कनिष्क की धार्मिक नीति: महायान बौद्ध धर्म, चतुर्थ संगीति और कुषाणकालीन सहिष्णुता

कुषाण काल में धर्म और सत्ता का संबंध

 

भारतीय प्राचीन इतिहास में कुषाण शासक कनिष्क का स्थान केवल एक विजेता सम्राट के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे शासक के रूप में भी महत्वपूर्ण है जिसने धर्म को राज्य की वैधता और सांस्कृतिक एकीकरण का माध्यम बनाया। यद्यपि उत्तरी भारत और मध्य एशिया में उसके सैन्य अभियानों ने कुषाण साम्राज्य को व्यापक विस्तार प्रदान किया, किंतु उसकी वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता उसकी धार्मिक नीति में निहित है।
कनिष्क का काल वह समय था जब बौद्ध धर्म आंतरिक रूप से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था और साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर अपने विस्तार की प्रक्रिया में था। ऐसे संक्रमणकाल में कनिष्क की धार्मिक नीति ने न केवल बौद्ध धर्म के भविष्य को दिशा दी, बल्कि बहुधार्मिक साम्राज्य में सहिष्णु शासन का एक व्यावहारिक मॉडल भी प्रस्तुत किया।

 

कनिष्क का बौद्ध धर्म ग्रहण – स्रोतों की ऐतिहासिक समीक्षा

 

उत्तरी बौद्ध परंपराओं में कनिष्क के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कथा अशोक के धर्मांतरण के समान प्रस्तुत की जाती है। इन कथाओं में कनिष्क को प्रारंभिक जीवन में क्रूर और अत्याचारी शासक बताया गया है, जो बाद में बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर एक उदार और धर्मनिष्ठ राजा बन जाता है।
किन्तु इतिहासकारों की दृष्टि से ऐसे विवरणों को अक्षरशः स्वीकार नहीं किया जा सकता। ये कथाएँ मुख्यतः धार्मिक साहित्यिक परंपरा का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य शासक की छवि को धर्म के संरक्षक के रूप में स्थापित करना था।

वास्तविक ऐतिहासिक साक्ष्य, विशेषतः कनिष्क के सिक्के और पेशावर (पुरुषपुर) का अभिलेख, इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह अपने शासन के आरंभिक वर्षों में ही बौद्ध धर्म से जुड़ चुका था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसका बौद्ध होना किसी अचानक नैतिक परिवर्तन का परिणाम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से सुविचारित निर्णय था।

 

पेशावर स्थित कनिष्क स्तूप और बौद्ध स्थापत्य परंपरा
पेशावर का कनिष्क स्तूप कुषाण काल में बौद्ध धर्म को प्राप्त राज्याश्रय और स्थापत्य संरक्षण का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

बौद्ध स्थापत्य और राज्याश्रय – पेशावर चैत्य का महत्व

 

कनिष्क द्वारा पेशावर में निर्मित विशाल बौद्ध चैत्य उसकी धार्मिक नीति का ठोस भौतिक प्रमाण है। चीनी यात्री फ़ाह्यान और ह्वेनसांग ने इस स्तूप का विस्तृत वर्णन किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि बौद्ध जगत का एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र था।
इस स्थापत्य संरक्षण से यह संकेत मिलता है कि कनिष्क बौद्ध धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था के रूप में नहीं, बल्कि राज्य द्वारा समर्थित सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखता था।

 

महायान बौद्ध धर्म को राज्याश्रय

 

इस संदर्भ में कनिष्क की धार्मिक नीति को केवल बौद्ध आस्था का परिणाम नहीं, बल्कि साम्राज्य की बहुजातीय संरचना के अनुरूप अपनाई गई एक व्यावहारिक राज्य-रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। कनिष्क की धार्मिक नीति का सबसे निर्णायक पहलू उसका महायान बौद्ध धर्म को संरक्षण देना था। उसके शासनकाल में बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से दो धाराओं हीनयान और महायान, में विभक्त हो चुका था।
कनिष्क ने महायान परंपरा को संरक्षण देकर बौद्ध धर्म को एक अधिक लोकप्रिय, प्रतीकात्मक और सार्वदेशिक रूप प्रदान किया। बुद्ध की मूर्ति-पूजा, बोधिसत्व की अवधारणा और करुणा-प्रधान दर्शन, ये सभी महायान की विशेषताएँ थीं, जिन्होंने बौद्ध धर्म को मध्य एशिया और चीन जैसे क्षेत्रों में स्वीकार्य बनाया।

यह निर्णय केवल धार्मिक नहीं था; यह कुषाण साम्राज्य की बहु-जातीय और बहु-सांस्कृतिक प्रकृति के अनुरूप भी था।

 

चतुर्थ बौद्ध संगीति और कनिष्क

 

आयोजन, स्थान और नेतृत्व

कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुण्डलवन नामक स्थान पर आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति बौद्ध इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस संगीति की अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य वसुमित्र ने की, जबकि अश्वघोष को उपाध्यक्ष बनाया गया। लगभग 500 विद्वान भिक्षुओं ने इसमें भाग लिया।

 

संगीति का ऐतिहासिक महत्व

इस संगीति में बौद्ध त्रिपिटकों के प्रामाणिक पाठों का संकलन किया गया तथा विभाषाशास्त्र जैसे ग्रंथों की रचना हुई। इससे बौद्ध धर्म को एक सुव्यवस्थित दार्शनिक ढांचा प्राप्त हुआ। यह संगीति इस बात का प्रमाण है कि कनिष्क की धार्मिक नीति केवल संरक्षण तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह बौद्ध विचारधारा को संस्थागत और बौद्धिक आधार प्रदान करना चाहता था।

 

धार्मिक सहिष्णुता – सिक्कों के प्रमाण

 

यद्यपि कनिष्क स्वयं बौद्ध था, फिर भी उसकी धार्मिक नीति संकीर्ण नहीं थी। उसके सिक्कों पर बुद्ध के साथ-साथ यूनानी, ईरानी, मेसोपोटामियन और भारतीय देवी-देवताओं के चित्र अंकित मिलते हैं।
इनमें आइशो (शिव), मिइरो (सूर्य), माओ (चंद्र), नाना, हेलियोस और सेलेनी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

ये सिक्के कुषाण साम्राज्य की धार्मिक बहुलता और कनिष्क की सहिष्णु दृष्टि के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी धार्मिक नीति किसी एक पंथ के प्रभुत्व पर आधारित नहीं, बल्कि साम्राज्य की विविध धार्मिक परंपराओं को साथ लेकर चलने की नीति थी। इस प्रकार सिक्कों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि कनिष्क की धार्मिक नीति किसी एक मत के वर्चस्व पर नहीं, बल्कि साम्राज्य की धार्मिक विविधता को संतुलित रूप से स्वीकार करने पर आधारित थी।

 

कनिष्क की धार्मिक नीति का ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

कनिष्क की धार्मिक नीति को यदि समग्र रूप में देखा जाए, तो यह तीन स्तरों पर कार्य करती हुई दिखाई देती है,

  1. व्यक्तिगत आस्था (बौद्ध धर्म का स्वीकार)
  2. राजनीतिक व्यावहारिकता (महायान का राज्याश्रय)
  3. सांस्कृतिक सहिष्णुता (बहुधार्मिक प्रतीक)

इसी संतुलन ने कनिष्क को न केवल एक महान शासक, बल्कि भारतीय इतिहास में धार्मिक उदारता का प्रतीक बनाया। मौर्योत्तर काल की समझ के लिए यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह धर्म और राज्य, सांस्कृतिक एकीकरण, तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संपर्कों जैसे व्यापक विषयों से जुड़ता है।

 

निष्कर्ष

 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कनिष्क की धार्मिक नीति बौद्ध धर्म के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। उसके संरक्षण में महायान बौद्ध धर्म ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण किया, जबकि उसकी सहिष्णु नीति ने कुषाण साम्राज्य को धार्मिक संघर्षों से मुक्त रखा।
इस प्रकार कनिष्क केवल एक धर्म का संरक्षक नहीं, बल्कि धार्मिक समन्वय और सांस्कृतिक विस्तार का शासक था, और यही तथ्य उसे भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top