गुप्तकालीन कला का वर्णन: स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला

 

संस्कृति के विविध क्षेत्रों के साथ-साथ गुप्तकालीन कला और स्थापत्य की उपलब्धियाँ भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह वह युग था जब कला केवल शिल्प या सजावट तक सीमित न रहकर धार्मिक भावना, आध्यात्मिक चेतना और गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के संरक्षण का संगठित माध्यम बन गई। गुप्त काल की कीर्ति आज साहित्यिक वर्णनों से अधिक उन दृश्य कृतियों के माध्यम से सुरक्षित है, जिनमें मंदिर, मूर्तियाँ, गुफाएँ और चित्रकला प्रमुख हैं।

गुप्त युग में सम्पूर्ण उत्तर भारत में एक व्यापक कलात्मक सक्रियता दिखाई देती है। स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला और मृद्भांड कला, सभी क्षेत्रों में संतुलित और परिपक्व विकास हुआ। इस काल की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि कुषाणकालीन विदेशी प्रभाव क्रमशः समाप्त हो गया और एक ऐसी कला-परंपरा विकसित हुई, जो रूप, भाव और प्रतीक, तीनों स्तरों पर भारतीय थी। इसी कारण गुप्तकालीन कला को भारतीय कला का शास्त्रीय चरण माना जाता है।

 

गुप्तकालीन कला की प्रमुख विशेषताएँ

 

गुप्तकालीन कला भारतीय कला परंपरा का वह चरण है जिसमें संतुलन, सौम्यता और आध्यात्मिकता का सर्वश्रेष्ठ समन्वय दिखाई देता है। इस कला की प्रमुख विशेषता विदेशी प्रभावों से मुक्त होकर एक विशुद्ध भारतीय शैली का विकास है। गुप्तकालीन स्थापत्य में मंदिरों की सुव्यवस्थित योजना, गर्भगृह-प्रधान संरचना और शिखर की प्रारंभिक अवधारणा स्पष्ट होती है। मूर्तिकला में शारीरिक सौष्ठव के स्थान पर आध्यात्मिक भाव, शांत मुखमुद्रा और संयमित अलंकरण को महत्व दिया गया। चित्रकला में अजन्ता और बाघ जैसी गुफाओं के भित्ति-चित्र मानवीय करुणा, भावात्मक गहराई और कथात्मक प्रवाह का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

 

गुप्तकालीन स्थापत्य: मंदिर की अवधारणा का विकास

 

गुप्तकालीन कला के स्थापत्य पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मंदिर स्थापत्य का सुव्यवस्थित विकास है। यद्यपि धार्मिक संरचनाएँ इससे पूर्व भी विद्यमान थीं, किंतु स्वतंत्र, स्थायी और नियोजित मंदिरों की परंपरा स्पष्ट रूप से गुप्त काल में ही दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल स्थापत्य तकनीक का नहीं, बल्कि धार्मिक जीवन की संरचना में आए परिवर्तन का भी संकेत है।

 

गुप्तकालीन मंदिरों की आधारभूत संरचना

गुप्तकालीन मंदिर प्रायः ऊँचे चबूतरों पर निर्मित किए जाते थे, जिन पर चढ़ने के लिए चारों ओर से सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं। प्रारम्भिक मंदिरों की छतें सपाट थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शिखर की अवधारणा अभी विकासशील अवस्था में थी। मंदिर का केन्द्रीय भाग वर्गाकार गर्भगृह होता था, जहाँ देवमूर्ति की स्थापना की जाती थी। यही गर्भगृह मंदिर का सर्वाधिक पवित्र और प्रतीकात्मक केंद्र था।

 

प्रदक्षिणा-पथ और प्रतीकात्मक अलंकरण

गर्भगृह के चारों ओर आच्छादित प्रदक्षिणा-पथ का निर्माण गुप्त स्थापत्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। आरंभ में गर्भगृह की दीवारें साधारण थीं, परंतु कालांतर में उन पर मूर्तियों और प्रतीकात्मक अलंकरणों का प्रयोग बढ़ने लगा। प्रवेशद्वारों की चौखटों पर मकरवाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना की आकृतियों का अंकन गुप्तकालीन कला की विशिष्ट पहचान बन गया। इनके साथ-साथ हंस-मिथुन, स्वस्तिक, श्रीवृक्ष, मङ्गलकलश, शंख और पद्म जैसे मांगलिक प्रतीकों का प्रयोग धार्मिक भावना को सुदृढ़ करता है।

 

प्रारम्भिक मंदिरों से परिपक्व स्थापत्य तक

 

गुप्तकालीन स्थापत्य के विकास को यदि क्रमिक रूप से देखा जाए, तो प्रारम्भिक मंदिरों में सरलता और संयम प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। साँची का मंदिर संख्या 17, तिगवाँ और एरण जैसे स्थलों से प्राप्त मंदिरों में सपाट छत, वर्गाकार गर्भगृह और सीमित अलंकरण स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। इन संरचनाओं में मंदिर योजना अभी प्रारम्भिक अवस्था में थी, किंतु स्थापत्य अनुशासन स्पष्ट रूप से विकसित हो चुका था।

इसके बाद नचना-कुठार और भूमरा जैसे स्थलों पर प्राप्त मंदिरों में यह परंपरा अधिक परिपक्व रूप ग्रहण करती है। यहाँ गर्भगृह के चारों ओर व्यवस्थित प्रदक्षिणा-पथ, स्तम्भयुक्त मण्डप और दीवारों पर अलंकरण की बढ़ती प्रवृत्ति दिखाई देती है। इन मंदिरों में सादगी बनी रहती है, किंतु साथ-साथ धार्मिक प्रतीकात्मकता और स्थापत्य संतुलन भी गहराता जाता है।

 

देवगढ़ का दशावतार मंदिर, गुप्तकालीन कला का स्थापत्य उदाहरण
देवगढ़ स्थित दशावतार मंदिर

देवगढ़ और भीतरगाँव: गुप्तकालीन स्थापत्य की चरम अवस्था

 

गुप्तकालीन कला के स्थापत्य विकास की पराकाष्ठा देवगढ़ का दशावतार मंदिर और भीतरगाँव का ईंट-निर्मित मंदिर में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। देवगढ़ का दशावतार मंदिर ऊँचे एवं चौड़े चबूतरे पर निर्मित है और इसमें गुप्त मंदिरों की लगभग सभी विकसित विशेषताएँ एक साथ उपलब्ध हो जाती हैं। गर्भगृह के प्रवेशद्वार पर द्वारपालों, नदी-देवताओं और वैष्णव प्रतीकों का कलापूर्ण अंकन है।

मंदिर की दीवारों पर शेषशायी विष्णु, नर-नारायण, गजेन्द्रमोक्ष तथा रामायण-महाभारत के दृश्य उत्कीर्ण हैं, जो गुप्तकालीन कला में धार्मिक आख्यानों के स्थापत्य माध्यम से अभिव्यक्ति को दर्शाते हैं। गर्भगृह के ऊपर निर्मित पिरामिडनुमा तिहरा शिखर, गवाक्ष और आमलक, ये सभी तत्व आगे चलकर नागर शैली के मंदिर स्थापत्य की आधारशिला बने। इस प्रकार देवगढ़ का मंदिर शिखरयुक्त मंदिरों का प्रारम्भिक और आदर्श उदाहरण माना जाता है।

भीतरगाँव का मंदिर, जो ईंटों से निर्मित है, गुप्तकालीन स्थापत्य में ईंट स्थापत्य की तकनीकी दक्षता को दर्शाता है। इसका शिखर लगभग 70 फुट ऊँचा था। बाहरी दीवारों में बने ताखों में गणेश, आदिवाराह, दुर्गा, नदी-देवताओं तथा रामायण-महाभारत के आख्यान उत्कीर्ण हैं। यह मंदिर संरचनात्मक दृढ़ता और कथात्मक अलंकरण, दोनों का संतुलित उदाहरण प्रस्तुत करता है।

 

स्थापत्य परंपरा का ऐतिहासिक महत्व

 

गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य ने भारतीय कला को स्थायित्व, संतुलन और आध्यात्मिक गहराई प्रदान की। गर्भगृह, मण्डप, प्रदक्षिणा-पथ और शिखर जैसी स्थापत्य अवधारणाएँ इसी काल में स्पष्ट रूप से विकसित हुईं, जो आगे चलकर मध्यकालीन भारतीय मंदिर स्थापत्य का आधार बनीं। इस दृष्टि से गुप्तकालीन कला केवल एक युग की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य परंपरा का निर्णायक चरण सिद्ध होती है।

 

गुप्तकालीन कला में स्तूप परंपरा का स्थान

 

यद्यपि गुप्तकालीन कला में मंदिर स्थापत्य का महत्व सर्वोपरि रहा, फिर भी इस युग में बौद्ध स्तूप परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसके विपरीत, कुछ प्रमुख स्तूपों का निर्माण अथवा पुनर्निर्माण गुप्त सम्राटों के काल में ही सम्पन्न हुआ। इनमें सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण सारनाथ का धमेख स्तूप है।

 

धमेख स्तूप और बौद्ध स्थापत्य की निरंतरता

धमेख स्तूप लगभग 128 फुट ऊँचा है और इसका निर्माण समतल धरातल पर, बिना किसी ऊँचे चबूतरे के किया गया। इसके बाह्य भाग पर मूर्तियाँ रखने के लिए बने ताख तथा ज्यामितीय अलंकरण गुप्तकालीन स्थापत्य की सादगी और अनुशासन को दर्शाते हैं। इसी प्रकार राजगृह स्थित ‘जरासंध की बैठक’ को भी गुप्तकालीन स्तूप स्थापत्य से संबद्ध माना जाता है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि गुप्त काल में बौद्ध स्थापत्य पूरी तरह उपेक्षित नहीं था, बल्कि उसे सीमित किन्तु संरक्षित संरक्षण प्राप्त था।

 

गुप्तकालीन गुहा-स्थापत्य: शैलकला का धार्मिक रूपांतरण

 

गुप्तकालीन कला में गुहा-स्थापत्य का विकास एक विशिष्ट चरण को दर्शाता है। इस काल की गुफाएँ दो प्रमुख धार्मिक परंपराओं ब्राह्मण और बौद्ध से संबंधित हैं। गुहा स्थापत्य में अब केवल निवास या ध्यान स्थल नहीं, बल्कि पूजास्थल और धार्मिक प्रतीक प्रमुख हो जाते हैं।

 

उदयगिरि की गुफाएँ और शैव-वैष्णव परंपरा

विदिशा के समीप स्थित उदयगिरि की गुफाएँ इस परिवर्तन का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। यहाँ की गुफाएँ भागवत और शैव धर्म से संबंधित हैं। उदयगिरि पहाड़ी से प्राप्त चन्द्रगुप्त द्वितीय के विदेश सचिव वीरसेन का लेख,
भक्त्या भगवता शम्भोः गुहामेकमकारयत्
इस तथ्य की पुष्टि करता है कि राज्य के उच्च अधिकारी भी धार्मिक स्थापत्य के संरक्षक थे।

 

वाराह प्रतिमा: धर्म और राज्य का प्रतीक

उदयगिरि की सबसे प्रसिद्ध वाराह गुफा में विष्णु के वाराह अवतार की विशाल प्रतिमा उत्कीर्ण है, जिसमें वे पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाए हुए दिखाए गए हैं। प्रतिमा के पार्श्व भागों में गंगा और यमुना की आकृतियाँ उनके वाहनों सहित उत्कीर्ण हैं। यह मूर्ति केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में राज्य-संरक्षण और धर्म की वैचारिक अभिव्यक्ति भी है। इन गुफाओं में चौकोर, सादे गर्भगृह और उनके सामने स्तम्भों पर टिके छोटे मण्डप मिलते हैं। द्वार-स्तम्भों पर नदी-देवताओं और द्वारपालों की मूर्तियाँ गुप्तकालीन कला की स्थापत्य-मूर्तिकला समन्वय परंपरा को दर्शाती हैं।

 

बौद्ध गुहा स्थापत्य: अजन्ता और बाघ की परंपरा

 

गुप्तकाल में बौद्ध गुहा स्थापत्य का सबसे समृद्ध विकास अजन्ता और बाघ की गुफाओं में देखने को मिलता है। अजन्ता में कुल 29 गुफाएँ हैं, जिनमें चार चैत्यगृह और शेष विहार हैं। इनका निर्माण ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक हुआ।

अजन्ता की गुफाओं में से 16वीं, 17वीं और 19वीं गुफाएँ गुप्तकालीन मानी जाती हैं। इन गुफाओं में चट्टान को तराशकर स्तूप बनाए गए हैं, जिनके ऊपर हर्मिका और छत्र मिलते हैं। यहाँ बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियों के साथ-साथ यक्ष-यक्षिणी और नाग प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण हैं। यह दर्शाता है कि गुप्तकालीन कला में बौद्ध धर्म के साथ लोक-आस्थाओं का भी समावेश बना रहा, जैसा कि फाहियान की भारत यात्रा से भी स्पष्ट होता है।

इसी परंपरा का विस्तार मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित बाघ पहाड़ी की गुफाओं में देखने को मिलता है। यहाँ नौ गुफाएँ हैं, जिनमें से कुछ गुप्तकालीन हैं। बाघ की गुफाएँ भी बौद्ध धर्म से संबंधित हैं, किंतु यहाँ स्थापत्य अपेक्षाकृत सरल है और चित्रकला अधिक प्रमुख भूमिका निभाती है।

 

अजन्ता की मरणासन्न राजकुमारी, गुप्तकालीन कला का भावात्मक चित्र
अजन्ता गुफाओं का ‘मरणासन्न राजकुमारी’ चित्र गुप्तकालीन कला में मानवीय करुणा और भावात्मक अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण है।

गुप्तकालीन चित्रकला: अजन्ता का उत्कर्ष

 

वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में, गुप्तकाल में चित्रकला अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुकी थी। गुप्तकाल से पूर्व चित्रकला के उदाहरण सीमित हैं, मुख्यतः प्रागैतिहासिक गुफाओं और कुछ प्रारम्भिक गुहा मंदिरों तक। किंतु गुप्त युग में आते-आते चित्रकला तकनीकी और भावात्मक दोनों स्तरों पर परिपक्व हो चुकी थी। 1819 ई० में मद्रास सेना के कुछ यूरोपीय सैनिकों ने इन गुफाओं की खोज की थी। 1824 ई० में जनरल सर जेम्स अलेक्जेंडर ने रायल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में प्रथम बार इनका विवरण प्रकाशित कर संसार को अजन्ता के दुर्लभ चित्रों की जानकारी दी।

अजन्ता में पहले 29 गुफाओं में चित्र बने थे परन्तु अब केवल छह गुफाओं (1-2, 9-10 तथा 16-17) के चित्र अवशिष्ट हैं। इनका समय अलग-अलग है। नौवीं-दसवीं गुफाओं के चित्र प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। पहली-दूसरी गुफाओं के चित्र सातवीं शताब्दी ईस्वी के हैं तथा दसवीं गुफा के स्तम्भों पर अंकित चित्र एवं सोलहवीं-सत्रहवीं गुफाओं के भित्ति चित्र गुप्तकालीन हैं। गुप्तकालीन चित्र अत्युत्कृष्ट हैं।

 

चित्रकला की तकनीक: फ्रेस्को और टेम्पेरा

अजन्ता की गुफाएँ गुप्तकालीन चित्रकला का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। यहाँ चित्र फ्रेस्को और टेम्पेरा दोनों विधियों से बनाए गए। फ्रेस्को में गीले प्लास्टर पर शुद्ध रंगों का प्रयोग किया जाता था, जबकि टेम्पेरा विधि में सूखे प्लास्टर पर रंगों के साथ अंडे की सफेदी और चूने का मिश्रण किया जाता था। दीवारों पर चित्रांकन से पूर्व शंखचूर्ण, शिलाचूर्ण, सिता मिश्री, गोबर और चोकर से तैयार गाढ़ा लेप चढ़ाया जाता था। चित्र बनाने के पूर्व दीवार को भली-भाँति रगड़ कर साफ करते थे तथा फिर उसके ऊपर लेप चढ़ाया जाता था। चित्र का खाका बनाने के लिये लाल खड़िया का प्रयोग होता था। रंगों में लाल, पीला, नीला, काला तथा सफेद रंग प्रयोग में लाए जाते थे।

 

जातक कथाएँ और भावात्मक अभिव्यक्ति

चित्रों के विषय मुख्यतः तीन प्रकार के हैं – अलंकरण, चित्रण और वर्णन। फूल-पत्तियों, वृक्षों और पशु-आकृतियों से अलंकरण किया गया; बुद्ध और बोधिसत्वों का चित्रण हुआ; तथा जातक कथाओं को वर्णनात्मक दृश्यों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

 

मरणासन्न राजकुमारी: मानवीय करुणा का शिखर

16वीं गुफा का ‘मरणासन्न राजकुमारी’ चित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पति के विरह में मरणासन्न राजकुमारी और उसके चारों ओर शोकाकुल परिवार, यह दृश्य करुणा और मानवीय संवेदना की अद्भुत अभिव्यक्ति है। ग्रिफिथ, बर्गेस और फार्गुसन जैसे विद्वानों ने इसे चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय बताया है। इसी गुफा में बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण का चित्र है जिसमें वे अपनी पत्नी, पुत्र तथा परिचारिकाओं को छोड़कर जाते हुए दिखाए गए हैं। उनकी वैराग्य भावना दर्शनीय है।

17वीं गुफा को ‘चित्रशाला’ कहा गया है। यहाँ बुद्ध के जन्म, महाभिनिष्क्रमण और महापरिनिर्वाण से संबंधित दृश्य अंकित हैं। ‘माता और शिशु’ चित्र में करुणा और आत्मोत्सर्ग की भावना अत्यंत सजीव है। जिसमें सम्भवतः बुद्ध की पत्नी अपने पुत्र को उन्हें समर्पित कर रही है। इस चित्र को देखने से सहानुभूति एवं करुणा टपकती है। हैवेल महोदय ने तो इस चित्र को जावा के बोरोबुदुर से प्राप्त बौद्ध कला की समकक्षता में रखना पसन्द किया है। बुद्ध के जीवन से सम्बन्ध रखने वाले चित्रों में उनके महाभिनिष्क्रमण का एक चित्र अत्यन्त सजीवता के साथ उत्कीर्ण किया गया है। इसमें युवक सिद्धार्थ के सिर पर मुकुट है तथा शरीर सुडौल है। आँखों से अहिंसा, शान्ति एवं वैराग्य टपक रहा है। मुखमुद्रा गम्भीर एवं सांसारिकता से उदासीन प्रतीत होती है। निवेदिता के शब्दों में “यह चित्र शायद बुद्ध का महानतम कलात्मक प्रदर्शन है जिसे संसार ने कभी देखा है”।

 

बाघ की चित्रकला: लौकिक जीवन की अभिव्यक्ति

 

सर्वप्रथम 1818 ईस्वी में बाघ गुफाओं का पता डेंजर फील्ड ने लगाया था। इन गुफाओं की संख्या नौ है जिनमें चौथी-पाँचवीं गुफाओं के भित्ति-चित्र सबसे अधिक सुरक्षित अवस्था में हैं। अजन्ता के विपरीत, बाघ की गुफाओं की चित्रकला में धार्मिक विषयों की अपेक्षा लौकिक जीवन अधिक प्रमुख है। यहाँ संगीत, नृत्य और दैनिक जीवन के दृश्य अत्यंत जीवंत रूप में चित्रित किए गए हैं। स्त्री-पुरुषों को अलंकृत वेश-भूषा में वाद्यों के साथ नृत्य करते हुए दिखाया गया है।

मार्शल के अनुसार, बाघ के चित्र जीवन की केवल घटनाओं को नहीं, बल्कि उन भावों को प्रकट करते हैं जिन्हें व्यक्त करना उच्च कला का लक्ष्य होता है। इस प्रकार बाघ की चित्रकला गुप्तकालीन कला के मानवीय और सामाजिक पक्ष को उजागर करती है।

 

गुप्तकालीन मूर्तिकला: आध्यात्मिक सौम्यता का शास्त्रीय रूप

 

गुप्तकालीन कला का सबसे परिष्कृत और प्रभावशाली रूप उसकी मूर्तिकला में दिखाई देता है। यदि स्थापत्य ने धार्मिक जीवन को स्थायित्व दिया, तो मूर्तिकला ने उसे आत्मिक गहराई और भावात्मक पूर्णता प्रदान की। गुप्तकालीन मूर्तिकारों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने कुषाणकालीन यथार्थवादी नग्नता और पूर्ववर्ती प्रतीकात्मक रूढ़ियों के बीच एक संतुलित समन्वय स्थापित किया।

इस संतुलन का परिणाम यह हुआ कि गुप्तकालीन मूर्तियों में न तो शारीरिक प्रदर्शन प्रमुख है और न ही अतिशय प्रतीकात्मकता। इसके स्थान पर आध्यात्मिक गरिमा, शालीनता और आंतरिक शांति का भाव सर्वत्र विद्यमान है। यही कारण है कि समुद्रगुप्त की उपलब्धियों के काल में विकसित गुप्तकालीन कला को भारतीय मूर्तिकला की शास्त्रीय परंपरा का सर्वोच्च चरण माना जाता है।

 

बुद्ध मूर्तियाँ: करुणा और निर्वाण की मूर्त अभिव्यक्ति

 

गुप्तकालीन मूर्तिकला में बुद्ध प्रतिमाओं का स्थान विशेष है। यद्यपि इस काल में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ अधिक संख्या में निर्मित हुईं, फिर भी बुद्ध मूर्तियों में गुप्त कलाकारों की कलात्मक परिपक्वता सर्वाधिक स्पष्ट दिखाई देती है। इन मूर्तियों में गंधार शैली का प्रभाव लगभग पूर्णतः समाप्त हो चुका है और एक विशुद्ध भारतीय अभिव्यक्ति उभरकर सामने आती है। गुप्तकाल की तीन बुद्ध मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – सारनाथ, मथुरा और सुल्तानगंज से प्राप्त प्रतिमाएँ।

 

सारनाथ बुद्ध प्रतिमा: आध्यात्मिक शांति

सारनाथ की बुद्ध मूर्ति लगभग 2 फुट साढ़े 4 इंच ऊँची है और पद्मासन में स्थित बुद्ध को धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में दर्शाती है। उनके सिर पर अलंकृत प्रभामंडल, घुँघराले बाल, लम्बे कान और नासिका-अग्र पर टिकी दृष्टि एक गहन आध्यात्मिक अनुभूति उत्पन्न करती है। कलाकार ने बुद्ध के शांत, निःस्पृह और ध्यानमग्न भाव को अत्यंत सफलता से मूर्त रूप दिया है। इसकी सौम्य मुस्कान और आध्यात्मिक गरिमा भारतीय कला की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाती है।

 

मथुरा और सुल्तानगंज: शैलीगत विविधता

मथुरा की गुप्तकालीन बुद्ध मूर्तियाँ खड़ी मुद्रा में हैं और लगभग 7 फुट ढाई इंच ऊँची हैं। इन प्रतिमाओं में संघाटि कंधों पर लिपटी हुई है, प्रभामंडल गोल और अलंकृत है तथा मुखमुद्रा में गम्भीर शांति का भाव दिखाई देता है। कुषाणकालीन प्रभाव से मुक्त ये मूर्तियाँ गुप्तकालीन कला की स्वतंत्र पहचान को रेखांकित करती हैं।

पाषाण के अतिरिक्त धातु मूर्तिकला का भी इस काल में विकास हुआ। सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्रनिर्मित बुद्ध मूर्ति, जो लगभग साढ़े सात फुट ऊँची है, इस परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण है। बुद्ध का दायाँ हाथ अभयमुद्रा में है और बायाँ हाथ संघाटि को थामे हुए है। मूर्ति की सजीवता और संतुलित अनुपात गुप्तकालीन कला की तकनीकी दक्षता और भावात्मक परिपक्वता दोनों को प्रकट करते हैं।

 

वैष्णव मूर्तिकला: राज्य, धर्म और प्रतीकात्मक शक्ति

 

गुप्त शासक वैष्णव मत के पोषक थे और इसका सीधा प्रभाव गुप्तकालीन कला की मूर्तिकला पर पड़ा। इस काल में विष्णु की बहुसंख्यक प्रतिमाओं का निर्माण हुआ, जिसका उल्लेख तत्कालीन साहित्य और अभिलेखों में भी मिलता है। भितरी लेख से ज्ञात होता है कि स्कन्दगुप्त के समय भगवान शङ्गिण (विष्णु) की प्रतिमा स्थापित की गई थी।

 

विष्णु प्रतिमाएँ और राजकीय संरक्षण

गुप्तकालीन विष्णु मूर्तियाँ सामान्यतः चतुर्भुजी हैं। इनके सिर पर मुकुट, गले में हार, भुजाओं में केयूर और कानों में कुण्डल अंकित हैं। इन प्रतिमाओं में शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर संयमित ऐश्वर्य और सौम्य गरिमा दिखाई देती है। देवगढ़, मथुरा और एरण से प्राप्त विष्णु मूर्तियाँ इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

 

देवगढ़ दशावतार मंदिर की विष्णु प्रतिमा, गुप्तकालीन कला
देवगढ़ के दशावतार मंदिर में उत्कीर्ण विष्णु शिल्प गुप्तकालीन कला में वैष्णव मूर्तिकला की परिपक्व अभिव्यक्ति को दर्शाता है।

वाराह अवतार: उद्धार और सत्ता का प्रतीक

विशेष रूप से देवगढ़ के दशावतार मंदिर से प्राप्त शेषशायी विष्णु की प्रतिमा उल्लेखनीय है, जिसमें विष्णु को शेषनाग पर विश्राम करते हुए दिखाया गया है। उनके शरीर पर अलंकरण संतुलित हैं और संपूर्ण रचना में एक दिव्य शांति व्याप्त है।

इस काल में विष्णु के वाराह अवतार की विशाल मूर्तियाँ भी निर्मित की गईं। उदयगिरि से प्राप्त वाराह प्रतिमा में विष्णु पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाए हुए हैं। प्रतिमा के पार्श्व भागों में गंगा और यमुना की आकृतियाँ उनके वाहनों सहित उत्कीर्ण हैं। यह मूर्ति केवल पौराणिक कथा का चित्रण नहीं, बल्कि राज्य-संरक्षण और धर्म के उद्धारक स्वरूप की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। बाशम के शब्दों में, इस प्रतिमा की गम्भीर भावना इसे विश्व कला में एक अद्वितीय स्थान प्रदान करती है।

 

शैव मूर्तिकला और मुखलिंग परंपरा

 

विष्णु मूर्तियों के साथ-साथ गुप्तकालीन कला में शैव मूर्तिकला का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इस काल की शैव प्रतिमाओं में विशेष रूप से मुखलिंग परंपरा का विकास हुआ। करमदण्डा से प्राप्त चतुर्मुखी और खोह तथा भूमरा से प्राप्त एकमुखी शिवलिंग इस परंपरा के उल्लेखनीय उदाहरण हैं।

इन मुखलिंगों में शिव को ध्यानावस्थित रूप में दर्शाया गया है। जटा-जूट, रुद्राक्ष माला, कुण्डल और जटा पर विराजमान अर्धचन्द्र शिव के तपस्वी स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। अधखुले नेत्र और होंठों पर मन्द मुस्कान शैव मूर्तिकला में आध्यात्मिक अंतर्मुखता को दर्शाती है। इन प्रतिमाओं में शक्ति या उग्रता नहीं, बल्कि शांति और वैराग्य का भाव प्रधान है, जो गुप्तकालीन कला की मूल आत्मा को प्रतिबिंबित करता है।

 

गुप्तकालीन मृण्मूर्ति कला: लोकधर्म और लोकप्रिय आस्था

 

गुप्तकालीन कला केवल राजकीय संरक्षण या मंदिरों तक सीमित नहीं थी। इस काल में मृण्मूर्ति कला का भी व्यापक विकास हुआ, जिसने धार्मिक विचारों को सामान्य जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पकी हुई मिट्टी से निर्मित छोटी-छोटी मूर्तियाँ चिकनी, सुडौल और सुलभ थीं।

विष्णु, कार्तिकेय, दुर्गा, गंगा और यमुना की मृण्मूर्तियाँ पहाड़पुर, राजघाट, भीटा, कौशाम्बी, श्रावस्ती, पवैया, अहिच्छत्र और मथुरा जैसे स्थलों से प्राप्त हुई हैं। इन धार्मिक प्रतिमाओं के साथ-साथ अनेक लौकिक मूर्तियाँ भी मिली हैं, जो तत्कालीन समाज के दैनिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं।

विशेष रूप से पहाड़पुर से प्राप्त कृष्ण-लीला से संबंधित मूर्तियाँ और श्रावस्ती से मिली यशोदा-कृष्ण-बलराम की संभावित आकृति लोकधर्म की लोकप्रियता को दर्शाती हैं। अहिच्छत्र से प्राप्त पार्वती के सुंदर सिर और गंगा-यमुना की मृण्मूर्तियाँ शिल्प की परिष्कृत संवेदना को प्रकट करती हैं। न सुलभ मूर्तियों ने गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में पौराणिक हिन्दू धर्म को लोकव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

मूर्तिकला परंपरा का ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

इस प्रकार गुप्तकालीन कला की मूर्तिकला में बुद्ध, विष्णु और शिव, तीनों परंपराओं का संतुलित और परिष्कृत विकास दिखाई देता है। यहाँ शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर आध्यात्मिक गरिमा, भद्रता और सौम्यता प्रमुख है। यही गुण गुप्तकालीन मूर्तिकला को न केवल अपने पूर्ववर्ती काल से भिन्न बनाते हैं, बल्कि आगे आने वाली मध्यकालीन भारतीय कला परंपरा के लिए भी मानक स्थापित करते हैं।

 

गुप्तकालीन कला: भारतीय कला परंपरा में निर्णायक मोड़

 

यदि भारतीय कला के दीर्घ इतिहास को समग्र रूप में देखा जाए, तो गुप्तकालीन कला केवल एक समृद्ध चरण नहीं, बल्कि एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आती है। मौर्य और शुंग-कुषाण काल की प्रयोगशीलता के बाद गुप्त युग में कला एक ऐसी अवस्था तक पहुँचती है, जहाँ रूप, भाव और प्रतीक, तीनों में संतुलन स्थापित हो जाता है। यही संतुलन गुप्त कला को “शास्त्रीय” बनाता है।

इस काल में कला का उद्देश्य न तो केवल यथार्थ चित्रण रह जाता है और न ही अतिशय अलंकरण। इसके स्थान पर कला आध्यात्मिक अनुभव की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। मंदिरों का सुव्यवस्थित स्थापत्य, मूर्तियों की सौम्य गरिमा और चित्रकला की भावप्रवण कथात्मकता, ये सभी मिलकर गुप्तकालीन कला को भारतीय सांस्कृतिक चेतना की सर्वाधिक परिपक्व अभिव्यक्ति बनाते हैं।

 

धर्म, राज्य और कला का अंतर्संबंध

 

गुप्तकालीन कला की एक मौलिक विशेषता यह है कि इसमें धर्म और राज्य के बीच गहरा अंतर्संबंध दिखाई देता है। वैष्णव धर्म के संरक्षण के बावजूद गुप्त शासकों ने बौद्ध और शैव परंपराओं को भी पर्याप्त स्थान दिया। यही कारण है कि इस काल में विष्णु, बुद्ध और शिव, तीनों की मूर्तियाँ समान कलात्मक परिष्कार के साथ निर्मित होती हैं।

उदयगिरि की वाराह प्रतिमा या देवगढ़ के दशावतार मंदिर जैसे उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि धार्मिक प्रतीक केवल आस्था का विषय नहीं थे, बल्कि राज्य की वैचारिक शक्ति और संरक्षण नीति के भी प्रतीक थे। दूसरी ओर अजन्ता और बाघ की गुफाएँ यह दर्शाती हैं कि बौद्ध कला भी इस काल में केवल जीवित ही नहीं रही, बल्कि अपनी सर्वोच्च कलात्मक ऊँचाई तक पहुँची।

 

शिल्पकार, तकनीक और कलात्मक चेतना

 

गुप्तकालीन कला की उत्कृष्टता केवल शासकीय संरक्षण का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे शिल्पकारों की उच्च तकनीकी दक्षता और विकसित कलात्मक चेतना भी कार्यरत थी। चाहे मंदिर स्थापत्य में गर्भगृह-मण्डप-शिखर की संरचना हो, मूर्तिकला में अनुपात और भाव-संतुलन हो, या चित्रकला में फ्रेस्को-टेम्पेरा तकनीक, हर क्षेत्र में तकनीक और सौंदर्य का संतुलन स्पष्ट दिखाई देता है।

विशेष रूप से मूर्तिकला में यह संतुलन सर्वोच्च स्तर पर पहुँच जाता है। बुद्ध प्रतिमाओं की शांत मुखमुद्रा, विष्णु की संयमित ऐश्वर्यपूर्ण आकृति और शिव के मुखलिंगों की ध्यानमग्न अंतर्मुखता, ये सभी गुप्तकालीन कला की उस प्रवृत्ति को दर्शाते हैं, जहाँ बाह्य भव्यता से अधिक आंतरिक अनुभूति को महत्व दिया गया।

 

लोक और शास्त्र का समन्वय

 

गुप्तकालीन कला की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका लोक और शास्त्र के बीच सेतु बनना है। जहाँ एक ओर देवगढ़, भीतरगाँव और अजन्ता जैसी कृतियाँ राजकीय संरक्षण और शास्त्रीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं, वहीं दूसरी ओर मृण्मूर्ति कला सामान्य जन-जीवन और लोकधर्म को अभिव्यक्त करती है।

पकी हुई मिट्टी से बनी छोटी मूर्तियाँ कृष्ण-लीला, यशोदा-बालकृष्ण, गंगा-यमुना यह दर्शाती हैं कि धार्मिक विचार केवल अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं थे। गुप्तकालीन कला ने धर्म को दृश्य, सुलभ और लोकव्यापी बनाया, जिससे पौराणिक हिंदू धर्म को व्यापक सामाजिक आधार प्राप्त हुआ।

 

उत्तरवर्ती भारतीय कला पर गुप्तकालीन प्रभाव

 

गुप्तकालीन कला का प्रभाव इस युग तक सीमित नहीं रहा। इसके स्थापत्य सिद्धांतों ने आगे चलकर नागर शैली के मंदिरों को जन्म दिया, मूर्तिकला के मानकों ने मध्यकालीन प्रतिमा परंपरा को दिशा दी और अजन्ता की चित्रकला ने भारतीय भित्ति चित्रण की एक स्थायी परंपरा स्थापित की।

मध्यकालीन मंदिरों की शिखर योजना, देवमूर्ति की मुद्रा और अलंकरण, तथा धार्मिक कथाओं का स्थापत्य और चित्रकला में प्रयोग, इन सभी में गुप्तकालीन कला की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। इस अर्थ में गुप्त कला भारतीय कला परंपरा की नींव और मानक दोनों है।

 

निष्कर्ष

 

इस प्रकार गुप्त वंश के इतिहास के स्रोतों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि गुप्तकालीन कला केवल एक “स्वर्ण युग” की सजावटी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय कला की आत्मा को परिभाषित करने वाला चरण थी। इस काल में कला ने धर्म, समाज और राज्य, तीनों के साथ संतुलित संवाद स्थापित किया। यही कारण है कि गुप्तकालीन कला न केवल अपने समय की प्रतिनिधि थी, बल्कि आने वाली सदियों के लिए भी भारतीय कला की कसौटी बन गई।

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top