महरौली स्तंभ लेख: चन्द्रगुप्त द्वितीय की ऐतिहासिक पहचान का निर्णायक प्रमाण

महरौली स्तंभ लेख: स्थल, संरचना और ऐतिहासिक संदर्भ

 

दिल्ली के महरौली क्षेत्र से प्राप्त लौह स्तंभ, जो वर्तमान में कुतुब परिसर में स्थापित है, प्राचीन भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक एवं पुरालेखीय साक्ष्य है। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण महरौली स्तंभ लेख में ‘चन्द्र’ नामक एक शासक की उपलब्धियों का वर्णन तीन संस्कृत श्लोकों में किया गया है। यह अभिलेख न केवल गुप्त वंश के इतिहास के स्रोत को समझने में सहायक है, बल्कि उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास, सैन्य अभियानों और वैष्णव धार्मिक प्रवृत्तियों के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

महरौली स्तंभ लेख में चन्द्रगुप्त द्वितीय की ऐतिहासिक प्रशस्ति
महरौली स्तंभ लेख गुप्तकालीन अभिलेख परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें ‘चन्द्र’ की पहचान चन्द्रगुप्त द्वितीय से जोड़ी जाती है।

महरौली स्तंभ लेख की विषय-वस्तु

 

अभिलेख में वर्णित श्लोकों का सार यह है कि ‘चन्द्र’ नामक शासक ने,

  • बंगाल के युद्ध-क्षेत्र में एकजुट होकर आए शत्रुओं के संघ को पराजित किया,
  • सिन्धु नदी के सातों मुखों को पार कर ‘बाह्निकों’ को युद्ध में परास्त किया,
  • और उसके प्रताप की ख्याति दक्षिण के समुद्रतट तक फैल गई।

लेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अभिलेख-लेखन के समय वह शासक जीवित नहीं था, किंतु उसकी कीर्ति पृथ्वी पर व्याप्त थी। उसने बाहुबल से राज्य प्राप्त किया था, दीर्घकाल तक शासन किया और विष्णु-भक्ति के कारण विष्णुपद नामक पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना करवाई थी। इस प्रकार महरौली स्तंभ लेख एक मरणोत्तर प्रशस्ति के रूप में सामने आता है, जिसमें राजनीतिक शक्ति, सैन्य विजय और धार्मिक आस्था, तीनों का समन्वय दिखाई देता है।

 

तिथि और वंशावली का अभाव: एक मूल समस्या

 

इस अभिलेख में न तो किसी प्रकार की तिथि अंकित है और न ही शासक की वंशावली दी गई है। राजा का केवल ‘चन्द्र’ नाम ही मिलता है। यही कारण है कि महरौली स्तंभ लेख में वर्णित ‘चन्द्र’ की पहचान प्राचीन भारतीय इतिहास की सबसे जटिल समस्याओं में से एक बन गई है। चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य तक, लगभग सभी प्रमुख ‘चन्द्र’-नामधारी शासकों के साथ इस लेख के ‘चन्द्र’ का समीकरण स्थापित करने के प्रयास किए गए हैं, जिसकी पृष्ठभूमि को समझने के लिए गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है।

 

‘चन्द्र’ की पहचान को लेकर विद्वानों के मत

 

महरौली स्तंभ लेख में तिथि और वंशावली के अभाव के कारण ‘चन्द्र’ की पहचान को लेकर विद्वानों में गहन मतभेद रहा है। प्रत्येक इतिहासकार ने भाषा, लिपि, धार्मिक संकेतों तथा राजनीतिक संदर्भों के आधार पर इस ‘चन्द्र’ को किसी न किसी ज्ञात शासक से जोड़ने का प्रयास किया है। किंतु इन मतों की वैधता को स्वीकार करने से पूर्व, उनका आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक है, क्योंकि प्रशस्ति-लेखों में अतिशयोक्ति और प्रतीकात्मक भाषा की प्रवृत्ति सामान्य रही है।

 

चन्द्रगुप्त मौर्य से समीकरण

विद्वान एच. सी. सेठ ने इस ‘चन्द्र’ की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से करने का प्रयास किया है। किंतु यह मत स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि चन्द्रगुप्त मौर्य वैष्णव मतानुयायी नहीं था, जबकि महरौली लेख में वर्णित शासक विष्णु-भक्त प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, इस अभिलेख की लिपि भी मौर्यकालीन नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से गुप्तकालीन है।

 

कनिष्क और कुषाण-समीकरण

इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार के अनुसार महरौली लेख के ‘चन्द्र’ की पहचान कुषाण नरेश कनिष्क से की जानी चाहिए, क्योंकि उसका बल्ख पर अधिकार था और खोतानी पांडुलिपि में उसे ‘चन्द्र कनिष्क’ कहा गया है। किंतु यह मत भी कई कारणों से असंगत प्रतीत होता है। कनिष्क बौद्ध मतानुयायी था, जबकि महरौली लेख का शासक विष्णु-भक्त था। इसके अतिरिक्त, कनिष्क के राज्य का विस्तार दक्षिण भारत तक नहीं था।

 

नागवंशी चन्द्रांश और अन्य दुर्बल समीकरण

रायचौधरी ने ‘चन्द्र’ को पुराणों में उल्लिखित नागवंशी शासक चन्द्रांश से जोड़ा है। किंतु चन्द्रांश इतना शक्तिशाली और प्रतापी राजा नहीं था कि उसके साथ बंगाल-विजय, बाह्निक-विजय और दक्षिण तक फैली ख्याति जैसे दावों को जोड़ा जा सके। वही दूसरी तरफ इतिहासकार हरप्रसाद शास्त्री ने इसे सुसुनिया (पश्चिम बंगाल) के लेख में उल्लिखित चन्द्रवर्मा से जोड़ने का प्रयास किया, किंतु यह समीकरण भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि चन्द्रवर्मा एक साधारण शासक था, जिसे समुद्रगुप्त ने सहज ही पराजित कर दिया था।

 

चन्द्रगुप्त प्रथम और समुद्रगुप्त से तुलना

फ्लीट, आयंगर और बसाक जैसे विद्वानों ने ‘चन्द्र’ की पहचान चन्द्रगुप्त प्रथम से की है, किंतु यह भी तर्कसंगत नहीं है। चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्य-विस्तार सीमित था और बंगाल अथवा दक्षिण भारत पर उसके प्रभाव का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

कुछ विद्वानों ने ‘चन्द्र’ को समुद्रगुप्त से जोड़ने का प्रयास किया है, किंतु समुद्रगुप्त की उपलब्धियां देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह समीकरण मरणोत्तर प्रशस्ति की प्रकृति से मेल नहीं खाता। इस समीकरण के विरुद्ध सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि महरौली स्तंभ लेख एक मरणोत्तर प्रशस्ति है, जिसमें अश्वमेध यज्ञ का कोई उल्लेख नहीं मिलता। साथ ही, समुद्रगुप्त के लिए ‘चन्द्र’ नाम का कोई स्पष्ट समकालीन प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है।

 

विद्वत् मतों की आलोचनात्मक समीक्षा

 

इस प्रकार, ‘चन्द्र’ की पहचान को लेकर प्रस्तुत किए गए ये सभी मत किसी न किसी ऐतिहासिक कसौटी पर असंगत सिद्ध होते हैं। कहीं धार्मिक प्रवृत्ति बाधा बनती है, कहीं राजनीतिक विस्तार, तो कहीं समकालीन साक्ष्यों का अभाव। इन सभी समीकरणों की आलोचनात्मक समीक्षा करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि महरौली स्तंभ लेख में उल्लिखित ‘चन्द्र’ की पहचान किसी ऐसे शासक से ही की जा सकती है, जिसके सैन्य पराक्रम और वैष्णव धार्मिक संकेत अभिलेख में वर्णित काव्यात्मक प्रशस्ति से मेल खाते हों, और जिनका व्यापक राजनीतिक प्रभाव अन्य ऐतिहासिक स्रोतों से भी पुष्ट होता हो।

 

महरौली स्तंभ लेख का मूल अभिलेख लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण
लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण महरौली स्तंभ लेख गुप्तकालीन अभिलेख परंपरा का महत्वपूर्ण साक्ष्य है, जिसमें ‘चन्द्र’ नामक शासक की प्रशस्ति मिलती है।

‘चन्द्र’ की पहचान और चन्द्रगुप्त द्वितीय

 

पूर्ववर्ती विद्वत् मतों की आलोचनात्मक समीक्षा के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि महरौली स्तंभ लेख में उल्लिखित ‘चन्द्र’ की पहचान किसी ऐसे शासक से ही संभव है, जिसके जीवन और शासनकाल में,

  1. व्यापक सैन्य सफलताएँ,
  2. वैष्णव धार्मिक प्रवृत्ति, और
  3. उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक फैला हुआ राजनीतिक प्रभाव,

तीनों तत्व एक साथ उपलब्ध हों। इन कसौटियों पर परखने पर चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का व्यक्तित्व सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

 

बंगाल-विजय और शत्रु-संघ का प्रश्न

 

महरौली स्तंभ लेख में वर्णित पहला प्रमुख सैन्य प्रसंग बंगाल के युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं के एक संघ पर विजय से संबंधित है। यह उल्लेख साधारण विजय नहीं, बल्कि किसी संगठित राजनीतिक गठबंधन के दमन की ओर संकेत करता है।

समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसके समय गुप्त साम्राज्य की पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर पाँच राज्य समतट, डावाक, कामरूप, कर्तृपुर और नेपाल स्थित थे, जिन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार की थी। किंतु रामगुप्त के दुर्बल शासनकाल में इन राज्यों का पुनः स्वतंत्र होना और आपसी संघ बनाना असंभव नहीं प्रतीत होता।

 

उत्तरी बंगाल का गुप्त साम्राज्य में विलय

कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेखों से यह प्रमाणित होता है कि उसके शासनकाल में पुण्ड्रवर्धन गुप्तों की एक भुक्ति था। चूँकि कुमारगुप्त प्रथम स्वयं किसी बड़े सैन्य अभियान के लिए प्रसिद्ध नहीं है, अतः यह मानना तर्कसंगत है कि उत्तरी बंगाल का यह क्षेत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा ही जीता गया था। महरौली स्तंभ लेख का बंगाल-विजय संबंधी उल्लेख इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का काव्यात्मक रूपांतरण प्रतीत होता है।

 

बाह्निक-विजय’ और सिन्धु के सात मुख

 

महरौली स्तंभ लेख का दूसरा महत्वपूर्ण सैन्य संकेत ‘सिन्धु के सात मुखों को पार कर बाह्निकों पर विजय’ से संबंधित है। इस कथन की सही ऐतिहासिक व्याख्या किए बिना ‘चन्द्र’ की पहचान अधूरी रह जाती है।

 

‘बाह्निक’ शब्द का ऐतिहासिक अर्थ

भण्डारकर ने रामायण और महाभारत के संदर्भों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्राचीन काल में पंजाब के व्यास नदी क्षेत्र को ‘बाह्निक’ या ‘वाहीक’ कहा जाता था। रामायण में भरत को बुलाने गए दूतों के मार्ग-वर्णन में जिन स्थलों विष्णुपद, विपाशा, शाल्मली का उल्लेख है, वे सभी पंजाब क्षेत्र से संबंधित हैं। महाभारत में इसी भूभाग को ‘वाहीक देश’ कहा गया है।

 

कुषाणों और बाह्निकों का समीकरण

कुषाण मूलतः बल्ख क्षेत्र के शासक थे, किंतु बाद में वे पंजाब में आकर बस गए। इस कारण पंजाब में निवास करने वाले उत्तरकालीन कुषाण भी ‘बाह्निक’ कहलाने लगे। गुप्तकाल में ये कुषाण पहले समुद्रगुप्त के अधीन थे, परंतु रामगुप्त के समय शकों के साथ मिलकर स्वतंत्र हो गए।

 

सिन्धु-पार अभियान का ऐतिहासिक आशय

सिन्धु के सात मुखों का उल्लेख उसके डेल्टा क्षेत्र की ओर संकेत करता है। संभवतः चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों के उन्मूलन के पश्चात निचली सिन्धु घाटी से होते हुए पंजाब में प्रवेश किया और वहाँ स्थित उत्तरकालीन कुषाणों को पराजित किया। इस प्रकार, महरौली स्तंभ लेख में वर्णित ‘बाह्निक-विजय’ वास्तव में चन्द्रगुप्त द्वितीय की उत्तर-पश्चिमी नीति का संकेतक है।

 

दक्षिण भारत में चन्द्रगुप्त द्वितीय की ख्याति

 

महरौली स्तंभ लेख में ‘चन्द्र’ के प्रताप की सुगंध से दक्षिण के समुद्रतट के सुवासित होने का उल्लेख प्रत्यक्ष सैन्य विजय की अपेक्षा राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव की ओर अधिक संकेत करता है।

 

दक्षिणी वंशों से वैवाहिक और राजनीतिक संबंध

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने वाकाटक और कदंब वंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उसकी पुत्री प्रभावती गुप्त के शासनकाल में वाकाटक राज्य पूर्णतः गुप्त प्रभाव क्षेत्र में आ गया। यह प्रभाव प्रत्यक्ष साम्राज्य-विस्तार नहीं, बल्कि राजनीतिक अधीनता का सूचक था।

 

कालिदास और कुन्तल-प्रसंग

भोज के शृंगारप्रकाश तथा क्षेमेन्द्र के उद्धरणों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कालिदास को कुन्तल नरेश काकुत्स्वर्मा के दरबार में दूत बनाकर भेजा था। कालिदास के कथन से संकेत मिलता है कि कुन्तल नरेश ने व्यावहारिक रूप से शासनभार चन्द्रगुप्त पर छोड़ दिया था। यही ऐतिहासिक वास्तविकता महरौली स्तंभ लेख में काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्त हुई है।

 

वैष्णव धार्मिक प्रवृत्ति और विष्णुध्वज की स्थापना

 

महरौली स्तंभ लेख में ‘चन्द्र’ को भगवान विष्णु का परम भक्त बताया गया है और विष्णुपद नामक पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह विवरण किसी गौण धार्मिक संकेत का नहीं, बल्कि शासक की वैचारिक पहचान का सूचक है। गुप्तकाल में ‘परमभागवत’ उपाधि केवल औपचारिक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि राज्यसत्ता और धर्म के घनिष्ठ संबंध को दर्शाती थी।

यह विशेषता उन सभी शासकों के साथ मेल नहीं खाती, जिनके साथ ‘चन्द्र’ का समीकरण प्रस्तावित किया गया है। चन्द्रगुप्त मौर्य, कनिष्क अथवा समुद्रगुप्त, इनमें से किसी के लिए भी विष्णु-भक्ति इस स्तर पर प्रमाणित नहीं है। इसके विपरीत, चंद्रगुप्त द्वितीय की वैष्णव धार्मिक प्रवृत्ति उसके सिक्कों, उपाधियों और अन्य अभिलेखों से भली-भाँति सिद्ध होती है।

 

‘बाहुबल से राज्य-प्राप्ति’ का ऐतिहासिक आशय

 

महरौली स्तंभ लेख में यह कथन विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है कि ‘चन्द्र’ ने बाहुबल से राज्य प्राप्त किया। यह वाक्य किसी सामान्य उत्तराधिकार का नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकट और शक्ति-संघर्ष की ओर संकेत करता है।

रामगुप्त के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य की स्थिति संकटपूर्ण हो गई थी। शक क्षत्रपों का दबाव बढ़ रहा था और यदि निर्णायक हस्तक्षेप न हुआ होता, तो गुप्त सत्ता का पतन संभव था। परंपरा के अनुसार, चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस संकट में हस्तक्षेप कर शकपति का वध किया और सत्ता अपने हाथों में ली। इस प्रकार उसकी सत्ता-प्राप्ति न तो शांतिपूर्ण उत्तराधिकार थी और न ही केवल वंशानुगत, बल्कि स्पष्ट रूप से सैन्य शक्ति के प्रयोग से जुड़ी हुई थी। यही ऐतिहासिक वास्तविकता महरौली स्तंभ लेख में ‘बाहुबल’ शब्द के माध्यम से संक्षेप में अभिव्यक्त हुई है।

 

दीर्घकालीन शासन और राजनीतिक स्थायित्व

 

महरौली स्तंभ लेख में ‘चन्द्र’ के दीर्घकालीन शासन का संकेत भी निहित है। चन्द्रगुप्त द्वितीय का लगभग चार दशकों (लगभग 375–415 ई.) तक शासन करना गुप्त इतिहास में एक असाधारण तथ्य है। इस काल में साम्राज्य न केवल स्थिर रहा, बल्कि प्रशासनिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ हुआ।

इस दीर्घ शासनकाल ने ही उसे उत्तर-पश्चिम, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत, तीनों दिशाओं में प्रभाव स्थापित करने का अवसर दिया। अल्पकालिक या सीमित शासन वाले किसी भी अन्य ‘चन्द्र’ के साथ इस प्रकार की उपलब्धियों का समन्वय संभव नहीं है।

 

मरणोत्तर प्रशस्ति और लेख का संभावित कर्ता

 

महरौली स्तंभ लेख से यह स्पष्ट होता है कि लेख-रचना के समय ‘चन्द्र’ जीवित नहीं था। यह तथ्य इस अभिलेख को एक मरणोत्तर प्रशस्ति के रूप में स्थापित करता है। गुप्तकाल में पूर्ववर्ती शासकों की स्मृति में प्रशस्ति उत्कीर्ण कराने की परंपरा विद्यमान थी।

इस संदर्भ में यह अनुमान अत्यंत तर्कसंगत प्रतीत होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम ने पिता की कीर्ति को स्थायी रूप देने के लिए यह लेख उत्कीर्ण कराया। नाम के रूप में केवल ‘चन्द्र’ का प्रयोग संभवतः लिपि-संरचना और काव्यात्मक आवश्यकता के कारण किया गया। उल्लेखनीय है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय की कुछ मुद्राओं पर भी केवल ‘चन्द्र’ नाम ही अंकित मिलता है।

 

निष्कर्ष

 

महरौली स्तंभ लेख का महत्व केवल ‘चन्द्र’ की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि यह अभिलेख गुप्तकालीन राजसत्ता की प्रकृति और उसकी स्मृति-परंपरा को संक्षिप्त किंतु सघन रूप में अभिव्यक्त करता है। यह एक मरणोत्तर प्रशस्ति है, जिसमें काव्यात्मक भाषा के माध्यम से आदर्श शासक की छवि निर्मित की गई है। अभिलेख में निहित सैन्य अभियानों के संकेत, वैष्णव धार्मिक प्रवृत्ति, व्यापक राजनीतिक प्रभाव और सत्ता-प्राप्ति की प्रकृति, इन सभी तत्वों को अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के आलोक में परखने पर यह निष्कर्ष सर्वाधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि महरौली स्तंभ लेख का ‘चन्द्र’ चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ही था। इस प्रकार यह अभिलेख गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष काल और उसकी ऐतिहासिक आत्म-छवि को समझने का एक केंद्रीय स्रोत सिद्ध होता है।

 

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