गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण: स्वर्ण युग का अंत कैसे हुआ?

 

दो शताब्दियों के निरंतर उत्कर्ष के पश्चात् शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य, अपने वंश के अंतिम महान शासक स्कन्दगुप्त की 467 ईस्वी में मृत्यु के बाद पतन की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर हो गया। यद्यपि स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों ने किसी न किसी रूप में लगभग 550 ईस्वी तक मगध पर अपना अधिकार बनाए रखा, किंतु वह साम्राज्यात्मक शक्ति और राजनीतिक स्थिरता समाप्त हो चुकी थी, जिसने गुप्तों को “स्वर्ण युग” का प्रतिनिधि बनाया था। इसके पश्चात् गुप्त साम्राज्य भारतीय इतिहास के मंच से धीरे-धीरे लुप्त हो गया।

गुप्त साम्राज्य का पतन किसी एकल कारण का परिणाम नहीं था, अपितु यह विभिन्न राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक तथा बाह्य कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था। इतिहासकारों का सामान्य मत है कि गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण एक दीर्घकालिक प्रक्रिया में निहित थे, जिनकी जड़ें स्कन्दगुप्त के पश्चात् उत्पन्न परिस्थितियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इस प्रकार, गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण केवल एक घटना तक सीमित न होकर राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक प्रक्रियाओं के संयुक्त परिणाम के रूप में समझे जाने चाहिए।

गुप्त साम्राज्य का विस्तार और विघटन दर्शाता ऐतिहासिक मानचित्र
चौथी-छठी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य का विस्तार तथा उसके पतन की प्रक्रिया को दर्शाता मानचित्र।

निर्बल एवं अयोग्य उत्तराधिकारी और गुप्त साम्राज्य का पतन

 

गुप्त साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण स्कन्दगुप्त के बाद के शासकों में नेतृत्व-क्षमता और राजनीतिक दक्षता का अभाव था। गुप्त वंश के प्रारंभिक शासक विशेषतः समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय साम्राज्य विस्तार की स्पष्ट नीति और दृढ़ प्रशासनिक दृष्टि रखते थे। कुमारगुप्त प्रथम ने विशाल साम्राज्य को सुरक्षित रखा, जबकि स्कन्दगुप्त ने हूणों और पुष्यमित्रों जैसे शक्तिशाली शत्रुओं का सामना कर साम्राज्य की रक्षा की। स्कन्दगुप्त के बाद उत्पन्न नेतृत्व संकट को गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों में एक प्रमुख राजनीतिक कारण माना जा सकता है।

इसके विपरीत, स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारी न तो समान वीरता दिखा सके और न ही प्रशासनिक दृढ़ता। राजकुमारों में आपसी संघर्ष और सत्ता-प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर होती चली गई। ऐसे संकटपूर्ण समय में, जब साम्राज्य को सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता थी, उत्तरगुप्त शासकों की दुर्बलता ने गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया।

 

गुप्त प्रशासन का संघात्मक स्वरूप और पतन के संरचनात्मक कारण

 

गुप्त प्रशासन मूलतः संघात्मक था, जिसमें अनेक सामंतवादी इकाइयाँ सम्मिलित थीं। मौखरि, उत्तरगुप्त, परिव्राजक, सनकानिक, वर्मन और मैत्रक जैसे सामंत अपने क्षेत्रों में पर्याप्त स्वायत्तता का उपभोग करते थे और ‘महाराज’ की उपाधि धारण करते थे। स्थानीय राजाओं और गणराज्यों को भी व्यापक स्वतंत्रता प्रदान की गई थी। जब तक केंद्रीय सत्ता शक्तिशाली रही, यह संघात्मक व्यवस्था साम्राज्य के लिए उपयोगी सिद्ध हुई। किंतु जैसे ही केंद्रीय नियंत्रण कमजोर पड़ा, सामंतों ने स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए। इस प्रकार, संघात्मक ढाँचा जो प्रारंभ में गुप्त साम्राज्य की शक्ति था, वही आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों में एक प्रमुख संरचनात्मक कमजोरी बन गया।

 

उच्च पदों का आनुवंशिक होना

 

गुप्त प्रशासन की एक गंभीर कमजोरी यह थी कि उच्च पद प्रायः वंशानुगत होते थे। महादंडनायक हरिषेण के पिता ध्रुवभूति भी इसी पद पर थे। उदयगिरि गुहा-लेख से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के सचिव वीरसेन को भी पद वंशानुगत रूप से प्राप्त हुआ। करमदंडा-लेख से यह जानकारी मिलती है कि कुमारगुप्त के मंत्री पृथिवीषेण अपने पिता के पश्चात् इस पद पर नियुक्त हुए।

इस प्रकार की व्यवस्था में योग्यता के स्थान पर वंश को प्राथमिकता दी जाने लगी, जिससे कई बार अयोग्य व्यक्ति महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो गए। निर्बल शासकों के काल में ऐसे पदाधिकारियों की भूमिका राज्य की एकता और प्रशासनिक दक्षता के लिए घातक सिद्ध हुई, जिससे गुप्त साम्राज्य का पतन और अधिक तेज़ हो गया।

 

प्रांतीय शासकों के विशेषाधिकार और पतन की प्रवृत्ति

 

गुप्त युग में प्रांतीय शासकों और सामंतों को अत्यधिक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे अपने क्षेत्रों में कर वसूलने, सेना रखने और लगभग सम्राट जैसी जीवन-शैली अपनाने के अधिकारी थे। अग्रहार दान प्रथा के अंतर्गत ब्राह्मणों को भूमि के साथ-साथ चारागाह, खान, निधि और विष्टि जैसे अधिकार भी प्रदान किए जाते थे।

इस व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रभाव राजकोष पर पड़ा। राज्य की नियमित आय में कमी आई और दानग्राही धीरे-धीरे छोटे शासकों के रूप में उभर आए। इस प्रकार भूमि अनुदान नीति ने आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों को और सुदृढ़ किया।

 

प्रांतीय प्रशासन की ढीली पकड़

 

जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि राज्यपाल पर्णदत्त ने अपने पुत्र चक्रपालित को गिरनार का नगरपाल नियुक्त किया। यह नियुक्ति सम्राट की प्रत्यक्ष स्वीकृति के बिना की गई थी, जिससे स्पष्ट होता है कि प्रांतीय प्रशासन पर केंद्रीय नियंत्रण सीमित था। जूनागढ़ जैसे क्षेत्रों में गुप्त संवत् का प्रयोग न होना और सम्राट का नियमित उल्लेख न किया जाना भी प्रांतीय स्वायत्तता का संकेत देता है। यही कारण है कि ऐसे प्रांत सबसे पहले गुप्त साम्राज्य से अलग हुए और साम्राज्य का विघटन शीघ्र हो गया।

 

बाह्य आक्रमण और गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया

 

गुप्त साम्राज्य के पतन में बाह्य आक्रमणों, विशेषतः हूणों के आक्रमणों, की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित अवश्य किया, किंतु सिंधु घाटी पर स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं किया जा सका। इसके परिणामस्वरूप हूणों के लिए भारत में पुनः प्रवेश संभव हो गया।

एरण अभिलेख से ज्ञात होता है कि हूण नरेश तोरमाण ने लगभग 500 ईस्वी के बाद एरण पर अधिकार कर लिया। उसके पुत्र मिहिरकुल के काल में हूण शक्ति चरम पर पहुँची। नरसिंहगुप्त बालादित्य द्वारा मिहिरकुल को मुक्त कर देना राजनीतिक अदूरदर्शिता का उदाहरण माना जाता है। इन आक्रमणों ने गुप्त साम्राज्य की सैन्य और राजनीतिक प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँचाई। इस प्रकार हूण आक्रमण, गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों में तात्कालिक बाह्य कारक के रूप में उभरते हैं।

 

बौद्ध धर्म का प्रभाव

 

प्रारंभिक गुप्त शासक वैष्णव थे और साम्राज्य विस्तार को राज्य-कर्तव्य मानते थे। किंतु कुमारगुप्त प्रथम के पश्चात् बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा। शासकों का ध्यान युद्ध और विजय की अपेक्षा पुण्यार्जन और धार्मिक दानों की ओर अधिक हो गया।

हुएनसांग के विवरण के अनुसार, मिहिरकुल के आक्रमण के समय बालादित्य का युद्ध से विमुख होना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। यद्यपि बौद्ध धर्म को गुप्त साम्राज्य के पतन का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता, फिर भी इसने राज्य की सैन्य तत्परता और राजकोषीय क्षमता को कमजोर करने में भूमिका निभाई।

 

नई शक्तियों का उदय

 

छठी शताब्दी ईस्वी में भारत में नई क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरकर सामने आईं। थानेश्वर में वर्धन, कन्नौज में मौखरि, कामरूप में वर्मन और मालवा में औलिकरवंशी यशोधर्मन का उदय गुप्त साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। विशेषतः यशोधर्मन ने गुप्त साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार किया। इतिहासकार हेमचन्द्र रायचौधरी उसके अभियानों को गुप्त साम्राज्य के पतन का तात्कालिक कारण मानते हैं।

 

निष्कर्ष

 

इस प्रकार, गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण बहुआयामी थे और वे दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप विकसित हुए। निर्बल उत्तराधिकारी, संघात्मक प्रशासन, सामंतवाद, आर्थिक क्षरण, बाह्य आक्रमण और वैचारिक परिवर्तन, इन सभी ने मिलकर इस महान साम्राज्य की आधारशिला को कमजोर किया।

इतिहासकार रमेशचन्द्र मजूमदार के शब्दों में, जिन परिस्थितियों ने मौर्य और मुगल साम्राज्यों के पतन में भूमिका निभाई, वही गुप्त साम्राज्य के पतन में भी सहायक सिद्ध हुईं। गुप्तों के पतन के साथ ही भारत राजनीतिक विकेंद्रीकरण के युग में प्रवेश कर गया।

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top