रुद्रदामन: पश्चिमी क्षत्रपों का उदय, विजयें और प्रशासन – एक गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

परिचय: शक सत्ता के पुनरुत्थान का युग और रुद्रदामन प्रथम

 

चष्टन की मृत्यु के बाद उसका पौत्र रुद्रदामन प्रथम पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों का शासक बना। उससे पहले शक शक्ति क्षीण हो रही थी और कई क्षेत्रों में उनका प्रभाव संकट में था। ऐसे संक्रमणकाल में सत्ता सँभालकर रुद्रदामन ने न केवल शक साम्राज्य को पुनर्जीवित किया, बल्कि इसे अपने चरम पर पहुँचा दिया। उसका 150 ईस्वी का जूनागढ़ (गिरनार) शिलालेख, जो संस्कृत गद्य में रचित है, उसकी विजयों, प्रशासनिक नीति, सांस्कृतिक झुकाव और राजनीतिक दृष्टि का विस्तार से वर्णन करता है। मौर्योत्तर काल के दृष्टिकोण से यह अभिलेख पश्चिमी क्षत्रप शासन व्यवस्था को समझने का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

रुद्रदामन को अभिलेख में “सभी जातियों का रक्षक” कहा गया है, जो उसके अधीन बहु-जातीय संरचना वाले विशाल क्षेत्र का संकेत देता है। उसका शासनकाल सामान्यतः 130-150 ईस्वी माना जाता है और इस अवधि में शक साम्राज्य अपनी सर्वोच्च शक्ति पर पहुँचा।

जूनागढ़ गिरनार शिलालेख का प्राचीन अभिलेखीय उत्कीर्ण दृश्य
जूनागढ़ स्थित यह गिरनार शिलालेख रुद्रदामन के शासन, सार्वजनिक कार्यों और प्रशासनिक नीति पर आधारित सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है।

रुद्रदामन की सत्ता का उदय और प्रारम्भिक राजनीतिक स्थिति

 

जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार रुद्रदामन ने “महाक्षत्रप” की उपाधि स्वयं धारण की। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि उसके पूर्ववर्ती शासक अपेक्षाकृत कमजोर थे। शक सत्ता पहले से ही कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से जूझ रही थी, जैसे- सातवाहनों के साथ संघर्ष, उत्तर-पश्चिम में यौधेयों का दबाव, और सिंध क्षेत्र में कुषाणों का प्रभाव।

रुद्रदामन के उदय के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता कम हुई और एक केंद्रीयीकृत सत्ता संरचना विकसित हुई। उसके व्यक्तित्व में संगठन क्षमता, सैन्य नेतृत्व, राजनीतिक चातुर्य और सांस्कृतिक समझ का विशिष्ट संगम दिखता है।

 

रुद्रदामन की विजयों का विस्तृत विश्लेषण

 

जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदामन विभिन्न प्रदेशों की विजय का उल्लेख करता है। इन क्षेत्रों का महत्व समझने से रुद्रदामन की वास्तविक शक्ति और उसकी रणनीतियों की गहराई स्पष्ट होती है।

 

आकर और अवन्ति  – मालवा पर प्रभुत्व

आकर (पूर्वी मालवा) की राजधानी विदिशा तथा अवन्ति (पश्चिमी मालवा) की राजधानी उज्जयिनी थी। दोनों क्षेत्र व्यापार, संस्कृति और प्रशासनिक दृष्टि से केंद्रीय माने जाते थे। इनका अधिग्रहण यह दर्शाता है कि रुद्रदामन ने मालवा पर दृढ़ नियंत्रण स्थापित कर लिया था, जो आगे चलकर मालवा और गुजरात पर रुद्रदामन का नियंत्रण समझने में महत्वपूर्ण संदर्भ है।

 

अनूप – नर्मदा तट का सामरिक क्षेत्र

अनूप की स्थिति नर्मदा के किनारे माहिष्मती (आज का महेश्वर/मांडू) में मानी जाती है। नर्मदा घाटी अपने व्यापारिक मार्गों और नदी-आधारित आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध थी। इस क्षेत्र पर अधिकार से रुद्रदामन ने मध्य भारत के अंतर्देशीय मार्गों पर मजबूत पकड़ बना ली।

 

अपरान्त – समुद्री मार्गों का नियंत्रण

अपरान्त उत्तरी कोकण का हिस्सा था। इसकी राजधानी शूर्पारका (सोपारा) पश्चिमी व्यापार मार्गों का प्रमुख केंद्र थी। महाभारत में इसका संबंध परशुराम की भूमि से बताकर इस क्षेत्र को सांस्कृतिक महत्व भी मिला है। यह विजय रुद्रदामन की समुद्री और तटीय रणनीति को दर्शाती है।

 

आनर्त और सुराष्ट्र – काठियावाड़ पर अधिकार

आनर्त (उत्तरी काठियावाड़) की राजधानी द्वारका और सुराष्ट्र (दक्षिणी काठियावाड़) की राजधानी गिरिनगर थी। ये क्षेत्र आज के गुजरात में स्थित हैं और कृषि, व्यापार, तटीय गतिविधियों, तथा धार्मिक प्रवाह के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इस विजय से उसे पश्चिमी समुद्री मार्गों, विशेषकर अरब सागर के व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण मिला।

 

कुकुर, स्वभ्र और मरु – सरहदी सुरक्षा का आधार

इन क्षेत्रों पर अधिकार ने राजस्थान-काठियावाड़ सीमा पर स्थिरता स्थापित की। डी. सी. सरकार के अनुसार कुकुर उत्तरी काठियावाड़ में था। स्वभ्र साबरमती के तट पर स्थित था, जबकि मरु का संबंध मारवाड़ क्षेत्र से है। ये विजय भूमि-सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक एकीकरण के लिए आवश्यक थीं।

 

सिन्ध और सौवीर – निचली सिंधु घाटी का महत्व

निचली सिंधु घाटी राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र था। कनिष्क की सुई-विहार अभिलेख से ज्ञात होता है कि यह क्षेत्र कुषाणों के अधीन था। रुद्रदामन ने कनिष्क-अनुयायियों को हराकर यहाँ अधिकार स्थापित किया। यह उसकी सैन्य क्षमता का प्रबल प्रमाण है।

 

निषाद – उत्तरी सीमा का नियंत्रण

महाजनपद काल में मत्स्य के बाद इसका उल्लेख मिलता है। बूलर ने इसकी स्थिति हरियाणा-राजस्थान के हिसार-भटनेर क्षेत्र में मानी है। यह क्षेत्र यौधेयों के समीप था, इसलिए इसकी विजय उत्तरी मोर्चे की स्थिरता हेतु आवश्यक थी।

 

रुद्रदामन का साम्राज्य

 

सातवाहनों के साथ संघर्ष

 

जूनागढ़ अभिलेख में उल्लेख है कि रुद्रदामन ने “दक्षिणापथ के स्वामी शातकर्णि” को दो बार पराजित किया, पर संबंध की निकटता के कारण उसका वध नहीं किया। यह पराजित नरेश वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी था। नासिक अभिलेख से ज्ञात होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने आकर, अवन्ति, अनूप, कुकुर, अपरान्त आदि अनेक प्रदेशों पर अधिकार किया था। गौतमीपुत्र की मृत्यु के बाद इन प्रदेशों को उसके उत्तराधिकारी संभाल नहीं पाए और इसी अवसर का लाभ उठाकर रुद्रदामन ने उन्हें पुनः अपने अधिकार में ले लिया। यह संघर्ष प्राचीन भारत की पश्चिम-दक्षिण राजनीति को समझने की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है।

 

उत्तर दिशा में स्थिरता: यौधेयों का अधीनकरण

 

सिंध-सौवीर क्षेत्र को उसने कनिष्क के उत्तराधिकारियों से जीता होगा। जूनागढ़ अभिलेख स्वाभिमानी तथा अदम्य यौधेयों के साथ उसके युद्ध तथा उनकी पराजय का भी उल्लेख करता है, जिन्होंने संभवतः उत्तर की ओर से उसके राज्य पर आक्रमण किया होगा। यौधेय गणराज्य पूर्वी पंजाब में स्थित था। वे अत्यंत वीर तथा स्वाधीनता-प्रेमी थे। पाणिनि ने उन्हें ‘आयुधजीवी संघ’ अर्थात् ‘शस्त्रों के सहारे जीवित रहने वाला’ कहा है। यौधेयों को पराजित कर रुद्रदामन ने उन्हें अपने नियंत्रण में कर लिया तथा उसका राज्य उनके आक्रमणों से सदा के लिए सुरक्षित हो गया।

 

लोककल्याणकारी कार्य और प्रशासनिक कौशल

 

सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण

 

यह उसकी उपलब्धियों में सबसे प्रसिद्ध है। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में सुराष्ट्र में सुदर्शन झील, जिसका निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के समय में हुआ था तथा अशोक के समय में इससे नहरें निकलवाई गई थीं। लेकिन उसके काल में बांध भारी वर्षा के कारण टूट गया और उसमें 24 हाथ लंबी, इतनी ही चौड़ी तथा 75 हाथ गहरी दरार बन गई। इसके फलस्वरूप झील का सारा जल बह गया। इस दैवी विपत्ति से जनता का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया तथा चारों ओर हाहाकार मच गया। चूंकि इसके पुनर्निर्माण में बहुत अधिक धन की आवश्यकता थी, अतः उसकी मंत्रिपरिषद् ने इस कार्य के लिए धन-व्यय की स्वीकृति नहीं दी। किंतु रुद्रदामन ने जनता पर बिना कोई अतिरिक्त कर लगाए ही अपने व्यक्तिगत कोष से धन देकर अपने राज्यपाल सुविषाख के निर्देशन में बांध की मरम्मत करवाई तथा उससे तिगुना मजबूत बांध बनवाया। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक क्षमता, बल्कि प्रजा-हित के प्रति उसकी संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।

 

कर नीति, प्रजा-व्यवहार और प्रशासनिक ढाँचा

 

वह एक उदार शासक था, जिसने कभी अपनी प्रजा से न तो अनुचित धन वसूला और न ही बेगार (विष्टि) तथा प्रणय (पुण्यकर्म) ही लिया। उसका कोष स्वर्ण, रजत, होरे आदि बहुमूल्य धातुओं से परिपूर्ण था। उसके शासन में प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं था। उसने साम्राज्य को प्रांतों में विभक्त किया था। प्रत्येक प्रांत का शासन योग्य तथा विश्वासपात्र अमात्य (राज्यपाल) के अधीन रखा गया था। आनर्त-सुराष्ट्र प्रांत का शासक सुविषाख था। अन्य प्रादेशिक शासकों के विषय में हमें ज्ञात नहीं है। उसकी एक मंत्रिपरिषद् थी, जिसमें दो प्रकार के मंत्री होते थे,

  1. मतिसचिव (सलाहकार),
  2. कर्मसचिव (कार्यकारी मंत्री)

वह प्रशासनिक कार्य अपनी मंत्रिपरिषद् की परामर्श से ही करता था तथा शक्तिशाली होते हुए भी निरंकुश नहीं था। मतिसचिव उसके व्यक्तिगत सलाहकार होते थे, जबकि कर्मसचिव कार्यपालिका के अधिकारी थे। इन्हीं में से राज्यपाल, कोषाध्यक्ष, अधोक्षक आदि की नियुक्ति की जाती थी। जूनागढ़ अभिलेख में उसे ‘भ्रष्ट-राज-प्रतिष्ठापक’ कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के समान उसने भी पराजित राजाओं के राज्य पुनः वापस कर दिए थे। संभवतः ये शासक वे थे, जिन्हें पूर्व में गौतमीपुत्र शातकर्णि ने पराजित किया था, क्योंकि नासिक अभिलेख से पता चलता है कि उसने क्षत्रिय राजाओं का मान-मर्दन किया था।

 

सांस्कृतिक योगदान और संस्कृत का विकास

 

रुद्रदामन महान् विजेता एवं कुशल प्रशासक होने के साथ ही साथ एक उच्च कोटि का विद्वान् तथा विद्या प्रेमी था। वह वैदिक धर्मानुयायी था तथा संस्कृत भाषा को उसने राज्याश्रय प्रदान किया। उसका गिरनार शिलालेख अपनी शैली की रोचकता, भाव-प्रवणता एवं हृदयस्पर्शिता के लिए प्रसिद्ध है। वह वस्तुतः एक छोटा गद्य-काव्य ही है। इससे पता चलता है कि रुद्रदामन व्याकरण, राजनीति, संगीत तथा तर्कशास्त्र में प्रवीण था। उसे गद्य-पद्य रचना में निपुण बताया गया है। विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखा हुआ उसका अभिलेख प्राचीनतम अभिलेखों में से एक है तथा इससे उस समय संस्कृत भाषा के पर्याप्त विकसित रूप का प्रमाण मिलता है।

वह व्याकरण, राजनीति, संगीत और तर्कशास्त्र में निपुण था। उज्जयिनी उसके समय में शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी। गिरनार अभिलेख का कथन है कि वह अनेक स्वयंवरों में गया था तथा कई राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया था। इन उल्लेखों से प्रकट होता है कि उसके समय तक शक भारतीय समाज में पूर्णतः घुल-मिल चुके थे।

इस प्रकार रुद्रदामन एक महान् विजेता, साम्राज्य-निर्माता, उदार एवं लोकोपकारी प्रशासक तथा हिंदू धर्म एवं संस्कृति का महान् उन्नायक था। उसकी प्रतिभा बहुमुखी थी। उसका शासनकाल १३० ईस्वी से १५० ईस्वी तक सामान्यतः स्वीकार किया जाता है। उसका अंत किन परिस्थितियों में हुआ, यह हमें ज्ञात नहीं है। १५० ईस्वी के गिरनार अभिलेख के पश्चात् हम उसका नाम नहीं पाते। निस्संदेह, उसका शासनकाल पश्चिमी क्षत्रपों की शक्ति के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करता है।

 

रुद्रदामन के उत्तराधिकारी और शक सत्ता का अंत

 

रुद्रदामन की मृत्यु (150 ईस्वी के बाद) के पश्चात् शक-सत्ता में क्रमिक ह्रास प्रारम्भ हुआ। सिक्कों और अभिलेखों के आधार पर उत्तराधिकारियों का क्रम इस प्रकार स्पष्ट होता है,

  • दामयसद (दामदामन) – अल्पकालिक शासन
  • जीवदामन (178–179 ईस्वी)
  • रिक्ति-काल
  • रुद्रसिंह प्रथम (181–188 ईस्वी) – आभीर प्रभाव के कारण पदच्युत एवं पुनर्स्थापित
  • पुनः रिक्ति
  • जीवदामन का पुन: शासन (197–199 ईस्वी)
  • रुद्रसेन प्रथम (200–222 ईस्वी)
  • संग्रामदामन व दामसेन – जिनके काल में मालवा शकों के नियंत्रण से मुक्त हुआ

आभीर सेनापतियों रुद्रभूति तथा ईश्वरदत्त के उदय ने शक प्रशासन को कमजोर किया। अंततः पश्चिमी भारत का अंतिम शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय था, जिसे गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ने पराजित कर शक-सत्ता का अंतिम उन्मूलन किया।

 

निष्कर्ष: भारतीय इतिहास में रुद्रदामन का स्थान

 

रुद्रदामन एक महान विजेता, संगठित प्रशासक, उदार प्रजापालक और संस्कृत-संरक्षक के रूप में उभरता है। उसके शासनकाल में पश्चिमी क्षत्रप शक्ति अपने चरम पर पहुँची। रुद्रदामन का इतिहास और महत्व इस बात में निहित है कि उसने न केवल रणनीतिक विस्तार किया, बल्कि प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उसका शासन भारत की प्राचीन राजनीतिक संरचना में संतुलन, संगठन और सांस्कृतिक मिश्रण के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

 

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