लिम शासक की अधीनता स्वीकार कर ली थी और उसके द्वारा निर्धारित नियमों का पालन किया था, जिम्मी या संरक्षित व्यक्ति माना जाता था। इस अवधारणा के अंतर्गत उन्हें सीमित किंतु परिभाषित धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

 

जिम्मी व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाएँ

 

जिम्मी के रूप में हिंदुओं को अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा करने, मंदिरों के रखरखाव और मरम्मत का अधिकार था, क्योंकि यह स्वीकार किया गया था कि “इमारतें सदा के लिए नहीं टिकतीं।” हालाँकि, उन्हें “इस्लाम के विरोध में” नए मंदिर बनाने की अनुमति नहीं थी। यह प्रावधान अस्पष्ट था और इसकी व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही।

 

मंदिरों का प्रश्न : सिद्धांत और व्यवहार

इस अस्पष्टता का अर्थ यह हो सकता था कि हिंदू अपने घरों या ऐसे गाँवों में मंदिर बना सकते थे जहाँ कोई मुस्लिम नहीं रहता था। दूसरी ओर, शासक वर्ग या उलेमा के एक वर्ग द्वारा यह तर्क भी दिया जा सकता था कि विरोध की स्थिति में पुराने मंदिरों को भी नष्ट किया जा सकता है।

प्रारंभिक काल में युद्धों के दौरान अनेक प्राचीन मंदिरों को लूटा गया और नष्ट किया गया। कुछ मामलों में उन्हें मस्जिदों में परिवर्तित किया गया या उनके अवशेषों का उपयोग मस्जिद निर्माण में किया गया। किंतु यह प्रवृत्ति तब कम हो गई जब तुर्क स्वयं अपनी स्थापत्य परंपरा विकसित करने लगे।

 

युद्ध, राजनीति और धार्मिक प्रतीक

 

स्थानीय प्रमुखों या पड़ोसी शासकों के विरुद्ध युद्धों में मंदिरों का विनाश कई बार धार्मिक पुण्य का कार्य माना गया। किंतु जैसे-जैसे तुर्की शासन स्थिर हुआ और पूरे देश में फैल गया, यह प्रथा भी सीमित होती चली गई। इससे स्पष्ट होता है कि मंदिरों का विनाश प्रायः राजनीतिक-सैन्य संदर्भ से जुड़ा था, न कि केवल धार्मिक नीति से।

 

जज़िया: स्वरूप, मूल्यांकन और प्रभाव

 

हिंदुओं से अपेक्षित एक प्रमुख दायित्व जज़िया का भुगतान था। जज़िया की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है, कुछ इसे यूनानी पोल-टैक्स से जोड़ते हैं, कुछ पूर्व-इस्लामी ईरान से, और कुछ इसे सैन्य सेवा के बदले कर मानते हैं। इस भ्रम को 9वीं-10वीं शताब्दी में विकसित विभिन्न शरिया स्कूलों ने सुलझाने का प्रयास किया। भारत में प्रचलित हनफ़ी शरिया स्कूल ने “इस्लाम, मृत्यु या जज़िया” का विकल्प प्रस्तुत किया।

 

जज़िया का व्यावहारिक स्वरूप

सल्तनत काल में जज़िया के मूल्यांकन और संग्रह की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। बरनी के कुछ संदर्भों में किसानों द्वारा खराज या जज़िया को एक ही कर के रूप में चुकाने का संकेत मिलता है, विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ कर एकमुश्त राशि के रूप में निर्धारित किए जाते थे। शहरों में जज़िया कैसे एकत्र की जाती थी, इस पर स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। शरिया के अनुसार महिलाएँ, बच्चे, पागल और निर्धन व्यक्ति जज़िया से मुक्त थे। फिरोजशाह तुगलक के समय तक ब्राह्मणों को भी छूट प्रदान की गई।

 

जज़िया और धर्मांतरण का प्रश्न

 

इन तथ्यों के आधार पर जज़िया को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का साधन मानना कठिन है, क्योंकि यह केवल शहरी क्षेत्रों के एक सीमित वर्ग कारीगरों और व्यापारियों  को प्रभावित करती थी। हालाँकि, उलेमा के एक रूढ़िवादी वर्ग ने जज़िया को हिंदुओं को अपमानित करने और अधीनता दर्शाने का साधन माना। काज़ी मुग़ीस जैसे विद्वानों के कथन, जो अपमानजनक व्यवहार का समर्थन करते थे, एक मानसिकता को दर्शाते हैं, न कि व्यापक प्रशासनिक व्यवहार को।

 

उलेमा की कठोर व्याख्याएँ और राज्य की प्रतिक्रिया

 

कुछ धर्मशास्त्रियों ने यह तर्क दिया कि मूर्तिपूजक होने के कारण हिंदू जज़िया के पात्र नहीं हैं और उन्हें केवल इस्लाम या मृत्यु का विकल्प दिया जाना चाहिए। यदि बरनी पर विश्वास किया जाए, तो यह विचार इल्तुतमिश के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। इसके प्रत्युत्तर में वज़ीर निज़ामुल मुल्क जुनैदी ने इसे परंपरा-विरोधी और अव्यावहारिक बताया, यह तर्क देते हुए कि मुसलमान भारत में “एक पकवान में नमक” के समान अल्पसंख्यक थे। यह उत्तर सल्तनत की व्यावहारिक राज्य-नीति को दर्शाता है।

 

हिंदू समाज की वास्तविक स्थिति : शक्ति और सीमाएँ

 

यद्यपि उच्च प्रशासनिक पदों पर हिंदुओं की नियुक्ति अत्यंत सीमित थी, फिर भी वे ग्रामीण समाज पर प्रभुत्व बनाए हुए थे खुट, मुकद्दम, चौधरी, राणा और ठाकुर जैसे पदों के माध्यम से। शहरी क्षेत्रों में हिंदू व्यापार, वित्त और परिवहन (बंजारों) में प्रमुख भूमिका निभाते थे। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा राजधानी के आसपास के खुटों और मुकद्दमों के वैभव का वर्णन इस आर्थिक वास्तविकता को उजागर करता है।

 

बरनी की शिकायतें और सामाजिक यथार्थ

बरनी द्वारा हिंदू साहों, मेहताओं और पंडितों की समृद्धि पर की गई टिप्पणियाँ अतिशयोक्तिपूर्ण अवश्य हैं, किंतु वे इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि हिंदू समाज का एक सीमित वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त हो चुका था। फिर भी, यह समृद्धि व्यापक नहीं थी। अधिकांश हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या निर्धन बनी रही और शासक वर्ग द्वारा शोषित होती रही।

 

दैनिक जीवन और राज्य का हस्तक्षेप

एक दृष्टिकोण के अनुसार, सल्तनत राज्य ने औसत हिंदू के दैनिक जीवन में सीमित हस्तक्षेप किया, जब तक कि वह अपने करों का भुगतान करता रहा। व्यक्तिगत और नागरिक मामलों में हिंदू जाति पंचायतों और स्थानीय प्रमुखों के अधीन रहते थे। हालाँकि, एक केंद्रीकृत राज्य में हस्तक्षेप की प्रवृत्ति बढ़ती है। अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक की कृषि और राजस्व नीतियाँ इस बढ़ते हस्तक्षेप का उदाहरण हैं।

 

धार्मिक स्वतंत्रता : अनुग्रह या अधिकार?

 

धार्मिक स्वतंत्रता प्रायः अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि शासक की अनुकंपा के रूप में दी जाती थी। जलालुद्दीन खिलजी द्वारा हिंदू जुलूसों को अनुमति देना, या मुहम्मद बिन तुगलक का होली उत्सव में भाग लेना, इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। किन्तु निरंकुश राज्य में ऐसी स्वतंत्रता अस्थिर होती है। फिरोजशाह तुगलक द्वारा एक ब्राह्मण को जीवित जलाना, या नए मंदिरों के विनाश को वैध ठहराना, इसी अस्थिरता का उदाहरण है। उल्लेखनीय है कि सिकंदर लोदी को कुरुक्षेत्र के प्राचीन तीर्थ को नष्ट करने से उलेमा ने ही रोका।

 

तुलनात्मक दृष्टि : सल्तनत और यूरोप

सीमाओं और विरोधाभासों के बावजूद, यह स्वीकार करना होगा कि सल्तनत काल में भारत में गैर-मुसलमानों को जितनी धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी, वह 16वीं शताब्दी तक यूरोप में ईसाइयों के प्रतिद्वंद्वी संप्रदायों को प्राप्त स्वतंत्रता से अधिक थी। राज्य औपचारिक रूप से इस्लामी था, मुसलमान विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग थे, किंतु यह स्थिति भारत के पूर्ववर्ती सामाजिक ढाँचों से पूर्णतः भिन्न नहीं थी, जहाँ राजपूत और ब्राह्मण विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग थे।

हिंदुओं की स्थिति, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सीमाएँ इस बात को स्पष्ट करती हैं कि सल्तनत की शक्ति कैसे प्रयोग की जाती थी। यही प्रश्न हमें राज्य की निरंकुशता, न्याय और नैतिक वैधता के व्यापक विश्लेषण की ओर ले जाता है।

 

राज्य शक्ति और निरंकुशता की समस्या

 

दिल्ली सल्तनत के स्वरूप को समझने में निरंकुशता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। मुस्लिम राजनीतिक विचारकों के समक्ष यह समस्या निरंतर बनी रही कि राज्य शक्ति की वैध सीमा क्या होनी चाहिए और सुल्तान की नैतिक प्राधिकार किस आधार पर टिकी हो।

राजनीतिक चिंतन में सामान्यतः राज्य को सामाजिक अराजकता के विरुद्ध एकमात्र सुरक्षा माना गया। संपत्ति और स्त्रियों की रक्षा, सामाजिक व्यवस्था की स्थिरता और बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा, इन सभी के लिए एक शक्तिशाली केंद्रीय सत्ता आवश्यक मानी गई। इसी कारण अधिकांश विचारकों ने कुलीनतंत्र या सामूहिक शासन की अपेक्षा एक सशक्त सुल्तान के शासन को वरीयता दी।

 

निरंकुशता और धर्म : बरनी की दृष्टि

 

जियाउद्दीन बरनी के राजनीतिक विचारों में निरंकुशता एक केंद्रीय, किंतु समस्याग्रस्त, तत्व के रूप में उपस्थित है। एक ओर वह निरंकुशता को मूलतः गैर-इस्लामी मानता है और यह स्वीकार करता है कि व्यक्तिगत सत्ता का दुरुपयोग समाज के लिए घातक हो सकता है। दूसरी ओर, वह भारत जैसी परिस्थितियों में कठोर दंड और शक्तिशाली शासन को अपरिहार्य भी मानता है।

 

विद्रोह का अधिकार और उसकी सीमाएँ

बरनी अन्यायपूर्ण शासक के विरुद्ध विद्रोह के अधिकार को स्वीकार नहीं करता, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ शरिया का खुला और स्पष्ट उल्लंघन हो। इस प्रकार, वह राज्य की स्थिरता को नैतिक आदर्शों से ऊपर रखता है। उसकी दृष्टि में, समाज में “नीच और अयोग्य” वर्गों की बहुलता को नियंत्रित करने के लिए निरंकुशता न केवल आवश्यक, बल्कि वांछनीय भी थी। यह दृष्टिकोण शासक वर्ग के भय और असुरक्षा को प्रतिबिंबित करता है, साथ ही राज्य शक्ति को नैतिक औचित्य प्रदान करने का प्रयास भी।

 

न्याय (अदल) : निरंकुशता पर नैतिक अंकुश

 

यदि निरंकुशता अपरिहार्य थी, तो प्रश्न उठता है कि राज्य की नैतिक प्राधिकार को कैसे बनाए रखा जाए। इसी संदर्भ में मध्यकालीन मुस्लिम राजनीतिक चिंतन में अदल (न्याय) की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया। न्याय का अर्थ केवल कानून का समान अनुप्रयोग नहीं था, बल्कि अमीर और गरीब, कुलीन और अकुलीन, रिश्तेदार और अजनबी, सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना था। कई विचारकों, विशेषतः बरनी, ने न्याय को धार्मिक कर्तव्यों से भी उच्च स्थान दिया।

 

न्याय और सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण

हालाँकि, यह न्याय आधुनिक समानता की अवधारणा से भिन्न था। इसका उद्देश्य मौजूदा सामाजिक व्यवस्था, जो कठोर पदानुक्रम पर आधारित थी, का संरक्षण भी था। कारीगरों, किसानों और तथाकथित निम्न वर्गों को सत्ता से बाहर रखना इस “न्यायपूर्ण व्यवस्था” का हिस्सा माना गया। फिर भी, न्याय की अवधारणा ने कुलीनों और निचले अधिकारियों द्वारा मनमाने अत्याचारों पर कुछ सीमा तक नियंत्रण अवश्य लगाया।

 

उदारता, संत परंपरा और राज्य

 

न्याय की अवधारणा के साथ-साथ उदारता और लोगों की सेवा का विचार भी राज्य की नैतिक छवि से जुड़ा हुआ था। संत चाहे वे मुस्लिम सूफी हों या हिंदू भक्ति परंपरा के शासकों से करुणा, संयम और मानवता की अपेक्षा करते थे। इन संत परंपराओं ने सामाजिक पदानुक्रम की आलोचना भी की और मानवीय समानता के विचार को जीवित रखा। इस प्रकार, वे लोकप्रिय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बने और कठोर असमान व्यवस्था में मानसिक और नैतिक राहत प्रदान की। हालाँकि, राजनीतिक स्तर पर उदारता प्रायः एक आदर्श बनी रही, न कि व्यवहारिक नीति। जलालुद्दीन खिलजी के बाद फिरोजशाह तुगलक वह पहला शासक था जिसने विशेषतः मुसलमानों के संदर्भ में इस आदर्श को कुछ हद तक लागू करने का प्रयास किया।

 

क्या ऐसा राज्य विकास को प्रोत्साहित कर सकता था?

एक अत्यधिक केंद्रीकृत, सैन्यवादी राज्य, जिसका सामाजिक आधार संकीर्ण था, क्या आर्थिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दे सकता था? यह प्रश्न दिल्ली सल्तनत के समग्र मूल्यांकन में निर्णायक महत्व रखता है।

 

सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास

इन सभी सीमाओं के बावजूद, सल्तनत काल में स्थापत्य, साहित्य और संगीत का उल्लेखनीय विकास हुआ, जिसमें मुसलमानों और हिंदुओं, दोनों का योगदान रहा। सूफी और भक्ति आंदोलनों के विस्तार ने सामाजिक तनाव को कुछ हद तक कम किया और संवाद के साझा मंच प्रदान किए।

 

आर्थिक परिवर्तन और शहरीकरण

 

आर्थिक क्षेत्र में कुछ ही शासक विशेषतः मुहम्मद बिन तुगलक और फिरोजशाह तुगलक, खेती के विस्तार और सुधार को लेकर सक्रिय रूप से चिंतित थे। फिर भी, राजस्व प्रशासन की केंद्रीकृत प्रणाली ने राज्य को ग्रामीण जीवन में अधिक प्रभावी हस्तक्षेप की क्षमता प्रदान की।  राजस्व अधिशेष का एक बड़ा हिस्सा शासक वर्ग के हाथों में केंद्रित होने से श्रेष्ठ कारीगर उत्पादन को प्रोत्साहन मिला और शहरीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। सड़क संचार में सुधार, स्थिर मुद्रा विशेषतः चाँदी का टंका और इस्लामी विश्व के साथ व्यापक व्यापारिक संपर्कों ने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया।

 

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समृद्धि

 

सल्तनत काल में भारत की सीमाएँ व्यापार के लिए अपेक्षाकृत खुली रहीं। दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापार को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया गया। आधुनिक शोध से यह स्पष्ट होता है कि 15वीं शताब्दी के अंत में, जब पुर्तगाली हिंद महासागर क्षेत्र में पहुँचे, तब भारत सहित इस क्षेत्र में व्यापार और समृद्धि अभूतपूर्व स्तर पर थी। यह अलग प्रश्न है कि इस समृद्धि से कौन लाभान्वित हुआ और कौन वंचित रहा, क्योंकि तब भी, आज की तरह, समृद्धि और घोर गरीबी साथ-साथ विद्यमान थीं।

 

सल्तनत काल का ऐतिहासिक महत्व और सीमाएँ

 

इस प्रकार, दिल्ली सल्तनत को केवल एक ‘अंधकार युग’ के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से अनुचित है। इसने 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच विकसित कठोर और संकीर्ण सामाजिक-आर्थिक ढाँचों को आंशिक रूप से तोड़ा और नए विकास की परिस्थितियाँ निर्मित कीं, यद्यपि सीमित और असमान रूप में। इन सभी आयामों को साथ रखकर देखने पर ही दिल्ली सल्तनत का स्वरूप स्पष्ट रूप से उभरता है। इन सभी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक आयामों को एक साथ देखने पर ही दिल्ली सल्तनत के स्वरूप का समग्र मूल्यांकन संभव हो पाता है।

 

दिल्ली सल्तनत का स्वरूप : एक समग्र ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

दिल्ली सल्तनत का स्वरूप किसी एक सैद्धांतिक खांचे में समाने वाला नहीं था। यह भारतीय सामाजिक यथार्थ, इस्लामी राजनीतिक चिंतन और व्यावहारिक शासन आवश्यकताओं के निरंतर संवाद से निर्मित एक गतिशील राज्य संरचना थी। इसलिए इसे न तो पूर्णतः धर्मतांत्रिक कहा जा सकता है और न ही केवल सैनिक निरंकुशता का रूप।

राजनीतिक स्तर पर सल्तनत ने केंद्रीकरण की दिशा में स्पष्ट प्रयास किए, विशेषतः बलबन से तुगलक काल तक, पर यह केंद्रीकरण स्थायी या सर्वव्यापी नहीं रहा। सुल्तान और कुलीन वर्ग के बीच सत्ता-संघर्ष, प्रांतीय शक्तियों की भूमिका और शासकों के व्यक्तित्व के अनुसार इसकी तीव्रता बदलती रही। लोदी काल में अफगान सरदारों की बढ़ती हिस्सेदारी ने इस केंद्रीकरण की सीमाएँ उजागर कर दीं।

सामाजिक रूप से राज्य एक संकीर्ण, पदानुक्रमिक शासक वर्ग पर आधारित रहा। प्रारंभिक तुर्की प्रभुत्व के बाद खिलजी काल से गैर-तुर्क और भारतीय मुसलमानों के लिए अवसर बढ़े, किंतु सामाजिक समानता का प्रश्न अनसुलझा रहा। ‘गुलाम राज्य’ जैसी संज्ञाएँ इस यथार्थ को सरल बनाती हैं; वस्तुतः गुलामी यहाँ सामाजिक गतिशीलता का माध्यम थी, न कि राज्य का मूल स्वभाव।

धार्मिक आयाम में सल्तनत औपचारिक रूप से इस्लामी थी, पर उलेमा-नियंत्रित नहीं। शरिया ने नैतिक ढाँचा दिया, किंतु शासन निर्णयों को राजनीतिक विवेक और परिस्थितियों ने दिशा दी, जिसे बरनी की दुनिया-दारी की अवधारणा सबसे सटीक रूप में व्यक्त करती है।

हिंदुओं की स्थिति इस व्यावहारिकता को और स्पष्ट करती है। जिम्मी व्यवस्था के अंतर्गत सीमित किंतु परिभाषित धार्मिक स्वतंत्रता मिली, अधिकार के रूप में नहीं, शासकीय अनुकंपा के रूप में। फिर भी, समकालीन यूरोप की तुलना में सहिष्णुता का स्तर व्यापक था, और आर्थिक सामाजिक जीवन में हिंदुओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण बनी रही।

इन अंतर्विरोधों के बावजूद, सल्तनत काल में स्थापत्य, साहित्य, संगीत, शहरीकरण और व्यापार का विस्तार हुआ। अतः इसे ‘अंधकार युग’ कहना इतिहाससम्मत नहीं। संक्षेप में, दिल्ली सल्तनत एक व्यावहारिक, परिस्थितिजन्य और परिवर्तनशील राज्य थी, जिसकी विरासत ने आगे चलकर मुगल शासन की राजनीतिक-प्रशासनिक सोच को आकार दिया।

 

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