गुप्त वंश का मूल निवास स्थान : एक ऐतिहासिक समस्या
गुप्त वंश की उत्पत्ति के प्रश्न की भाँति ही गुप्त वंश का मूल निवास स्थान भी प्राचीन भारतीय इतिहास की सबसे जटिल और विवादास्पद समस्याओं में से एक है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रारम्भिक गुप्त शासकों से संबंधित स्पष्ट और प्रत्यक्ष अभिलेखीय प्रमाणों का अभाव है। उपलब्ध साक्ष्य जैसे पुराण, चीनी यात्रियों के विवरण, सिक्के और बाद के अभिलेख अधिकांशतः अनुमानपरक व्याख्याओं पर आधारित हैं।
इसी कारण इतिहासकारों के बीच गुप्तों के मूल निवास स्थान को लेकर भिन्न-भिन्न मत सामने आए हैं, जिनमें मुख्यतः बंगाल, मगध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सिद्धांत प्रमुख हैं। गुप्तों के राजनीतिक उदय की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के लिए गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
बंगाल सिद्धांत : चीनी यात्री इत्सिंग के विवरण पर आधारित मत
चीनी यात्री इत्सिंग के विवरण के आधार पर कुछ इतिहासकारों ने यह मत प्रस्तुत किया है कि गुप्त वंश का मूल निवास स्थान बंगाल था। यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि प्रारम्भिक गुप्त शासक गंगा के निचले मैदानों से संबंधित थे और वहीं से उनकी राजनीतिक गतिविधियों का आरम्भ हुआ। बंगाल को प्राचीन काल में व्यापार, बौद्ध शिक्षा और सांस्कृतिक संपर्कों का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र माना जाता था, इसलिए यह कल्पना आकर्षक प्रतीत होती है कि गुप्तों का प्रारम्भिक उभार इसी क्षेत्र से हुआ हो।
किन्तु यह मत मुख्यतः एक विदेशी यात्री के विवरण की व्याख्या पर टिका हुआ है, न कि प्रत्यक्ष गुप्त अभिलेखों या सिक्कों पर। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासलेखन में इस सिद्धांत को सावधानी के साथ देखा जाता है।
बंगाल को गुप्तों का मूल निवास मानने वाले इतिहासकार
एलन, गांगूली तथा आर. सी. मजूमदार जैसे विद्वानों ने यह मत प्रस्तुत किया है कि गुप्त वंश का मूल निवास स्थान बंगाल था। इस मत का मुख्य आधार चीनी यात्री इत्सिंग (I-tsing) का यात्रा विवरण है।
इत्सिंग का विवरण और उसकी व्याख्या
इत्सिंग के अनुसार, उससे लगभग 500 वर्ष पूर्व हुई-लुन (Hui-lun) नामक एक चीनी भिक्षु नालन्दा आया था। यहाँ चिलिकितो (श्रीगुप्त) नामक राजा ने चीनी भिक्षुओं के लिए एक मंदिर का निर्माण कराया और उसके निर्वाह हेतु 24 गाँवों की आय दान में दी। यह ‘चीन का मंदिर’ मृगशिखावन विहार के समीप, नालन्दा से लगभग 40 योजन पूर्व, गंगा नदी के तट पर स्थित था।
गांगूली का तर्क है कि यदि नालन्दा से पूर्व की ओर 40 योजन (लगभग 240 मील) की दूरी मापी जाए, तो यह क्षेत्र आधुनिक पश्चिमी बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में पड़ता है। इसी आधार पर बंगाल को गुप्तों का मूल निवास क्षेत्र माना गया।
बंगाल सिद्धांत की प्रमुख कमजोरियाँ
इस मत के विरुद्ध कई ठोस आपत्तियाँ प्रस्तुत की गई हैं-
- गुप्त वंश के संस्थापक का नाम ‘महाराज गुप्त’ था, जबकि चिलिकितो का भारतीय रूप ‘श्रीगुप्त’ माना जाता है, दोनों की ऐतिहासिक पहचान सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
- इत्सिंग के अनुसार चिलिकितो का काल लगभग 171 ईस्वी ठहरता है, जबकि गुप्त वंश का उदय तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध से पूर्व संभव नहीं माना जाता।
- चिलिकितो द्वारा 24 गाँवों का दान दिया जाना उसके सशक्त और समृद्ध शासक होने का संकेत देता है, जबकि प्रारम्भिक श्रीगुप्त की स्थिति एक साधारण या अधीनस्थ शासक की प्रतीत होती है।
जे. एस. नेगी का मत है कि चीनी यात्रियों ने किसी व्यक्ति विशेष का नाम न देकर केवल ‘गुप्त वंश के प्रसिद्ध शासक’ का संकेत किया है। अतः गुप्तों के मूल निवास स्थान के निर्धारण में इत्सिंग का विवरण निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मगध सिद्धांत : पुराणों के आधार पर विश्लेषण
पुराणों के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया गया है कि गुप्त वंश का मूल निवास स्थान मगध था। यह सिद्धांत इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि मगध प्राचीन भारत में साम्राज्य-निर्माण की एक स्थापित परंपरा वाला क्षेत्र था। मौर्यों के बाद भी मगध राजनीतिक चेतना का केन्द्र बना रहा, और गुप्तों का उससे जुड़ना ऐतिहासिक रूप से असंगत नहीं लगता।
पुराणों में गुप्तों को ‘मागध गुप्त’ कहे जाने से यह संकेत मिलता है कि या तो वे मूलतः मगध निवासी थे अथवा उनका प्रारम्भिक शक्ति-केन्द्र वहीं स्थित था।
पुराणों में ‘मागध गुप्त’ की अवधारणा
पुराणों, विशेषकर विष्णु पुराण और वायु पुराण, में गुप्तों का संबंध मगध से जोड़ा गया है। विंटरनित्ज का मत है कि विष्णु पुराण की रचना गुप्तकाल में हुई, इसलिए उसमें दिए गए विवरणों को गुप्त इतिहास के संदर्भ में गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
विष्णु पुराण के पाठ और उनका महत्व
विष्णु पुराण की कुछ पांडुलिपियों में उल्लेख मिलता है- ‘अनुगंगा प्रयाग मागधाः गुप्ताश्च भोक्ष्यन्ति’ अर्थात गंगा तटवर्ती प्रयाग और मगध क्षेत्र पर गुप्तों का शासन होगा। पाठांतरों के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ‘मागधा’ शब्द गुप्तों का विशेषण है, जिससे यह संकेत मिलता है कि या तो मगध उनका मूल निवास था या प्रारम्भिक राजनीतिक आधार।
वायु पुराण और ऐतिहासिक निष्कर्ष
वायु पुराण में गुप्तों के साम्राज्य विस्तार में प्रयाग, साकेत और मगध का उल्लेख है। रायचौधरी के अनुसार प्रयाग और कोशल की विजय चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी, जबकि उत्तरी बिहार लिच्छवियों से वैवाहिक संबंधों के माध्यम से प्राप्त हुआ। इससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि मगध गुप्तों का मूल क्षेत्र रहा होगा, और इसी कारण पुराण उन्हें ‘मागध गुप्त’ कहते हैं। पुराणों में गुप्तों को ‘मागध गुप्त’ कहे जाने की अवधारणा को समझने के लिए गुप्त वंश के इतिहास के स्रोत विशेष रूप से सहायक सिद्ध होते हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश सिद्धांत : पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित मत
कुछ इतिहासकारों ने साहित्यिक स्रोतों के बजाय पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर यह तर्क दिया है कि गुप्त वंश का मूल निवास स्थान पूर्वी उत्तर प्रदेश था। यह दृष्टिकोण आधुनिक इतिहासलेखन के अधिक निकट है, क्योंकि यह सिक्कों और अभिलेखों जैसे ठोस साक्ष्यों पर आधारित है।
यह माना जाता है कि किसी भी वंश के प्रारम्भिक सिक्के और लेख सामान्यतः उसी क्षेत्र में मिलते हैं जहाँ से उसका राजनीतिक उदय हुआ हो। इसी सिद्धांत को गुप्तों पर लागू करते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश को उनका आदि क्षेत्र माना गया है।
सिक्के, अभिलेख और मूल निवास की अवधारणा
एस. आर. गोयल ने पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया कि किसी भी वंश के प्रारम्भिक सिक्के और अभिलेख सामान्यतः उसी क्षेत्र से मिलते हैं, जो उसका मूल निवास होता है।
गुप्त सिक्के और प्रयाग प्रशस्ति
गुप्तों के प्राचीनतम स्वर्ण सिक्के ‘चन्द्रगुप्त–कुमारदेवी प्रकार’ अधिकांशतः पूर्वी उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त प्रारम्भिक गुप्त अभिलेखों की संख्या भी इसी क्षेत्र में अधिक है।
सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख, प्रयाग प्रशस्ति, समुद्रगुप्त की सैनिक उपलब्धियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जो शासक के सत्ता-केन्द्र के प्रति झुकाव को दर्शाता है।
इस सिद्धांत की सीमाएँ
इसके बावजूद यह तर्क भी पूर्णतः निर्णायक नहीं है, क्योंकि-
- पूर्वी उत्तर प्रदेश से प्राप्त अधिकांश अभिलेख चन्द्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त प्रथम के काल के हैं।
- प्रयाग प्रशस्ति एक अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है, जो मूलतः कौशाम्बी में स्थापित था।
अतः केवल इसके आधार पर गुप्तों के मूल निवास स्थान का निर्धारण करना कठिन है।
निष्कर्ष : गुप्त वंश का मूल निवास स्थान – एक खुला ऐतिहासिक प्रश्न
उपलब्ध साहित्यिक, अभिलेखीय और पुरातात्विक साक्ष्यों के समग्र विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि गुप्त वंश का मूल निवास स्थान किसी एक निश्चित भू-भाग में सीमित कर पाना संभव नहीं है। बंगाल, मगध और पूर्वी उत्तर प्रदेश तीनों सिद्धांतों के पक्ष और विपक्ष में तर्क उपलब्ध हैं, परंतु स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रमाणों के अभाव में यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच विवादास्पद बना हुआ है। इस प्रकार, गुप्तों के मूल निवास स्थान की समस्या हमें यह सिखाती है कि प्राचीन भारतीय इतिहास में कई प्रश्नों के उत्तर निश्चित नहीं, बल्कि संभाव्य और विश्लेषणात्मक होते हैं और यही इतिहासलेखन की वास्तविक शक्ति भी है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
