ऋग्वैदिक काल का आर्थिक जीवन
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ऋग्वैदिक काल का आर्थिक जीवन : कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योग

  ऋग्वैदिक काल का आर्थिक जीवन (Economic Life in the Rigvedic Period)   ऋग्वैदिक काल का आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योग पर आधारित था। जो उस समय के सामाजिक ढांचे और जीवनशैली का अहम हिस्सा थे। इस काल में समाज की अधिकांश गतिविधियाँ कृषि और पशुपालन से जुड़ी थीं, लेकिन व्यापार और […]

ऋग्वैदिक समाज
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ऋग्वैदिक समाज: परिवार, विवाह, वर्ण व्यवस्था और स्त्रियों की स्थिति

  क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे समाज की जड़ें कहां से आईं? ऋग्वैदिक काल (1500 ईसा पूर्व से लेकर 500 ईसा पूर्व), भारतीय सभ्यता का प्रारंभिक दौर, एक ऐसे समय को दर्शाता है जब सामाजिक संरचनाएँ, परिवार, विवाह और स्त्रियों की स्थिति ने आकार लिया। इस काल में न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक

आर्यों की उत्पत्ति
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आर्यों का मूल स्थान: क्या हैं विवादित सिद्धांत?

  आर्यों की उत्पत्ति: आर्य कौन थे?   “आर्य” शब्द का प्रयोग प्राचीन भारतीय समाज में विभिन्न संदर्भों में किया गया है। यह शब्द संस्कृत के “आर्य” (Arya) से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘श्रेष्ठ’, ‘उत्कृष्ट’ या ‘आदर्श’। ऐतिहासिक रूप से, आर्य शब्द का उपयोग Indo-Aryan भाषा बोलने वाले लोगों को संदर्भित करने के

सहायक संधि (Subsidiary Alliance)
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सहायक संधि: ब्रिटिश साम्राज्य और भारतीय राज्यों पर प्रभाव

सहायक संधि (Subsidiary Alliance) क्या थी?    सहायक संधि (Subsidiary Alliance) एक राजनीतिक और सैन्य समझौता था, जिसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय राज्यों के बीच किया गया था। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में और अधिक मजबूत बनाना था। भारत में अंग्रेजी राज्य के विस्तार के लिए सहायक संधि

महालवाड़ी व्यवस्था
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महालवाड़ी प्रणाली: किसानों और गाँवों पर इसके प्रभाव की समीक्षा

  महालवाड़ी व्यवस्था  ब्रिटिश सरकार द्वारा 1822 में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में शुरू की गई एक भूमि-राजस्व व्यवस्था थी। इसे “महल” यानी गाँव को आधार बनाकर तैयार किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजस्व संग्रहण को आसान और प्रभावी बनाना था। इस प्रणाली का नाम “महल” पर पड़ा, क्योंकि इसमें पूरे गाँव को

रैयतवाड़ी व्यवस्था
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रैयतवाड़ी व्यवस्था: भारतीय कृषि में ऐतिहासिक परिवर्तन

  रैयतवाड़ी व्यवस्था क्या है?   रैयतवाड़ी व्यवस्था एक प्रकार की भूमि कर संग्रहण प्रणाली थी, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसान को ज़मीन का मालिक माना गया और उन्हें कर का भुगतान करने की जिम्मेदारी दी गई। “रैयत” शब्द का अर्थ है किसान, और “वाड़ी”

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