ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ: कैसे बदली भारत की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ ने भारतीय कृषि संरचना और ग्रामीण समाज को गहराई से प्रभावित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान लागू की गई भूमि काश्तकारी की नई प्रणालियाँ, जैसे स्थायी जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी, ने भारतीय किसानों के जीवन, उत्पादन प्रणाली और सामाजिक संबंधों में व्यापक परिवर्तन किए। इन औपनिवेशिक भूमि राजस्व नीतियों ने न केवल कृषि उत्पादन को बदला बल्कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भूमि स्वामित्व की अवधारणाओं को भी पुनः परिभाषित किया। इस लेख में हम ब्रिटिश भूमि राजस्व प्रणाली की गहरी समीक्षा करेंगे, और समझेंगे कि इन बदलावों ने कैसे भारतीय कृषि ढांचे को नया रूप दिया और इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या रहा।

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ और कृषि संरचना में बदलाव

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों के कारण भारतीय कृषि संरचना में बड़े बदलाव आए। नई भूमि पट्टेदारी व्यवस्था, भूमि स्वामित्व की अवधारणा, और बढ़ी हुई भूमि कर-मांग ने ग्रामीण जीवन को गहराई से प्रभावित किया। अलाउद्दीन खिलजी और मुगल काल की कर-व्यवस्थाएँ” से ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक शासन ने स्थानीय परंपराओं को तोड़ दिया। इन औपनिवेशिक कृषि नीतियों ने भारत में विकृत आधुनिकीकरण का युग आरंभ किया, जिसमें पारंपरिक ग्राम-समुदायों की जगह निजी संपत्ति और राज्य-नियंत्रित राजस्व प्रणाली ने ले ली।

 

ब्रिटिश पूर्व भारत की कृषि और भूमि स्वामित्व व्यवस्था

 

ब्रिटिश शासन से पहले भारत में ग्राम समुदाय स्थानीय स्वशासन और भूमि राजस्व प्रशासन की मुख्य इकाई के रूप में कार्य करते थे। भारत में भूमि स्वामित्व और कर प्रणाली की जड़ें प्राचीन काल से जुड़ी थीं। भूमि पर पूर्ण स्वामित्व का विचार उस समय नहीं था; बल्कि, भूमि से जुड़े सभी वर्गों, किसान, पटेल और शासक, के अपने-अपने अधिकार और दायित्व थे। किसान को खेती करने का अधिकार था और वह वार्षिक उपज का एक निश्चित हिस्सा राज्य को भूमि कर के रूप में देता था। पटेल या ग्राम-प्रधान मामलतदार के रूप में काम करता था और राज्य की राजस्व-मांग को को शासक तक पहुंचाता था। यह पूरी व्यवस्था स्थानीय रीति-रिवाजों और परंपराओं पर आधारित थी, जिसने भारतीय ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाए रखा।

 

ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश भूमि राजस्व प्रणाली का आरंभ

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों के तहत अंग्रेजों ने भारत की भूमि को राज्य की आय का प्रमुख स्रोत बनाया। ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन भारत में राजस्व संग्रह से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से कार्यरत था। ब्रिटिश औद्योगिक और व्यापारिक हितों ने उन्हें आयात-निर्यात शुल्क से पर्याप्त आय अर्जित करने से रोका, इसलिए भूमि कर ही मुख्य आय-स्रोत बन गया।

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभिक प्रशासक भारत को एक विशाल संपत्ति मानते थे। उनका विश्वास था कि कंपनी पूरे आर्थिक किराये (economic rent) की हकदार है, जबकि किसानों को केवल खेती का खर्च और श्रम-मजदूरी छोड़ दी जाती थी। परिणामस्वरूप, ग्राम-समुदायों की पारंपरिक भूमिका समाप्त हो गई और भूमि राजस्व की ‘फार्मिंग’ प्रणाली शुरू की गई। अत्यधिक भूमि-कर-मांग के कारण कृषि-उत्पादन में गिरावट आई, अनेक क्षेत्र खेती से बाहर हो गए और अकाल की स्थिति उत्पन्न हुई। यह स्पष्ट हुआ कि ब्रिटिश भूमि राजस्व नीति किसानों के हित में नहीं बल्कि औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के हित में थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक परिवर्तन ने भारत में शासन की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया था। इन्हीं परिवर्तनों के परिणामस्वरूप कंपनी ने ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लागू कीं, जिनका उद्देश्य राजस्व नियंत्रण को केंद्रीकृत करना था। इन परिस्थितियों ने ब्रिटिश सरकार को भूमि राजस्व के मामलों पर पुनर्विचार के लिए विवश किया। गहन विचार-विमर्श के बाद नई भूमि काश्तकारी व्यवस्थाएँ, जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी, लागू की गईं, जो आगे चलकर भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गईं।

 

नई भूमि काश्तकारी व्यवस्था

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लागू करते समय अंग्रेजों ने भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने भूमि काश्तकारी की तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ, जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी प्रणाली अपनाईं। इन औपनिवेशिक भूमि राजस्व प्रणालियों ने भारतीय कृषि ढांचे, किसानों की स्थिति और ग्रामीण समाज पर गहरा प्रभाव डाला।

  1. जमींदारी काश्तकारी

    यह प्रणाली बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश के बनारस डिवीजन, उत्तरी कर्नाटक और ब्रिटिश भारत के लगभग 49% क्षेत्र में लागू की गई थी। इसे स्थायी बंदोबस्त प्रणाली या Permanent Settlement भी कहा जाता है। यह ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों की सबसे प्रारंभिक और प्रसिद्ध प्रणाली थी, जिसने भूमि स्वामित्व को जमींदारों के हाथों में केंद्रित कर दिया।

  2. महालवाड़ी काश्तकारी

    यह प्रणाली उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत और पंजाब जैसे क्षेत्रों में लागू हुई, जो ब्रिटिश भारत के लगभग 60% हिस्से को कवर करती थी। इसमें गांव या महाल (estate) को राजस्व बंदोबस्त की इकाई माना गया। महालवाड़ी व्यवस्था ने ग्राम-समुदायों की भूमिका को आंशिक रूप से बनाए रखा, लेकिन अंततः यह भी राज्य-केन्द्रित राजस्व नीति बन गई।

  3. रैयतवाड़ी काश्तकारी

    यह प्रणाली मद्रास, बॉम्बे, असम और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में लागू की गई। इसमें प्रत्येक किसान को भूमि का व्यक्तिगत स्वामी माना गया, जो सीधे राज्य को भूमि कर चुकाता था। यह व्यवस्था व्यक्तिगत स्वामित्व की अवधारणा पर आधारित थी, जो ब्रिटिश शासन के पूंजीवादी दृष्टिकोण को दर्शाती थी।

इन तीनों भूमि काश्तकारी व्यवस्थाओं, जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी  की तुलना से ब्रिटिश नीति की दिशा स्पष्ट होती है। जमींदारी प्रणाली में भूमि का स्वामित्व जमींदारों के हाथों में केंद्रित हुआ, जिससे किसानों की बेदखली और किराया-शोषण बढ़ा। महालवाड़ी व्यवस्था में ग्राम समुदायों को सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया, लेकिन राज्य नियंत्रण यहाँ भी अत्यधिक रहा। रैयतवाड़ी प्रणाली ने किसानों को सीधे राज्य से जोड़कर व्यक्तिगत स्वामित्व की अवधारणा दी, परंतु इसने उन्हें ऋण और कर-भार के बोझ तले दबा दिया। तीनों ही व्यवस्थाओं का उद्देश्य समान था, राजस्व अधिकतमकरण,  किंतु इनके सामाजिक परिणाम भिन्न-भिन्न रहे।

 

ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण

 

जमींदारी बनाम महालवाड़ी बनाम रैयतवाड़ी प्रणाली का तुलनात्मक सारांश:

प्रणालीराजस्व भुगतानकर्ताइकाईअवधिप्रभाव
जमींदारीजमींदारसम्पूर्ण एस्टेटस्थायी (Permanent)किसानों की बेदखली और किराया शोषण
महालवाड़ीग्राम समुदायमहाल/गांव20-30 वर्षसामूहिक जिम्मेदारी, परन्तु राज्य नियंत्रण अधिक
रैयतवाड़ीव्यक्तिगत किसानजोत (Plot)20-30 वर्षव्यक्तिगत स्वामित्व, परन्तु कर भार और ऋणग्रस्तता

 

 ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों के आर्थिक प्रभाव

 

इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी थीं। आरंभिक विचारधारा के अनुसार, अंग्रेज़ प्रशासक भारत की भूमि को केवल राजस्व का स्रोत मानते थे। हाल के शोधों में एरिक स्टोक्स और जी. डी. बीयरस जैसे विद्वानों द्वारा प्रस्तुत इस थीसिस पर संदेह पैदा कर दिया है कि इंग्लैंड में समकालीन विचारधारात्मक रवैया, एक सीमा तक, भारत में ब्रिटिश प्रशासकों को उनकी नीतियों में मार्गदर्शन करता था। उनका कहना है कि इंग्लैंड में चल रहे लिबरल और उपयोगितावादी विचारों ने इन नीतियों को प्रभावित किया।

हालाँकि, बाद में बैडेन पॉवेल जैसे विद्वानों ने तर्क दिया कि ब्रिटिश भूमि राजस्व प्रणाली स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूलन का परिणाम थी। फिर भी, भारतीय राष्ट्रवादी और मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार, यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों का उद्देश्य भारत की कृषि को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के हितों के अनुरूप ढालना था।

ब्रिटेन के भीतर भी इन नीतियों की आलोचना शुरू हो गई थी। एडमंड बर्क ने वॉरेन हेस्टिंग्स के महाभियोग के दौरान ब्रिटिश संसद में कहा कि “भारत से भूमि राजस्व की यह अंधाधुंध वसूली, ब्रिटिश साम्राज्य की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न है।”
इसी प्रकार, 1830 और 1840 के दशक में लंदन में हुए संसदीय बहसों में यह स्पष्ट किया गया कि ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ भारतीय किसानों को गरीबी और शोषण के जाल में फंसा रही हैं। इन आलोचनाओं के बावजूद, औपनिवेशिक प्रशासन ने भारत को एक राजस्व-स्रोत के रूप में देखना जारी रखा।

 

भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा भूमि राजस्व नीतियों की आलोचना

 

भारतीय राष्ट्रवादी चिंतकों ने ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों की तीखी आलोचना की। दादाभाई नौरोजी ने इसे “भारत का आर्थिक निकास (Drain of Wealth)” कहा, जबकि आर. सी. दत्त ने अपनी पुस्तक The Economic History of India में तर्क दिया कि इन नीतियों ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जड़ों को नष्ट कर दिया। मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे औपनिवेशिक शोषण की संरचना बताया, जिसके माध्यम से ब्रिटिश पूंजीवाद ने भारत के संसाधनों को नियंत्रित किया। इन विश्लेषणों ने यह स्पष्ट किया कि भूमि राजस्व नीतियाँ केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक व सामाजिक नियंत्रण के औजार भी थीं।

 

स्थायी जमींदारी बंदोबस्त: ब्रिटिश भारत की पहली भूमि राजस्व नीति

 

जमींदारी प्रणाली, जो कि ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों की सबसे पहली कड़ी थी, लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में लागू की गई। इसे स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) कहा गया। इसे जागीरदारी, मालगुजारी, और बिस्वेदारी जैसे नामों से भी जाना जाता था। इस नीति के अंतर्गत, भूमि राजस्व की राशि को स्थायी रूप से तय कर दिया गया, अर्थात राज्य की राजस्व मांग को एक बार तय कर दिया गया और भविष्य में उसमें कोई परिवर्तन नहीं होना था। अन्य जमींदारी क्षेत्रों में, भूमि राजस्व को 10 से 40 वर्षों की अवधि के बाद संशोधित किया जाता था।

इस नीति ने जमींदारों को भूमि का पूर्ण स्वामी बना दिया। वे भूमि को बेच सकते थे, गिरवी रख सकते थे या वसीयत कर सकते थे। लेकिन किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई, क्योंकि राजस्व संग्रह का पूरा भार उन पर आ गया। यदि जमींदार राजस्व नहीं चुकाता था, तो उसकी भूमि जब्त कर ली जाती थी।

ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों के इस रूप ने कृषि उत्पादन, किसानों की आजीविका, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, तीनों को हिला कर रख दिया।

 

राजस्व मांग की ऊँचाई और प्रभाव

 

बंगाल में राज्य की भूमि राजस्व मांग किराये का 89% निर्धारित की गई थी, जिससे जमींदारों के पास केवल 11% हिस्सा बचता था। इस भारी कर-मांग ने किसानों पर असहनीय दबाव डाला और कृषि उत्पादन में गिरावट शुरू हो गई।

ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों के शुरुआती चरण में, 1762–63 से लेकर 1790–91 तक राजस्व संग्रह में तीव्र वृद्धि हुई-

  • 1762-63में, मीर कासिम के प्रशासन के दौरान, राजस्व संग्रह 6 लाख रुपये था।
  • 1763-64 में, मीर जाफर के प्रशासन के दौरान, यह बढ़कर 2 लाख रुपयेहो गया।
  • 1764-65 में, यह और बढ़कर 7 लाख रुपयेहो गया।
  • 1765-66में, कंपनी की दीवानी का पहला वर्ष, राजस्व संग्रह 0 लाख रुपये तक पहुँच गया।
  • 1790-91तक, कंपनी का राजस्व संग्रह 268 लाख रुपये हो गया।

यह आँकड़े बताते हैं कि औपनिवेशिक प्रशासन का उद्देश्य भारतीय कृषि से अधिकतम आर्थिक लाभ उठाना था, न कि किसानों की भलाई सुनिश्चित करना।

सन् 1857 तक भूमि राजस्व, ब्रिटिश भारतीय सरकार की कुल आय का लगभग 50% हिस्सा था।
यह आँकड़ा इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि ब्रिटिश भूमि राजस्व प्रणाली औपनिवेशिक वित्त का मेरुदंड थी। राज्य की पूरी आर्थिक नीति का केंद्र बिंदु यही था कि भारत से अधिकतम राजस्व निकाला जाए, चाहे उसके सामाजिक परिणाम कितने भी विनाशकारी क्यों न हों।

 

कॉर्नवालिस कोड और भूमि नीति का संस्थाकरण

 

कॉर्नवालिस कोड लागू करने वाले ब्रिटिश गवर्नर-जनरल चार्ल्स कॉर्नवालिस का चित्र।
भारत में स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) नीति लागू करने वाले लॉर्ड कॉर्नवालिस की पेंटिंग।

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों के संस्थागत रूप को 1793 के कॉर्नवालिस कोड (Cornwallis Code) ने औपचारिक रूप दिया। इस कोड के अंतर्गत न केवल स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को लागू किया गया बल्कि राजस्व प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था और नौकरशाही के लिए भी पश्चिमी ढांचा तैयार किया गया।
कॉर्नवालिस ने राजस्व अधिकारियों और न्यायाधीशों को अलग कर एक केंद्रित राजस्व नौकरशाही की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था कर वसूली को नियमित और नियंत्रण में रखना। यह कोड आगे चलकर ब्रिटिश शासन की केंद्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली का आधार बना और भारत में औपनिवेशिक शासन के कानूनी ढांचे की नींव रखी।

 

स्थायी बंदोबस्त का किसानों पर प्रभाव

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों का सबसे गंभीर प्रभाव किसानों पर पड़ा। स्थायी बंदोबस्त में एक बड़ी समस्या यह थी कि जमींदार द्वारा किसान से वसूल किए जाने वाले किराए को अनिर्धारित छोड़ दिया गया था। इसके कारण अत्यधिक किराया वसूली हुई। किसानों को उनकी पारंपरिक जोत से बार-बार बेदखल किया जाता था। 1859 और 1885 के बंगाल किराया अधिनियमों ने किसानों को कुछ राहत प्रदान की। हालांकि, कुछ विद्वानों का मानना है कि ये कानून मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों को शांत रखने के लिए बनाए गए थे।

औपनिवेशिक भूमि नीतियों ने भारत में एक नया सामाजिक ढांचा तैयार किया, जिसमें जमींदार, साहूकार, और व्यापारी वर्ग मजबूत हुआ जबकि किसान वर्ग कर्ज और गरीबी के जाल में फँस गया।

 

महालवाड़ी प्रणाली: ब्रिटिश भारत में सामुदायिक भूमि राजस्व नीति

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ विकसित करते समय, अंग्रेजों ने उत्तर भारत की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए महालवाड़ी प्रणाली को लागू किया। इस प्रणाली में गांव या महाल (estate) को राजस्व बंदोबस्त की मूल इकाई माना गया। गांव की भूमि ग्राम समुदाय के सामूहिक स्वामित्व में होती थी, जिसे ‘सह-साझेदारों का समूह’ कहा जाता था।

 

सह-साझेदारों की जिम्मेदारी

 

इस प्रणाली में, सह-साझेदारों का समूह संयुक्त रूप से राजस्व भुगतान के लिए जिम्मेदार होता था। हालांकि व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बनी रहती थी। यदि कोई साझेदार अपनी भूमि छोड़ देता था, तो वह हिस्सा गांव समुदाय के सामूहिक स्वामित्व में वापस चला जाता था। यह व्यवस्था, अपने प्रारंभिक रूप में, ग्राम-आधारित स्वशासन की भावना को बनाए रखती थी, लेकिन ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों की कठोरता के कारण यह भी धीरे-धीरे राज्य नियंत्रण के अधीन हो गई।

 

ग्राम समुदाय और भूमि स्वामित्व की परंपरा

 

गांव समुदाय के पास सामान्य भूमि, चरागाह और वनभूमि होती थी, जिससे सामुदायिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। यह प्रणाली गांवों की आर्थिक एकता और सहयोग की परंपरा को बनाए रखने का प्रयास करती थी। लेकिन राजस्व की ऊँची मांग और औपनिवेशिक प्रशासनिक दबाव के कारण महालवाड़ी प्रणाली भी किसानों के लिए बोझ बन गई।

 

उत्तर-पश्चिमी प्रांत और अवध में ब्रिटिश भूमि बंदोबस्त

 

जब ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ उत्तर भारत में लागू की गईं, तो कंपनी ने धीरे-धीरे अवध, इलाहाबाद और गंगा-जमुना दोआब जैसे उपजाऊ क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लिया।  1801 में, अवध के नवाब ने कंपनी को इलाहाबाद जिले और आसपास के क्षेत्रों को सौंप दिया। इन्हें “सीडेड डिस्ट्रिक्ट्स” कहा जाता था। दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद, कंपनी ने जमुना और गंगा के बीच के क्षेत्र को प्राप्त किया। इसे “कॉन्कर्ड प्रोविंसेज” कहा गया। 1817-18 के अंतिम एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद, लॉर्ड हेस्टिंग्स ने उत्तरी भारत में और अधिक क्षेत्रों को प्राप्त किया।

 

हेनरी वेलेस्ली का बंदोबस्त

 

सीडेड डिस्ट्रिक्ट्स के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर हेनरी वेलेस्ली ने जमींदारों और किसानों के साथ तीन साल के लिए भूमि राजस्व बंदोबस्त किया। पहले ही वर्ष में, उन्होंने अवध के नवाब की मांग से 20 लाख रुपये अधिक राजस्व मांग तय की। तीसरे वर्ष समाप्त होने से पहले, 10 लाख रुपये का और बोझ जोड़ा गया। यह दिखाता है कि ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों का उद्देश्य किसानों की स्थिति सुधारना नहीं बल्कि राजस्व अधिकतमकरण था।

 

कंपनी की कठोर राजस्व प्रणाली

 

कंपनी की भूमि राजस्व मांग बहुत कठोर थी। नवाब का राजस्व संग्रह वर्ष में वास्तविक उत्पादन के अनुसार अलग-अलग होता था। लेकिन कंपनी की मांग को पहले भारत में अज्ञात कठोरता के साथ वसूल किया जाता था। कॉन्कर्ड प्रोविंसेज के लिए भी इसी तरह के भूमि राजस्व बंदोबस्त किए गए। यही नीति आगे चलकर महालवाड़ी व्यवस्था की कठोरता का आधार बनी।

 

1822 का विनियमन VII: ब्रिटिश भूमि सर्वेक्षण और राजस्व सुधार

 

होल्ट मैकेंजी का चित्र, जिन्होंने 1822 का विनियमन VII (Regulation VII) तैयार किया था।
भारत में महलवारी प्रणाली की अवधारणा देने वाले ब्रिटिश अधिकारी होल्ट मैकेंजी

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों के विकास क्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ 1822 का विनियमन VII था, जिसे बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स के सचिव होल्ट मैकेंजी ने 1819 में अपनी मिनट दर्ज की। उन्होंने उत्तरी भारत में ग्राम समुदायों के अस्तित्व पर जोर दिया। उन्होंने भूमि का सर्वेक्षण करने, भूमि में अधिकारों का रिकॉर्ड तैयार करने, और गांव दर गांव या महल दर महल भूमि राजस्व मांग का बंदोबस्त करने की सिफारिश की।

भूमि राजस्व बंदोबस्त किराये के मूल्य के 80% के आधार पर किए गए। जिन मामलों में एस्टेट जमींदारों के पास नहीं थे, बल्कि किसानों के पास सामान्य काश्तकारी में थे, राज्य की मांग को किराए के 95% पर तय करने की अनुमति दी गई। परिणामस्वरूप, इस कठोर नीति ने किसानों और छोटे भू-स्वामियों पर भारी बोझ डाल दिया।

 

राजस्व निर्धारण की जटिलता और विफलता

 

अत्यधिक राज्य मांग और राजस्व प्रशासन की त्रुटियों के कारण यह नीति विफल रही। किसानों की आर्थिक स्थिति बदतर होती गई, और कृषि उत्पादन में गिरावट आई।

 

1833 का विनियमन IX और मर्टिन्स बर्ड की भूमि नीति

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लगातार आलोचना का विषय बनती जा रही थीं। विलियम बेंटिक की सरकार ने 1822 की योजना की समीक्षा की। उन्होंने पाया कि यह योजना व्यापक दुख का कारण बनी। 1833 का विनियमन IX पारित किया गया। इसमें उत्पादन और किराए के अनुमान तैयार करने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया। विभिन्न प्रकार की मिट्टी के लिए औसत किराए तय करने की प्रणाली शुरू की गई।

 

मर्टिन्स बर्ड का योगदान

 

मर्टिन्स बर्ड को उत्तरी भारत में भूमि बंदोबस्त का जनक माना जाता है। उनकी देखरेख में, एक क्षेत्र की भूमि का सर्वेक्षण किया गया। खेत की सीमाएं और खेती योग्य और बंजर भूमि दिखाई गई। फिर पूरे क्षेत्र के लिए मूल्यांकन तय किया गया। प्रत्येक गांव के लिए मांग तय की गई। राज्य की मांग को किराए के मूल्य के 66% पर तय किया गया। बंदोबस्त 30 साल के लिए किया गया। यह नीति अपेक्षाकृत संतुलित मानी गई, परंतु औपनिवेशिक शासन के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इसमें भी किसानों की स्थिति द्वितीयक रही।

 

1855 के सहारनपुर नियम और ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियाँ

 

लॉर्ड डलहौजी ने ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों में सुधार के लिए 1855 के संशोधित सहारनपुर नियम लागू किए। नियमों के तहत राज्य की राजस्व मांग को किराए के मूल्य के 50% तक सीमित कर दिया। हालांकि, बंदोबस्त अधिकारियों ने इस नियम से बचने की कोशिश की। उन्होंने 50% किराया मूल्य की व्याख्या एस्टेट के “संभावित और संभावित” किराए के आधे के रूप में की, न कि “वास्तविक किराए” के रूप में। इससे कृषि वर्ग पर भारी बोझ पड़ा और व्यापक असंतोष पैदा हुआ। इन कठोर ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों ने किसानों और जमींदारों दोनों में गहरा असंतोष पैदा किया, जो आगे चलकर 1857 के वर्ग संघर्ष का एक प्रमुख आर्थिक कारण बना।

 

रैयतवाड़ी प्रणाली: ब्रिटिश भारत में व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व का उदय

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ जब दक्षिण भारत में लागू की गईं, तो अंग्रेजों ने स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए रैयतवाड़ी प्रणाली अपनाई। रैयतवाड़ी प्रणाली में, भूमि के हर ‘पंजीकृत’ धारक को भूमि का मालिक माना जाता था। उसे राज्य को सीधे भूमि राजस्व का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था। उसे अपनी भूमि को उप-किराए पर देने, हस्तांतरित करने, गिरवी रखने या बेचने का अधिकार था। जब तक वह राज्य की भूमि राजस्व मांग का भुगतान करता था, तब तक सरकार द्वारा उसे उसकी जोत से बेदखल नहीं किया जाता था। इस प्रणाली ने भूमि में निजी संपत्ति की अवधारणा को जन्म दिया, जिसने ग्रामीण समाज के पारंपरिक सामूहिक ढांचे को तोड़ दिया।

 

मद्रास में भूमि बंदोबस्त

 

थॉमस मुनरो का चित्र, जिन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी में रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System) लागू की थी।
रैयतवाड़ी प्रणाली के प्रणेता और मद्रास के गवर्नर सर थॉमस मुनरो

1792 में, कंपनी ने मद्रास प्रेसीडेंसी के बारामहल जिले में पहले भूमि राजस्व बंदोबस्त किए। कैप्टन रीड ने थॉमस मुनरो की सहायता से खेतों के अनुमानित उत्पादन के 50% के आधार पर राज्य की मांग तय की। यह प्रतिशत ब्रिटिश भूमि राजस्व नीति की कठोरता को दर्शाता है, जो किसानों की भुगतान क्षमता से कहीं अधिक था। यही प्रणाली अन्य हिस्सों में भी लागू की गई।

 

प्रारंभिक बंदोबस्त की समस्याएं

 

प्रारंभिक बंदोबस्त अत्यधिक कठोर थे, जिससे किसानों पर असहनीय बोझ पड़ा। परिणामस्वरूप, कृषि उत्पादन में गिरावट आई और ग्रामीण वर्गों में ऋणग्रस्तता बढ़ी। यह औपनिवेशिक भूमि कर नीति की सबसे बड़ी विफलता थी।

 

थॉमस मुनरो और मद्रास बंदोबस्त

 

थॉमस मुनरो (1820–27), जो मद्रास के गवर्नर थे, ने महसूस किया कि प्रारंभिक बंदोबस्त किसानों के लिए अन्यायपूर्ण हैं। उन्होंने पूरे प्रांत में रैयतवाड़ी प्रणाली लागू की। इस प्रणाली के तहत, राज्य की मांग जोत के सकल उत्पाद के 1/3 के आधार पर तय की गई। यह मांग लगभग पूरे आर्थिक किराए को अवशोषित कर लेती थी। हालाँकि मुनरो ने इसे न्यायपूर्ण बताया, लेकिन व्यवहार में यह नीति भी किसानों पर भारी बोझ बन गई। किसानों को साहूकारों से ऋण लेना पड़ा, और इस तरह वे साहूकारी पूंजी के चंगुल में फँस गए। ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ के इस स्वरूप ने भारतीय कृषि को व्यवसायिक और पूंजीवादी ढांचे की ओर धकेला।

 

मुनरो के बंदोबस्त का प्रभाव

 

मुनरो के बंदोबस्त लगभग तीस वर्षों तक चले। इससे व्यापक अत्याचार और कृषि संकट पैदा हुआ। किसान गरीबी में और डूब गए। वे साहूकारों के चंगुल में फंस गए। संग्रह का तंत्र बहुत अत्याचारपूर्ण था। राज्य के बकाया वसूली के लिए यातना का सहारा लिया जाता था।

 

यातना की प्रथाएं

 

ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों की क्रूरता का एक उदाहरण यह था कि राजस्व बकाया वसूलने के लिए अत्याचार किए जाते थे।  ब्रिटिश संसद में सदस्यों ने यातना की घृणित प्रथाओं के बारे में सवाल पूछे, इनमें शामिल थे:

  • चूककर्ता को भोजन करने या प्राकृतिक आवश्यकताओं का ध्यान रखने से रोकना।
  • एक आदमी को झुकी हुई स्थिति में बांधना।
  • चूककर्ताओं को उनके पीछे के बालों से बांधना।
  • हड्डियों या अन्य अपमानजनक सामग्री की माला गर्दन में डालना।

इन घटनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की औपनिवेशिक क्रूरता को उजागर किया और भारत में राजस्व नीति के प्रति व्यापक असंतोष उत्पन्न किया।

 

1855 का सर्वेक्षण और बंदोबस्त

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों में सुधार के लिए 1855 में एक व्यापक सर्वेक्षण और नया बंदोबस्त कार्यक्रम तय किया गया। इसमें राज्य की मांग को सकल उत्पाद के 30% तक सीमित करने का सिद्धांत था। वास्तविक कार्य 1861 में शुरू हुआ। 1864 के नियम ने राज्य की मांग को किराए के 50% तक सीमित कर दिया। लेकिन यह भी कागज़ी नीति बनकर रह गया, क्योंकि औपनिवेशिक प्रशासन का उद्देश्य किसानों को राहत देना नहीं, बल्कि राजस्व संग्रह बनाए रखना था।

 

1867–78 का मद्रास अकाल और राजस्व नीति की भूमिका

 

1867 से 1878 के बीच हुए मद्रास अकाल ने ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों की वास्तविकता को उजागर कर दिया।  इस अवधि में लाखों किसान भूख और गरीबी से मारे गए। इस अकाल ने सिद्ध कर दिया कि औपनिवेशिक भूमि नीति का मूल उद्देश्य केवल राजस्व अधिकतमकरण था, न कि भारतीय कृषि या किसानों का कल्याण।

अकालों की पुनरावृत्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1880 और 1901 के अकाल आयोगों (Famine Commissions) का गठन किया। दोनों आयोगों ने अपनी रिपोर्टों में स्वीकार किया कि भारत में बार-बार पड़ने वाले अकालों का एक मुख्य कारण भूमि राजस्व की ऊँची दरें और राजस्व संग्रह की कठोर नीतियाँ थीं। रिपोर्टों ने यह भी रेखांकित किया कि ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ किसानों को आर्थिक रूप से असुरक्षित बना रही थीं, क्योंकि अकाल के समय में भी उनसे पूर्ण राजस्व वसूला जाता था। इन निष्कर्षों ने भारत में औपनिवेशिक शासन की राजनीतिक वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए।

 

बॉम्बे में भूमि बंदोबस्त

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ का तीसरा प्रमुख रूप बॉम्बे प्रेसीडेंसी में लागू किया गया। यहाँ भी कंपनी ने रैयतवाड़ी प्रणाली अपनाई, जिसका उद्देश्य ग्राम समुदायों और जमींदारों की मध्यस्थता को समाप्त कर राज्य और किसान के बीच सीधा आर्थिक संबंध स्थापित करना था।

 

एल्फिंस्टन और चैपलिन की रिपोर्ट्स

 

एल्फिंस्टन, बॉम्बे के गवर्नर (1819-27), ने अक्टूबर 1819 में पेशवा से जीते गए क्षेत्रों पर एक विस्तृत ‘रिपोर्ट’ प्रस्तुत की। उन्होंने मराठा सरकार की दो महत्वपूर्ण विशेषताओं पर जोर दिया:

  1. ग्राम समुदायों का अस्तित्व।
  2. मिरासदारी काश्तकारी का अस्तित्व।

दक्कन के कमिश्नर चैपलिन ने 1821 और 1822 में दो रिपोर्टें प्रस्तुत कीं। इनमें राजस्व बंदोबस्त में पिछली प्रथाओं का उल्लेख किया गया और कुछ मूल्यवान सुझाव दिए गए।

 

प्रिंगल का सर्वेक्षण

 

1824-28 के दौरान, प्रिंगल द्वारा भूमि का नियमित सर्वेक्षण किया गया। राज्य की मांग को शुद्ध उत्पाद के 55% पर तय किया गया। यह नीति भी ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों की कठोरता का प्रमाण थी। दुर्भाग्य से, अधिकांश सर्वेक्षण दोषपूर्ण थे। खेतों के उत्पादन का अनुमान गलत साबित हुआ। इसके परिणामस्वरूप अधिक मूल्यांकन और किसानों पर अत्याचार हुआ। निराश होकर कई किसानों ने अपने खेत छोड़ दिए। बड़े क्षेत्र खेती से बाहर हो गए।

 

विंगेट का सर्वेक्षण और बॉम्बे में रैयतवाड़ी बंदोबस्त

 

1835 में, लेफ्टिनेंट विंगेट को इंजीनियर्स कोर में सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया। उन्होंने 1847 में एक रिपोर्ट पेश की, जिस पर एच.सी. गोल्डस्मिड, कैप्टन डेविडसन और कैप्टन विंगेट ने संयुक्त रूप से हस्ताक्षर किए। इस रिपोर्ट ने बॉम्बे में रैयतवाड़ी बंदोबस्त की नींव रखी।

 

भूमि राजस्व मांग का निर्धारण

 

पहले, राज्य की भूमि राजस्व मांग जिले के पिछले इतिहास और लोगों की भुगतान क्षमता के आधार पर तय की जाती थी। फिर, इस मांग को खेतों के बीच बांट दिया जाता था। पुरानी प्रणाली, जो खेत उत्पाद के समान आधार पर थी, को भूवैज्ञानिक आधार पर मूल्यांकन से बदल दिया गया। इसके अलावा, मूल्यांकन प्रत्येक खेत पर किया जाता था, न कि किसान की जोत पर। इससे किसान किसी भी खेत को छोड़ सकते थे या खाली पड़े खेतों को ले सकते थे। यह बंदोबस्त 30 साल के लिए किया गया था।

नया मूल्यांकन अनुमान पर आधारित था और कठोरता की ओर झुका हुआ था। 30 साल बाद, 1866 में पुनः बंदोबस्त का काम शुरू हुआ। अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-65) के कारण बॉम्बे कपास की मांग बढ़ गई, जिससे कीमतों में अस्थायी उछाल आया। इस उछाल ने सर्वेक्षण अधिकारियों को मूल्यांकन को 66% से 100% तक बढ़ाने का मौका दिया, बिना किसानों को कानूनी अदालत में अपील करने का अधिकार दिए।

 

दक्कन कृषक विद्रोह और राहत अधिनियम

 

1875 में दक्कन क्षेत्र में कृषक विद्रोह हुए, जो ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों और साहूकारों के अत्याचार के खिलाफ थे। सरकार ने 1879 के दक्कन कृषक राहत अधिनियम के माध्यम से साहूकारों के खिलाफ राहत प्रदान की। हालाँकि, यह अधिनियम भी राजस्व नीति की जड़ समस्या, यानी अत्यधिक राज्य मांग  को नहीं सुलझा सका। किसानों की आर्थिक दुर्दशा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन का यह दौर ब्रिटिश शासन की औपनिवेशिक कृषि नीति की असफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण बना।

 

रैयतवाड़ी प्रणाली की समस्याएं

 

बॉम्बे में रैयतवाड़ी प्रणाली के दो बड़े नुकसान थे: अधिक मूल्यांकन और अनिश्चितता। इसके अलावा, अधिक मूल्यांकन के खिलाफ कानूनी अदालत में अपील करने का कोई प्रावधान नहीं था। कलेक्टर किसान को सूचित करता था कि उसकी भूमि का भविष्य में किस दर पर मूल्यांकन किया गया है। यदि किसान नई शर्तों पर भूमि रखना चाहता था, तो वह ऐसा कर सकता था; यदि नहीं, तो वह इसे छोड़ सकता था।

 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश भूमि नीतियों का प्रभाव

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ केवल कृषि प्रणाली को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी उलट-पलट कर गईं। ईस्ट इंडिया कंपनी की राजस्व प्रणालियों और अत्यधिक राज्य मांग के संयुक्त प्रभाव से भारतीय ग्राम-समाज की आत्मनिर्भर संरचना टूट गई।

कंपनी द्वारा लागू की गई औपनिवेशिक भूमि कर नीतियाँ स्थानीय उत्पादन और उपभोग के संतुलन को नष्ट कर, कृषि को व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में धकेलने लगीं। इस प्रक्रिया में किसानों की पारंपरिक सुरक्षा समाप्त हो गई और वे साहूकारों तथा जमींदारों के अधीन आर्थिक रूप से निर्भर हो गए।

 

ग्राम पंचायतों और स्थानीय प्रशासन में परिवर्तन

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लागू होने के बाद ग्राम पंचायतों की पारंपरिक भूमिका में भारी कमी आई। पहले पंचायतें न केवल भूमि बंदोबस्त और राजस्व संग्रह का कार्य करती थीं, बल्कि न्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों में भी भाग लेती थीं।

अंग्रेजों की औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था ने पंचायतों को उनके इन अधिकारों से वंचित कर दिया। पटेल अब केवल राजस्व संग्रहकर्ता बनकर रह गया, जो राज्य के प्रति उत्तरदायी था, न कि अपने ग्राम समुदाय के प्रति। इस प्रकार, स्थानीय स्वशासन की परंपरा टूट गई और ग्राम पंचायतें औपनिवेशिक शासन की नौकरशाही का हिस्सा बन गईं।

 

भूमि में निजी संपत्ति का परिचय: औपनिवेशिक नवाचार

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियों का सबसे दीर्घकालिक प्रभाव भूमि में निजी संपत्ति की अवधारणा का परिचय था। इससे भूमि एक बाज़ार वस्तु (commodity) बन गई, जिसे बेचा, गिरवी रखा या हस्तांतरित किया जा सकता था। इस बदलाव ने भारतीय सामाजिक संबंधों को गहराई से प्रभावित किया। पुराने सहयोगी ग्राम-समुदायों की जगह प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिवाद ने ले ली। जमींदार, व्यापारी और साहूकार वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त हुए, जबकि कृषक वर्ग अधिकाधिक निर्भर और कमजोर बनता गया।

 

सहयोग से प्रतिस्पर्धा तक: ब्रिटिश भारत की कृषि अर्थव्यवस्था

 

ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लागू होने से पहले, भारतीय कृषि समाज सहयोग और सामूहिकता पर आधारित था। लेकिन औपनिवेशिक नीतियों ने इसे प्रतिस्पर्धा और निजी स्वार्थ की दिशा में मोड़ दिया। भूमि अब व्यक्तिगत स्वामित्व और लाभ का माध्यम बन गई। कृषि के पूंजीवादी विकास के पूर्वापेक्षाएं बनाई गईं। उत्पादन के नए तरीके, मुद्रा अर्थव्यवस्था का परिचय, कृषि का व्यावसायीकरण, परिवहन के बेहतर साधन और विश्व बाजार से जुड़ाव ने भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम दिया।

हालाँकि, इस परिवर्तन का लाभ केवल सीमित वर्गों, जमींदारों, व्यापारियों और साहूकारों  तक ही सीमित रहा। अधिकांश किसान ऋण, कर और भूख के त्रिकोण में फँसे रहे।

 

ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियों के दीर्घकालिक प्रभाव

 

1857 के विद्रोह के बाद जब भारत में ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हुआ, तब भी ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ लगभग यथावत रहीं। राज्य ने केवल प्रशासनिक सुधार किए, लेकिन राजस्व की उच्च दरें और किसानों पर आर्थिक बोझ जारी रहा। इन नीतियों का प्रभाव इतना गहरा था कि स्वतंत्र भारत में 1950 के दशक तक चलने वाले भूमि सुधार आंदोलनों का उद्देश्य इन्हीं औपनिवेशिक व्यवस्थाओं को समाप्त करना था। इस प्रकार, ब्रिटिश भूमि नीति की दीर्घकालिक विरासत आज भी भारतीय ग्रामीण संरचना और भूमि स्वामित्व पैटर्न में दिखाई देती है।

 

निष्कर्ष: ब्रिटिश भूमि राजस्व नीतियाँ और भारत की कृषि विरासत

 

संक्षेप में कहा जाए तो ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व नीतियाँ भारतीय कृषि और ग्रामीण समाज के लिए एक संरचनात्मक परिवर्तनकारी युग सिद्ध हुईं। जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी प्रणालियों ने भारतीय कृषि को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला। किसानों पर अधिक बोझ डाला और उन्हें सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का सामना करना पड़ा।

इन नीतियों के कारण कृषक वर्ग पर कर का बोझ, भूमि से बेदखली, और ऋणग्रस्तता जैसी समस्याएँ आम हो गईं। वहीं, जमींदारों, साहूकारों और व्यापारियों का एक नया आर्थिक वर्ग उभरा जिसने ग्रामीण समाज में असमानता को स्थायी रूप दिया।

इस प्रकार, ब्रिटिश भूमि राजस्व प्रणाली ने भारत में न केवल कृषि उत्पादन की प्रकृति बदली, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे को भी पुनर्गठित किया। औपनिवेशिक शासन की ये नीतियाँ भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ऐसे प्रभाव छोड़ गईं, जिनकी गूँज आज भी भारत के कृषि और भूमि स्वामित्व ढांचे में महसूस की जा सकती है।

अंततः, इन सभी औपनिवेशिक भूमि नीतियों का लक्ष्य भारत को एक राजस्व-स्रोत के रूप में देखना था, न कि एक समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित करना।
इसने भारत को राजनीतिक रूप से अधीन, आर्थिक रूप से निर्भर, और सामाजिक रूप से असमान बना दिया, जो कि औपनिवेशिक शासन की सबसे स्थायी विरासतों में से एक है।

 

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