कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि: इतिहास, प्रमाण और विद्वानों के मत

कनिष्क काल में कुषाण साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार
कनिष्क के शासनकाल में कुषाण साम्राज्य का विस्तार, मध्य एशिया से गंगा घाटी तक फैला हुआ।

कुषाण साम्राज्य का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक उभार की एक महत्त्वपूर्ण धुरी है। विम कडफिसेस के पश्चात् जब साम्राज्य की बागडोर कनिष्क के हाथों में आई, तब भारतीय इतिहास एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचा। कनिष्क न केवल कुषाण वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे, बल्कि बौद्ध धर्म, अंतर-क्षेत्रीय वाणिज्य, कला एवं प्रशासनिक नवाचारों के भी अग्रदूत माने जाते हैं।

उत्तरी बौद्ध अनुश्रुतियाँ उन्हें दिव्य आभा के साथ चित्रित करती हैं, वहीं स्वर्ण एवं ताम्र मुद्राओं, शिलालेखों और पुरातात्त्विक अवशेषों से उनके साम्राज्य की व्यापकता, समृद्धि और प्रभाव स्पष्ट होते हैं। किंतु उनके शासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी इतिहासकारों के समक्ष चुनौती बना हुआ है,
कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि क्या थी?”

यह प्रश्न मात्र काल-निर्धारण का नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के संपूर्ण कालक्रम को व्यवस्थित करने का आधार है।

 

कनिष्क की उत्पत्ति और वंश: एक अनिश्चित अध्याय

 

कनिष्क की उत्पत्ति और कुषाण वंश में उनकी सटीक स्थिति इतिहासकारों के लिए लंबे समय से जटिल पहेली रही है। यह भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं हो सका है कि क्या पूर्ववर्ती कडफिसेस राजाओं से उनका कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था अथवा नहीं।

स्टेनकोनो जैसे कुछ प्रख्यात विद्वानों की धारणा है कि कनिष्क यू-ची की छोटी शाखा से निकटतः सम्बन्धित थे तथा वे भारत में खोतान के मार्ग से प्रवेश कर चुके थे, जो मध्य एशिया के इन प्रवासियों की गतिशीलता को प्रतिबिंबित करता है। इसके विपरीत, चीनी ग्रंथों में उनके वंशज वासुदेव को ‘ता-यू-ची’ (Great Yuezhi) का शासक बताया गया है, जो भिन्न दिशा इंगित करता है।

प्रत्यक्ष प्रमाणों के अभाव के कारण कनिष्क की उत्पत्ति का प्रश्न आज भी अनुमान और तुलनात्मक विश्लेषण पर आधारित है, और यही कारण है कि कनिष्क के शासनकाल की तिथि निर्धारण और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

मथुरा संग्रहालय की कनिष्क प्रतिमा, कुषाण शासक
मथुरा संग्रहालय में संरक्षित कुषाण सम्राट कनिष्क की प्रतिमा

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि: भारतीय इतिहास की सबसे विवादास्पद समस्या

 

इतिहासकारों ने विभिन्न अभिलेखीय, पुरातात्त्विक और साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि के अनेक मत प्रस्तुत किए हैं। यह विषय इसलिए जटिल है क्योंकि—

  • कुषाण अभिलेख संवत् आधारित हैं, पर संवत् की प्रकृति अस्पष्ट है।
  • मुद्राओं का क्रम-निर्धारण क्षेत्रीय विविधता से प्रभावित है।
  • चीनी स्रोत बौद्ध परंपरा पर आधारित हैं, जिनमें काल-गणना भिन्न है।
  • पुरातात्त्विक स्तर (stratigraphy) कई बार समान कालखंडों को ओवरलैप करते हैं।

इन्हीं कारणों से कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि भारतीय इतिहास के सबसे विवादित काल-विवादों में सम्मिलित हो चुकी है।

 

मत 1: कनिष्क 58 ईसा पूर्व में राज्यारूढ़ हुए

 

फ्लीट तथा कनेडी जैसे विद्वानों के अनुसार, कनिष्क दोनों कडफिसेस राजाओं से पूर्व के शासक थे। उनका मानना था कि वे 58 ईसा पूर्व में गद्दी पर आरूढ़ हुए तथा उन्होंने जिस सम्बत् की स्थापना की, वह कालांतर में विक्रम संवत् के नाम से व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। यह मत प्राचीन भारतीय कालगणना की एक महत्वपूर्ण कड़ी को जोड़ने का प्रयास करता है।

 

यह मत क्यों अस्वीकार किया गया?

उपर्युक्त मत को मार्शल द्वारा तक्षशिला की पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त हुए प्रमाणों के आधार पर पूर्णतः खण्डित कर दिया गया है। तक्षशिला की खुदाई में ऊपरी सतह से कनिष्क परिवार की मुद्राएँ तथा निचली सतह से कडफिसेस परिवार की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कनिष्क परिवार कडफिसेस परिवार से परवर्ती काल का है। पुनः, कनिष्क के अभिलेखों, उनकी मुद्राओं तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग के विस्तृत विवरणों से यह ज्ञात होता है कि कनिष्क का गंधार प्रदेश पर पूर्ण अधिकार स्थापित था, जो उनके साम्राज्य की सीमाओं को रेखांकित करता है। परन्तु चीनी साक्ष्यों के अनुसार, प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के द्वितीय चरण में गंधार प्रदेश पर इन-मो-फू का प्रभुत्व प्रमाणित होता है, जो कनिष्क के काल से पूर्व का है। इसके अतिरिक्त, चीनी ग्रंथ स्पष्ट रूप से कडफिसेस प्रथम को ही कुषाण शाखा का प्रथम राजा बताते हैं, जो इस मत को और कमजोर बनाता है।

 

मत 2: कनिष्क का राज्यारोहण तीसरी शताब्दी ईस्वी में (248-278 ई.)

 

रमेशचन्द्र मजूमदार जैसे इतिहासकार के अनुसार, कनिष्क 248 ईस्वी में गद्दी पर बैठे थे और उन्होंने त्रैकुटक-कलचुरि-चेदि संवत् का प्रवर्तन किया था, जो दक्षिण भारत की कालगणना प्रणाली से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। इसी प्रकार, आर० जी० भंडारकर कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को 278 ईस्वी में निर्धारित करते हैं, जो तीसरी शताब्दी के आरंभ को इंगित करता है।

 

इस मत की समस्याएँ

 

1.गुप्त साम्राज्य से टकराव

कनिष्क को इतने बाद का मान लिए जाने के लिए कोई पर्याप्त ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है, जो इस मत को संदिग्ध बनाता है। कुषाण लेखों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि कनिष्क काल के 98वें वर्ष में वासुदेव नामक शासक मथुरा पर शासन कर रहा था, जो उनके वंश की निरंतरता दर्शाता है। यदि इस तिथि को त्रैकुटक-कलचुरि-चेदि संवत् की तिथि माना जाए, तो इससे 346 ईस्वी (98+248) में वासुदेव को मथुरा का शासक ठहराया जाएगा। परन्तु गुप्त अभिलेखों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मथुरा इस तिथि से बहुत पूर्व ही गुप्त साम्राज्य के अधिकार क्षेत्र में आ चुका था, जो विरोधाभास उत्पन्न करता है।

2. पुराणों का कालक्रम

पुराणों के विस्तृत विवरणों से पता चलता है कि गुप्तों के पूर्व मथुरा में नागवंश का शासन कायम था, जो तीसरी शताब्दी के मध्य तक विस्तृत था।

3. तिब्बती व बौद्ध स्रोत

इसके अलावा, तिब्बती अनुश्रुतियों में कनिष्क को खोतान के नरेश विजयकीर्ति का समकालीन बताया गया है, जिनका काल द्वितीय शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक भाग तक सीमित माना जाता है।

इन सभी प्रमाणों के प्रकाश में हम कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को 248 ईस्वी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह ऐतिहासिक क्रम से मेल नहीं खाता। ये ही तर्क भण्डारकर द्वारा प्रस्तुत 278 ईस्वी की तिथि के विरुद्ध भी पूर्णतः लागू किए जा सकते हैं, जो समान रूप से असंगत प्रतीत होते हैं।

कनिष्क के स्वर्ण सिक्के, कुषाण कालीन मौद्रिक प्रमाण
कुषाण सम्राट कनिष्क द्वारा जारी स्वर्ण मुद्राएँ, जिन पर शासकीय उपाधियाँ और धार्मिक प्रतीक अंकित हैं।

मत 3: 125-144 ईस्वी में कनिष्क का राज्यारोहण

 

मार्शल, स्टेनकोनो तथा स्मिथ आदि कुछ प्रख्यात विद्वानों द्वारा कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 125 ईस्वी बताई गई है। इसी क्रम में, घिर्शमैन नामक विद्वान् ने गहन विश्लेषण के आधार पर कनिष्क की तिथि को 144 ईस्वी के रूप में निकाला है। यह मत पूर्वी अफगानिस्तान के बेग्राम नामक स्थान पर की गई पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त कुषाण अवशेषों पर दृढ़तापूर्वक आधारित है। इस खुदाई से वासुदेव नामक राजा के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनकी पहचान वासुदेव प्रथम से की गई है, जो कुषाण वंश की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। घिर्शमैन के अनुसार, यह नगर सासानी नरेश शापुर प्रथम द्वारा 240 ईस्वी से 250 ईस्वी के मध्य विनष्ट कर दिया गया था, जिसके साथ ही कुषाण साम्राज्य का पूर्ण अंत हो गया। वासुदेव की तिथि 74 से 98 ईस्वी के मध्य आंकी गई है। इस प्रकार, कनिष्क द्वारा प्रवर्तित संवत् की तिथि 144 ईस्वी के आसपास निकलती है। बैजनाथ पुरी ने इस तिथि का पूर्ण समर्थन किया है, जो इस मत को और मजबूती प्रदान करता है।

 

इस मत के विरुद्ध प्रस्तुत ठोस आपत्तियाँ

 

परन्तु कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ईस्वी के मध्य भाग में स्थापित करने में कुछ ठोस आपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनकी उपेक्षा करना संभव नहीं है।

1. रुद्रदामन-कनिष्क समकालीन विवाद

शक क्षत्रप रुद्रदामन (130-150 ईस्वी) के जूनागढ़ अभिलेख से सिंधु-सौवीर क्षेत्र पर उनके अडिग अधिकार का प्रमाण प्राप्त होता है। वे एक महाक्षत्रप थे, जो किसी अन्य शासक की अधीनता को कभी स्वीकार नहीं कर सकते थे, जो उनकी स्वतंत्रता की गारंटी थी। दूसरी ओर, सूई बिहार (सिंधु-क्षेत्र) से प्राप्त कनिष्क का अभिलेख निचली सिंधु घाटी पर उनके शासन का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करता है। यदि हम कनिष्क को 125 अथवा 144 ईस्वी में शासनरत मान लें, तो वे रुद्रदामन के समकालीन सिद्ध हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों शासकों का सिंध क्षेत्र पर एक साथ आधिपत्य कैसे संभव हो सकता है, जो एक भौगोलिक और राजनीतिक विरोधाभास उत्पन्न करता है।

2. शकों के उत्तराधिकारी सक्रिय थे

वे विद्वान् जो कनिष्क की तिथि को 144 ईस्वी में निर्धारित करते हैं, उनका मत है कि कनिष्क ने सूई बिहार को रुद्रदामन की मृत्यु के पश्चात् (150 ईस्वी के बाद) ही जीता होगा। सूई बिहार का अभिलेख उसके राज्यकाल के ग्यारहवें वर्ष का है। यदि उसके राज्यारोहण की तिथि 144 ईस्वी मानी जाए, तो तदनुसार सूई बिहार पर उसका अधिकार 144+11=155 ईस्वी में स्थापित हुआ था। किन्तु यदि हम रुद्रदामन के उत्तराधिकारियों के इतिहास पर गहन विचार करें, तो यह मत तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता। रुद्रदामन के बाद दामघोष तथा फिर जीवदामन प्रथम ने शासन संभाला। सिक्कों के प्रमाणों से स्पष्ट है कि वे दोनों रुद्रदामन के समान ही ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि धारण करते थे। जीवदामन ने लगभग 180 ईस्वी तक स्वतंत्र शासक के रूप में राज्य किया। इस बात का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि सूई बिहार अथवा रुद्रदामन द्वारा विजित कोई अन्य प्रदेश इस समय तक शकों के अधिकार से बाहर चला गया हो। ऐसी दशा में यह स्वीकार करना कठिन है कि कनिष्क ने सूई बिहार क्षेत्र की विजय रुद्रदामन के उत्तराधिकारियों को पराजित कर ही प्राप्त की होगी।

3. कनिष्क संवत् द्वितीय शताब्दी में आरंभ नहीं हो सकता

इसके विपरीत, इसकी संभावना अधिक प्रबल है कि रुद्रदामन ने ही कुषाणों से सिंध-सौवीर का राज्य छीन लिया होगा। कनिष्क काल के वर्ष 61 से 66 तक उनके कुल का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं होता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यह काल कुषाण सत्ता के हास का कालीन अवधि रही होगी, और इसी बीच रुद्रदामन ने उत्तर भारत पर अपनी विजय स्थापित की होगी। किन्तु यदि कनिष्क को दूसरी शताब्दी (130-144 ईस्वी) में रखा जाए, तो यह निष्कर्ष बिल्कुल संभव नहीं ठहरता।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कनिष्क के अभिलेखों में प्रदत्त तिथियों के क्रमबद्ध विश्लेषण से यह स्पष्ट पता चलता है कि वे किसी निश्चित संवत् की तिथियाँ हैं। दूसरे शब्दों में, कनिष्क के अभिलेख उन्हें किसी संवत् के प्रवर्तन का पूर्ण श्रेय प्रदान करते हैं, जो उनके शासन की एक प्रमुख उपलब्धि है। परन्तु हमें द्वितीय शताब्दी ईस्वी में प्रचलित होने वाले किसी भी संवत् का कोई ठोस ज्ञान प्राप्त नहीं है। ऐसी दशा में कनिष्क को द्वितीय शताब्दी में स्थापित करने का मत स्वाभाविक रूप से निर्बल पड़ जाता है।

4. बेग्राम के वासुदेव की पहचान गलत

घिर्शमैन ने जो बेग्राम के सिक्कों वाले वासुदेव की पहचान वासुदेव प्रथम से की है, वह तर्कसंगत नहीं लगती, क्योंकि यह एक अनुचित साम्य पर आधारित है। वासुदेव प्रथम के अभिलेखों से पता चलता है कि उनका राज्य उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था तथा मथुरा उनका प्रमुख केंद्र था। बेग्राम से प्राप्त वासुदेव के सिक्के उत्तर प्रदेश में कहीं प्राप्त नहीं होते। यह दोनों वासुदेवों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति सिद्ध करता है, जो पहचान की इस प्रक्रिया को अवैध बनाता है। इस बात का भी कोई विश्वसनीय आधार उपलब्ध नहीं है कि बेग्राम नगर को शापुर प्रथम ने ही नष्ट किया हो। वासुदेव प्रथम को कुषाण वंश का अंतिम राजा मानना भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि सिक्कों से उसके पश्चात् शासन करने वाले कुछ अन्य राजाओं के नाम स्पष्ट रूप से मिलते हैं, जैसे, कनिष्क द्वितीय, वासुदेव द्वितीय आदि। अतः शापुर प्रथम को वासुदेव प्रथम का समकालीन मानकर निकाला गया निष्कर्ष तर्कसंगत नहीं ठहरता।

5. सातवाहन-कुषाण संघर्ष का अभाव

पुनश्च, यदि कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 144 ईस्वी मानी जाए, तो तदनुसार उनका शासन 144+23=167 ईस्वी में समाप्त होता है। ऐसी दशा में वे सातवाहन राजाओं वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी तथा शिवश्री शातकर्णि के समकालीन सिद्ध हो जाते हैं। हमें ज्ञात है कि इन दोनों शासकों का कार्दमक शकों के साथ विस्तृत युद्ध हुआ था। यदि कनिष्क 167 ईस्वी तक शासन करते, तो उनका किसी सातवाहन शासक के साथ संघर्ष अवश्यमेव घटित होता। किन्तु हम उनके अभिलेखों अथवा सातवाहन अभिलेखों में सातवाहन-कुषाण संघर्ष का कोई संकेत भी प्राप्त नहीं पाते। इस प्रमाण से भी यह सिद्ध हो जाता है कि कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 144 ईस्वी नहीं हो सकती।

 

सबसे अधिक स्वीकार्य मत: कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ईस्वी

 

फर्गुसन, ओल्डेनबर्ग, थॉमस, बनर्जी, रैप्सन, हेमचन्द्र रायचौधरी जैसे कुछ विद्वान् कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को 78 ईस्वी के रूप में मानते हैं। उनके अनुसार, कनिष्क ने 78 ईस्वी से ही शक संवत् का प्रवर्तन किया था, जो भारतीय कालगणना की एक महत्वपूर्ण धुरी है। चूँकि इस संवत् का व्यापक प्रयोग पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों ने किया, जो प्रारंभ में कनिष्क की अधीनता को पूर्णतः स्वीकार करते थे, अपने अभिलेखों तथा सिक्कों में चतुर्थ शताब्दी से लेकर अंत तक जारी रखा। अतः उनके साथ निरंतर एवं अटूट सम्बद्धता के कारण इस संवत् को कालांतर में शक संवत् के नाम से जाना जाने लगा। प्रारंभिक काल में इस संवत् का कोई विशिष्ट नाम निर्धारित नहीं था तथा इसका उल्लेख केवल संख्यात्मक रूप में ही होता था। कुषाण तथा क्षत्रप लेखों एवं सिक्कों में भी इसके लिए केवल संख्या का ही उल्लेख प्राप्त मिलता है। इस संवत् को पाँचवीं शताब्दी के पश्चात् भारतीय अभिलेखों में ‘शक-संवत्‘ अथवा ‘शक-काल‘ नाम प्रदान कर दिया गया। इस प्रकार, मूलतः कनिष्क द्वारा ही प्रवर्तित यह संवत् शक संवत् के नाम से विख्यात हो गया, जो एक ऐतिहासिक निरंतरता को दर्शाता है।

 

डूब्रील की कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि पर आपत्तियों का समाधान

 

जे. ए. डूब्रील ने 78 ईस्वी के इस मत के विरुद्ध दो मुख्य आपत्तियाँ प्रकट की हैं, जो इसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं,

  1. कडफिसेस प्रथम 50 ईस्वी में गद्दी पर आरूढ़ हुए थे। यदि कनिष्क 78 ईस्वी में राजा बने, तो दोनों कडफिसेस राजाओं के लिए मात्र 28 वर्ष का समय ही शेष रह जाता है। इतने अल्पकाल में दोनों का शासन संभव कैसे हो सकता था, जो एक कालगणनात्मक असंगति उत्पन्न करता है।
  2. तक्षशिला से प्राप्त चिरस्तूप अभिलेख में 136 की तिथि अंकित है, जो संभवतः विक्रम संवत् की है। अतः इसका निर्माण 78 ईस्वी (136-58) में हुआ होगा। यह काल कडफिसेस द्वितीय का माना जाता है। इस प्रकार, कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ईस्वी में स्थापित नहीं की जा सकती।

किन्तु उपर्युक्त दोनों आपत्तियाँ मूलतः निर्बल सिद्ध होती हैं। इनका खण्डन हम निम्नलिखित प्रकार से कर सकते हैं-

  1. कडफिसेस प्रथम की तिथि 50 ईस्वी को पूर्णतः निश्चित नहीं माना जा सकता। भले ही यह मान लिया जाए कि कडफिसेस प्रथम 50 ईस्वी में गद्दी पर बैठे, तो भी 28 वर्षों की अवधि दोनों के लिए न्यूनतम नहीं है, क्योंकि कडफिसेस प्रथम ने 80 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की थी और लंबे समय तक राज्य किया। उनका उत्तराधिकारी राजा बनने के समय काफी प्रौढ़ अवस्था में रहा होगा। इस प्रकार, 28 वर्षों की यह अवधि दोनों के शासन के लिए पर्याप्त एवं यथोचित सिद्ध होती है।
  2. तक्षशिला चिरस्तूप अभिलेख में कुषाण शासक को ‘देवपुत्र’ की उपाधि से संबोधित किया गया है। यह उपाधि कडफिसेस परिवार के शासकों की न होकर कनिष्क परिवार के शासकों की विशेषता है। अतः यह अभिलेख कडफिसेस द्वितीय के काल का नहीं लगता, बल्कि कनिष्क वंश से जुड़ा प्रतीत होता है।

इस प्रकार, 78 ईस्वी के विरुद्ध जो शंकाएँ उठाई गई हैं, वे सबल एवं निर्णायक नहीं हैं। अतः, विभिन्न मत-मतान्तरों के बीच कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को 78 ईस्वी में ही रखना अधिक तर्कसंगत एवं युक्तिसंगत प्रतीत होता है, यद्यपि इसे भी अंतिम रूप से निर्णीत नहीं माना जा सकता, क्योंकि नई खोजें इस पर पुनर्विचार करा सकती हैं।

 

वैज्ञानिक प्रमाण: रेडियो-कार्बन तिथियाँ

 

इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि प्रख्यात पुरातत्वविद् ए० एच० दानी ने पेशावर के शैखान-देरी (Shaikhan Dheri) नामक स्थान की पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त कुषाणकालीन अवशेषों के आधार पर रेडियो कार्बन तिथियाँ (Radio-Carbon-Dates) निकाली हैं। इन तिथियों से भी कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि द्वितीय शताब्दी ईस्वी की अपेक्षा प्रथम शताब्दी ईस्वी में ही निर्धारित होती है, जो वैज्ञानिक प्रमाणों का एक महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान करती है।

 

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सहमति

 

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि संबंधी समस्या पर गहन विचार-विमर्श के लिए 1913 तथा 1960 ई० में लंदन में दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए गए थे, जिनमें विश्व के प्रमुख इतिहासकारों ने भाग लिया। द्वितीय सम्मेलन में आम सहमति 78 ई० के पक्ष में ही बनी, जो इस मत की प्रबलता को रेखांकित करती है। इसके समापन भाषण में ए० एल० बाशम ने कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को 78 ई० में रखने के पक्ष में एक नया एवं प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत किया। इसके अनुसार, यदि कनिष्क की तिथि 78 ई० को न माना जाए, तो यह बता सकना अत्यंत कठिन होगा कि गंधार तथा पंजाब क्षेत्रों में किस संवत् का प्रचलन था। हमें सम्पूर्ण उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम भारत में, जो दीर्घकाल तक शक-कुषाणों की अधीनता में रहे, शक संवत् के प्रचलन का पर्याप्त प्रमाण प्राप्त मिलता है। मात्र उपरोक्त दो प्रदेशों में ही इसका प्रचलन नहीं दिखाई देता, जो एक असंगति उत्पन्न करता है। किन्तु यदि कनिष्क के अभिलेखों की तिथियों को शक संवत् से समीकृत (संगत) कर दिया जाए, तो हमें पंजाब और गंधार में संवत् के अभाव की कोई समस्या दिखाई नहीं देगी, जो इस तिथि की युक्तिसंगति को पुष्ट करती है।

 

अंतिम निष्कर्ष

 

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि भारतीय इतिहास की कालगणना से जुड़ी सबसे जटिल समस्याओं में से एक रही है। अभिलेखीय साक्ष्यों, पुरातात्त्विक स्तरों, चीनी और बौद्ध ग्रंथों, सिक्कों के क्रमबद्ध अध्ययन तथा आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषणों को समेकित रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न मतों में प्रस्तुत तिथियाँ 58 ईसा पूर्व, 125-144 ईस्वी या 248-278 ईस्वी कई आंतरिक विरोधाभासों से ग्रस्त हैं और उपलब्ध प्रमाणों के साथ संगत नहीं बैठतीं।

इसके विपरीत, 78 ईस्वी न केवल कुषाण और शक क्षत्रपों द्वारा प्रयुक्त संवत् प्रणाली से स्वाभाविक रूप से मेल खाती है, बल्कि तक्षशिला, बेग्राम और शैखान-देरी से प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेषों, रेडियो-कार्बन तिथियों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की विद्वत-सहमति से भी दृढ़ समर्थन प्राप्त करती है। ए. एल. बाशम जैसे प्रख्यात इतिहासकारों का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि 78 ईस्वी को आधार न मानने पर पंजाब-गंधार क्षेत्र की संवत् परंपरा अस्पष्ट हो जाती है।

इन सभी विश्लेषणों के आधार पर यह निष्कर्ष सर्वाधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि, कनिष्क के राज्यारोहण की सर्वाधिक स्वीकार्य और प्रमाण-समर्थित तिथि 78 ईस्वी ही है

यद्यपि भविष्य में नई खोजें इस कालक्रम को और सुस्पष्ट कर सकती हैं, वर्तमान उपलब्ध प्रमाणों की दृष्टि से 78 ईस्वी ही वह तिथि है जो भारतीय इतिहास की कालगणना, कुषाण साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति और अभिलेखीय परंपरा, तीनों से सर्वाधिक सुसंगत बैठती है।

 

 

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