कुमारगुप्त का शासनकाल – स्थिरता, निरंतरता और अंतर्निहित चुनौतियाँ
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल समाप्त होने के पश्चात् कुमारगुप्त का शासनकाल (लगभग 415–455 ई.) गुप्त साम्राज्य के इतिहास में एक ऐसे चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ बाह्य विस्तार के स्थान पर राजनीतिक संतुलन और प्रशासनिक सुदृढ़ता को प्राथमिकता दी गई। वे ध्रुवदेवी से उत्पन्न चन्द्रगुप्त द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनके छोटे भाई गोविंदगुप्त के साथ उत्तराधिकार संघर्ष की संभावना कुछ विद्वानों ने व्यक्त की है, किंतु इसके समर्थन में कोई ठोस अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः कुमारगुप्त का राज्यारोहण एक अपेक्षाकृत शांत सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही स्वीकार्य प्रतीत होता है।

कुमारगुप्त का राज्यारोहण और शासनकाल की अवधि
कुमारगुप्त का शासनकाल गुप्त साम्राज्य में सत्ता के अपेक्षाकृत शांत संक्रमण का उदाहरण प्रस्तुत करता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् कुमारगुप्त का सिंहासनारूढ़ होना किसी बड़े गृहयुद्ध या विघटन के संकेत नहीं देता। वे ध्रुवदेवी से उत्पन्न चन्द्रगुप्त द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र थे और उत्तराधिकार के वैधानिक दावेदार माने जाते हैं।
यद्यपि उनके छोटे भाई गोविंदगुप्त के साथ संभावित उत्तराधिकार संघर्ष का उल्लेख कुछ विद्वानों द्वारा किया गया है, किंतु इस धारणा के समर्थन में कोई निर्णायक अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। गोविंदगुप्त का कुमारगुप्त के शासनकाल में वैशाली (बसाढ़) का राज्यपाल होना इस बात का संकेत देता है कि यदि कोई मतभेद रहे भी हों, तो वे साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं थे। अतः कुमारगुप्त का राज्यारोहण एक सुव्यवस्थित और अपेक्षाकृत शांत प्रक्रिया के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
शासनकाल की तिथि: अभिलेखीय एवं मुद्रात्मक साक्ष्य
कुमारगुप्त के शासनकाल की अवधि का निर्धारण अभिलेखों और सिक्कों के आधार पर स्पष्ट रूप से किया जा सकता है। उनके शासन की प्रारंभिक तिथि गुप्त संवत् 96 (415 ई.) मानी जाती है, जो बिलसड़ (बिलसद) अभिलेख से ज्ञात होती है। यह अभिलेख न केवल उनकी सत्ता-स्थापना की तिथि प्रदान करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि उस समय गुप्त प्रशासन पूर्णतः सक्रिय और संगठित था।
उनके शासन की अंतिम तिथि गुप्त संवत् 136 (455 ई.) है, जो उनके चाँदी के सिक्कों से प्रमाणित होती है। इसी वर्ष स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में उनके शासन का उल्लेख प्रारंभ होता है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस समय तक कुमारगुप्त का शासन समाप्त हो चुका था।
इन साक्ष्यों के आधार पर यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है कि कुमारगुप्त ने लगभग 40 वर्षों (415–455 ई.) तक शासन किया। यह दीर्घकालीन शासन स्वयं इस तथ्य का प्रमाण है कि उनका शासनकाल राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक संतुलन और साम्राज्य की निरंतरता से युक्त था, जो किसी भी प्राचीन साम्राज्य के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।
कुमारगुप्त का शासनकाल और गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति
यह विशेष उल्लेखनीय है कि कुमारगुप्त के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति पर्याप्त रूप से स्थिर बनी रही और साम्राज्य की सीमाएँ अक्षुण्ण रहीं। यद्यपि उन्होंने अपने पिता या पितामह की भाँति किसी बड़े विजय अभियान का संचालन नहीं किया, फिर भी यह शासनकाल राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक रहा। मंदसौर अभिलेख में कुमारगुप्त के शासन का काव्यात्मक वर्णन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि साम्राज्य सुव्यवस्थित, सुरक्षित और समृद्ध था।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विजय का अभाव कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि प्रशासनिक संतुलन और आंतरिक नियंत्रण की नीति का द्योतक है।

सैन्य गतिविधियाँ और विजय संबंधी विवाद
कुमारगुप्त की किसी सुनिश्चित सैन्य विजय का उल्लेख न तो अभिलेखों में मिलता है, न ही सिक्कों में। कुछ स्वर्ण मुद्राओं पर अंकित ‘व्याघ्रबलपराक्रमः’ की उपाधि के आधार पर रायचौधरी ने उनके दक्षिणी अभियान की संभावना व्यक्त की है। महाराष्ट्र के सतारा जिले तथा बरार क्षेत्र से प्राप्त मुद्राओं को इस मत के समर्थन में प्रस्तुत किया गया है।
इसी प्रकार, ‘खग-निहन्ता’ प्रकार के सिक्कों के आधार पर राधामुकुंद मुखर्जी ने उनकी असम विजय का अनुमान लगाया, किंतु यह मत भी कल्पनाप्रधान प्रतीत होता है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि गुप्त वंश के इतिहास के स्रोत केवल मुद्रात्मक साक्ष्यों तक सीमित नहीं हैं और उनके आधार पर सैन्य अभियानों का निष्कर्ष निकालना ऐतिहासिक दृष्टि से सावधानीपूर्ण होना।

पुष्यमित्र आक्रमण: कुमारगुप्त के शासनकाल का अंतर्निहित संकट
कुमारगुप्त का शासनकाल सामान्यतः शांति, प्रशासनिक संतुलन और साम्राज्य की स्थिरता के लिए जाना जाता है। किंतु यह धारणा पूर्णतः सही नहीं होगी यदि हम उनके शासन के अंतिम वर्षों में उत्पन्न पुष्यमित्र आक्रमण की उपेक्षा करें। यह आक्रमण गुप्त साम्राज्य के लिए केवल एक सीमित सैन्य चुनौती नहीं था, बल्कि उस संक्रमणकालीन संकट का संकेतक था, जो आगे चलकर स्कंदगुप्त के शासनकाल में गंभीर रूप लेता है।
यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इस आक्रमण का उल्लेख स्वयं कुमारगुप्त के किसी अभिलेख में नहीं, बल्कि उनके पुत्र स्कंदगुप्त के भितरी अभिलेख में मिलता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुमारगुप्त के अंतिम वर्षों में साम्राज्य की आंतरिक एवं सीमांत स्थिति उतनी शांत नहीं रही, जितनी सामान्यतः मानी जाती है।
भितरी अभिलेख, पुष्यमित्र जाति और विद्वानों की व्याख्याएँ
भितरी अभिलेख में उल्लिखित पुष्यमित्रों को अत्यंत समृद्ध, शक्तिशाली और सैन्य दृष्टि से संगठित बताया गया है। इस आक्रमण से ‘गुप्तवंश की राजलक्ष्मी’ के विचलित होने का उल्लेख इस बात का संकेत है कि संकट वास्तविक और गंभीर था।
यद्यपि दिवेकर द्वारा ‘पुष्यमित्रांश्च’ के स्थान पर ‘युद्धमित्रांश्च’ पाठ पढ़ने का प्रयास किया गया है, किंतु वायुपुराण तथा जैन कल्पसूत्र जैसे स्रोतों में पुष्यमित्र नामक जाति के उल्लेख इस संशोधन को कमजोर बनाते हैं। यह अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि पुष्यमित्र एक वास्तविक जनजातीय शक्ति थे, जिनका प्रभाव नर्मदा और मेकल क्षेत्र में था।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस आक्रमण का निर्णायक दमन स्कंदगुप्त द्वारा किया गया, किंतु इस संकट की उत्पत्ति और साम्राज्य पर उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कुमारगुप्त के शासनकाल में ही स्पष्ट हो चुका था। इस दृष्टि से पुष्यमित्र आक्रमण, कुमारगुप्त के शासनकाल का एक अंतर्निहित संकट माना जाना चाहिए।
अश्वमेध यज्ञ और सम्राट की प्रतिष्ठा
कुमारगुप्त द्वारा अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान उनके ‘अश्वमेध’ प्रकार के सिक्कों से प्रमाणित होता है। इन पर अंकित ‘श्रीअश्वमेधमहेंद्रः’ लेख उनकी सार्वभौमिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं है कि यह यज्ञ किस विशिष्ट विजय के उपलक्ष्य में किया गया, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि कुमारगुप्त स्वयं को एक शक्तिशाली, सार्वभौम शासक के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे।
प्रशासनिक व्यवस्था और प्रांतीय शासक
कुमारगुप्त का शासनकाल गुप्त प्रशासनिक प्रणाली की परिपक्व अवस्था को दर्शाता है। इस काल में साम्राज्य का विशाल आकार बना रहा, जिसका अर्थ यह है कि प्रशासनिक ढाँचा न केवल प्रभावी था, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी पर्याप्त रूप से संगठित था। गुप्त प्रशासन की यही विशेषता आगे चलकर उनके साम्राज्य की दीर्घकालिक स्थिरता का आधार बनी।
प्रांतों को ‘भुक्ति’ कहा जाता था और उनके प्रमुख को ‘उपरिक महाराज’। यह व्यवस्था इस बात का संकेत देती है कि गुप्त शासक केंद्रीय सत्ता को बनाए रखते हुए भी प्रांतीय प्रशासन को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान करते थे।
उपरिक महाराज और गुप्त प्रशासन की कार्यकुशलता
कुमारगुप्त के अभिलेखों से ज्ञात प्रांतीय शासक चिरादत्त (पुंड्रवर्धन), घटोत्कचगुप्त (एरण), बंधुवर्मा (दशपुर) और पृथिवीषेण (अवंति) केवल नाममात्र के अधिकारी नहीं थे, बल्कि प्रशासन, धर्म और लोककल्याण में सक्रिय भूमिका निभाते थे। उदाहरणस्वरूप, बंधुवर्मा द्वारा शिव मंदिर का निर्माण या पृथिवीषेण का सचिव एवं महाबलाधिकृत जैसे उच्च पदों पर कार्य करना, यह दर्शाता है कि प्रांतीय अधिकारी केवल कर-संग्राहक नहीं, बल्कि शासन की वैचारिक और सांस्कृतिक धुरी भी थे।
यह प्रशासनिक व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि कुमारगुप्त के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र पर आधारित था।
धार्मिक नीति और सांस्कृतिक योगदान
कुमारगुप्त वैष्णव थे और उन्हें ‘परमभागवत’ कहा गया है, किंतु उनकी धार्मिक नीति पूर्णतः सहिष्णु थी। बौद्ध, शैव और अन्य संप्रदायों को समान संरक्षण प्राप्त था। नालंदा महाविहार की स्थापना, जिसे ह्वेनसांग ‘शक्रादित्य’ से जोड़ता है, कुमारगुप्त के शासनकाल की सबसे दूरगामी सांस्कृतिक उपलब्धि मानी जाती है।

ऐतिहासिक मूल्यांकन: कुमारगुप्त का शासनकाल क्यों निर्णायक था
समग्र मूल्यांकन से स्पष्ट है कि कुमारगुप्त का शासनकाल गुप्त साम्राज्य की स्थिरता का अंतिम सुदृढ़ चरण था। उन्होंने समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा निर्मित साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उसे प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से संगठित भी किया। उनके स्वर्ण सिक्कों पर अंकित उपाधियाँ ‘गुप्तकुलव्योमशशि’ और ‘गुप्तकलामलचंद्र’ उनकी ऐतिहासिक भूमिका को सटीक रूप में अभिव्यक्त करती हैं।
कुमारगुप्त का शासनकाल: स्थिरता का शिखर और संकट की भूमिका
समग्र दृष्टि से देखा जाए तो कुमारगुप्त का शासनकाल गुप्त साम्राज्य के इतिहास में स्थिरता का शिखर था, किंतु यह स्थिरता पूर्णतः निष्कलंक नहीं थी। बाह्य विस्तार के अभाव, पुष्यमित्र आक्रमण के संकेत और उत्तराधिकार की पृष्ठभूमि में यह शासनकाल एक ऐसे संक्रमण-बिंदु के रूप में उभरता है, जहाँ साम्राज्य की आंतरिक शक्ति तो बनी रही, परंतु भविष्य के संकटों की आहट भी स्पष्ट होने लगी थी।
कुमारगुप्त की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा निर्मित विशाल साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उसे प्रशासनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से संगठित भी किया। यही कारण है कि उनका शासनकाल गुप्त साम्राज्य के पतन की नहीं, बल्कि उससे ठीक पहले की संतुलित अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
इस प्रकार, कुमारगुप्त का शासनकाल न तो एक निष्क्रिय मध्यवर्ती अध्याय है और न ही केवल शांति का काल, बल्कि वह ऐतिहासिक सेतु है जिसने गुप्त स्वर्ण युग की विरासत को स्कंदगुप्त के संघर्षपूर्ण युग तक पहुँचाया।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
