कुषाण साम्राज्य का पतन भारतीय प्राचीन इतिहास की उन जटिल प्रक्रियाओं में से एक है, जिन्हें कुषाण साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को समझे बिना पूर्णतः स्पष्ट नहीं किया जा सकता। लगभग पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी भारत की राजनीति पर प्रभुत्व रखने वाले कुषाणों का अवसान एक दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। कुषाण साम्राज्य के पतन के कारण राजनीतिक, सैन्य और बाह्य आक्रमणों के संयुक्त प्रभाव से जुड़े हुए थे, जिन पर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद देखने को मिलता है।
कुषाण साम्राज्य के पतन पर विद्वानों के मत
इतिहासकारों ने कुषाण सत्ता के अवसान को समझाने के लिए विभिन्न तर्क प्रस्तुत किए हैं। ये मत परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं, किंतु समग्र रूप से देखने पर एक बहु-कारकीय प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं।
गुप्त उदय और कुषाण पतन का प्रश्न
राखाल दास बनर्जी ने यह मत प्रस्तुत किया कि कुषाण सत्ता का विनाश गुप्त वंश के उदय के कारण हुआ। परंतु यह मत ऐतिहासिक साक्ष्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि उत्तरी भारत में गुप्त साम्राज्य के पूर्ण उभार से पूर्व ही कुषाण शक्ति क्षीण हो चुकी थी। इस प्रकार गुप्तों का उदय कुषाण साम्राज्य के पतन का कारण नहीं, बल्कि उसके बाद की राजनीतिक अवस्था का परिणाम अधिक प्रतीत होता है।
नाग शक्ति और वाकाटक संदर्भ
काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि पंजाब और मध्य भारत में कुषाण सत्ता का पतन भारशिव नागों के उदय से जुड़ा था। उनके अनुसार नाग शासकों ने कुषाणों की राजनीतिक जड़ों को कमजोर किया, जिसे आगे चलकर वाकाटक शासक प्रवरसेन प्रथम ने निर्णायक रूप दिया।
हालाँकि, अल्तेकर जैसे विद्वानों ने इस मत का खंडन करते हुए यह स्पष्ट किया कि नागों और वाकाटकों की भूमिका को प्रत्यक्ष रूप से कुषाण पतन से जोड़ना प्रमाणिक नहीं है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नाग शक्ति एक सहायक कारण हो सकती है, किंतु मुख्य निर्णायक शक्ति नहीं।
यौधेय और गणराज्यों की भूमिका
अल्तेकर का एक महत्वपूर्ण मत यह है कि यौधेय, कुणिन्द और अर्जुनायन जैसे गणराज्यों ने संगठित होकर कुषाणों को सतलज नदी के पार खदेड़ दिया। यौधेयों के सिक्कों पर उत्कीर्ण ‘यौधेयानाम् जयः’ और ‘जयमन्त्रधर’ जैसे लेख उनकी सैन्य सफलताओं की ओर संकेत करते हैं।
फिर भी, केवल सिक्कीय साक्ष्य के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि ये विजय कुषाणों के विरुद्ध ही प्राप्त की गई थीं। अतः यह मत संभावनाओं पर आधारित है, न कि निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाणों पर।
ससैनियन आक्रमण और कुषाण सत्ता का क्षरण
शापुर प्रथम का आक्रमण
धिर्शमन् ने बेग्राम उत्खनन से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वासुदेव के शासनकाल के अंत में ससैनियन शासक शापुर प्रथम ने कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के परिणामस्वरूप पश्चिमोत्तर भारत के महत्वपूर्ण क्षेत्र कुषाण नियंत्रण से निकल गए।
हालाँकि, इस मत की सीमा यह है कि सिक्कीय प्रमाण वासुदेव के बाद भी कुछ कुषाण शासकों के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ससैनियन आक्रमण कुषाण साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को तेज करता है, किंतु उसका पूर्ण अंत नहीं करता।
आंतरिक दुर्बलता और सामन्तीय प्रवृत्तियाँ
यद्यपि आपके मूल लेख में आंतरिक प्रशासनिक कमजोरी पर विस्तार नहीं है, फिर भी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि कुषाण शासन के उत्तरकाल में सामन्तीय शक्तियाँ सशक्त होने लगी थीं। बाहरी आक्रमणों ने इन सामन्तों को स्वतंत्र होने का अवसर प्रदान किया, जिससे केंद्रीय सत्ता और अधिक कमजोर हुई।
इस प्रक्रिया ने कुषाण शासन के अवसान को अपरिवर्तनीय दिशा प्रदान की।
उत्तर-पश्चिमी आक्रमण और जुआन-जुआन प्रभाव
कुषाण साम्राज्य के पतन में उत्तर की ओर से जुआन-जुआन जाति के आक्रमणों का भी उल्लेख मिलता है। यद्यपि इन आक्रमणों की प्रकृति पर विद्वानों में मतभेद हैं, फिर भी यह स्वीकार किया जाता है कि इन आक्रमणों ने कुषाणों की सैन्य और आर्थिक शक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
कुषाण साम्राज्य के पतन के कारणों का समग्र मूल्यांकन
उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि कुषाण साम्राज्य के पतन के कारण किसी एक घटना या शक्ति से नहीं जुड़े थे। नागों, यौधेयों, ससैनियनों और उत्तर-पश्चिमी आक्रमणों, इन सभी ने किसी न किसी रूप में कुषाण सत्ता को कमजोर किया।
वास्तविकता यह है कि इन सभी कारणों के संघात से ही कुषाण साम्राज्य का पतन संभव हुआ। यही बहु-कारकीय दृष्टिकोण, ऐतिहासिक विश्लेषण की दृष्टि से सर्वाधिक संतुलित और तर्कसंगत प्रतीत होता है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
