स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां: हूण आक्रमण से गुप्त साम्राज्य की रक्षा

स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां: काल, राज्यारोहण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य जिस संक्रमणकाल से गुज़र रहा था, उसी दौर में स्कन्दगुप्त का राज्यारोहण हुआ। जूनागढ़ अभिलेख में उसके शासन की प्रथम तिथि गुप्त संवत् 136 (455 ईस्वी) उत्कीर्ण मिलती है, जबकि गढ़वा अभिलेख तथा उसकी चाँदी की मुद्राओं में अंतिम तिथि गुप्त संवत् 148 (467 ईस्वी) दी हुई है। इन साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि स्कन्दगुप्त ने लगभग बारह वर्षों तक शासन किया।

यद्यपि यह अवधि कालक्रम की दृष्टि से अधिक दीर्घ नहीं थी, परन्तु राजनीतिक संकट, बाह्य आक्रमण और प्रशासनिक चुनौतियों की दृष्टि से यह वही संदर्भ है जिसे समझने के लिए गुप्त वंश के इतिहास के स्रोत अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वास्तव में स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां केवल सैन्य सफलताओं तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे उस संघर्षपूर्ण युग की प्रतिक्रिया थीं जिसमें गुप्त साम्राज्य का अस्तित्व ही दाँव पर लगा हुआ था।

स्कन्दगुप्त का रजत सिक्का और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां
स्कन्दगुप्त का रजत सिक्का

उत्तराधिकार का प्रश्न और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियों की पृष्ठभूमि

 

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार का प्रश्न विद्वानों के बीच अत्यन्त विवादास्पद रहा है, जिसे समझने के लिए कुमारगुप्त प्रथम का इतिहास विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होता है। कुछ इतिहासकारों, विशेषतः आर.सी. मजूमदार, ने यह मत प्रस्तुत किया है कि कुमारगुप्त का ज्येष्ठ पुत्र पुरुगुप्त ही गुप्त सिंहासन का वैध उत्तराधिकारी था तथा स्कन्दगुप्त ने किसी प्रकार के दायाद-युद्ध के माध्यम से सत्ता प्राप्त की।

यह विवाद केवल वंशावली का प्रश्न नहीं था, बल्कि उससे स्कन्दगुप्त की वैधता और उसके शासन के स्वरूप की व्याख्या जुड़ी हुई है। अतः इस प्रश्न की आलोचनात्मक समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।

 

उत्तराधिकार संघर्ष के समर्थन में प्रस्तुत तर्क

उत्तराधिकार-युद्ध की परिकल्पना के समर्थन में मुख्यतः तीन प्रकार के तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं,

पहला, भितरी अभिलेख में पुरुगुप्त की माता अनन्तदेवी को ‘महादेवी’ कहा गया है, जबकि स्कन्दगुप्त के अभिलेखों में उसकी माता का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त पुरुगुप्त को कुमारगुप्त का ‘तत्पादानुध्यात’ कहा गया है, जो कुछ विद्वानों के अनुसार उसके तात्कालिक उत्तराधिकारी होने का संकेत है।

दूसरा, स्कन्दगुप्त के भितरी लेख में वर्णित वह श्लोक जिसमें कहा गया है कि पिता की मृत्यु के बाद वंशलक्ष्मी चंचल हो गई और स्कन्दगुप्त ने अपने बाहुबल से उसे पुनः प्रतिष्ठित किया। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि राजपरिवार में संघर्ष हुआ था।

तीसरा, जूनागढ़ अभिलेख में उल्लिखित वह प्रसिद्ध पंक्ति,
व्यपेत्य सर्वान् मनुजेन्द्रपुत्रान् लक्ष्मी स्वयं यं वरयाञ्चकार”
जिसका अर्थ यह निकाला गया कि स्कन्दगुप्त को लक्ष्मी ने अन्य राजकुमारों को त्यागकर चुना, अर्थात् वह स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं था। इसी व्याख्या से लक्ष्मी-प्रकार की स्वर्ण मुद्राओं को भी जोड़ा गया है।

 

उत्तराधिकार-युद्ध सिद्धान्त की आलोचनात्मक समीक्षा

यदि उपर्युक्त तर्कों की गहन समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे निर्णायक नहीं हैं। स्कन्दगुप्त की माता का अभिलेखों में उल्लेख न होना अथवा ‘महादेवी’ उपाधि का अभाव, अपने आप में उसके अवैध उत्तराधिकारी होने का प्रमाण नहीं है। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ शासकों की माताओं का न तो उल्लेख हुआ और न ही ‘महादेवी’ की उपाधि प्रयुक्त हुई, परन्तु इससे उनके उत्तराधिकार पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।

इसी प्रकार ‘तत्पादानुध्यात’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘पिता के चरणों का ध्यान करने वाला’ है। यह पितृभक्ति का द्योतक है, न कि अनिवार्य रूप से उत्तराधिकार का। यह उपाधि केवल राजकुमारों तक सीमित नहीं थी; प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा भी इसका प्रयोग किया जाता था।

भितरी लेख में जिन शत्रुओं का उल्लेख हुआ है, वे वस्तुतः बाह्य शत्रु थे, विशेषतः पुष्यमित्र और हूण। यदि ये शत्रु आन्तरिक होते, तो वंशलक्ष्मी के ‘चंचल’ होने की व्याख्या ही असंगत हो जाती। अतः इस श्लोक को राजपरिवार के गृह-युद्ध से जोड़ना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता।

जहाँ तक जूनागढ़ लेख में लक्ष्मी-वरण का प्रश्न है, यह भारतीय प्रशस्ति-परम्परा का एक काव्यात्मक अलंकार है। इसी प्रकार के उल्लेख हमें हर्षचरित और अन्य अभिलेखों में भी मिलते हैं। इससे अधिक से अधिक यही निष्कर्ष निकलता है कि स्कन्दगुप्त अपने भाइयों में सर्वाधिक योग्य था और उसे इसी कारण उत्तराधिकारी चुना गया।

 

उत्तराधिकार विवाद और उसके ऐतिहासिक निहितार्थ

 

इस प्रकार उत्तराधिकार का प्रश्न पूर्णतः स्पष्ट नहीं होते हुए भी इतना निर्विवाद है कि स्कन्दगुप्त के शासन के प्रारम्भिक वर्ष अशान्ति से भरे हुए थे। चाहे यह अशान्ति आन्तरिक हो या बाह्य, गुप्त साम्राज्य एक गहरे संकट से गुजर रहा था।

यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें स्कन्दगुप्त को न केवल अपने अधिकार को स्थापित करना था, बल्कि साम्राज्य को बाह्य आक्रमणों से भी बचाना था। उसकी आगे की उपलब्धियां विशेषतः हूणों के विरुद्ध संघर्ष इसी प्रारम्भिक अस्थिरता की स्वाभाविक परिणति थीं। इस दृष्टि से देखा जाए तो स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत पराक्रम का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि वे उस युग के राजनीतिक यथार्थ की प्रतिक्रिया भी हैं, जिसमें योग्यता और शक्ति ही वैधता का वास्तविक आधार बन चुकी थी।

 

हूण आक्रमण और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां

 

कुमारगुप्त प्रथम के उत्तरार्द्ध और स्कन्दगुप्त के राज्यारोहण के समय गुप्त साम्राज्य जिस बाह्य संकट से जूझ रहा था, वह पूर्ववर्ती सभी खतरों की तुलना में कहीं अधिक भयावह था। यह संकट हूणों के प्रथम भारतीय आक्रमण के रूप में प्रकट हुआ। वस्तुतः यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जहाँ स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां गुप्त साम्राज्य के अस्तित्व से सीधे जुड़ जाती हैं।

हूण मध्य एशिया की एक युद्धप्रिय एवं अर्ध-घुमंतू जाति थे। जनसंख्या-वृद्धि, चरागाहों की कमी और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण वे अपने मूल निवास-क्षेत्रों से निकलकर नये भूभागों की ओर बढ़े। कालान्तर में उनकी दो प्रमुख शाखाएँ बनीं, पश्चिमी और पूर्वी। पश्चिमी हूण यूरोप की ओर बढ़े और रोम साम्राज्य को गहरे संकट में डाल दिया, जबकि पूर्वी हूण मध्य एशिया से आगे बढ़ते हुए भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं तक पहुँच गये।

 

हूणों का भारत की ओर बढ़ना और आक्रमण की पृष्ठभूमि

 

पूर्वी हूणों ने पहले ऑक्सस नदी घाटी में अपना प्रभाव स्थापित किया। इसके पश्चात् उन्होंने ईरान के ससानी शासकों पर दबाव बनाया। पू. एन. राय के अनुसार, भारत पर आक्रमण करने वाला हूण नेता तोरमाण (खूशनेवाज) था, जिसने ईरान में सफलता प्राप्त करने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप की ओर रुख किया।

यह आक्रमण किसी सीमित लूट-पाट का प्रयास नहीं था, बल्कि एक संगठित सैन्य धावा था, जिसने गुप्त साम्राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को गम्भीर चुनौती दी। स्कन्दगुप्त के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में ही यह संकट उत्पन्न हो गया, जिससे उसकी शासन-क्षमता की वास्तविक परीक्षा हुई।

भितरी स्तम्भ अभिलेख और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां
भितरी स्तम्भ अभिलेख, जिसमें हूणों पर विजय और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां अभिलेखीय रूप में दर्ज हैं।

हूणों के विरुद्ध युद्ध: भितरी अभिलेख का साक्ष्य

 

हूण आक्रमण की भीषणता का सबसे प्रामाणिक विवरण भितरी स्तम्भलेख में प्राप्त होता है। इस अभिलेख के अनुसार, जब स्कन्दगुप्त हूणों से युद्ध करने के लिए युद्ध-भूमि में उतरा, तो,

उसकी भुजाओं के प्रताप से पृथ्वी काँप उठी और युद्ध-क्षेत्र में भीषण आवर्त उत्पन्न हो गया।”

यह वर्णन न केवल युद्ध की तीव्रता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष सामान्य सीमांत झड़प नहीं, बल्कि निर्णायक साम्राज्यात्मक युद्ध था। दुर्भाग्यवश, हमें इस युद्ध का क्रमबद्ध सैन्य विवरण उपलब्ध नहीं होता, परन्तु परिणाम के विषय में कोई संदेह नहीं रह जाता।

 

हूणों की पराजय और उसके ऐतिहासिक प्रमाण

 

स्कन्दगुप्त द्वारा हूणों की पराजय का स्पष्ट संकेत जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होता है। इस अभिलेख में हूणों को ‘म्लेच्छ’ कहा गया है और यह उल्लेख मिलता है कि पराजय के पश्चात् वे अपने देश लौटकर स्कन्दगुप्त की कीर्ति का गान करने लगे।

यह उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह सिद्ध होता है कि,

  • हूणों को केवल रोका नहीं गया
  • बल्कि उन्हें साम्राज्य की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया गया

म्लेच्छ-देश से तात्पर्य सम्भवतः गंधार अथवा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों से है, जहाँ पराजय के बाद हूणों ने शरण ली।

 

साहित्यिक साक्ष्य और परोक्ष प्रमाण

 

हूणों पर स्कन्दगुप्त की विजय का समर्थन केवल अभिलेखों तक सीमित नहीं है। साहित्यिक स्रोत भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।

चन्द्रगोमिन ने अपने व्याकरण में एक सूत्र दिया है,
अजयत जर्टी (गुप्तो) हूणान्”
अर्थात् ‘गुप्त (राजा) ने हूणों को जीता।’ विद्वानों का मत है कि यहाँ ‘जर्टी’ से तात्पर्य स्कन्दगुप्त से ही है।

इसी प्रकार सोमदेव के कथासरित्सागर में उज्जयिनी के राजा महेन्द्रादित्य के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा म्लेच्छों पर विजय का उल्लेख मिलता है। यहाँ महेन्द्रादित्य कुमारगुप्त तथा विक्रमादित्य स्कन्दगुप्त की ओर संकेत करता है। म्लेच्छों से तात्पर्य स्पष्टतः हूणों से ही है। इन सभी साक्ष्यों को संयुक्त रूप से देखने पर यह निष्कर्ष दृढ़ हो जाता है कि हूणों पर स्कन्दगुप्त की विजय ऐतिहासिक तथ्य है, न कि प्रशस्ति-काव्य की अतिशयोक्ति।

 

हूण युद्ध का स्थल: मत-मतान्तर और विवेचना

 

हूणों और स्कन्दगुप्त के बीच हुए युद्ध का स्थल निश्चित करना इतिहासकारों के लिए एक जटिल प्रश्न रहा है। भितरी लेख में प्रयुक्त ‘गाङ्गध्वनि’ शब्द के आधार पर कुछ विद्वानों ने यह मत प्रस्तुत किया कि यह युद्ध गंगा घाटी में लड़ा गया था।

बी. पी. सिन्हा का विचार है कि हूण गंगा के उत्तरी तट तक पहुँच गये थे और वहीं संघर्ष हुआ। किन्तु इस मत को सर्वसम्मति प्राप्त नहीं है। जगन्नाथ तथा डी. सी. सरकार ने ‘गाङ्गध्वनि’ के स्थान पर ‘सार्ङ्गध्वनि’ पाठ को अधिक उपयुक्त माना है, जिसका अर्थ धनुषों की टंकार से है। आर. पी. त्रिपाठी ने राजतरंगिणी के उदाहरणों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि ‘गाङ्गध्वनि’ का प्रयोग यहाँ युद्ध की भीषणता को रूपकात्मक रूप में व्यक्त करने के लिए किया गया है, न कि किसी भौगोलिक संकेत के रूप में।

 

संभावित युद्ध-क्षेत्र: उत्तर-पश्चिम या पश्चिमी भारत

 

आधुनिक इतिहासकारों में यह मत अधिक प्रचलित है कि हूण-युद्ध गुप्त साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी या पश्चिमी सीमा पर हुआ। अत्रेयी विश्वास तथा उपेन्द्र ठाकुर के अनुसार, यह संघर्ष या तो सतलज नदी के समीप अथवा पश्चिमी भारत के किसी क्षेत्र में हुआ होगा। जूनागढ़ अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि स्कन्दगुप्त पश्चिमी प्रान्त की सुरक्षा को लेकर विशेष रूप से चिन्तित था। इसी कारण उसने पर्णदत्त जैसे योग्य अधिकारी को सुराष्ट्र प्रान्त का राज्यपाल नियुक्त किया। यह तथ्य इस क्षेत्र में बाह्य आक्रमण के खतरे की ओर संकेत करता है।

इस प्रकार विभिन्न मतों का विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि हूणों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष पश्चिमी भारत अथवा उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हुआ, न कि गंगा घाटी में।

 

हूण-विजय और स्कन्दगुप्त की उपलब्धियों का ऐतिहासिक महत्व

 

हूणों को पराजित कर देश से बाहर खदेड़ देना निःसंदेह स्कन्दगुप्त की उपलब्धियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। यदि हम बाद के काल में भारत और ईरान में हूणों द्वारा किये गये विध्वंस को ध्यान में रखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि स्कन्दगुप्त की इस सफलता ने भारतीय उपमहाद्वीप को लगभग आधी शताब्दी तक एक भीषण संकट से बचाए रखा। स्कन्दगुप्त ने हूणों को सम्भवतः 460 ईस्वी के पूर्व ही पराजित कर दिया था, क्योंकि कहौम लेख (460 ईस्वी) तथा इसके बाद के इन्दौर और गढ़वा अभिलेखों से उसके शासनकाल में शान्ति और स्थिरता का संकेत मिलता है।

 

हूण आक्रमण और स्कन्दगुप्त की ऐतिहासिक भूमिका

 

इस प्रकार हूण आक्रमण केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि गुप्त साम्राज्य के भविष्य का प्रश्न था। स्कन्दगुप्त ने इस संकट का सफलतापूर्वक सामना कर न केवल अपने शासन की वैधता सिद्ध की, बल्कि गुप्त साम्राज्य को तत्कालीन विश्व की सबसे विध्वंसक शक्ति से सुरक्षित रखा। इसी कारण इतिहास में स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां विशेष रूप से हूण-विजय के संदर्भ में स्मरण की जाती हैं। यह उपलब्धि उसे गुप्त शासकों की महान परम्परा में अन्तिम निर्णायक रक्षक के रूप में स्थापित करती है।

 

अन्य सैन्य सफलताएँ और सीमांत सुरक्षा

 

हूणों के विरुद्ध निर्णायक विजय के अतिरिक्त भी स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां केवल एक युद्ध तक सीमित नहीं थीं। उसके शासनकाल में साम्राज्य की विभिन्न सीमाओं पर उत्पन्न चुनौतियों का सफल समाधान किया गया।

जूनागढ़ अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि स्कन्दगुप्त की गरुड़ध्वजांकित राजाज्ञा उन राजाओं का मर्दन करने वाली थी जो मान और दर्प से अपने फन उठाए हुए थे। इस कथन के आधार पर कुछ विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि स्कन्दगुप्त ने नागवंशी शासकों को पराजित किया था। यद्यपि इस विषय में कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तथापि यह कथन इतना अवश्य सूचित करता है कि उसके शासनकाल में साम्राज्य की सीमाओं पर विद्रोही और चुनौतीपूर्ण शक्तियाँ सक्रिय थीं, जिन्हें नियंत्रित किया गया।

इसी प्रकार यह भी प्रतीत होता है कि स्कन्दगुप्त की प्रारम्भिक राजनीतिक उलझनों का लाभ उठाकर दक्षिण से वाकाटकों ने गुप्त प्रदेशों में हस्तक्षेप किया। बालाघाट लेख में वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को कोशल, मेकल और मालवा का शासक बताया गया है। सम्भवतः कुछ समय के लिए मालवा क्षेत्र वाकाटकों के अधीन चला गया था, परन्तु स्कन्दगुप्त ने शीघ्र ही अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और जीवनपर्यन्त इस क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाए रखा। इस प्रकार वाकाटकों की यह चुनौती गुप्त साम्राज्य के लिए दीर्घकालिक संकट सिद्ध नहीं हुई।

 

साम्राज्य विस्तार नहीं, साम्राज्य संरक्षण की नीति

 

स्कन्दगुप्त की नीति उसके पूर्ववर्ती शासकों से इस अर्थ में भिन्न थी कि उसका लक्ष्य साम्राज्य का विस्तार नहीं, बल्कि पहले से प्राप्त भूभाग की रक्षा था। समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय जहाँ आक्रामक विस्तारवादी नीति के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं स्कन्दगुप्त का शासन एक रक्षात्मक साम्राज्य नीति का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

उसके अभिलेखों और सिक्कों के व्यापक प्रसार से यह स्पष्ट हो जाता है कि उसने अपने पिता और पितामह द्वारा स्थापित साम्राज्य को पूर्णतः अक्षुण्ण बनाए रखा। जूनागढ़ अभिलेख से सुराष्ट्र पर उसके अधिकार की पुष्टि होती है। उसकी रजत मुद्राओं के विभिन्न प्रकार गरुड़ प्रकार, वेदी प्रकार और नन्दी प्रकार इस तथ्य को दर्शाते हैं कि पश्चिमी, मध्य और काठियावाड़ क्षेत्र उसके प्रभाव क्षेत्र में थे। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में सुराष्ट्र तक फैले भूभाग पर उसका शासन स्थापित रहा। इस प्रकार स्कन्दगुप्त उत्तर भारत पर शासन करने वाला अन्तिम महान गुप्त सम्राट सिद्ध होता है।

 

प्रशासनिक व्यवस्था: स्कन्दगुप्त की उपलब्धियों का शासनात्मक पक्ष

 

स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं थीं। वह एक सक्षम और व्यावहारिक प्रशासक भी था। जिसकी शासन-प्रणाली को समझने में समुद्रगुप्त की प्रशासनिक व्यवस्था सहायक सिद्ध होती है। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि विशाल गुप्त साम्राज्य को प्रान्तों में विभाजित किया गया था, जिन्हें देश, अवनी अथवा विषय कहा जाता था। इन प्रान्तों का शासन ‘उपरिक’ नामक राज्यपालों द्वारा किया जाता था। इस प्रकार प्रशासनिक क्षेत्र में भी स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां उल्लेखनीय थीं।

 

पर्णदत्त और चक्रपालित: प्रशासनिक दक्षता का उदाहरण

सुराष्ट्र प्रान्त के राज्यपाल पर्णदत्त स्कन्दगुप्त के सबसे योग्य अधिकारियों में से एक था। जूनागढ़ अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि उसकी नियुक्ति स्कन्दगुप्त ने अत्यन्त विचार-विमर्श के बाद की थी। सम्भवतः इस क्षेत्र पर बाह्य आक्रमण का विशेष खतरा था, जिसके कारण वहाँ एक अनुभवी और विश्वासपात्र अधिकारी की आवश्यकता थी। सुराष्ट्र की राजधानी गिरनार का प्रशासन पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित के हाथों में था। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि स्कन्दगुप्त के शासनकाल में प्रशासनिक निरंतरता, योग्यता और उत्तरदायित्व को विशेष महत्व दिया जाता था।

 

लोकोपकारिता और जनकल्याण के कार्य

 

स्कन्दगुप्त एक प्रजावत्सल शासक था, जिसकी शासन-नीति का एक प्रमुख आधार जनकल्याण था। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में भारी वर्षा के कारण प्रसिद्ध सुदर्शन झील का बाँध टूट गया, जिससे सम्पूर्ण क्षेत्र में भारी संकट उत्पन्न हो गया। इस आपदा से निपटने के लिए चक्रपालित ने मात्र दो महीनों के भीतर अपार धन व्यय कर पत्थरों की जड़ाई से बाँध का पुनर्निर्माण करवाया। अभिलेख के अनुसार यह बाँध सौ हाथ लम्बा और अड़सठ हाथ चौड़ा था। इस कार्य से न केवल कृषि और सिंचाई व्यवस्था पुनः स्थापित हुई, बल्कि प्रजा का शासन पर विश्वास भी दृढ़ हुआ।

यह उल्लेखनीय है कि सुदर्शन झील का इतिहास मौर्य काल से जुड़ा हुआ था। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय पुष्यगुप्त वैश्य द्वारा निर्मित यह झील अशोक, रुद्रदामन् और अब स्कन्दगुप्त के काल में पुनः संरक्षित की गई। इससे स्पष्ट होता है कि स्कन्दगुप्त की लोकोपकारिता एक दीर्घ प्रशासनिक परम्परा का अंग थी।

 

धार्मिक नीति और सहिष्णुता

 

अपने पूर्वजों की भाँति स्कन्दगुप्त भी वैष्णव था और ‘परमभागवत’ की उपाधि धारण करता था। उसने भितरी में भगवान विष्णु (शाङ्गिण) की प्रतिमा स्थापित करवाई। सुदर्शन झील के तट पर भी विष्णु की मूर्ति स्थापित की गई।

किन्तु इसके साथ-साथ स्कन्दगुप्त का शासन धार्मिक सहिष्णुता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। इन्दौर अभिलेख से सूर्य-पूजा का उल्लेख मिलता है, जबकि कहौम लेख से ज्ञात होता है कि एक जैन श्रद्धालु मद्र ने पाँच जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ स्थापित करवाई थीं। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि गुप्त साम्राज्य में विभिन्न धार्मिक परम्पराओं को संरक्षण प्राप्त था।

 

समग्र मूल्यांकन: स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां और ऐतिहासिक स्थान

 

समग्र रूप से देखा जाए तो स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां उसे एक ऐसे शासक के रूप में स्थापित करती हैं, जिसने संकट के समय अपने वंश और साम्राज्य दोनों की रक्षा की। उसने,

  • हूणों जैसे विध्वंसक आक्रमणकारियों को रोका
  • साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा
  • प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखा
  • और प्रजा-कल्याण को शासन का आधार बनाया

यदि चन्द्रगुप्त मौर्य ने यूनानियों की शक्ति को समाप्त किया और चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों का उन्मूलन किया, तो स्कन्दगुप्त ने हूणों के गर्व को चूर्ण कर भारत को विनाश से बचाया। इसी कारण वह ‘देश-रक्षक’ के रूप में स्मरण किया जाता है।

बौद्ध ग्रन्थ आर्यमंजुश्रीमूलकल्प में उसे ‘श्रेष्ठ, बुद्धिमान और धर्मवत्सल’ कहा गया है। उसकी मृत्यु के समय तक गुप्त साम्राज्य की सीमाएँ सुरक्षित रहीं। उसके बाद ही साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हुआ, जो इस तथ्य का प्रमाण है कि वह वास्तव में गुप्त वंश का अन्तिम महान स्तम्भ था। इन सभी तथ्यों के आधार पर स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां बहुआयामी सिद्ध होती हैं।

इस प्रकार स्कन्दगुप्त न केवल एक महान् योद्धा, बल्कि एक कुशल प्रशासक, उदार शासक और अपने युग का यथार्थवादी नेता था। स्कन्दगुप्त की उपलब्धियां गुप्त साम्राज्य के इतिहास में उस अंतिम चरण का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहाँ शक्ति, नीति और कर्तव्य एक साथ मिलकर साम्राज्य को विनाश से बचाने में सफल हुए।

 

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