भारत पर यवन प्रभाव: सांस्कृतिक, आर्थिक, कला एवं बौद्धिक परिवर्तन
भारत और यूनान के मध्य वास्तविक और प्रभावी संपर्क सिकंदर के अल्पकालीन आक्रमण से नहीं, बल्कि उसके बाद उभरे बैक्ट्रियन-यवन शासन से स्थापित हुआ। उत्तर-पश्चिमी भारत में उनकी उपस्थिति ने एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक संवाद की नींव रखी, जो आने वाली शताब्दियों तक भारतीय इतिहास में परिलक्षित होता रहा। भारत पर यवन प्रभाव केवल राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं था; एक ओर जहाँ यूनानी भारतीय धर्मों से गहराई से प्रभावित हुए, वहीं दूसरी ओर भारतीयों ने कला, विज्ञान, मुद्रा-प्रणाली, ज्योतिष आदि के क्षेत्रों में यूनानी संस्कृति से अनेक बातें ग्रहण कीं। जिसमें दोनों सभ्यताओं ने एक-दूसरे से ग्रहण किया और एक विशिष्ट इंडो-ग्रीक संश्लेषण का निर्माण हुआ।

यवन-भारतीय संपर्क की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
सिकंदर के बाद बैक्ट्रियन-यवन शासन का उदय
ईसा पूर्व 2वीं-1वीं शताब्दियों में बैक्ट्रिया से भारत में आए यवन, शकों और पार्थियों से पहले प्रभाव डालने वाले थे।
इनमें प्रमुख थे-
- डेमेट्रियस,
- एंटिमेकस,
- अपोलोडोटस,
- मेनांडर (मिलिंद)।
ग्रीक शिलालेख, पुरातात्त्विक अवशेष, सिक्के, और बौद्ध साहित्य इन हिन्द यवन शासकों की उपस्थिति, नीतियों और प्रभाव के प्रमुख स्रोत हैं।
यही वह दौर था जिसमें का आरंभिक और सबसे ठोस रूप दिखाई देता है।
धार्मिक एवं दार्शनिक प्रभाव: द्विपक्षीय आध्यात्मिक संवाद
मेनांडर का बौद्ध धर्म ग्रहण करना
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है हिन्द-यवन सम्राट मेनांडर, जिसने नागसेन से संवाद के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इस संवाद को “मिलिंदपन्हा” के रूप में साहित्यिक स्वरूप मिला, जिसमें-
- तर्कशास्त्र,
- धर्म की व्याख्या,
- तथा राजधर्म
पर गहन चर्चा मिलती है।
यह ग्रंथ दर्शाता है कि यवन शासक भारतीय दार्शनिक परंपराओं से कितने प्रभावित थे।
हेलियोडोरस स्तम्भ और वैष्णव प्रभाव
यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म अंगीकार कर लिया तथा विदिशा में विष्णु मन्दिर के समक्ष विष्णुध्वज की स्थापना की। यह उसके भागवत धर्म स्वीकार करने का स्पष्ट प्रमाण है। स्तम्भ पर लिखा है-
“देव-प्रियः भागवत-हेलियोडोरस”
भारतीय धर्मों पर यवनों के वास्तविक प्रभाव और उनके धार्मिक समन्वय का सबसे प्रामाणिक साक्ष्य है।
अन्य यवनों का भारतीय धर्म-संस्कृति अपनाना
उत्तरी भारत के पुरातात्त्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि अनेक यवन
- बौद्ध संघों के संरक्षक बने,
- दानपत्रों में भाग लिया,
- और भारतीय सामाजिक आचारों को अपनाते गए।
इसी प्रकार कुछ अन्य यवनों ने भी भारतीय धर्म, रहन-सहन आदि को अपना लिया था।
कला एवं स्थापत्य पर यूनानी प्रभाव: गंधार कला का विकास
दूसरी ओर भारत भी यवन प्रभाव से पूर्णतः अछूता न रहा। कला के क्षेत्र में स्पष्ट रूप से यूनानी प्रभाव का दर्शन होता है। कला की गंधार शैली की नींव इसी युग में पड़ी थी। इसमें भारतीय विषयों को यूनानी शैली में व्यक्त किया गया।
गंधार कला की विशेषताएँ
गंधार कला, भारत पर यवन प्रभाव का सर्वोत्तम दृश्य रूप है-
यहाँ भारतीय धार्मिक विषयों और यूनानी कला-शैली का संगम मिलता है।
प्रमुख विशेषताएँ—
- यथार्थवादी मानव आकृतियाँ,
- मांसल शरीर और ड्रेपरी,
- घुँघराले बाल और चेहरे की सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ,
यह शैली बाद में पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय हुई और गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प का आधार बनी।
स्थापत्य तकनीकों पर प्रभाव
यूनानी प्रभाव से,
- स्तम्भ-निर्माण,
- उत्कीर्णन शैली,
- तथा वास्तु-अनुपात
में भी नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं।
आर्थिक प्रभाव: सिक्का-प्रणाली और व्यापारिक परिवर्तनों पर यवन योगदान
भारतीय मुद्रा-प्रणाली में यूनानी नवाचार
हिन्द-यवन शासन का सबसे ठोस योगदान था डाई-स्ट्रक (साँचे में ढली) मुद्रा-प्रणाली।
यूनानी प्रभाव के बाद भारतीय सिक्कों में,
- सुडौल बनावट,
- यूनानी/खरोष्ठी लिपि,
- द्विभाषी अभिलेख,
- देव-प्रतीकों का कलात्मक चित्रण
स्पष्ट दिखाई देता है।
कुणिंद तथा औदुम्बर गणराज्यों के सिक्के यवन नरेश अपोलोडोटस के सिक्कों के अनुकरण पर ढाले गए हैं। इंडो-ग्रीक शासकों ने ही सर्वप्रथम अपने सिक्कों पर लेख उत्कीर्ण करवाए थे।
आर्थिक शब्दावली पर प्रभाव
मध्यकालीन अभिलेखों में “द्रम्म” शब्द (द्राख्मा) का प्रयोग स्पष्ट रूप से यूनानी परंपरा की याद दिलाता है।
विज्ञान, गणित और ज्योतिष पर यवन प्रभाव
ज्योतिष के क्षेत्र में भी भारत ने यूनान से प्रेरणा ली। बृहत्संहिता में कहा गया है कि “यवन म्लेच्छ हैं, किन्तु ज्योतिष का जन्म उनसे ही हुआ है, अतः वे ऋषियों के समान सम्मान के योग्य हैं।” यह यूनानी खगोलविद्या की भारतीय स्वीकार्यता का स्पष्ट संकेत है।
ज्योतिष के पाँच सिद्धांत और यूनानी संपर्क
भारतीय ग्रंथों में उल्लेखित पाँच सिद्धांत,
- पैतामह
- वसिष्ठ
- सूर्य
- पोलिश
- रोमक
इनमें अंतिम दो सिद्धांत सीधे यवन संपर्क से जुड़े माने जाते हैं।
- पोलिश सिद्धांत सिकन्दरिया के विद्वान पौलिष पर आधारित प्रतीत होता है।
- रोमक सिद्धांत में नक्षत्रों के नाम यूनानी मूल के मिलते हैं।
वराहमिहिर और यूनानी-बेबीलोनियन प्रभाव
रोमक के संदर्भ में वराहमिहिर ने जिन नक्षत्रों के नाम गिनाए हैं, वे यूनानी मूल के लगते हैं। वराहमिहिर के ‘होरा’ विषयक ज्ञान, जो कुंडलियों से संबंधित है, पर यूनानी खगोलशास्त्र का प्रभाव स्पष्टतः दिखाई देता है। संभवतः इस विद्या का उद्भव बेबीलोन में हुआ था और वहाँ से यह यूनान तथा अन्य देशों में पहुँची। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित अनेक शब्द जैसे- केन्द्र, हारिज, लिप्त, द्रक्कन आदि यूनानी भाषा से ही लिये गये प्रतीत होते है।
इतिहासकार टार्न के अनुसार निश्चित तिथि से काल-गणना की प्रथा, संवतों का प्रयोग तथा सप्ताह का सात दिनों में विभाजन आदि भारतीयों ने यूनानियों से ही सीखा।
चिकित्सा, साहित्य और दर्शन पर सांस्कृतिक प्रभाव
इसी प्रकार यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स तथा भारतीय चिकित्साशास्त्री चरक के सिद्धांतों में अनेक समानताएँ दिखाई देती है।
चरक और हिप्पोक्रेट्स की समानताएँ
भारतीय चिकित्साशास्त्री चरक और यूनानी वैद्य हिप्पोक्रेट्स के सिद्धांतों में
- निदान पद्धति,
- आहार-विहार,
- और चिकित्सक-प्रतिज्ञा
में उल्लेखनीय समानता मिलती है।
यह दर्शाता है कि चिकित्सा-ज्ञान का आदान-प्रदान दोनों सभ्यताओं के बीच सक्रिय था।
नाट्यपरंपरा और यूनानी प्रभाव
दर्शन के क्षेत्र में भी भारतीयों तथा यूनानियों के बीच अनेक समानताएँ हैं। बेबर आदि कुछ विद्वान् भारतीय नाटकों का उद्भव भी यूनानी नाटको से ही बताते हैं। संस्कृत नाट्यशास्त्र में प्रयुक्त ‘यवनिका’ (पर्दा) शब्द यूनानी मूल का माना जाता है।
कुछ विद्वान ‘मृच्छकटिक’ की तुलना यूनानी ‘न्यू एटिक कामेडी’ (New Attic Comedy) से करते हैं, यह साहित्यिक प्रभाव का प्रमाण है। संस्कृत शब्दकोशों में स्याही, कलम, फलक आदि के लिए जो शब्द मिलते हैं, वे यूनानी भाषा से लिए गए लगते हैं।
भारतीय संस्कृति की मूल संरचना पर सीमित प्रभाव
भारत पर यवन प्रभाव व्यावहारिक क्षेत्रों, कला, सिक्के, तकनीक, ज्योतिष, में स्पष्ट दिखाई देता है। इन व्यापक संपर्कों और प्रभावों के बावजूद यह सत्य है कि भारतीय संस्कृति के मूल तत्व, उसकी आध्यात्मिकता, दार्शनिक गहराई, सामाजिक संरचना और मूल्य-व्यवस्था, यवन प्रभाव से मूलतः अप्रभावित ही रहे। भारत ने यवनों से बहुत कुछ ग्रहण किया, परंतु यह ग्रहणशीलता भारतीय संस्कृति की उस विशिष्ट क्षमता का प्रतीक है, जिसमें बाहरी तत्वों को आत्मसात करते हुए भी अपनी मूल पहचान को सुरक्षित रखा जाता है। अतः भारतीय सभ्यता पर यवन प्रभाव महत्वपूर्ण अवश्य था, किंतु निर्णायक या रूपांतरणकारी नहीं। भारतीय संस्कृति ने इस प्रभाव को अपने अनुसार ढाल लिया, जिससे वह और अधिक बहुआयामी तो बनी, परंतु अपनी मूल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धारा से विचलित नहीं हुई।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
