विजयनगर-बहमनी प्रतिद्वंद्विता की संरचनात्मक धुरी: रायचूर दोआब
रायचूर दोआब, कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित वह क्षेत्र था जिसने लगभग डेढ़ शताब्दी तक दक्कन की शक्ति-संरचना को प्रभावित किया। यह केवल सीमावर्ती भूभाग नहीं, बल्कि विजयनगर-बहमनी प्रतिद्वंद्विता का केंद्रीय मंच था। 1336 ई. में स्थापित विजयनगर साम्राज्य और 1347 ई. में स्थापित बहमनी सल्तनत लगभग एक ही राजनीतिक परिस्थिति की उपज थे, तुग़लक सत्ता के पतन के बाद उत्पन्न शक्ति-शून्य।
दोनों राज्यों की भौगोलिक स्थिति ही उन्हें परस्पर टकराव की ओर ले जाती थी। विजयनगर तुंगभद्रा के दक्षिण में और बहमनी कृष्णा के उत्तर में संगठित हुआ। इनके मध्य का क्षेत्र अर्थात् रायचूर दोआब स्वाभाविक रूप से सैन्य और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बना। इतिहास में इसे “रायचूर दोआब की समस्या” कहा गया, परंतु इस अभिव्यक्ति का आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक है।
वास्तव में रायचूर दोआब विजयनगर-बहमनी संबंधों की धुरी था, परंतु यह संघर्ष का मूल कारण नहीं, बल्कि उस व्यापक साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का रणक्षेत्र था जो दक्कन की भू-राजनीति में निहित थी।

स्रोत: Karl J Schmidt, CC BY-SA 4.0, Wikimedia Commons
रायचूर दोआब क्या है?
रायचूर दोआब कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित दक्षिण भारत का एक ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो मध्यकालीन काल में विजयनगर साम्राज्य और बहमनी सल्तनत के बीच दीर्घकालीन संघर्ष का केंद्र रहा। यह क्षेत्र अपनी उपजाऊ भूमि, सामरिक किलों (विशेषकर रायचूर और मुदगल), तथा दक्कन के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण था। चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक यह क्षेत्र दक्कन की शक्ति-संतुलन राजनीति का प्रतीक बना रहा।
रायचूर दोआब का सामरिक और आर्थिक महत्व: संघर्ष की वास्तविक पृष्ठभूमि
रायचूर दोआब का महत्व केवल भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं था। इसे समझने के लिए सामरिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक तीनों आयामों पर विचार करना आवश्यक है।
सामरिक दृष्टि से कृष्णा और तुंगभद्रा नदियाँ प्राकृतिक अवरोध थीं। इनके बीच स्थित किले विशेषकर रायचूर और मुदगल दक्कन की सीमांत सुरक्षा के मुख्य स्तंभ थे। रायचूर का किला ग्रेनाइट शिलाखंडों पर निर्मित था, जिसकी दोहरी परकोट व्यवस्था दीर्घकालीन घेराबंदी को संभव बनाती थी। अतः इस क्षेत्र पर नियंत्रण का अर्थ था उत्तर और दक्षिण दक्कन के मध्य सैन्य मार्गों पर नियंत्रण।
आर्थिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण था। कृष्णा के दक्षिण का भाग अत्यंत उपजाऊ था और यहाँ का कृषि-उत्पादन राजस्व की दृष्टि से आकर्षक था। इसके अतिरिक्त लौह संसाधन तथा कृष्णा तटवर्ती क्षेत्रों के हीरा-उत्पादन ने इसे रणनीतिक संपन्नता प्रदान की। घोड़ा व्यापार, जो मध्यकालीन दक्षिण भारतीय सेनाओं की रीढ़ था, पश्चिमी तट से आंतरिक दक्कन तक इसी मार्ग से संचालित होता था। अतः रायचूर दोआब का सामरिक और आर्थिक महत्व प्रत्यक्ष रूप से सैन्य शक्ति से जुड़ा हुआ था। इसी कारण रायचूर दोआब पर विजयनगर और बहमनी संघर्ष केवल सीमावर्ती विवाद नहीं था, बल्कि संसाधन और शक्ति-संतुलन का प्रश्न था।
रायचूर दोआब: प्रमुख युद्ध और घटनाएँ (कालक्रम)
| वर्ष | घटना |
| 1367 ई. | बहमनी-विजयनगर प्रारंभिक टकराव |
| 1406 ई. | फ़िरोज़ शाह का बाँकापुर अभियान |
| 1420-1440 | देवराय द्वितीय के सैन्य सुधार |
| 1471 ई. | महमूद गवां द्वारा गोवा पर अधिकार |
| 1520 ई. | कृष्णदेव राय द्वारा रायचूर की निर्णायक विजय |
धार्मिक व्याख्या बनाम संरचनात्मक विश्लेषण: स्रोतों की आलोचनात्मक समीक्षा
विजयनगर-बहमनी संघर्ष को कई समकालीन फारसी स्रोतों ने धार्मिक रूप में प्रस्तुत किया। ‘बुरहान-ए-मआसिर’ के लेखक तबतबा ने इसे ‘कुफ्र के दमन’ के रूप में चित्रित किया। फ़रिश्ता ने कर-विवाद को युद्ध का कारण बताया।
किन्तु इन स्रोतों का तुलनात्मक विश्लेषण एक भिन्न चित्र प्रस्तुत करता है। विजयनगर दरबार में मुस्लिम अश्वारोही और तुर्की धनुर्धारी नियुक्त थे। देवराय द्वितीय ने अपनी सेना में इस्लामी सैन्य विशेषज्ञों को शामिल किया। दूसरी ओर, बहमनी प्रशासन में स्थानीय हिंदू अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर थे। यदि संघर्ष पूर्णतः धार्मिक होता, तो इस प्रकार का सैन्य-सहयोग और प्रशासनिक समावेशन संभव नहीं था। अतः यह निष्कर्ष अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि धार्मिक भाषा राजनीतिक वैधता का उपकरण थी, वास्तविक कारण नहीं। इस प्रकार, मध्यकालीन दक्षिण भारत में रायचूर दोआब का राजनीतिक महत्व साम्राज्यवादी विस्तार और संसाधन-नियंत्रण से अधिक संबंधित था, न कि सांप्रदायिक वैमनस्य से।
प्रारंभिक संघर्ष (1347-1400 ई.): सीमाओं का परीक्षण और शक्ति-संतुलन
विजयनगर-बहमनी संबंधों का प्रारंभिक चरण सीमांत परीक्षण का काल था। बहमनी सुल्तान अलाउद्दीन बहमन शाह के समय रायचूर क्षेत्र पर दबाव डाला गया। फ़रिश्ता के अनुसार विजयनगर नरेश हरिहर प्रथम ने घोड़े और धन देकर समझौता किया। यद्यपि स्रोतों में मतभेद हैं, परंतु यह स्पष्ट है कि दोनों शक्तियाँ प्रत्यक्ष टकराव से पहले एक-दूसरे की क्षमता परख रही थीं।
बुक्का प्रथम और मुहम्मद शाह प्रथम के काल में तीन युद्धों का उल्लेख मिलता है। 1367 ई., 1375 ई. और 1398 ई. के मध्य विजयनगर और बहमनी सेनाओं के बीच सीमांत संघर्ष हुए। विशेष रूप से मुदगल और रायचूर किलों पर अधिकार के लिए बार-बार सैन्य टकराव हुआ। इन युद्धों में कोई स्थायी सीमा-विस्तार नहीं हुआ, जिससे स्पष्ट है कि संघर्ष नियंत्रण-आधारित था, न कि अधिग्रहण-आधारित। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, रायचूर दोआब पर नियंत्रण परिवर्तनीय था, स्थायी नहीं।
यह चरण दर्शाता है कि दोनों राज्य पूर्ण विजय के बजाय शक्ति-संतुलन बनाए रखने की नीति पर चल रहे थे। यही प्रवृत्ति आगे चलकर पंद्रहवीं शताब्दी में और स्पष्ट होती है।
फ़िरोज़ शाह और देवराय प्रथम: रायचूर दोआब पर प्रभुत्व की पहली निर्णायक टक्कर
पंद्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यह स्पष्ट हो चुका था कि रायचूर दोआब पर स्थायी नियंत्रण किसी एक शक्ति के लिए सरल नहीं होगा। चौदहवीं शताब्दी के अंत तक सीमांत संघर्ष परीक्षणात्मक थे, किंतु फ़िरोज़ शाह बहमनी (1397-1422 ई.) के शासनकाल में यह प्रतिद्वंद्विता अधिक आक्रामक और संगठित रूप लेती है। फ़िरोज़ शाह केवल सीमांत रक्षात्मक नीति से संतुष्ट नहीं था; उसका उद्देश्य दक्षिण दक्कन में बहमनी प्रभुत्व की स्थापना करना था। इस संदर्भ में रायचूर दोआब पर विजयनगर और बहमनी संघर्ष राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया।
फ़रिश्ता के अनुसार 1406 ई. के आसपास फ़िरोज़ शाह ने तुंगभद्रा पार कर बाँकापुर पर आक्रमण किया और देवराय प्रथम को समझौते के लिए विवश किया। इस अभियान के दौरान रायचूर और मुदगल जैसे सीमांत किलों पर नियंत्रण निर्णायक बन गया। पांगल किले की दीर्घ घेराबंदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघर्ष केवल सीमांत झड़प नहीं था, बल्कि दक्षिणी दक्कन की शक्ति-संरचना को प्रभावित करने वाला संगठित सैन्य अभियान था।
फ़रिश्ता एक वैवाहिक संधि का भी उल्लेख करता है, जिसके अनुसार देवराय की पुत्री का विवाह सुल्तान से हुआ और बाँकापुर दहेज में दिया गया। परंतु यह विवरण विवादास्पद है, क्योंकि पुर्तगाली यात्री नूनिज तथा उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाण इस वैवाहिक समझौते की पुष्टि नहीं करते। अतः यह संभव है कि फारसी इतिहासकारों ने बहमनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के उद्देश्य से इस घटना को अधिक गौरवपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया हो।
यद्यपि यह अभियान स्थायी विजय में परिणत नहीं हुआ, परंतु 1406 का यह संघर्ष रायचूर दोआब को दीर्घकालीन सैन्य प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के रूप में स्थापित कर गया।
युद्ध का वास्तविक परिणाम अधिक जटिल था। पांगल किले की दीर्घ घेराबंदी और तेलंगाना क्षेत्र में दोनों पक्षों की सक्रियता यह दर्शाती है कि संघर्ष केवल सीमांत भूभाग तक सीमित नहीं था। इस चरण में रायचूर दोआब सामरिक दबाव का उपकरण बन गया, जिसके माध्यम से एक शक्ति दूसरी की आंतरिक राजनीति और संसाधनों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती थी। अतः यह टकराव स्थायी विजय से अधिक शक्ति-प्रदर्शन का प्रयास था।
पांगल और तेलंगाना: सीमांत से परे विस्तारित संघर्ष
फ़िरोज़ शाह और देवराय प्रथम के संघर्ष को केवल रायचूर तक सीमित समझना त्रुटिपूर्ण होगा। तेलंगाना के वेलमा सरदारों और क्षेत्रीय राजनीति में हस्तक्षेप इस संघर्ष को व्यापक दक्कनी परिप्रेक्ष्य से जोड़ता है। जब देवराय प्रथम ने पांगल किले पर अधिकार किया, तो बहमनी सत्ता को अपने प्रभाव-क्षेत्र की रक्षा के लिए व्यापक सैन्य प्रयास करने पड़े।
दो वर्ष तक चले घेराव और बदलते गठबंधनों ने यह स्पष्ट किया कि रायचूर दोआब विजयनग-बहमनी संबंधों की धुरी तो था, परंतु उसके माध्यम से दोनों शक्तियाँ व्यापक क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने का प्रयास कर रही थीं। यह एक संरचनात्मक शक्ति-संघर्ष था, न कि सीमित भू-विवाद।
देवराय द्वितीय की सैन्य पुनर्संरचना: अनुकूलन, प्रतिस्पर्धा और दोआब की रणनीति
देवराय द्वितीय (1422-1446 ई.) का काल विजयनगर इतिहास में सैन्य पुनर्गठन के लिए विशेष रूप से स्मरणीय है। पूर्ववर्ती संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि बहमनी सेना की घुड़सवार संरचना और तुर्की धनुर्विद्या दक्षिण भारतीय पारंपरिक युद्ध-पद्धति पर भारी पड़ सकती है। इस संदर्भ में देवराय द्वितीय का दृष्टिकोण प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक था।
उसने मुस्लिम अश्वारोही सैनिकों को नियुक्त किया, तुर्की धनुर्धारियों को सेना में शामिल किया और घुड़सवार दल का विस्तार किया। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस धारणा का खंडन करता है कि संघर्ष सांप्रदायिक आधार पर था। यदि युद्ध धार्मिक होता, तो इस प्रकार का सैन्य समावेशन संभव न होता।
देवराय द्वितीय ने सीमांत किलों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण पर विशेष ध्यान दिया। इससे स्पष्ट है कि वह समझता था कि रायचूर दोआब का सामरिक और आर्थिक महत्व केवल आक्रामक विजय में नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रक्षा-संतुलन में भी निहित है।
इस काल में विजयनगर ने दोआब क्षेत्र में आक्रामक नीति अपनाई और कुछ समय के लिए प्रभाव स्थापित किया, किंतु स्थायी समाधान पुनः नहीं निकला। यह स्थिति दर्शाती है कि दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे को निर्णायक बढ़त लेने से रोक रही थीं।
सैन्य-सुधार का दीर्घकालिक प्रभाव
देवराय द्वितीय की सैन्य नीति का प्रभाव तत्काल युद्धों से अधिक दीर्घकालिक था। इससे विजयनगर राज्य अधिक पेशेवर सैन्य ढाँचे की ओर अग्रसर हुआ। यह परिवर्तन केवल बहमनी चुनौती का प्रत्युत्तर नहीं था, बल्कि दक्षिण भारत की व्यापक शक्ति-संरचना में विजयनगर की स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास था। इसी चरण में मध्यकालीन दक्षिण भारत में रायचूर दोआब का राजनीतिक महत्व और स्पष्ट हो जाता है, यह क्षेत्र अब सैन्य आधुनिकीकरण का प्रेरक तत्व बन चुका था।
अहमद शाह प्रथम और संतुलन की पुनर्स्थापना: स्थायी विजय क्यों संभव नहीं हुई?
फ़िरोज़ शाह के उत्तराधिकारी अहमद शाह प्रथम ने बहमनी राज्य की दक्षिणी सीमा को पुनः संगठित करने का प्रयास किया। तेलंगाना क्षेत्र में हस्तक्षेप और रायचूर दोआब में दबाव-नीति इस बात का संकेत थे कि बहमनी दरबार विजयनगर के सैन्य सुधारों से सजग था।
इस चरण में संघर्ष पुनः तीव्र हुआ, किंतु परिणाम वही रहा, कोई भी शक्ति स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकी। इसका कारण केवल सैन्य संतुलन नहीं था, बल्कि भौगोलिक वास्तविकता भी थी। कृष्णा और तुंगभद्रा के मध्य स्थित यह क्षेत्र प्राकृतिक अवरोधों से घिरा था और स्थानीय सरदारों की भूमिका भी निर्णायक थी।
अतः यह स्पष्ट है कि रायचूर दोआब पर विजयनगर और बहमनी संघर्ष पूर्ण विजय की रणनीति नहीं, बल्कि संतुलन-नीति का परिणाम था। दोनों पक्ष यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि दूसरा पक्ष अत्यधिक शक्तिशाली न हो जाए।
महमूद गवां का युग: प्रशासनिक सुधार और शक्ति-संरचना का पुनर्गठन
पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बहमनी साम्राज्य के शक्तिशाली वज़ीर महमूद गवां (लगभग 1466-1481 ई.) का उदय दक्कन की राजनीति में निर्णायक सिद्ध हुआ। गवां ने प्रांतीय पुनर्गठन किया, ‘तरफ’ प्रणाली को व्यवस्थित किया तथा जागीर-व्यवस्था में सुधार कर केंद्रीय नियंत्रण को सुदृढ़ किया। इन उपायों का उद्देश्य दक्कनी और अफ़ाकी गुटों के बीच चल रहे संघर्ष को नियंत्रित कर बहमनी सत्ता को संगठित बनाना था।
1471 ई. में गोवा पर अधिकार बहमनी साम्राज्य की आर्थिक और सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करने वाली घटना सिद्ध हुआ। पश्चिमी समुद्री व्यापार, विशेषकर घोड़ा-आपूर्ति पर नियंत्रण ने बहमनी सैन्य क्षमता को मजबूत किया। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव रायचूर दोआब की रणनीतिक स्थिति पर पड़ा, क्योंकि अब दोआब का नियंत्रण समुद्री रसद और आंतरिक दक्कन की सैन्य संरचना से जुड़ गया था।
यद्यपि गवां को 1481 ई. में दरबारी षड्यंत्रों के कारण मृत्युदंड दिया गया, परंतु उसके प्रशासनिक सुधारों ने बहमनी राज्य को अस्थायी रूप से सुदृढ़ किया। इसी काल में उड़ीसा के गजपति शासकों द्वारा विजयनगर पर दबाव बढ़ने से शक्ति-संतुलन बहु-आयामी हो गया। परिणामस्वरूप, रायचूर दोआब का संघर्ष केवल विजयनगर और बहमनी के मध्य द्विपक्षीय प्रतिस्पर्धा नहीं रहा, बल्कि दक्कन की व्यापक शक्ति-संरचना का अभिन्न अंग बन गया।
संगम वंश का पतन और शक्ति-संतुलन का परिवर्तन: रायचूर दोआब की निरंतरता
पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विजयनगर साम्राज्य आंतरिक संकटों से जूझने लगा। संगम वंश के उत्तरकालीन शासक पूर्ववर्ती नरेशों की भाँति सशक्त नहीं थे। प्रशासनिक शिथिलता, सामंती प्रवृत्तियों का उभार और बाहरी आक्रमणों का दबाव, इन सभी कारकों ने विजयनगर की सीमांत नीति को कमजोर किया। इस परिवर्तित परिस्थिति में रायचूर दोआब पुनः अस्थिरता का केंद्र बन गया।
1485 ई. में संगम वंश का पतन और सालुव वंश का उदय केवल राजवंशीय परिवर्तन नहीं था; यह दक्कन की शक्ति-संरचना में परिवर्तन का संकेत था। विजयनगर की सीमांत शक्ति जब अस्थिर हुई, तब बहमनी साम्राज्य के भीतर भी गुटबाज़ी और विघटन की प्रक्रिया तीव्र हो रही थी। इस प्रकार, दोनों राज्यों की आंतरिक दुर्बलताओं ने दोआब क्षेत्र को अधिक संवेदनशील बना दिया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बहमनी साम्राज्य स्वयं भी स्थायी रूप से सुदृढ़ नहीं था। दक्कनी (स्थानीय) और अफ़ाकी (विदेशी) गुटों के बीच संघर्ष ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, बहमनी राज्य का विघटन आरंभ हुआ। किंतु यह विघटन रायचूर दोआब पर विजयनगर और बहमनी संघर्ष को समाप्त नहीं कर सका; बल्कि उसने इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया।
बहमनी विघटन और उत्तराधिकारी सल्तनतें: संघर्ष का नया चरण
पंद्रहवीं शताब्दी के अंत और सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक बहमनी साम्राज्य पाँच स्वतंत्र दक्कनी सल्तनतों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, बरार और बीदर में विभाजित हो गया। इस राजनीतिक विखंडन ने दक्कन की शक्ति-संरचना को बहुध्रुवीय बना दिया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है। पूर्व में विजयनगर का संघर्ष एक केंद्रीकृत बहमनी सत्ता से था, परंतु अब उसे अनेक क्षेत्रीय शक्तियों से जूझना था। इन उत्तराधिकारी सल्तनतों में विशेष रूप से बीजापुर की आदिलशाही सत्ता ने रायचूर दोआब को अपनी रणनीति का केंद्रीय तत्व बनाया।
बीजापुर की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि दोआब पर नियंत्रण उसके दक्षिणी विस्तार और सुरक्षा के लिए अनिवार्य था। इस प्रकार, बहमनी विघटन के बाद भी रायचूर दोआब का सामरिक और आर्थिक महत्व समाप्त नहीं हुआ; बल्कि वह नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया।
1520 ई. का रायचूर युद्ध: निर्णायक मोड़
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक रायचूर दोआब केवल विजयनगर-बहमनी संघर्ष का अवशेष नहीं रहा था, बल्कि उत्तराधिकारी दक्कनी सल्तनतों और विजयनगर साम्राज्य के बीच प्रतिष्ठा और प्रभुत्व का प्रश्न बन चुका था। 1520 ई. का युद्ध इस दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धा का चरम रूप था, जिसमें विजयनगर के शक्तिशाली शासक कृष्णदेव राय ने बीजापुर की आदिलशाही सत्ता को निर्णायक चुनौती दी।
उस समय बीजापुर पर इस्माइल आदिल शाह का शासन था। रायचूर किला आदिलशाही नियंत्रण में था और विजयनगर के लिए यह राजनीतिक अपमान तथा सामरिक बाधा दोनों था। कृष्णदेव राय ने इसे केवल सीमांत विवाद नहीं, बल्कि साम्राज्यिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया।
युद्ध की पृष्ठभूमि: राजनीतिक और सामरिक कारण
कृष्णदेव राय के शासनकाल (1509-1529 ई.) में विजयनगर अपनी शक्ति के चरम पर था। उड़ीसा के गजपति शासकों को परास्त करने के बाद उसका ध्यान दक्कन की ओर केंद्रित हुआ। रायचूर दोआब पर नियंत्रण उसके लिए तीन कारणों से आवश्यक था:
- तुंगभद्रा के उत्तर में स्थायी सुरक्षा
- बीजापुर की दक्षिणी महत्वाकांक्षाओं पर रोक
- साम्राज्यिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन
इस प्रकार, रायचूर दोआब पर विजयनगर और आदिलशाही संघर्ष पूर्ववर्ती विजयनगर-बहमनी प्रतिद्वंद्विता की निरंतरता था।
सैन्य संरचना और युद्ध-रणनीति
समकालीन पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस के अनुसार, कृष्णदेव राय की सेना अत्यंत विशाल थी, जिसमें पैदल सेना, घुड़सवार और हाथियों के अतिरिक्त तोपखाना भी सम्मिलित था। विजयनगर सेना ने रायचूर किले की घेराबंदी की और आदिलशाही सेना को खुले मैदान में निर्णायक संघर्ष के लिए विवश किया। निर्णायक क्षण तब आया जब विजयनगर की संगठित घुड़सवार टुकड़ियों ने आदिलशाही पंक्तियों को तोड़ दिया। युद्ध में तोपखाने का प्रयोग दोनों पक्षों ने किया, किंतु विजयनगर की संख्या-बल और रसद-संगठन अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ। अंततः इस्माइल आदिल शाह को पीछे हटना पड़ा और रायचूर किला विजयनगर के अधीन आ गया।
परिणाम: शक्ति-संतुलन पर प्रभाव
1520 की विजय ने तीन महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न किए:
- विजयनगर की प्रतिष्ठा दक्कन में चरम पर पहुँची।
- बीजापुर की दक्षिणी विस्तार-नीति को अस्थायी झटका लगा।
- रायचूर दोआब का सामरिक और आर्थिक महत्व पुनः सिद्ध हुआ।
यह विजय केवल क्षेत्रीय सफलता नहीं थी; यह विजयनगर साम्राज्य की सैन्य-संगठनात्मक श्रेष्ठता का प्रदर्शन थी। कृष्णदेव राय ने विजित किले में प्रवेश कर धार्मिक अनुष्ठान किए, जिससे राजनीतिक विजय को सांस्कृतिक वैधता भी प्रदान की गई।
क्या यह अंतिम समाधान था?
यद्यपि 1520 का रायचूर युद्ध विजयनगर के लिए निर्णायक विजय थी, परंतु यह स्थायी समाधान सिद्ध नहीं हुआ। दक्कनी सल्तनतों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा और विजयनगर के साथ उनकी सामूहिक शत्रुता अंततः सोलहवीं शताब्दी के मध्य में एक व्यापक गठबंधन का कारण बनी, जिसका परिणाम 1565 ई. का तालीकोटा युद्ध था। इस प्रकार, 1520 का युद्ध यह सिद्ध करता है कि मध्यकालीन दक्षिण भारत में रायचूर दोआब का राजनीतिक महत्व केवल सीमांत नियंत्रण नहीं, बल्कि व्यापक दक्कनी शक्ति-संतुलन से जुड़ा हुआ था।
शक्ति-संतुलन से टकराव की पराकाष्ठा तक: दीर्घकालिक परिणाम
विजयनगर-बहमनी प्रतिद्वंद्विता के दीर्घकालिक प्रभावों का मूल्यांकन करते समय यह स्पष्ट होता है कि रायचूर दोआब विजयनगर-बहमनी संबंधों की धुरी बना रहा, किंतु उसका प्रभाव सीमांत युद्धों से कहीं अधिक व्यापक था।
पहला, इस संघर्ष ने दोनों राज्यों की सैन्य-संरचना को प्रभावित किया। विजयनगर ने घुड़सवार सेना और तोपखाने को सुदृढ़ किया, जबकि बहमनी और उसके उत्तराधिकारी राज्यों ने सीमांत किलों की रक्षा-व्यवस्था को मजबूत किया।
दूसरा, निरंतर युद्धों ने आर्थिक संसाधनों पर दबाव डाला। दोआब क्षेत्र की उपजाऊ भूमि बार-बार सैन्य गतिविधियों का केंद्र बनी, जिससे कृषि और स्थानीय समाज प्रभावित हुआ।
तीसरा, यह संघर्ष दक्कन की सामूहिक राजनीति को आकार देता है। जब सोलहवीं शताब्दी के मध्य में दक्कनी सल्तनतों ने विजयनगर के विरुद्ध व्यापक गठबंधन बनाया, तब उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यही दीर्घकालीन सीमांत प्रतिस्पर्धा कार्य कर रही थी। यद्यपि तालीकोटा का युद्ध (1565 ई.) सीधे “रायचूर दोआब की समस्या” का परिणाम नहीं था, परंतु दक्कन की शक्ति-संरचना में दोआब संघर्ष की स्मृति और अनुभव निहित थे।
क्या रायचूर दोआब केवल रणक्षेत्र था? एक समग्र मूल्यांकन
इतिहासलेखन में अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या रायचूर दोआब स्वयं संघर्ष का कारण था या केवल रणभूमि। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह अधिक युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि दोआब मूल कारण नहीं, बल्कि संरचनात्मक प्रतिस्पर्धा का माध्यम था।
भौगोलिक दृष्टि से यह प्राकृतिक सीमा थी;
आर्थिक दृष्टि से यह राजस्व और संसाधन-संपन्न क्षेत्र था;
राजनीतिक दृष्टि से यह प्रतिष्ठा और वैधता का प्रतीक था।
अतः मध्यकालीन दक्षिण भारत में रायचूर दोआब का राजनीतिक महत्व उस व्यापक साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में निहित था, जिसने विजयनगर और बहमनी राज्यों को निरंतर संघर्षरत रखा। धार्मिक व्याख्या इस जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण मात्र है।
समापन: विजयनगर-बहमनी संबंधों का ऐतिहासिक अर्थ
समग्रतः कहा जा सकता है कि विजयनगर-बहमनी संबंधों का इतिहास सीमांत संघर्षों का इतिहास भर नहीं है; यह दक्कन की भू-राजनीतिक संरचना का अध्ययन है। रायचूर दोआब पर विजयनगर और बहमनी संघर्ष ने दक्षिण भारत में शक्ति-संतुलन, सैन्य-सुधार और राजनीतिक पुनर्संरचना की प्रक्रिया को जन्म दिया।
यह क्षेत्र किसी एक साम्राज्य की स्थायी विजय का साक्षी नहीं बना, किंतु इसने दोनों राज्यों को अपनी-अपनी नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार, रायचूर दोआब मध्यकालीन दक्षिण भारतीय इतिहास का वह केंद्रीय बिंदु है, जिसके माध्यम से विजयनगर-बहमनी संबंधों की जटिलता को समझा जा सकता है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
