परिचय: गुप्त युग और प्रशासनिक उत्कृष्टता
प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त युग को प्रायः कला, साहित्य और विज्ञान की उपलब्धियों के लिए स्मरण किया जाता है, किंतु इस युग की वास्तविक शक्ति उसकी संतुलित और सुव्यवस्थित प्रशासनिक संरचना में निहित थी। यदि गुप्त साम्राज्य लगभग दो शताब्दियों तक राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक समृद्धि बनाए रखने में सफल रहा, तो इसके मूल में गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यकुशलता ही थी।
यह वह काल था जब शासन न तो मौर्य युग की तरह अत्यधिक केंद्रीकृत और कठोर था, और न ही उत्तरकालीन भारत की भाँति विखंडित और अस्थिर। गुप्त शासकों ने एक ऐसा प्रशासनिक मॉडल विकसित किया जिसमें सम्राट की सर्वोच्चता, मंत्रियों की सहभागिता, प्रांतीय स्वायत्तता और ग्राम स्तर पर स्थानीय स्वशासन, सभी का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि इतिहासकार इस युग को भारतीय प्रशासनिक परंपरा का क्लासिकल चरण मानते हैं।
चीनी यात्री फाहियान के विवरण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि गुप्त शासन का उद्देश्य दमन नहीं, बल्कि संरक्षण था। मृदु दण्ड-विधान, उदार कर नीति और स्थानीय संस्थाओं को मान्यता देने वाली यह प्रशासनिक व्यवस्था प्रजा और राज्य के बीच विश्वास का आधार बनी। इस लेख में हम गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के विविध पक्षों, केन्द्रीय शासन, प्रांतीय प्रशासन, न्याय प्रणाली, सैन्य संगठन और भूमि-राजस्व नीति, का क्रमबद्ध और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करेंगे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गुप्त युग केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी भारतीय इतिहास का एक आदर्श काल क्यों माना जाता है।

गुप्त साम्राज्य का विस्तार और प्रशासनिक ढाँचा
गुप्त शासकों की विजयों के फलस्वरूप एक विशाल साम्राज्य का निर्माण हुआ, जिसका विस्तार उत्तर में हिमालय से दक्षिण में विंध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्चिम में सौराष्ट्र तक था। इस विस्तार को समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति और चंद्रगुप्त द्वितीय की उदयगिरि गुफा-लेख जैसे अभिलेख प्रमाणित करते हैं। इतने विस्तृत भूभाग पर प्रभावी शासन के लिए गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को मौर्यकालीन कठोर केंद्रीकरण की तुलना में अधिक लचीला और विकेन्द्रित बनाया गया।
पाटलिपुत्र राजधानी होने के कारण प्रशासनिक एवं व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यह शहर न केवल राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र था, बल्कि नालंदा जैसे शिक्षा केंद्रों के निकट होने से बौद्धिक उन्नति का भी प्रतीक था। गुप्तकालीन अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि साम्राज्य को संगठित रखने के लिए स्पष्ट प्रशासनिक इकाइयाँ और पदाधिकारी नियुक्त किए गए थे।
सम्राट की स्थिति: दैवी अवधारणा और प्रशासनिक यथार्थ
गुप्त साम्राज्य की शासन-व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। मौर्य शासकों के विपरीत गुप्तवंशी शासक अपनी देवी उत्पत्ति में विश्वास करते थे तथा ‘महाराजाधिराज’, ‘परमभट्टारक’, ‘एकराज’, ‘परमेश्वर’ जैसी विशाल उपाधियाँ धारण करते थे। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर स्थित देवता कहा गया है, जिससे सम्राट की दैवी उत्पत्ति की धारणा पुष्ट होती है। किन्तु यह दैवी अवधारणा निरंकुशता में परिवर्तित नहीं हुई। गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में सम्राट स्वयं धर्म और विधि के अधीन माना जाता था। वह धर्मशास्त्रों का पालनकर्ता था और अपने अधिकारों का प्रयोग जनहित में करता था।
प्रशासन, न्याय और सेना में सम्राट की भूमिका
सम्राट प्रशासन का मुख्य स्रोत था जिसके अधिकार और शक्तियाँ असीमित थीं। वह कार्यपालिका का सर्वोच्च अधिकारी, न्याय का प्रधान न्यायाधीश एवं सेना का सर्वोच्च सेनापति होता था। युद्ध के समय वह स्वयं सेना का संचालन करता था, जैसा कि समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय में देखा गया। प्रशासन के सभी उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति सम्राट द्वारा ही की जाती थी और वे सभी उसी के प्रति उत्तरदायी होते थे। इस प्रकार सिद्धान्ततः उसकी स्थिति एक निरंकुश शासक जैसी थी। परन्तु व्यवहार में वह पर्याप्त अंशों में उदार तथा जनहितकारी होता था।
फाहियान के अनुसार, गुप्त काल में कठोर दण्डों का प्रचलन नहीं था और प्रजा सामान्यतः सुरक्षित एवं संतुष्ट थी। इससे स्पष्ट होता है कि सम्राट की शक्ति निरंकुश न होकर नैतिक सीमाओं से बंधी थी।
गुप्तकाल में रानियों की भूमिका
गुप्तकालीन प्रशासन में रानियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। चंद्रगुप्त प्रथम की पत्नी कुमारदेवी ने शासन में सक्रिय भागीदारी की। इसी प्रकार, प्रभावतीगुप्ता ने वाकाटक राज्य में शासन संचालन किया। यह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी गुप्त काल की प्रगतिशीलता को दर्शाती है, जो वैदिक काल की परंपरा से जुड़ी थी। यह तथ्य दर्शाता है कि गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को पूर्णतः निषेध नहीं किया गया था।
सामंतवाद का उदय और प्रशासन पर उसका प्रभाव
गुप्तकाल में सामंतवाद का प्रारम्भिक रूप विकसित हो चुका था। समुद्रगुप्त ने विजित राज्यों को प्रत्यक्ष रूप से साम्राज्य में विलय करने के बजाय उनके शासकों को अधीनस्थ बनाकर शासन करने की अनुमति दी। इन अधीनस्थ शासकों को ‘महाराज’ की उपाधि प्राप्त होती थी और वे सम्राट को उपहार एवं सैन्य सहायता प्रदान करते थे। पूर्वी मालवा में सनकानीक, बुन्देलखण्ड में परिव्राजक और उच्चकल्प जैसे सामंतों के उल्लेख गुप्त अभिलेखों में मिलते हैं। इतिहासकार आर.एस. शर्मा इस सामंतवाद को भूमि-दान प्रथा से जोड़ते हैं, जबकि डी.आर. भंडारकर इसे सैन्य आवश्यकताओं का परिणाम मानते हैं। स्पष्ट है कि सामंतवाद ने एक ओर साम्राज्य विस्तार को सरल बनाया, तो दूसरी ओर केन्द्रीय नियंत्रण को आंशिक रूप से कमजोर भी किया।
अमात्य और मंत्री परिषद
सम्राट प्रशासनिक कार्यों में अमात्यों और मंत्रियों की सहायता प्राप्त करता था। अमात्य सामान्य प्रशासनिक अधिकारी होते थे, जिनमें से योग्य व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त किया जाता था। प्रयाग प्रशस्ति में ‘राजसभा’ का उल्लेख मिलता है जिसके सदस्य ‘सभेय’ कहे जाते थे। यह सभा सलाहकारी भूमिका निभाती थी, लेकिन अंतिम निर्णय सम्राट का होता।
उत्तराधिकार और युवराज की भूमिका
सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र को उत्तराधिकारी बनाया जाता था, परन्तु योग्यता को प्राथमिकता दी जाती थी। समुद्रगुप्त का चयन इसी सिद्धान्त का उदाहरण है। सम्राट के छोटे पुत्रों को प्रान्तीय शासकों के रूप में नियुक्त करने की प्रथा थी, जैसे कुमारगुप्त प्रथम के छोटे भाई गोविन्दगुप्त को मालवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। युवराज अपने पिता के जीवनकाल में प्रशासनिक कार्यों में उसकी सहायता करता था। गुप्त युग में युवराज की अधीनता में एक पृथक् सैनिक विभाग हुआ करता था। सम्राट के वृद्ध होने पर प्रशासन का पूरा उत्तरदायित्व युवराज के ऊपर ही आता था। इस प्रकार का उदाहरण कुमारगुप्त प्रथम के समय में मिलता है जबकि उसके पुत्र स्कन्दगुप्त ने अपने पिता के काल में सैनिक अभियानों में प्रमुख रूप से भाग लिया था। यह प्रथा उत्तराधिकार की सुगमता सुनिश्चित करती थी।
केन्द्रीय प्रशासनिक पदाधिकारी: शासन की रीढ़
गुप्त साम्राज्य की स्थिरता और कार्यकुशलता का वास्तविक आधार उसके केन्द्रीय प्रशासनिक पदाधिकारी थे। गुप्त शासन में विभिन्न विभाग विभिन्न मन्त्रियों के अधीन होते थे। गुप्तकालीन लेखो तथा स्मृतियों में मंन्त्रियों तथा सचिवों का उल्लेख मिलता है। किन्तु उनकी संख्या अथवा उनके विभागों के विषय में कोई सूचना नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि विभागीय अध्यक्षों और मन्त्रियों में कोई खास अन्तर नहीं था। सैनिक योग्यता मन्त्रियों के लिये अनिवार्य अर्हता थी। समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय के युद्ध सचिव हरिषेण एवं वीरसेन उच्चकोटि के सेनानायक भी थे। वीरसेन के उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि वह आनुवंशिक रूप से अपने पद का उपभोग कर रहा था।’ कुमारगुप्त प्रथम का मन्त्री पृथ्वीषेण, शिखरस्वामी का पुत्र था जो उसके पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय का मन्त्री रह चुका था। वह पहले मन्त्री था किन्तु बाद में सेनापति (महाबलाधिकृत) के पद पर पहुँच गया था। गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में इन अधिकारियों की पदोन्नति वंशानुगत और योग्यता-आधारित प्रणाली का मिश्रण दर्शाती है, जो गुप्त प्रशासन की लचीलापन को रेखांकित करती।
गुप्तकालीन अभिलेखों में निम्नलिखित पदाधिकारियों के नाम मिलते है, जिनकी भूमिकाएँ साम्राज्य की दक्षता का आधार थीं।
प्रतिहार एवं महाप्रतिहार
प्रतिहार और महाप्रतिहार राजदरबार के महत्वपूर्ण अधिकारी थे। प्रतिहार अंतःपुर की सुरक्षा करता था, जबकि महाप्रतिहार राजमहल के रक्षकों का प्रधान होता था। इनका प्रशासनिक कार्यों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं था, किंतु सम्राट तक पहुँच को नियंत्रित करने के कारण इनका प्रभाव अत्यधिक था।
महासेनापति और महाबलाधिकृत
सेना का सर्वोच्च अधिकारी महासेनापति कहलाता था, जबकि महाबलाधिकृत सैन्य संगठन और संचालन का प्रमुख था। गुप्त शासकों की सैन्य सफलता, विशेषतः स्कन्दगुप्त द्वारा हूणों को पराजित करना, इसी संगठित सैन्य प्रशासन का परिणाम थी।
महासंधिविग्रहिक
महासंधिविग्रहिक युद्ध और संधि से संबंधित मामलों का मंत्री होता था। कूटनीतिक समझौते, मित्रता और शत्रुता के निर्णय इसी पदाधिकारी के माध्यम से संचालित होते थे। यह पद इस बात का प्रमाण है कि गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि सक्रिय कूटनीति पर भी आधारित थी।
दण्डपाशिक और विनयस्थितिस्थापक
दण्डपाशिक पुलिस विभाग का प्रधान अधिकारी था, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायी था। विनयस्थितिस्थापक धार्मिक और नैतिक मामलों की देख-रेख करता था तथा सार्वजनिक मंदिरों के प्रबंधन से जुड़ा रहता था। यह पद गुप्त प्रशासन में धर्म और राज्य के समन्वय को दर्शाता है।
कुमारामात्य व्यवस्था: उच्च प्रशासनिक वर्ग
कुमारामात्य गुप्त प्रशासन का एक विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग था। अनेक इतिहासकारों ने इसे आधुनिक आई.ए.एस. सेवा के समकक्ष माना है। गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में कुमारामात्य ऐसे अधिकारी थे जिन्हें प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों, केन्द्रीय, प्रांतीय और जिला स्तर, पर नियुक्त किया जा सकता था।
अल्तेकर के अनुसार, कुमारामात्य उच्च प्रशासनिक पदाधिकारियों का एक पृथक वर्ग था। इस वर्ग के पदाधिकारी अपनी योग्यता के आधार पर उच्च से उच्च पद पर नियुक्त किये जा सकते थे। वहीं रोमिला थापर का मत है कि कुमारामात्य मुख्यतः प्रांतीय प्रशासन से जुड़े अधिकारी थे, जो केन्द्र और स्थानीय इकाइयों के बीच सेतु का कार्य करते थे।
कुमारामात्य का पृथक् कार्यालय होता था जिसे कुमारामात्याधिकरण कहा जाता था। हाल ही में प्रयाग के समीप एक टीले से प्राप्त की गयी मुद्रा में ‘मूलकुमारामात्याधिकरणस्य‘ लेख उत्कीर्ण मिलता है। इससे ऐसा लगता है कि गुप्त प्रशासन में एक मुख्य कुमारामात्य भी होता था। उसके नीचे कई कुमारामात्य होते रहे होंगे। यह विवादास्पद व्याख्या गुप्त प्रशासन की जटिलता को दर्शाती है, केंद्रीकृत या विकेंद्रीकृत?
प्रांतीय प्रशासन: भुक्ति और उपरिक प्रणाली
गुप्त साम्राज्य को प्रशासनिक सुविधा के लिए अनेक प्रान्तों में विभाजित किया गया था। इन प्रान्तों को ‘भुक्ति’, ‘देश’ अथवा ‘अवनि’ कहा जाता था। गुप्त प्रशासन के प्रमुख प्रान्त सुराष्ट्र, पश्चिमी मालवा (अवन्ति), पूर्वी मालवा (एरण), तीरभुक्ति, पुण्ड्रवर्धन, मगध आदि थे। प्रत्येक भुक्ति का प्रधान अधिकारी उपरिक कहलाता था, जिसकी नियुक्ति सीधे सम्राट द्वारा की जाती थी। उपरिक सम्राट के प्रति उत्तरदायी होता था और उसके अधीन राजस्व, न्याय और सुरक्षा से जुड़े कार्य आते थे।
सीमावर्ती क्षेत्रों में ‘गोप्ता’ नामक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे, जिनका कार्य सीमाओं की रक्षा और शांति बनाए रखना था।
राजकुमारों की प्रांतीय नियुक्ति
प्रांतीय प्रशासन में राजकुमारों की नियुक्ति एक सामान्य प्रथा थी। चुन्द्रगुप्त द्वितीय का छोटा पुत्र गोविन्दगुप्त तौरभुक्ति (आधुनिक दरभंगा) का तथा कुमारगुप्त प्रथम का पुत्र घटोत्कचगुप्त पूर्वी मालवा का राज्यपाल था। इस व्यवस्था से एक ओर प्रशासनिक अनुभव प्राप्त होता था, वहीं दूसरी ओर राजवंशीय नियंत्रण भी बना रहता था। हालांकि, इससे सामंतवाद को भी प्रोत्साहन मिला।
जिला प्रशासन: विषय और विषयपति
प्रान्तों को आगे जिलों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘विषय’ कहा जाता था। प्रत्येक विषय का प्रधान अधिकारी विषयपति होता था, जिसे कभी-कभी कुमारामात्य भी कहा गया है। विषयपति की नियुक्ति सामान्यतः उपरिक द्वारा की जाती थी, किंतु कुछ मामलों में सम्राट स्वयं भी यह नियुक्ति करता था। विषयपति का अपना कार्यालय होता था, जिसमें अभिलेखों की देख-रेख ‘पुस्तपाल’ करता था। फरीदपुर ताम्रपत्र संख्या 3 में विषयसमिति के सदस्यों की संख्या 20 मिलती है।
विषय समिति और सामाजिक सहभागिता
विषयपति एक समिति की सहायता से प्रशासन चलाता था। इस समिति में,
- नगर श्रेष्ठि
- सार्थवाह
- प्रथम कुलिक
- प्रथम कायस्थ
शामिल होते थे। ये सदस्य ‘विषय महत्तर’ कहलाते थे और आर्थिक तथा सामाजिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यह व्यवस्था गुप्त प्रशासन में श्रेणी और गिल्ड प्रणाली की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है।
नगर प्रशासन: पुरपाल और नगर समितियाँ
नगरों का प्रशासन ‘पुरपाल’ नामक अधिकारी के अधीन होता था। पुरपाल प्रायः कुमारामात्य श्रेणी का अधिकारी होता था।
नगर प्रशासन में उसकी सहायता के लिए भी समितियाँ कार्यरत रहती थीं। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि गिरनार नगर का पुरपाल चक्रपालित था, जिसने सुदर्शन झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवाया। यह उदाहरण दर्शाता है कि गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में नगर प्रशासन केवल कर वसूली तक सीमित नहीं था, बल्कि सार्वजनिक कार्यों और सिंचाई परियोजनाओं पर भी ध्यान दिया जाता था।
ग्राम प्रशासन: स्थानीय स्वशासन की आधारशिला
गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ग्राम स्तर पर स्थानीय स्वशासन की सुदृढ़ परंपरा थी। ग्राम प्रशासन को शासन की सबसे छोटी, किंतु सबसे सक्रिय इकाई माना जाता था। ग्रामों का प्रशासन ग्रामसभा द्वारा संचालित होता था, जिसे मध्य भारत में ‘पंचमण्डली’ और बिहार क्षेत्र में ‘ग्राम जनपद’ कहा जाता था।
ग्रामसभा ग्राम की सुरक्षा, निर्माण कार्यों, कृषि भूमि के प्रबंधन और राजस्व संग्रह जैसे कार्यों को सम्पन्न करती थी। यह व्यवस्था स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करती थी, जिससे प्रशासन अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनता था।
ग्रामसभा के पदाधिकारी
दामोदरपुर ताम्रपत्रों से ग्रामसभा के जिन पदाधिकारियों का उल्लेख मिलता है, उनमें,
- महत्तर
- अष्टकुलाधिकारी
- ग्रामिक
- कुटुम्बिन
शामिल थे। यद्यपि इनके निर्वाचन की प्रक्रिया पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, फिर भी यह निश्चित है कि ग्रामसभा को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे। यह स्थानीय लोकतांत्रिक तत्व गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को मौर्यकाल से भिन्न बनाता है। यह प्रणाली स्थानीय स्वशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो चोल काल की पंचायत प्रथा का अग्रदूत था।
न्याय प्रशासन: विकसित और मानवीय व्यवस्था
गुप्तकाल में न्याय प्रशासन अत्यंत विकसित और सुव्यवस्थित था। यद्यपि अभिलेखों में पृथक न्याय विभाग का उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी नारद और बृहस्पति जैसी समकालीन स्मृतियों से स्पष्ट होता है कि न्याय व्यवस्था स्पष्ट विधिक सिद्धान्तों पर आधारित थी। गुप्त युग में पहली बार दीवानी और फौजदारी अपराधों के बीच स्पष्ट भेद स्थापित किया गया। उत्तराधिकार, संपत्ति और दायित्व से संबंधित नियमों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी।
न्यायालय और दण्ड प्रणाली
सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था और सभी मामलों में अंतिम अपील उसी के पास होती थी। सम्राट के अतिरिक्त मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधिकारी साम्राज्य के विभिन्न भागों में नियुक्त रहते थे।
श्रेणियों (व्यापारिक गिल्ड), कुलों और ग्राम पंचायतों के अपने-अपने न्यायालय थे, जिन्हें राज्य की मान्यता प्राप्त थी।
दण्ड व्यवस्था अत्यंत मृदु थी, मृत्युदण्ड का अभाव, आर्थिक दण्डों की प्रधानता और शारीरिक यातनाओं का न्यूनतम प्रयोग गुप्त प्रशासन की मानवीय दृष्टि को दर्शाता है।
फाहियान और स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि अपराधियों को अनावश्यक पीड़ा नहीं दी जाती थी। इस प्रकार गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में न्याय को दमन का नहीं, बल्कि सुधार का साधन माना गया।
सैन्य संगठन: शक्ति, अनुशासन और रणनीति
गुप्त साम्राज्य की रक्षा और विस्तार एक सुदृढ़ सैन्य संगठन पर आधारित था। गुप्त सेना विशाल, संगठित और बहुस्तरीय थी।
सेना का सर्वोच्च अधिकारी ‘महाबलाधिकृत’ कहलाता था, जबकि हाथी, घुड़सवार और पैदल सेना के लिए पृथक-पृथक अधिकारी नियुक्त थे। हाथियों की सेना के प्रधान को ‘महापौलुपति’ तथा घुड़सवारों की सेना के प्रधान को ‘भटाश्वपति’ कहते थे। सेना के लिए रसद और शस्त्रों की व्यवस्था ‘रणभाण्डागारिक’ के अधीन होती थी। प्रयाग प्रशस्ति में परशु, शर, तोमर, भिन्दिपाल जैसे अस्त्र-शस्त्रों का उल्लेख मिलता है, जो सैन्य तकनीक की उन्नति का संकेत देता है।
सम्राट और सेना का संबंध
गुप्त शासक स्वयं कुशल योद्धा होते थे और युद्ध में प्रत्यक्ष भाग लेते थे। स्कन्दगुप्त द्वारा हूण आक्रमणों को रोकना इस सैन्य व्यवस्था की सफलता का श्रेष्ठ उदाहरण है। मंत्रियों और उच्च अधिकारियों के लिए सैन्य योग्यता आवश्यक मानी जाती थी, जिससे प्रशासन और सेना के बीच समन्वय बना रहता था। यह समन्वय गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता था।
भूमि व्यवस्था: स्वामित्व और उपयोग का संतुलन
गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में भूमि राज्य की आर्थिक शक्ति का मूल आधार थी। सैद्धान्तिक रूप से भूमि पर सम्राट का स्वामित्व माना जाता था, किंतु व्यवहार में कृषकों के निजी अधिकार सुरक्षित थे। राजकीय भूमि के अतिरिक्त निजी स्वामित्व वाली भूमि का अस्तित्व इस बात का संकेत देता है कि गुप्त प्रशासन ने उत्पादन और कर-संग्रह के बीच संतुलन बनाए रखा।
मंदिरों तथा ब्राह्मणों को दी जाने वाली भूमि को ‘अग्रहार’ कहा जाता था। ये भूमिदान सामान्यतः कर-मुक्त होते थे और उनका उद्देश्य धार्मिक तथा शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना था। यद्यपि आर.एस. शर्मा इन्हें सामंतवाद के विकास से जोड़ते हैं, तथापि बी.एन.एस. यादव का मत है कि सीमित आकार के ये दान राजनीतिक सामंतवाद का स्थायी आधार नहीं बन सके।
यह बहस गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की जटिलता और संतुलन को रेखांकित करती है।
राजस्व व्यवस्था: उदारता और व्यवहारिकता
गुप्त राजाओं ने भूमि के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया था। भूमिकर संग्रह करने के लिए ‘नुवाधिकरण’ तथा भूमि-आलेखों को सुरक्षित करने के लिए ‘महाक्षपटलिक‘ और ‘करणिक नामक पदाधिकारी थे। न्यायाधिकरण नामक पदाधिकारी भूमि-सम्बन्धी विवादों का निपटारा करते थे। सिंचाई की उत्तम व्यवस्था थी। गुप्त शासको ने कुएँ, तालाब, नहरों आदि का निर्माण करवाया था। सम्राट स्कन्द्रगुप्त के जूनागढ़ के राज्यपाल पर्णदत्त के पुत्र चक्तपालित ने गिरनार में सुदर्शन झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवाया था।
गुप्तकाल में राजस्व व्यवस्था अपेक्षाकृत उदार थी। भूमिकर सामान्यतः उपज का छठा भाग लिया जाता था, जिसे ‘भाग’ या ‘उद्रंग’ कहा जाता था। स्मृति ग्रंथों में इसे राजा की ‘वृत्ति’ माना गया है, जो प्रजा-रक्षण के बदले वैध अधिकार के रूप में स्वीकार की गई। नारद और कालिदास दोनों के उल्लेख इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि राजा कर को दमन का साधन नहीं, बल्कि प्रशासन संचालन का आवश्यक संसाधन मानता था। भूमिकर नकद अथवा अन्न दोनों रूपों में दिया जा सकता था, जिससे कृषकों को लचीलापन मिलता था।
अन्य कर और आय के स्रोत
भूमिकर के अतिरिक्त राज्य की आय के अन्य स्रोत भी थे,
- चुंगी (नगरों में प्रवेश करने वाली वस्तुओं पर)
- शुल्क (सीमा और व्यापार कर)
- वन, चारागाह और खानों से प्राप्त आय
- अपराधियों पर लगाए गए आर्थिक दण्ड
स्कन्दगुप्त के बिहार लेख में ‘शुल्किक’ नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है, जो सीमा-शुल्क विभाग का अधीक्षक था।
‘विष्टि’ (बेगार) का उल्लेख स्मृति ग्रंथों में मिलता है, यद्यपि गुप्त अभिलेखों में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इसका प्रयोग सीमित और नियंत्रित था।
आर्थिक नीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण
गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की आर्थिक नीति का आधार उदारता और दीर्घकालीन स्थिरता थी। इस काल की रचना कामन्दकीय नीतिसार में शासक को सलाह दी गयी है कि ‘जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से जल ग्रहण करता है, उसी प्रकार प्रजा से राजा थोड़ा-थोड़ा धन ग्रहण करे।’ राजा के आचरण की तुलना ग्वाले तथा माली से करते हुए कामन्दक लिखते है कि जिस प्रकार ग्वाला पहले गाय का पोषण करता है तथा फिर उसका दूध दुहता है तथा जिस प्रकार माली पहले पौधों को सोचता है तथा फिर उनका चयन करता है, उसी प्रकार राजा को पहल प्रजा का पोषण करना चाहिए और फिर बाद में उससे कर ग्रहण करना चाहिये।
गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का समग्र मूल्यांकन
समग्र रूप से देखें तो गुप्त प्रशासन न तो पूर्णतः केंद्रीकृत था और न ही अत्यधिक विकेन्द्रित।
इसमें,
- सम्राट की सर्वोच्चता
- मंत्रियों और अमात्यों की सक्रिय भूमिका
- प्रांतीय और स्थानीय स्वशासन
- मृदु न्याय व्यवस्था
- संतुलित कर नीति
का समन्वय देखने को मिलता है। यही संतुलन गुप्त साम्राज्य को दीर्घकालीन स्थायित्व प्रदान करता है। मौर्यकाल की कठोरता और उत्तरकालीन विखंडन के बीच गुप्त प्रशासन एक मध्य मार्ग प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष: प्रशासनिक परंपरा की स्थायी विरासत
इस प्रकार गुप्त प्रशासन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि गुप्त सम्राटों ने जिस विस्तृत प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण किया वह अत्यन्त उदार एव सुसगठित थी। राज्य में पूर्व शान्ति एवं व्यवस्था का वातावरण विद्यमान था। तभी तो फाहियान जैसे विदेशी को भी इस सम्बन्ध में किसी प्रकार को शिकायत का अवसर नहीं मिल सका था।
सम्राट स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख को अग्रलिखित पक्तियाँ इस लोकोपकारी शासन व्यवस्था का सही चित्र उपस्थित करतो है,
तस्मिन्नृपे शासति नैवकश्चिद्धर्मादपेतो मनुजः प्रजासु । आर्त्ता दरिद्रो व्यसनी कदर्यो दण्ड्यो न वा यो भृशपीडितः स्यात् ।।
अर्थात् ‘जिस समय वह राजा शासन कर रहा था कोई भी व्यक्ति ऐसा नही या जो धर्मच्युत हो, दुःखी हो, दरिद्र हो, व्यसनी हो, लोभी हो अथवा दण्डनीय होने के कारण अधिक सताया गया हो।’
इसी कारण गुप्त युग भारतीय इतिहास में ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास में भी एक आदर्श प्रशासनिक मॉडल के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। यह प्रशासनिक विरासत आगे चलकर उत्तर भारत के राजवंशों और मध्यकालीन शासन प्रणालियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
