चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान: शकों का पतन और गुप्त साम्राज्य का विस्तार

 

चंद्रगुप्त द्वितीय का उदय और शासनकाल : विजय अभियानों की पृष्ठभूमि

 

चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान गुप्त साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अभियान केवल सैन्य सफलताओं तक सीमित नहीं थे, बल्कि सुविचारित कूटनीति, वैवाहिक गठबंधनों और दीर्घकालिक साम्राज्यवादी दृष्टि का परिणाम थे। समुद्रगुप्त के पश्चात् गुप्त साम्राज्य की बागडोर जिस शासक के हाथों में आई, वह था चंद्रगुप्त द्वितीय, जिसने अपने पिता की विस्तारवादी नीति को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसे एक स्थायी और संगठित राजनीतिक ढाँचे में भी रूपांतरित किया।

गुप्त अभिलेखों में उसे तत्परिगृहीत कहा गया है, जिसका सामान्य अर्थ समुद्रगुप्त द्वारा चयनित उत्तराधिकारी से जोड़ा जाता है। कुछ इतिहासकारों ने इसी पद के आधार पर रामगुप्त की ऐतिहासिकता को नकारने का प्रयास किया है, किंतु यह निष्कर्ष न तो साहित्यिक परंपरा से मेल खाता है और न ही पुरातात्त्विक साक्ष्यों से। वस्तुतः यह अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि इस पद का प्रयोग राजवंशीय वैधता को सुदृढ़ करने और सत्ता हस्तांतरण को विवाद-मुक्त दिखाने के लिए किया गया था। वास्तव में, तत्परिगृहीत पद का प्रयोग संभवतः राजवंशीय वैधता को पुष्ट करने और सत्ता हस्तांतरण को विवाद-मुक्त दिखाने के लिए किया गया था। रामगुप्त से संबंधित साहित्यिक उल्लेख, सिक्कों तथा नाट्य परंपराओं को देखते हुए यह अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय का उदय उत्तराधिकार संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ, जिसने आगे चलकर उसके विजय अभियानों को और अधिक आक्रामक तथा निर्णायक बनाया।

चंद्रगुप्त द्वितीय की प्रथम निश्चित तिथि गुप्त संवत् 61 (380 ई.) मथुरा स्तम्भलेख से प्राप्त होती है, जो उसके शासन के पाँचवें वर्ष का उल्लेख करता है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उसका राज्यारोहण लगभग 375 ईस्वी में हुआ। उसकी अंतिम ज्ञात तिथि गुप्त संवत् 93 (412 ई.) है, जबकि कुमारगुप्त प्रथम की प्रथम तिथि गुप्त संवत् 96 (415 ई.) के बिलसड़ लेख में मिलती है। इस प्रकार चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल लगभग 375 से 415 ईस्वी तक, यानी लगभग चार दशकों तक विस्तृत रहा।

यह दीर्घ शासनकाल गुप्त इतिहास में केवल स्थिरता का नहीं, बल्कि राजनीतिक विस्तार, सैन्य विजय और सांस्कृतिक उत्कर्ष का काल सिद्ध हुआ। वास्तव में, चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान इसी सुदृढ़ और दीर्घकालिक शासन की उपज थे।

चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान में गुप्त साम्राज्य का विस्तार
चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार, जिसमें पश्चिमी भारत और प्रमुख नगर स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं।

उपाधियाँ और वैचारिक छवि : विजय की वैधता का निर्माण

 

चंद्रगुप्त द्वितीय केवल एक विजेता ही नहीं, बल्कि एक वैचारिक शासक भी था। देव, देवगुप्त, देवराज और देवश्री जैसी उपाधियाँ उसके दैवी अधिकार की अवधारणा को पुष्ट करती हैं। वहीं विक्रमादित्य और परमभागवत जैसी उपाधियाँ उसके सैन्य पराक्रम और वैष्णव धर्मनिष्ठा, दोनों को अभिव्यक्त करती हैं। इसी वैचारिक ढाँचे ने आगे चलकर चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान को धार्मिक और नैतिक वैधता प्रदान की।

विशेष रूप से विक्रमादित्य की उपाधि का संबंध केवल वीरता से नहीं, बल्कि धर्मयुक्त विजय (righteous conquest) की अवधारणा से भी जुड़ा हुआ है। यही वैचारिक ढाँचा आगे चलकर चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियानों को केवल साम्राज्य विस्तार न रहकर, विदेशी शक्तियों के उन्मूलन के रूप में प्रस्तुत करता है।

 

विजय अभियानों से पूर्व वैवाहिक कूटनीति : रणनीतिक तैयारी

 

गुप्तों की राजनीतिक सफलता का एक प्रमुख आधार उनकी कूटनीतिक दूरदृष्टि थी। चंद्रगुप्त द्वितीय से पूर्व ही गुप्त शासकों ने यह सिद्ध कर दिया था कि साम्राज्य विस्तार केवल तलवार के बल पर नहीं, बल्कि वैवाहिक गठबंधनों के माध्यम से भी संभव है। चंद्रगुप्त प्रथम का लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह और समुद्रगुप्त द्वारा शक-कुषाण कन्याओं की प्राप्ति इसी नीति के उदाहरण हैं। इस प्रकार गुप्तों की यह नीति प्रत्यक्ष रूप से चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान की रणनीतिक तैयारी से जुड़ी हुई थी।

चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपने विजय अभियानों से पहले इसी नीति को और अधिक परिष्कृत रूप में अपनाया। उसने वैवाहिक संबंधों को केवल सामाजिक गठबंधन नहीं, बल्कि सैन्य-राजनीतिक रणनीति के रूप में प्रयोग किया।

 

नागवंश के साथ वैवाहिक संबंध और मध्य भारत की स्थिरता

नागवंश प्राचीन भारत के शक्तिशाली राजवंशों में से एक था, जिनका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में मथुरा, अहिच्छत्र और पद्मावती के शासकों के रूप में मिलता है। यद्यपि समुद्रगुप्त ने इन नाग शासकों को अधीन कर लिया था, तथापि उनकी शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। मध्य भारत में किसी भी दीर्घकालिक विजय अभियान के लिए उनका समर्थन आवश्यक था।

चंद्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह कर इस शक्ति को अपने पक्ष में कर लिया। इस विवाह से उत्पन्न पुत्री प्रभावतीगुप्ता के पूना ताम्रपत्र में नागकुलसंभूता कहलाने से यह संबंध ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित होता है। नागवंश में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर चन्द्रगुप्त ने उसका समर्थन प्राप्त कर लिया तथा यह गुप्तों को नवस्थापित चक्रवर्ती स्थिति के दृढ़ीकरण में बड़ा ही उपयोगी सिद्ध हुआ। इस गठबंधन ने गुप्त साम्राज्य की आंतरिक स्थिरता को मजबूत किया और चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियानों के लिए सुरक्षित आधार प्रदान किया।

 

वाकाटक गठबंधन और शक-विजय की भूमिका

वाकाटक वंश दक्षिण-पश्चिम भारत की एक प्रमुख शक्ति था, जिसकी भौगोलिक स्थिति गुप्तों और शकों के बीच सेतु का कार्य करती थी। गुजरात और काठियावाड़ के शकों पर आक्रमण से पूर्व वाकाटकों का सहयोग प्राप्त करना चंद्रगुप्त द्वितीय के लिए अनिवार्य था।

इसी रणनीति के अंतर्गत उसने अपनी पुत्री प्रभावतीगुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से कराया। रुद्रसेन की शीघ्र मृत्यु के पश्चात् प्रभावतीगुप्ता संरक्षिका बनी, क्योंकि उसके दोनों पुत्र (दिवाकरसेन तथा दामोदरसेन) अवयस्क थे, और इस अवधि में वाकाटक राज्य वस्तुतः गुप्त प्रभाव में आ गया। उसी के शासनकाल में चन्द्रगुप्त ने गुजरात और काठियावाड़ की विजय की तथा विधवा रानी ने अपने पिता को सभी संभव सहायता प्रदान की। वाकाटकों तथा गुप्तों की सम्मिलित शक्ति ने शकों का उन्मूलन कर डाला। इस प्रकार वाकाटक गठबंधन को चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान की सफलता की एक निर्णायक कड़ी माना जा सकता है।

 

कदम्ब वंश और गुप्त कूटनीति का दक्षिणी विस्तार

इसी व्यापक कूटनीतिक नीति के अंतर्गत चंद्रगुप्त द्वितीय ने उत्तर और पश्चिम के साथ-साथ दक्षिण भारत तक भी अपने राजनीतिक संबंध स्थापित किए। कदम्ब वंश के साथ वैवाहिक संपर्क इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि चंद्रगुप्त द्वितीय की साम्राज्यवादी रणनीति केवल प्रत्यक्ष विजय अभियानों तक सीमित नहीं थी, बल्कि दूरवर्ती क्षेत्रों में प्रभाव स्थापित करने के लिए कूटनीतिक माध्यमों का भी सजग उपयोग किया गया। इस संदर्भ में दक्षिण भारत में गुप्त प्रभाव का विस्तार एक अप्रत्यक्ष, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।

 

चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान : शक शक्ति का निर्णायक उन्मूलन

 

वैवाहिक कूटनीति द्वारा साम्राज्य की आंतरिक तथा बाह्य स्थिति को सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपने विजय अभियानों का वास्तविक सैन्य चरण आरम्भ किया। उदयगिरि गुहाभिलेख में उल्लिखित कृत्स्नपृथ्वीजय(सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतना) का आदर्श उसके साम्राज्यवादी लक्ष्य को स्पष्ट करता है। इन अभियानों का केन्द्रीय उद्देश्य पश्चिमी भारत में स्थापित शक (पश्चिमी क्षत्रप) सत्ता का उन्मूलन था, जो यद्यपि समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर चुकी थी, किंतु व्यावहारिक रूप से अब भी स्वतंत्र शक्ति के रूप में विद्यमान थी।

शक शासकों का प्रभाव गुजरात, काठियावाड़ और मालवा के पश्चिमी भागों तक विस्तृत था। इन क्षेत्रों पर नियंत्रण केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यही कारण है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान गुप्त इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध होते हैं।

 

पूर्वी मालवा अभियान और अभिलेखीय साक्ष्य

चंद्रगुप्त द्वितीय के शक-विरोधी अभियान का प्रारम्भ पूर्वी मालवा क्षेत्र से हुआ, जिसका संकेत वहाँ से प्राप्त 3 अभिलेखों से मिलता है। उदयगिरि पहाड़ी से प्राप्त उसका प्रथम अभिलेख उसके सान्धिविग्रहिक सचिव वीरसेन का है, जिसमें उल्लेख है कि वह सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने की इच्छा से राजा के साथ यहाँ आया। यह कथन स्पष्ट करता है कि यह अभियान केवल स्थानीय संघर्ष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साम्राज्यवादी योजना का अंग था।

उदयगिरि से प्राप्त दूसरा अभिलेख उसके सामन्त सनकानीक महाराज का है, जबकि सांची का तीसरा लेख उसके एक उच्च सैनिक पदाधिकारी आम्रकाईव का उल्लेख करता है, जिसे सैकड़ों युद्धों का विजेता कहा गया है। इन तीनों अभिलेखों को संयुक्त रूप से देखने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय स्वयं अपने सामन्तों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ अभियान पर निकला था। यह तथ्य चंद्रगुप्त द्वितीय की सैन्य नीति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि गुप्त सम्राट केवल राजधानी में बैठकर आदेश देने वाला शासक नहीं था, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से युद्ध संचालन में भी संलग्न रहता था।

 

रुद्रसिंह तृतीय की पराजय और पश्चिमी क्षत्रपों का अंत

शक शासक रुद्रसिंह तृतीय चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। अभिलेखीय और मुद्रात्मक साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि वह युद्ध में पराजित हुआ और संभवतः मारा गया। इसके साथ ही गुजरात और काठियावाड़ का संपूर्ण क्षेत्र गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। यह विजय केवल एक शासक की पराजय नहीं थी, बल्कि पश्चिमी क्षत्रप वंश के लगभग तीन शताब्दियों के शासन का अंत थी। इस प्रकार चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा शकों की पराजय भारतीय इतिहास में विदेशी आधिपत्य के उन्मूलन की एक निर्णायक घटना बन गई।

चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान का स्वर्ण सिक्का
चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा जारी व्याघ्रशैली स्वर्ण मुद्रा, जो शक-विजय के बाद गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक प्रभुता और वैचारिक शक्ति को दर्शाती है।

सिक्के और विजय : राजनीतिक प्रभुत्व के ठोस प्रमाण

 

चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियानों का सबसे ठोस और निर्विवाद प्रमाण उसके द्वारा जारी किए गए सिक्कों में मिलता है। शक-विजय के पश्चात् उसने शकों की चाँदी की मुद्राओं के अनुकरण पर अपने चाँदी के सिक्के जारी करवाए। यह नीति केवल आर्थिक सुविधा के लिए नहीं थी, बल्कि स्थानीय जनता के लिए सत्ता परिवर्तन को सहज बनाने का एक व्यावहारिक उपाय भी थी।

विशेष रूप से उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कुछ स्थानों से रुद्रसिंह तृतीय के सिक्के ऐसे प्राप्त हुए हैं जिन पर चंद्रगुप्त द्वितीय ने पुनरंकन करवाया। यह प्रत्यक्ष रूप से उसके राजनीतिक आधिपत्य को प्रमाणित करता है। इसके अतिरिक्त, उसके व्याघ्रशैली (सिंह-वध दृश्य) वाले सिक्के भी गुजरात और काठियावाड़ की विजय से संबंधित माने जाते हैं, क्योंकि सिंह भारत के इसी भू-भाग में अधिक पाए जाते थे। मुद्राशास्त्रीय दृष्टि से यह विजय गुप्तों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई और इससे गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक हो गया। ये मुद्रात्मक प्रमाण चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान के ऐतिहासिक यथार्थ को निर्विवाद रूप से स्थापित करते हैं।

 

आर्थिक परिणाम : बंदरगाह, व्यापार और समृद्धि

 

शक-विजय के परिणाम केवल राजनीतिक नहीं थे। गुजरात और सौराष्ट्र के गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित होने से भृगुकच्छ (भड़ौच) जैसे प्रसिद्ध पश्चिमी बंदरगाह गुप्त नियंत्रण में आ गए। यह बंदरगाह रोमन विश्व तथा पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार का प्रमुख केंद्र था।

इसके माध्यम से गुप्त साम्राज्य का:

  • समुद्री व्यापार सुदृढ़ हुआ
  • स्वर्ण और रजत मुद्रा प्रवाह बढ़ा
  • राज्य की आर्थिक समृद्धि में तीव्र वृद्धि हुई

इस प्रकार चंद्रगुप्त द्वितीय की पश्चिमी भारत विजय ने गुप्त साम्राज्य को आर्थिक दृष्टि से भी अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ किया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी गुप्त साम्राज्य के लिए निर्णायक सिद्ध हुए।

 

विक्रमादित्य की उपाधि : ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

शक-विजय के पश्चात् चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण किए जाने की परंपरा को केवल साहित्यिक अलंकरण नहीं माना जा सकता। भारतीय परंपरा में वह शकारि के रूप में स्मरण किया गया है, और इसी विजय की प्रतिध्वनि अनेक साहित्यिक ग्रंथों में सुनाई देती है। यद्यपि विक्रम संवत् और चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रत्यक्ष संबंध पर विद्वानों में मतभेद है, तथापि इसमें संदेह नहीं कि शकों पर विजय ने उसकी छवि को एक आदर्श विजेता-राजा के रूप में स्थापित किया।

 

समग्र मूल्यांकन : चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियानों का ऐतिहासिक महत्व

 

समग्र रूप से देखें तो चंद्रगुप्त द्वितीय के विजय अभियान केवल युद्धों की श्रृंखला नहीं थे। वे:

  • वैवाहिक कूटनीति
  • सुनियोजित सैन्य रणनीति
  • प्रशासनिक एकीकरण
  • और आर्थिक दूरदृष्टि

का समन्वित परिणाम थे। इन्हीं अभियानों के कारण गुप्त साम्राज्य राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उस शिखर पर पहुँचा, जिसे इतिहासकार गुप्त युग का स्वर्णकाल कहते हैं।

 

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