
भारतीय इतिहास में विजयनगर साम्राज्य का स्थान
भारत का इतिहास केवल उत्तर भारत की सल्तनतों और मुग़ल शासन तक सीमित नहीं है; दक्षिण भारत ने भी ऐसे महान साम्राज्यों को जन्म दिया जिन्होंने न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और स्थापत्य दृष्टि से भी भारत की आत्मा को समृद्ध किया। इन्हीं में से एक था विजयनगर साम्राज्य, जिसने 14वीं से 16वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत को स्थिरता, समृद्धि और गौरव प्रदान किया।
जब उत्तर भारत दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों से जूझ रहा था, तब दक्षिण भारत में एक नए युग का आरंभ हुआ, एक ऐसा युग जिसने हिंदू संस्कृति के पुनरुत्थान और क्षेत्रीय एकता को सशक्त किया। इसी काल में उभरा था विजयनगर साम्राज्य, जिसकी राजधानी हम्पी आज भी अपनी स्थापत्य भव्यता और वैभव की गवाही देती है।
इस ब्लॉग का उद्देश्य इतिहास के शोधार्थियों को “विजयनगर साम्राज्य” की सम्पूर्ण यात्रा, इसकी स्थापना, राजनीतिक संरचना, आर्थिक नीति, सांस्कृतिक उत्थान, संघर्षों, और पतन, के माध्यम से उस स्वर्ण युग को पुनः जीवित करना है जिसने दक्षिण भारत को पहचान दी।
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना और उदय
राजनीतिक पृष्ठभूमि और आवश्यकता
14वीं शताब्दी के प्रारंभ में, जब दिल्ली सल्तनत का प्रभाव दक्षिण भारत में बढ़ रहा था, तब वहां की प्राचीन राज्य व्यवस्थाएँ, जैसे होयसल, काकतीय, पांड्य और चोल, पतन की ओर अग्रसर थीं। दिल्ली के सुल्तानों के निरंतर आक्रमणों से दक्षिण भारत में अराजकता फैल गई थी। यही वह समय था जब स्थानीय शासकों और धार्मिक गुरुओं ने यह अनुभव किया कि एक संगठित शक्ति की आवश्यकता है जो दक्षिण को इस अस्थिरता से बचा सके।
इसी ऐतिहासिक आवश्यकता से जन्म लिया “विजयनगर साम्राज्य” ने, जिसने न केवल राजनीतिक एकता प्रदान की बल्कि दक्षिण भारत को आर्थिक रूप से भी पुनर्जीवित किया।
संगम वंश की स्थापना (1336 ई.)
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में दो भाइयों हरिहर और बुक्का राय ने की थी। परंपरा के अनुसार, ये दोनों पहले वारंगल के काकतीय शासक के सामंत थे और बाद में कंपिली के शासक की सेवा में रहे। जब मुहम्मद बिन तुगलक ने कंपिली पर कब्जा किया, तो दोनों भाइयों को दिल्ली भेजा गया, जहाँ कथानुसार उन्हें इस्लाम में परिवर्तित किया गया। लेकिन जब दक्षिण में तुर्की शासन के खिलाफ विद्रोह हुआ, तो उन्होंने धर्म परिवर्तन त्याग दिया और विद्रोहियों में शामिल होकर स्वतंत्र राज्य की नींव रखी।
हालाँकि आधुनिक इतिहासकार इस कथा को पूरी तरह सत्य नहीं मानते, परंतु यह निर्विवाद है कि हरिहर और बुक्का ने दक्षिण में एक शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य की स्थापना की, जो होयसल और काकतीय परंपराओं का उत्तराधिकारी था।
संत विद्यारण्य की भूमिका
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के पीछे एक महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति थे संत विद्यारण्य। वे शृंगेरी मठ के प्रमुख आचार्य थे और उन्होंने हरिहर व बुक्का को राजनीतिक एकता और धार्मिक पुनर्जागरण के लिए प्रेरित किया। कहा जाता है कि उनकी सलाह पर ही तुंगभद्रा नदी के किनारे नई राजधानी “विजयनगर” (अर्थात विजय का नगर) की स्थापना की गई।
विद्यारण्य ने विजयनगर साम्राज्य को न केवल आध्यात्मिक वैधता दी, बल्कि उसे हिंदू संस्कृति के संरक्षण का केंद्र बनाया। यही कारण है कि विजयनगर साम्राज्य को अक्सर “हिंदू धर्म का किला (Citadel of Hinduism)” कहा गया।
राजधानी हम्पी का उत्कर्ष
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं थी, बल्कि यह कला, स्थापत्य और व्यापार का भी केंद्र बन गई। पहाड़ियों और तुंगभद्रा नदी से घिरी इस नगरी को इस प्रकार बसाया गया था कि यह युद्ध के समय प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान कर सके।
हम्पी के विरुपाक्ष मंदिर, विट्ठल मंदिर और राजमहल परिसर आज भी इस स्वर्ण युग की झलक दिखाते हैं। विदेशी यात्री निकोलो कॉन्टी, अब्दुर रज्जाक और बाद में डोमिंगो पेस ने हम्पी को “उस समय के सबसे समृद्ध और भव्य शहरों में से एक” बताया है।
प्रारंभिक विस्तार और राजनीतिक एकीकरण
हरिहर प्रथम (1336–1356 ई.) और बुक्का प्रथम (1356–1377 ई.) के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य ने तेजी से विस्तार किया। हरिहर ने होयसल राज्य के अवशेषों को अपने अधीन किया और तुंगभद्रा नदी के तट पर प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। बुक्का ने दक्षिण की ओर अभियान चलाकर मदुरै सल्तनत को समाप्त किया, जिससे साम्राज्य की सीमाएँ रामेश्वरम तक फैल गईं।
इसी काल में विजयनगर साम्राज्य का सामना बहमनी सल्तनत से हुआ, जिसने उत्तर में अपनी शक्ति स्थापित की थी। यह संघर्ष आगे आने वाली दो शताब्दियों तक दक्षिण भारतीय राजनीति की धुरी बना रहा।
विजयनगर साम्राज्य: दक्षिण भारत का प्रतिनिधि शासन
दिल्ली सल्तनत की तर्ज पर उभरने वाला विजयनगर साम्राज्य केवल क्षेत्रीय सत्ता नहीं था। इसमें कन्नड़, तेलुगु और तमिल परंपराओं का समन्वय हुआ, जिससे यह “दक्षिण भारत की एकीकृत सांस्कृतिक सत्ता” के रूप में उभरा। यह साम्राज्य हिंदू पुनरुत्थान का प्रतीक तो था ही, परंतु यह केवल धार्मिक विचारों तक सीमित नहीं रहा। हरिहर और बुक्का के शासन में व्यापार, सिंचाई, और प्रशासनिक सुधारों ने राज्य को स्थिरता प्रदान की।
विजयनगर साम्राज्य के उत्थान के कारण
विजयनगर साम्राज्य के तीव्र उत्थान के पीछे कुछ ठोस कारण थे –
- भौगोलिक स्थिति: तुंगभद्रा नदी का तटीय क्षेत्र प्राकृतिक सुरक्षा और कृषि संपन्नता दोनों प्रदान करता था।
- राजनीतिक रिक्तता: दिल्ली सल्तनत के पतन और स्थानीय रियासतों की दुर्बलता ने नए साम्राज्य के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
- धार्मिक एकता और प्रेरणा: संत विद्यारण्य जैसे गुरुओं ने इसे वैचारिक आधार दिया।
- कुशल नेतृत्व: हरिहर और बुक्का जैसे सक्षम शासक जिन्होंने प्रशासन और सैन्य संगठन को सुदृढ़ किया।
- आर्थिक पुनरुत्थान: कृषि, सिंचाई और व्यापारिक नेटवर्क ने राज्य को आत्मनिर्भर बनाया।
विजयनगर साम्राज्य का प्रशासनिक ढाँचा
केंद्रीकृत लेकिन विकेन्द्रीकृत शासन प्रणाली
विजयनगर साम्राज्य की सबसे बड़ी विशेषता थी, इसका संतुलित प्रशासनिक ढाँचा, जो एक ओर राजा की केंद्रीकृत शक्ति को दर्शाता था, तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकरण की अनुमति देता था। राजा को सर्वोच्च माना गया, परंतु स्थानीय शासकों और नायकों को भी पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे। यह प्रणाली इतनी सुव्यवस्थित थी कि विशाल साम्राज्य को शांति और स्थिरता के साथ दो से अधिक शताब्दियों तक संचालित किया जा सका।
विजयनगर शासन की मूल भावना “धर्म, नीति और शक्ति का संतुलन” थी। जहाँ उत्तर भारत में तुर्की सल्तनतें अत्यधिक केंद्रीकृत थीं, वहीं विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण की पारंपरिक संस्थाओं, जैसे ग्राम पंचायत, मंदिर प्रशासन और स्थानीय परिषदों को बनाए रखा।
राजा की शक्तियाँ और दरबार व्यवस्था
राजा विजयनगर साम्राज्य की आत्मा था। उसे दैवी सत्ता का प्रतिनिधि माना जाता था और उसके निर्णय अंतिम होते थे। शासक न केवल राजनीतिक मुखिया था, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षक भी।
अब्दुर रज्जाक, जो फारस से आए दूत थे, उन्होंने लिखा कि “राजा का दरबार एक चिहल सितून (चालीस स्तंभों वाला) विशाल हॉल था जहाँ मंत्री, लेखक और सेनापति बैठते थे।” इससे स्पष्ट होता है कि दरबार केवल वैभव का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह शासन का केंद्र भी था जहाँ राज्य के सभी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे।
राजा की सहायता के लिए एक मंत्री परिषद (Council of Ministers) थी, जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित पद शामिल थे –
- प्रधान मंत्री (Mahapradhana) – नीतियों और राज्य की देखरेख का प्रमुख अधिकारी।
- महादंडनायक – न्याय और कानून व्यवस्था का प्रमुख।
- महासेनापति – सेना का सर्वोच्च कमांडर।
- महाबंधारी – राजकोष और वित्त का प्रमुख अधिकारी।
- महामात्य – राजस्व एवं प्रशासनिक नियंत्रण अधिकारी।
इन अधिकारियों का चयन योग्यता, निष्ठा और अनुभव के आधार पर होता था।
नायंकार व्यवस्था (Nayankara System)
विजयनगर प्रशासन की सबसे विशिष्ट विशेषता थी, नायंकार व्यवस्था। चोल काल और विजयनगर युग के राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही नायंकार व्यवस्था है। नायक (या नायंक) वे सैन्य प्रमुख थे जिन्हें राज्य की सीमाओं की रक्षा, सैनिकों की भर्ती, और स्थानीय शासन का दायित्व दिया जाता था। इसके बदले में उन्हें एक निश्चित क्षेत्र, अमरम (Amaram) दिया जाता था, जिसकी आय से वे अपने सैनिकों का पालन करते थे।
नायक व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ:
- सैन्य दायित्व: प्रत्येक नायक को अपने क्षेत्र से एक निश्चित संख्या में घोड़े, हाथी और सैनिक बनाए रखना अनिवार्य था।
- राजस्व अधिकार: नायक अपने क्षेत्र से कर वसूल कर अपने सैनिकों का भुगतान करते थे, परंतु राज्य को वार्षिक कर देना अनिवार्य था।
- वंशानुगत अधिकार: नायक का पद प्रायः वंशानुगत था, किंतु राजा की अनुमति से ही वैध माना जाता था।
- राजकीय निष्ठा: प्रत्येक नायक राजा की अधीनता स्वीकार करता था और संकट के समय अपने सैनिकों सहित साम्राज्य की रक्षा में उपस्थित होता था।
यह प्रणाली तुर्की इक्ता व्यवस्था से भिन्न थी, क्योंकि विजयनगर के नायक राजा के दास नहीं, बल्कि अर्ध-स्वायत्त क्षेत्रीय सरदार थे। उन्होंने स्थानीय प्रशासन में बड़ी भूमिका निभाई। 16वीं शताब्दी तक नायकों की संख्या 200 थी और इन नायकों को सबसे अधिक तमिलनाडु में नियुक्त किया गया था।
नीलकंठ शास्त्री जैसे इतिहासकारों ने इसे “War-State Administration” कहा है, क्योंकि साम्राज्य की आय का बड़ा भाग सैन्य आवश्यकताओं पर व्यय होता था। राजा अपनी कुल आय का लगभग आधा भाग युद्ध-संबंधी कार्यों के लिए सुरक्षित रखता था। नायंकार व्यवस्था में सामंतवादी लक्षण बहुत अधिक थे जो कालांतर विजयनगर सामाज्य के विनाश का कारण बने। कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद अच्युतदेव राय के शासन काल मे नायकों की मनमानी को रोकने के लिए महामंडलेश्वर की नियुक्ति की गई।
सैन्य संगठन और स्थायी सेना
विजयनगर साम्राज्य की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य था उसकी संगठित और अनुशासित सेना। विदेशी यात्री अब्दुर रज्जाक के अनुसार, साम्राज्य की सेना में लगभग 11 लाख सैनिक थे, जिनमें से बड़ी संख्या घुड़सवार और हाथी सैनिकों की थी।
सेना की संरचना:
- पैदल सेना (Infantry)
- घुड़सवार सेना (Cavalry)
- हाथी दल (Elephant Corps)
- नौसेना (Navy) – विशेष रूप से कृष्णदेव राय के काल में विकसित।
विजयनगर शासकों ने मुस्लिम घुड़सवारों को भी सेना में शामिल किया, जो धनुष और अश्वकला में निपुण थे। यह दर्शाता है कि विजयनगर साम्राज्य केवल धार्मिक भावनाओं पर आधारित शासन नहीं था, बल्कि उसने व्यवहारिकता और रणनीति को प्राथमिकता दी। सेना को नियमित वेतन दिया जाता था और युद्ध के समय सैनिकों को जागीर या उपहार भूमि दी जाती थी।
न्याय प्रणाली और विधिक परंपराएँ
न्याय की स्थापना धर्मशास्त्र और राजनीतिक संहिताओं पर आधारित थी। राजा सर्वोच्च न्यायाधिकारी था, लेकिन स्थानीय स्तर पर पंचायतें और नायक भी न्याय करते थे। मामले दो स्तरों पर निपटाए जाते थे –
- ग्राम स्तर: छोटे अपराधों और विवादों का निपटारा स्थानीय पंचायतें करती थीं।
- राज्य स्तर: गंभीर अपराधों (हत्या, देशद्रोह, भूमि विवाद आदि) का निर्णय राजा या उसका प्रतिनिधि देता था।
दंड प्रणाली कठोर थी, चोरी और विद्रोह के मामलों में संपत्ति जब्ती या निर्वासन आम था। हालाँकि न्याय व्यवस्था धार्मिक पक्षपात से मुक्त थी; मुस्लिम और विदेशी व्यापारियों को भी निष्पक्ष न्याय मिलता था।
प्रशासनिक विशेषताएँ
| तत्व | विशेषता |
| शासन प्रणाली | केंद्रीकृत लेकिन विकेन्द्रीकृत प्रशासन |
| प्रमुख संस्था | नायंकार व्यवस्था (Nayankara System) |
| राजस्व नीति | भूमि आधारित कर, सिंचाई पर बल |
| सेना | विशाल और मिश्रित (हिंदू-मुस्लिम सैनिक दोनों) |
| न्याय प्रणाली | धर्म और नीति पर आधारित न्याय |
संक्षेप में, विजयनगर साम्राज्य ने एक ऐसा प्रशासनिक मॉडल प्रस्तुत किया जो न केवल राजनीतिक रूप से सफल था, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक संतुलन का भी आधार बना। नायक व्यवस्था, स्थानीय स्वायत्तता और राजकीय अनुशासन, इन तीनों ने मिलकर इस साम्राज्य को मध्यकालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक उदाहरण बना दिया।
विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक स्थिति और सांस्कृतिक उत्कर्ष
कृषि व्यवस्था और भूमि राजस्व नीति
विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि का मूल आधार था, कृषि व्यवस्था। दक्षिण भारत की उपजाऊ भूमि, विशेषकर तुंगभद्रा, कृष्णा और गोदावरी नदियों के तटवर्ती क्षेत्र, साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ थे। यहाँ धान, जौ, गन्ना, कपास और मसाले बड़ी मात्रा में उत्पन्न होते थे। विजयनगर शासकों ने जलाशयों, नहरों और बाँधों के निर्माण में विशेष रुचि दिखाई। देवराय प्रथम ने हरिद्रा नदी पर बाँध बनवाया जिससे सैकड़ों एकड़ भूमि सिंचित हुई। कृष्णदेव राय के काल में भी कई जलाशय और नहरें बनाई गईं। जल प्रबंधन में यह साम्राज्य अपने समय से काफी आगे था, यह कारण था कि सूखे के समय भी उत्पादन प्रभावित नहीं होता था।
भूमि से प्राप्त राजस्व साम्राज्य की मुख्य आय थी। कर की दर भूमि की उपज पर निर्भर करती थी, सामान्यतः 1/6 से 1/4 भाग तक। राजस्व वसूली स्थानीय अधिकारियों, गांवुंडा, कारणम और नायक के माध्यम से की जाती थी। शिष्ट नामक कर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था।
भूमि को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा गया था –
- राजभूमि: सीधे राज्य के अधीन क्षेत्र, जिनसे कर सीधे राजकोष में जाता था। ऐसे ग्राम को भंडारवाद ग्राम भी कहते थे।
- अमरम भूमि: नायकों को प्रदत्त क्षेत्र, जिनसे कर का एक भाग राज्य को मिलता था।
- देवदाय भूमि: मंदिरों और मठों को करमुक्त भूमि, जिनसे धार्मिक संस्थाएँ संचालित होती थीं। पूरे विजयनगर काल मे पूरे साम्राज्य में भू-राजस्व की दरें समान नही थीं, ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली भूमि उपज का बीसवाँ भाग तथा मंदिरों की भूमि से उपज का तीसवाँ भाग लगान के रूप में लिया जाता था।
इन नीतियों के कारण विजयनगर साम्राज्य में कृषि उत्पादन निरंतर बढ़ता गया, जिससे राज्य आत्मनिर्भर बन गया।
व्यापारिक मार्ग और अंतरराष्ट्रीय संबंध
विजयनगर साम्राज्य केवल कृषि पर निर्भर नहीं था; यह समुद्री व्यापार का भी एक प्रमुख केंद्र था। हम्पी, होनावर, बिदर, नागपट्टनम, और कालीकट जैसे बंदरगाह व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र बने। साम्राज्य के व्यापारी अरब, फ़ारसी और पुर्तगाली व्यापारियों के साथ सक्रिय संपर्क में थे। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने गोवा को अपना व्यापारिक अड्डा बनाया और विजयनगर दरबार के साथ घोड़ों, मसालों और रेशम का आदान-प्रदान किया।
विदेशी यात्रियों के अनुसार, विजयनगर साम्राज्य से निर्यात किए जाने वाले प्रमुख सामान थे –
- मसाले (काली मिर्च, इलायची)
- रेशम और सूती वस्त्र
- हाथी दाँत, कीमती पत्थर
- चंदन और धातुएँ
आयातित वस्तुओं में मुख्य थे, घोड़े, मोती, और विलासिता के सामान। विदेशी व्यापार से प्राप्त राजस्व ने साम्राज्य को अत्यधिक समृद्ध बनाया। अब्दुर रज्जाक ने लिखा है कि “राजा के अधीन तीन सौ बंदरगाह हैं, जिनमें से प्रत्येक कलिकट जितना बड़ा है।” यह कथन साम्राज्य की आर्थिक शक्ति का संकेत है।
विजयनगर साम्राज्य कालीन मुद्रा व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य की मुद्रा प्रणाली भारत की सबसे प्रशंसनीय और सुव्यवस्थित प्रणालियों में से एक थी। इस साम्राज्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिक्का स्वर्ण का ‘वराह’ था, जिसका उल्लेख विदेशी यात्रियों ने हूण, परदौस या पगोडा के रूप में किया है। सोने के छोटे सिक्कों को प्रताप और फणम, जबकि चाँदी के छोटे सिक्कों को तार कहा जाता था। विजयनगर का वराह सिक्का अत्यंत सम्मानित माना जाता था और इसे न केवल सम्पूर्ण भारत में, बल्कि विश्व के प्रमुख व्यापारिक नगरों में भी स्वीकार किया जाता था, जो विजयनगर की आर्थिक समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक प्रतिष्ठा का प्रमाण था।
हम्पी: व्यापारिक और सांस्कृतिक राजधानी
हम्पी, विजयनगर की राजधानी, उस युग में एक “विश्व महानगर” की तरह थी। विदेशी यात्रियों निकोलो कॉन्टी, अब्दुर रज्जाक, डोमिंगो पेस, और फर्नाओ नुनेस ने इसकी समृद्धि और वैभव की प्रशंसा की है।
निकोलो कॉन्टी (1420 ई.) ने लिखा, “विजयनगर शहर की परिधि साठ मील है, और इसके भीतर नब्बे हजार सशस्त्र सैनिक रहते हैं। इसका राजा भारत के सभी राजाओं से अधिक शक्तिशाली है।”
अब्दुर रज्जाक ने कहा, “यह शहर सात दुर्गों से घिरा है। भीतर के बाजार इतने बड़े हैं कि उनमें सोने-चाँदी से बने वस्त्र और कीमती रत्न खुलेआम बिकते हैं।”
डोमिंगो पेस ने विजयनगर को रोम से भी बड़ा बताया, “मैंने ऐसा शहर कभी नहीं देखा जहाँ मंदिर, महल और बाजार इतने भव्य और सुव्यवस्थित हों।”
हम्पी में व्यापार के लिए अलग-अलग क्षेत्र थे –
- कसाई और धातु बाजार
- वस्त्र बाजार
- रत्न बाजार (Moti Bazaar)
सोने, मसालों और रेशम का व्यापार
विजयनगर साम्राज्य “मसालों का साम्राज्य” भी कहा जाता था। दक्षिण भारत के तटीय इलाकों से मसालों, काली मिर्च और इलायची का निर्यात अरब और यूरोप तक होता था। राज्य के स्वर्ण और रेशम उद्योग ने भी वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त की। कृष्णदेव राय के काल में हम्पी के बाजारों में “सोना और रत्न खुले में बिकते थे”, यह विवरण विदेशी यात्रियों के वर्णनों में बार-बार मिलता है। यह समृद्ध व्यापारिक तंत्र विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक स्थिरता का मूल था, जिसने न केवल राजकोष को समृद्ध किया बल्कि राज्य को सांस्कृतिक रूप से भी उन्नत बनाया।
विजयनगर साम्राज्य की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
स्थापत्य कला: भव्यता और वैभव का प्रतीक
विजयनगर साम्राज्य स्थापत्य और मूर्तिकला के क्षेत्र में स्वर्ण युग था। हम्पी के मंदिरों और राजमहलों में हिंदू, द्रविड़ और दक्कनी स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
मुख्य मंदिर:
- विरुपाक्ष मंदिर – यह विजयनगर साम्राज्य की आध्यात्मिक आत्मा था।
- विट्ठलस्वामी मंदिर – इसका रथ मंदिर आज भी भारतीय स्थापत्य की उत्कृष्ट मिसाल है।
- हजारराम मंदिर, हजारमहल, और लोटस महल – राजकीय वैभव के प्रतीक।
मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के भी केंद्र थे, जहाँ से भूमि दान, शिक्षा, और कला संरक्षण का संचालन होता था।
मूर्तिकला और चित्रकला का उत्कर्ष
विजयनगर काल की मूर्तिकला अपनी जीवंतता और सूक्ष्मता के लिए प्रसिद्ध है। शिल्पकारों ने ग्रेनाइट पत्थरों से ऐसी मूर्तियाँ गढ़ीं जो आज भी जीवंत प्रतीत होती हैं। विट्ठल मंदिर का संगीत स्तंभ (Musical Pillar) इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जिसकी प्रत्येक स्तंभ से अलग-अलग ध्वनि निकलती है। चित्रकला में हम्पी की भित्तिचित्र शैली प्रसिद्ध थी, जिसमें धार्मिक और पौराणिक दृश्यों को जीवंत रूप में अंकित किया गया।
संगीत, नृत्य और साहित्य का उत्कर्ष
कृष्णदेव राय के काल में विजयनगर साम्राज्य का सांस्कृतिक उत्कर्ष चरम पर पहुँचा। उन्होंने स्वयं तेलुगु भाषा में महान ग्रंथ “आमुक्तमाल्यदा” की रचना की, जिसमें राज्यशासन और धर्मनीति का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में साहित्यिक कृतियाँ रची गईं। राजा के दरबार में आष्टदिग्गज नामक आठ कवियों का समूह था, जिनमें अल्लासानी पेदन्ना प्रमुख थे। नृत्य और संगीत में भरतनाट्यम और कर्नाटक संगीत को प्रोत्साहन मिला। मंदिरों में नृत्यांगनाओं (देवदासियों) द्वारा भक्ति नृत्य प्रस्तुत किए जाते थे।
धर्म और सामाजिक जीवन: सहिष्णुता की मिसाल
हालाँकि विजयनगर साम्राज्य हिंदू धर्म के संरक्षण का केंद्र था, परंतु इसमें धार्मिक सहिष्णुता की भावना स्पष्ट थी। शुरुआत में शैव प्रभाव अधिक था, पर बाद में वैष्णव, जैन और यहाँ तक कि मुस्लिम सैनिकों और व्यापारियों को भी समान सम्मान मिला। अब्दुर रज्जाक ने लिखा, “सेना में नियुक्त मुस्लिम सैनिकों को नमाज़ पढ़ने की पूरी स्वतंत्रता दी गई थी।”
ब्राह्मणों को भूमि दान देना, मंदिरों की देखरेख करना, और धार्मिक उत्सवों को राज्य प्रायोजित करना, यह सब राज्य की परंपरा का हिस्सा था। इसीलिए विजयनगर को ‘धर्म, शक्ति और संस्कृति का त्रिवेणी संगम’ कहा गया।
कृष्णदेव राय का काल: विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण युग
परिचय: दक्षिण भारत में शक्ति और संतुलन का चरम बिंदु
जब 16वीं शताब्दी की शुरुआत में कृष्णदेव राय ने सिंहासन संभाला (1509 ई.), तब विजयनगर साम्राज्य न केवल बहमनी साम्राज्य के अवशेषों से घिरा हुआ था, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं। उत्तर में दक्कन के मुस्लिम सल्तनतें बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर धीरे-धीरे संगठित हो रही थीं, जबकि पूर्व में उड़ीसा का गजपति राज्य भी सक्रिय था। इन परिस्थितियों में कृष्णदेव राय का शासन उस “राजनीतिक संतुलन” का प्रतीक बना, जिसने विजयनगर को न केवल सुदृढ़ किया बल्कि दक्षिण भारत को स्थायित्व दिया।
वास्तव में कृष्णदेव राय का युग केवल राजनीतिक विस्तार का नहीं था; यह एक संस्कृति, शासन और अर्थनीति के समन्वय का काल था, जिसने विजयनगर साम्राज्य को अपने चरम पर पहुँचा दिया।
राजनीतिक दृष्टि से: स्थिरता, विजय और कूटनीति
कृष्णदेव राय का शासनकाल (1509–1529 ई.) “संगठित शक्ति और निर्णायक नेतृत्व” का काल कहा जा सकता है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी, राज्य की स्थिरता और सीमाओं का पुनर्गठन। उन्होंने पहले उड़ीसा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव को पराजित किया और उड़ीसा के दक्षिणी क्षेत्रों (कंधमाल और कटक तक) को विजयनगर साम्राज्य में सम्मिलित किया। इसके बाद उन्होंने उत्तर-पश्चिम में बहमनी उत्तराधिकारी राज्यों पर ध्यान केंद्रित किया, विशेषकर बीजापुर और गोलकुंडा पर।
रायचूर युद्ध (1520 ई.) – सैन्य शक्ति की पराकाष्ठा
कृष्णदेव राय की सैन्य प्रतिभा का सबसे बड़ा उदाहरण था, रायचूर दोआब का युद्ध। 1520 ई० में उसने बीजापुर को पराजित करके सम्पूर्ण रायचूर दोआब पर अधिकार कर लिया। यह क्षेत्र (कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच) सदियों से विजयनगर और बहमनी के बीच संघर्ष का केंद्र था। बीजापुर के आदिल शाह ने इस पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसे कृष्णदेव राय ने पुनः प्राप्त करने का निश्चय किया।
उन्होंने लगभग 7 लाख सैनिकों की विशाल सेना संगठित की, जिसमें घुड़सवार, हाथी और तोपखाने शामिल थे। विदेशी यात्रियों के अनुसार, युद्ध इतनी भीषण था कि “धरती तोपों और घोड़ों की गर्जना से काँप उठी।” अंततः विजयनगर सेना विजयी हुई और रायचूर पर पुनः अधिकार स्थापित किया गया।
यह विजय केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकवाद के रूप में भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे विजयनगर ने दक्षिण भारत में अपनी सर्वोच्चता पुनः सिद्ध कर दी और दक्कन की मुस्लिम सल्तनतों को अस्थायी रूप से पीछे धकेल दिया।
कृष्णदेव राय ने बीदर और गुलबर्गा पर आक्रमण करके बहमनी सुल्तान महमूदशाह को कारागार से मुक्त करके बीदर की राजगद्दी पर आसीन किया और इस उपलब्धि की स्मृति में कृष्णदेव राय ने यदवाचार्य (या यदवराज स्थापानाचार्य) का विरुद्ध धारण किया।
आंतरिक शासन और प्रशासनिक सुधार
कृष्णदेव राय ने राज्य के भीतर प्रशासनिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने नायक व्यवस्था को पुनर्गठित किया। नायक अब केवल सैन्य सरदार नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन के उत्तरदायी अधिकारी बन गए। उन्होंने नायकों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रत्यक्ष राजकीय नियंत्रण की नीति अपनाई। यहाँ उन्होंने “केन्द्र–परिधि संबंध” को सशक्त किया, राजा सर्वोच्च था, परंतु स्थानीय स्वायत्तता भी सुरक्षित रही।
राजस्व नीति में भी उन्होंने नवाचार किए।
- उन्होंने भूमि के सर्वेक्षण और कर निर्धारण को संगठित किया।
- सिंचाई व्यवस्था के लिए नहरों और बाँधों का निर्माण कराया।
- किसानों को कृषि उपकरण और पशुधन के लिए राज्य सहायता दी।
इन सुधारों के कारण विजयनगर की अर्थव्यवस्था स्वावलंबी और उत्पादक बनी रही।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उत्कर्ष
कृष्णदेव राय की धार्मिक नीति “सहिष्णुता और संरक्षण” की थी। वे स्वयं वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी थे, किंतु उन्होंने शैव, जैन और यहाँ तक कि मुस्लिम व्यापारियों के प्रति भी सहिष्णुता दिखाई। उन्होंने तिरुपति बालाजी मंदिर को भव्य रूप में पुनर्निर्मित कराया और उसे स्वर्ण रथ अर्पित किया। इसी काल में विट्ठलस्वामी मंदिर का निर्माण हुआ, जिसका संगीत रथ और स्तंभ आज भी स्थापत्य चमत्कार माने जाते हैं। उनके शासन में देवदासी प्रथा, मंदिर कला और धार्मिक उत्सवों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था, जिससे धार्मिक संस्कृति सामाजिक जीवन का केंद्र बन गई।
कृष्णदेव राय: एक विद्वान शासक
कृष्णदेव राय केवल योद्धा नहीं, बल्कि विद्वान राजनायक भी थे। उन्होंने तेलुगु भाषा में प्रसिद्ध काव्य “आमुक्तमाल्यदा” की रचना की, जिसमें शासन-नीति और धर्मशासन के आदर्शों को व्यक्त किया गया। इस ग्रंथ में वे लिखते हैं, “राजा का धर्म है कि वह जनता के सुख को अपना सुख समझे और उनके दुःख को अपने दुःख की तरह महसूस करे।” उनके दरबार में विद्वानों का समूह था जिसे “आष्टदिग्गज” कहा जाता था, इनमें अल्लासानी पेदन्ना, तेनालीराम और अन्य कवि शामिल थे। इससे तेलुगु साहित्य ने “प्रबन्ध काल” में प्रवेश किया, जो दक्षिण भारतीय साहित्य का शिखर युग माना जाता है।
आर्थिक दृष्टि से स्वर्ण युग
कृष्णदेव राय के शासन में हम्पी केवल राजधानी नहीं, बल्कि एशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका था। पुर्तगाली यात्रियों ने लिखा कि “हम्पी के बाजारों में सोना, रत्न और मोती खुलेआम बिकते थे।” कृष्णदेव राय ने अपनी राजधानी विजयनगर के निकट नागलापुर नामक नगर की स्थापना की।
राज्य ने व्यापार पर कठोर नियंत्रण रखा, परंतु निजी व्यापारियों को स्वतंत्रता दी। मसाले, चंदन, कपास और रेशम का निर्यात अरब और यूरोप तक होता था। पुर्तगाली व्यापारी गोवा के रास्ते घोड़े और धातुएँ लाते थे, और बदले में विजयनगर से मसाले और रेशम निर्यात करते थे। कृष्णदेव राय का पुर्तगालियों से अच्छे सम्बन्ध थे, जिसका मुख्य कारण था पुर्तगालियों का बीजापुर से शत्रुता तथा घोड़ों की आपूर्ति। क्योंकि पुर्तगालियों और विजयनगर की सन्धि के अन्तर्गत पुर्तगालियों ने केवल विजयनगर को ही आयातित घोड़े बेचने का वचन दिया था।
यह आर्थिक खुलापन विजयनगर की राजनयिक दूरदर्शिता को दर्शाता है। कृष्णदेव राय समझते थे कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल संपत्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव भी देता है।
कृष्णदेव राय की नीतियों का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकारों ने कृष्णदेव राय को अक्सर “दक्षिण का अकबर” कहा है, क्योंकि उन्होंने अपने शासन को धर्म, न्याय और नीति पर आधारित किया। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में कृष्णदेवराय को भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है।
राजनीतिक दृष्टि से:
उन्होंने साम्राज्य की सीमाओं को अधिकतम विस्तार तक पहुँचाया, जिससे विजयनगर पूरे दक्षिण भारत का केंद्र बन गया।
प्रशासनिक दृष्टि से:
उनकी नायक नीति ने स्थानीय प्रशासन को संगठित रखा, परंतु इससे भविष्य में स्वायत्तता की प्रवृत्ति भी बढ़ी, जो बाद में साम्राज्य के पतन का कारण बनी।
आर्थिक दृष्टि से:
उन्होंने कृषि और व्यापार दोनों को समान रूप से विकसित किया, जिससे राज्य की आय स्थिर रही।
सांस्कृतिक दृष्टि से:
उनके शासन में धर्म, कला और साहित्य का समन्वय हुआ, जिससे दक्षिण भारत का “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” संभव हुआ।
अंत में कृष्णदेव राय के बारे में
कृष्णदेव राय का शासन भारतीय इतिहास में एक “बहुआयामी स्वर्ण युग” था, जहाँ शक्ति और संस्कृति का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
- राजनीतिक रूप से उन्होंने दक्षिण भारत को एकजुट किया।
- आर्थिक रूप से उन्होंने व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित किया।
- सांस्कृतिक रूप से उन्होंने कला, साहित्य और स्थापत्य को नई ऊँचाई दी।
- और नैतिक दृष्टि से उन्होंने शासक धर्म का आदर्श प्रस्तुत किया।
इतिहासकार के.ए. नीलकंठ शास्त्री के शब्दों में, “कृष्णदेव राय वह अंतिम महान सम्राट थे जिनके शासन में दक्षिण भारत ने आत्मविश्वास, समृद्धि और सांस्कृतिक गौरव का चरम अनुभव किया।”
विजयनगर साम्राज्य का पतन – शक्ति के चरम से पतन की ओर यात्रा
इस खंड में घटनाओं के साथ-साथ हम कारण, आंतरिक विरोधाभास, बाहरी परिस्थितियाँ और दीर्घकालिक प्रभावों का भी विश्लेषण करेंगे।
स्वर्ण युग से संध्या की ओर
कृष्णदेव राय (1509–1529 ई.) के शासनकाल के बाद विजयनगर साम्राज्य का राजनीतिक सूर्य धीरे-धीरे अस्त होने लगा। एक समय जो साम्राज्य दक्षिण भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक आत्मा था, वह 16वीं शताब्दी के मध्य तक आंतरिक विघटन, प्रशासनिक शिथिलता और बाहरी आक्रमणों का शिकार बन गया।
विजयनगर साम्राज्य का पतन केवल एक राजनीतिक पराजय नहीं था, यह एक संघर्ष था परंपरा और परिवर्तन के बीच, जो यह दर्शाता है कि किसी भी राज्य की स्थिरता केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत दृढ़ता पर निर्भर करती है।
राजनीतिक अस्थिरता और उत्तराधिकार संघर्ष
कृष्णदेव राय की मृत्यु (1529 ई.) के बाद विजयनगर साम्राज्य की राजनीति में अस्थिरता बढ़ने लगी। उनके उत्तराधिकारी अच्युतदेव राय, सदाशिव राय और रामराय प्रशासनिक दृष्टि से उतने प्रभावशाली नहीं थे। दरबार में तुर्की, तेलुगु और तमिल गुटों की राजनीति हावी होने लगी, जिससे केंद्रीकृत शक्ति कमजोर होती गई।
रामराय और साम्राज्य का राजनीतिक विच्छेदन
सदाशिव राय (1542–1570 ई.) को विजयनगर साम्राज्य का अंतिम प्रभावी शासक माना जाता है। वे राजनीतिक रूप से कुशल और कूटनीतिक दृष्टि से साहसी थे, लेकिन उनकी नीति “विभाजित करो और शासन करो” अंततः उनके ही विरुद्ध सिद्ध हुई। उन्होंने दक्कन की पाँच मुस्लिम सल्तनतों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, बिदर और बरर, के आपसी मतभेदों का लाभ उठाकर कई बार उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल किया। हालाँकि, यह संतुलन लंबे समय तक टिक नहीं सका। विजयनगर दरबार में भी कुलीनों में असंतोष पनपने लगा। इस प्रकार आंतरिक एकता धीरे-धीरे खंडित हो गई और यहीं से विजयनगर साम्राज्य की कमजोरी का आरंभ हुआ।
नायक व्यवस्था की स्वायत्तता: आंतरिक विघटन का मूल
विजयनगर साम्राज्य की शक्ति का आधार रही नायंकार व्यवस्था (Nayankara System) उसके पतन का भी एक बड़ा कारण बनी। कृष्णदेव राय के बाद जब केंद्र कमजोर हुआ, तो स्थानीय नायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अर्ध-स्वायत्त शासन स्थापित कर लिया। ये नायक अपने क्षेत्रों में राजस्व, सेना और न्याय के स्वामी बन गए। उनकी निष्ठा केवल औपचारिक रह गई, वे संकट के समय राजा की सहायता करने की बजाय अपनी सीमाओं की रक्षा में जुटे रहते थे।
इस विकेंद्रीकरण ने विजयनगर साम्राज्य की सैन्य शक्ति और राजकोषीय एकता दोनों को कमजोर किया। इसी कारण तालीकोटा के युद्ध के समय, साम्राज्य के कई नायक सेनाएँ लेकर समय पर युद्ध में शामिल नहीं हुए, जिससे केंद्रीय सेना अलग-थलग पड़ गई।
तालीकोटा का युद्ध (1565 ई.) – एक युग का अंत
युद्ध की पृष्ठभूमि
तालिकोटा (राशसी-तंगड़ी) का युद्ध (23 जनवरी, 1565 ई।) विजयनगर की बढ़ती हुई शक्ति से दक्षिणी सल्तनतो इतने आशंकित हो गये थे कि उनहोने पुरने मतभेदों को भुलाकर आपस में एक होनें का निश्चय किया। उन्होंने अपने शत्रु को पराजित करने के लिए एक संयुक्त महासंघ का गठन किया। विजयनगर साम्राज्य विरोधी इस महासंघ में अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंड और बीदर शामिल थे। युद्ध के शुभारंभ बीजापुर के सुल्तान अली अदिलशाह ने विजयनगर से रायचूर, मुदगल, अडोनि और किल्लो की वापसी की मांग के द्वारा की। रामराय ने इस मांग को ठुकरा दिया। गोलकुंडा और बरार के मध्य परस्परिक शत्रुता के कारण बरार इसमे शमिल नहीं हुआ।
सैन्य स्थिति
विजयनगर साम्राज्य की सेना संख्या में अधिक थी, अनुमानतः 6–7 लाख सैनिक। परंतु दक्कनी सेनाएँ तोपखाने और घुड़सवार युद्धकला में अत्यधिक कुशल थीं। विजयनगर के पास भारी हाथी सेना थी, लेकिन आधुनिक तोपों के सामने वह अप्रभावी सिद्ध हुई।
युद्ध की रणनीति और विश्वासघात
युद्ध के दौरान विजयनगर साम्राज्य की प्रारंभिक स्थिति अनुकूल थी। परंतु तभी गिलानी भाइयों, जो विजयनगर सेना में प्रमुख जनरल थे, ने पक्ष बदल लिया और दक्कन गठबंधन में शामिल हो गए। यह विश्वासघात निर्णायक सिद्ध हुआ।
रामराय युद्ध के मैदान में पकड़े गए और उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद विजयनगर की सेना बिखर गई और हम्पी पर शत्रु सेनाओं ने विनाशकारी आक्रमण किया। इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी ‘सेवेल’ था। उसने लिखा है ” तीसरे दिन के अंत का प्रारंभ देखा। विजयी मुसलमान रणक्षेत्र में विश्राम तथा जलपान के लिए ठहरें थे, पर जब वे राजधानी पहुंच चके थे तथा इस समय के बाद से पांच महीने तक विजयनगर को चैन नहीं मिला। उन्होने नदी के निकट विट्ठालस्वामी के मंदिर के शान से सजे हुए भवनों में भयंकर आग लगा दी।“
तालीकोटा युद्ध का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकार इस युद्ध को केवल एक सैन्य पराजय नहीं, बल्कि सभ्यता के पतन के रूप में देखते हैं। विजयनगर साम्राज्य की हार ने दक्षिण भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता को लगभग समाप्त कर दिया और इस क्षेत्र में विदेशी प्रभुत्व का मार्ग प्रशस्त किया।
पतन के प्रमुख कारणों का विश्लेषण
| श्रेणी | कारण | विश्लेषण |
| राजनीतिक | कमजोर उत्तराधिकारी और गुटबाज़ी | कृष्णदेव राय के बाद सत्ता संघर्ष ने केंद्रीकृत शासन को समाप्त कर दिया। |
| प्रशासनिक | नायक व्यवस्था की स्वायत्तता | स्थानीय शक्तियाँ केंद्र से स्वतंत्र हो गईं, जिससे राज्य विखंडित हुआ। |
| सैन्य | आधुनिक तोपखाने की कमी और विश्वासघात | गिलानी भाइयों के पलायन और तकनीकी पिछड़ापन निर्णायक सिद्ध हुआ। |
| आर्थिक | निरंतर युद्ध और व्यापारिक असंतुलन | पुर्तगालियों के समुद्री प्रभुत्व के कारण विदेशी व्यापार कमजोर पड़ा। |
| सांस्कृतिक | विलासिता और धर्म पर अत्यधिक व्यय | शासकों ने बाद में संसाधनों का उपयोग भव्यता पर किया, न कि रक्षा पर। |
संक्षेप में, विजयनगर साम्राज्य का पतन संस्थागत कमजोरियों, राजनीतिक दुरदृष्टि और सैन्य असंगठन का परिणाम था।
पतन के बाद की स्थिति: अरविदु वंश और पुनरुत्थान के प्रयास
तालीकोटा के बाद भी अरविदु वंश (1570–1646 ई.) ने पेनुकोंडा और चंद्रगिरी को नई राजधानी बनाकर शासन जारी रखा। किन्तु यह साम्राज्य अब केवल प्रतीकात्मक रह गया था, उसका प्रशासनिक ढाँचा टूट चुका था, व्यापारिक मार्ग छिन चुके थे और धार्मिक केंद्र नष्ट हो चुके थे।
फिर भी इस काल में कुछ स्थानीय पुनरुत्थान प्रयास हुए, नायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में शासन जारी रखा, जिससे विजयनगर साम्राज्य की सांस्कृतिक परंपरा जीवित रही। यह परंपरा बाद में मैसूर राज्य और नायक साम्राज्यों (तंजावूर, मदुरै, जिन्जी) के रूप में पुनः प्रकट हुई।
पतन के पीछे छिपी सीखें
विजयनगर साम्राज्य का पतन यह दर्शाता है कि, “किसी साम्राज्य की दीर्घायु केवल उसकी सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं की अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करती है।”
- प्रशासनिक अनुकूलन का अभाव:
विजयनगर साम्राज्य ने आधुनिक युद्धक तकनीकों (तोपखाने और रणनीतिक संगठन) को समय रहते अपनाया नहीं। - संघीय संरचना की कमजोरी:
नायक व्यवस्था जैसी विकेंद्रीकृत प्रणाली ने आरंभ में स्थिरता दी, लेकिन दीर्घकाल में यह राज्य की एकता के लिए खतरा बनी। - कूटनीतिक असफलता:
रामराय का गठबंधन नीति (Divide & Rule) अल्पकालिक सफल रही परंतु दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हुई। - आर्थिक असंतुलन:
पुर्तगाली प्रभुत्व और निरंतर युद्धों ने विजयनगर साम्राज्य के व्यापारिक नेटवर्क को तोड़ दिया, जिससे उसकी वित्तीय नींव कमजोर हुई।
इतिहासकार नूरुल हसन लिखते हैं, “विजयनगर साम्राज्य की पराजय किसी युद्ध की नहीं, बल्कि एक युग की पराजय थी, एक ऐसे युग की जिसने हिंदू धर्म, संस्कृति और राजनीतिक स्वाधीनता को एक सूत्र में पिरोया था।”
विजयनगर साम्राज्य की विरासत और ऐतिहासिक महत्व
एक सभ्यता जो पत्थरों में जीवित है
“विजयनगर साम्राज्य” का पतन 1565 ई. में तालीकोटा के युद्ध के साथ भले ही हुआ, लेकिन उसकी विरासत मिट्टी में नहीं, पत्थरों में दर्ज हुई। हम्पी के टूटे हुए मंदिर, सुनसान बाजार, और संगीत बजाने वाले पत्थर आज भी उस सभ्यता की आत्मा का अनुगूँज हैं जिसने भारतीय इतिहास में राजनीतिक शक्ति, सांस्कृतिक सृजन और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत किया। विजयनगर साम्राज्य केवल एक राज्य नहीं था, यह एक सांस्कृतिक आंदोलन था, जिसने दक्षिण भारत को एक राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक आत्मबोध प्रदान किया।
राजनीतिक विरासत: दक्षिण भारत में केंद्रीकरण और एकता का आदर्श
राजनीतिक एकता का सूत्रधार
14वीं शताब्दी में जब उत्तर भारत दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों से बिखरा हुआ था, तब दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य ने राजनीतिक एकता की पुनर्स्थापना की। हरिहर और बुक्का ने जिस राज्य की नींव रखी, वह बाद में कृष्णदेव राय के काल में दक्षिण भारत के एकीकृत राष्ट्र-राज्य मॉडल में विकसित हुआ। इस एकता ने न केवल विदेशी आक्रमणों को रोका बल्कि स्थानीय शक्तियों, जैसे चोल, पांड्य और काकतीय परंपरा को एक बड़े राजनीतिक ढाँचे में समाहित किया।
प्रशासनिक विरासत: नायक व्यवस्था और विकेंद्रीकृत शासन का संतुलन
विजयनगर साम्राज्य ने भारतीय प्रशासनिक परंपरा में एक नई अवधारणा दी, “संगठित विकेंद्रीकरण।” नायक व्यवस्था ने स्थानीय शासन को सशक्त बनाया, जबकि केंद्र की नीति-निर्माण शक्ति को बरकरार रखा। यह प्रणाली बाद में दक्षिण भारत के कई राज्यों, विशेषकर मैसूर राज्य (वोडेयार राजवंश) और मराठा साम्राज्य के लिए प्रेरणा बनी। आज भी भारतीय संघीय ढाँचे में स्थानीय स्वशासन और केंद्रीय नियंत्रण का संतुलन इसी परंपरा की याद दिलाता है।
आर्थिक और व्यापारिक विरासत
व्यापारिक दृष्टि से वैश्वीकरण का प्रारंभिक रूप
विजयनगर साम्राज्य को “Pre-modern Global Economy” का उदाहरण माना जा सकता है। हम्पी के बंदरगाह होन्नावर, बारकुर, नेलोर और गोवा पुर्तगाल, अरब, फारस, चीन और इटली तक के व्यापार मार्गों से जुड़े थे।
कृष्णदेव राय के शासन में मसाले, रेशम, मोती, और चंदन का निर्यात हुआ और इसके बदले में घोड़े, तोपें, और धातुएँ आयात की गईं। यह व्यापार केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि राजनयिक प्रभाव का माध्यम भी बना।
कृषि और सिंचाई व्यवस्था की विरासत
विजयनगर की सिंचाई नीति भारतीय कृषि इतिहास में मील का पत्थर है। राज्य ने नहरों, बाँधों और जलाशयों का निर्माण कराया, जिनमें “काम्पा बाँध” और “तुंगभद्रा परियोजना के पूर्वज नहर तंत्र” विशेष उल्लेखनीय हैं। यह प्रणाली स्थानीय जल-संसाधनों के सतत उपयोग की परिपक्व समझ को दर्शाती है। आज दक्षिण भारत की कई पारंपरिक जलसंरक्षण तकनीकें, जैसे एरी सिस्टम (Tamil Nadu) और काटक नहरें (Karnataka) उसी विजयनगर परंपरा की विकसित रूप हैं।
सांस्कृतिक विरासत: कला, स्थापत्य और साहित्य का पुनर्जागरण
स्थापत्य का उत्कर्ष – हम्पी की आत्मा
विजयनगर स्थापत्य भारतीय कला का वह संगम है, जहाँ द्रविड़, चालुक्य और होयसला परंपराएँ एक-दूसरे से मिलती हैं। हम्पी के विरुपाक्ष मंदिर, विट्ठलस्वामी मंदिर, हजार राम मंदिर और लोटस महल स्थापत्य के ऐसे नमूने हैं जो केवल धार्मिक भावना ही नहीं, बल्कि राज्य की तकनीकी और सौंदर्य दृष्टि को भी प्रदर्शित करते हैं।
गोपुरम (उँचे द्वार), मंडप, संगीत स्तंभ और रथ मंदिर जैसी स्थापत्य विशेषताएँ दक्षिण भारतीय मंदिरों की पहचान बन गईं। आज भी तिरुपति, कांचीपुरम और मदुरै के मंदिरों की स्थापत्य शैली विजयनगर प्रभाव को दर्शाती है।
चित्रकला और मूर्तिकला
विजयनगर काल में मूर्तिकला में “गति और भाव” का उत्कर्ष देखा जाता है, मूर्तियाँ केवल स्थिर नहीं, बल्कि जीवंत लगती हैं। चित्रकला में दीवारों पर रामायण और महाभारत के दृश्य अंकित किए गए, जिनकी झलक बाद में मैसूर चित्रशैली में दिखाई देती है।
साहित्य और भाषा का उत्कर्ष
कृष्णदेव राय के शासन में साहित्यिक बहुभाषिकता का चरम देखा गया। तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत चारों भाषाओं में उत्कृष्ट ग्रंथ लिखे गए। तेलुगु साहित्य का “प्रबन्ध युग” इसी काल में फला-फूला। “आष्टदिग्गज” अल्लासानी पेदन्ना, नंदी तिमाना, टेनालीराम आदि ने तेलुगु भाषा को दरबारी प्रतिष्ठा दिलाई। वहीं संस्कृत में विद्यारण्य और मध्वाचार्य की परंपरा ने वैदांतिक विचारों का पुनर्जागरण किया।
सामाजिक और धार्मिक विरासत
भक्ति आंदोलन और धार्मिक सहिष्णुता
विजयनगर की सबसे स्थायी विरासत उसकी धार्मिक सहिष्णुता और भक्ति भावना है। राज्य ने न केवल वैष्णव और शैव परंपराओं को संरक्षण दिया, बल्कि वीरशैव, हरिदास और जैन परंपराओं को भी सम्मानित किया। भक्ति आंदोलन ने वर्गीय भेदों को तोड़ा और कन्नड़, तेलुगु और तमिल साहित्य को जनता से जोड़ा।
पुरंदर दास, जिन्हें कर्नाटक संगीत का पिता कहा जाता है, विजयनगर काल में ही सक्रिय थे। उनके रचित कीर्तन आज भी दक्षिण भारत के मंदिरों में गूँजते हैं, यह दिखाता है कि विजयनगर केवल राजनैतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का भी केंद्र था।
इतिहास और पुरातत्व में विजयनगर की पुनर्खोज
17वीं शताब्दी के बाद हम्पी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में खो गया। लेकिन 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश पुरातत्वविद् रॉबर्ट सिवेल और बाद में भारतीय इतिहासकार के.ए. नीलकंठ शास्त्री ने इस पर शोध किया, तब दुनिया ने पुनः विजयनगर को पहचाना।
सिवेल की प्रसिद्ध पुस्तक “A Forgotten Empire” (1900) ने पश्चिमी जगत को दिखाया कि भारत का मध्यकाल केवल युद्ध और पराजय की कहानी नहीं, बल्कि सृजन और आत्मनिर्भरता का युग भी था। आज हम्पी को UNESCO World Heritage Site घोषित किया गया है। इसके संरक्षण के प्रयास भारतीय संस्कृति की निरंतरता और स्मृति की दृढ़ता को प्रमाणित करते हैं।
विजयनगर की विरासत का आधुनिक महत्व
- राजनीतिक दृष्टि से:
विजयनगर साम्राज्य की नीतियाँ आधुनिक भारतीय संघवाद के लिए प्रेरक हैं, केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन का विचार यहीं से उपजा। - आर्थिक दृष्टि से:
व्यापारिक उदारीकरण और स्थानीय उत्पादन पर आधारित निर्यात नीति, भारत की समकालीन “मेक इन इंडिया” भावना की ऐतिहासिक जड़ें हैं। - सांस्कृतिक दृष्टि से:
“एकता में विविधता” का भारतीय आदर्श – भाषाओं, धर्मों और कलाओं का समन्वय – विजयनगर साम्राज्य की देन है। - सामाजिक दृष्टि से:
विजयनगर साम्राज्य ने दिखाया कि सामाजिक समरसता नीतिगत सहिष्णुता से ही संभव है, न कि दमन से।
विश्लेषणात्मक निष्कर्ष: विजयनगर साम्राज्य की अमर चेतना
इतिहास के दृष्टिकोण से विजयनगर साम्राज्य भारत का अंतिम महान हिंदू साम्राज्य था, लेकिन इससे भी बढ़कर यह “भारतीय पुनर्जागरण का सेतु” था। यह वह युग था जब भारत ने दिखाया कि विदेशी आक्रमणों के बीच भी आत्मविश्वास, सृजन और सभ्यता की निरंतरता को बनाए रखा जा सकता है।
विजयनगर साम्राज्य ने सत्ता को केवल शासन नहीं, बल्कि “संस्कारों का वाहक” बनाया। उसने मंदिरों को केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, कला और अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में विकसित किया। उसकी नीतियों में आधुनिकता की झलक थी, विकेंद्रीकरण, कर नीति, सिंचाई और व्यापार की स्वतंत्रता। जैसा कि इतिहासकार आर.सी. मजूमदार लिखते हैं “विजयनगर भारत के मध्यकालीन इतिहास का वह दीपक है जिसने अंधकार के बीच सभ्यता की ज्योति को जलाए रखा।”
और इसीलिए, जब हम हम्पी के पत्थरों में उकेरे गए उस युग को देखते हैं, तो लगता है – विजयनगर साम्राज्य समाप्त नहीं हुआ; वह भारतीय आत्मा में आज भी जीवित है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
