विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना मध्यकालीन दक्षिण भारत के इतिहास को समझने की एक केंद्रीय कुंजी है। 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच विकसित यह साम्राज्य केवल सैन्य शक्ति या राजनीतिक विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी स्थिरता और दीर्घायु का वास्तविक आधार उसका संगठित समाज और कृषि-प्रधान, किंतु व्यावसायिक रूप से विकसित अर्थतंत्र था। विजयनगर समाज शास्त्रीय वर्णाश्रम परंपरा पर आधारित था, परंतु व्यवहारिक स्तर पर यह पूर्णतः जड़ नहीं था। ब्राह्मणों और व्यापारिक समुदायों की प्रधानता के साथ-साथ दस्तकार, कृषक और सेवा-आधारित वर्ग भी सामाजिक और आर्थिक जीवन के अनिवार्य अंग थे। मंदिर, मठ, व्यापारी समूह और नायक वर्ग न केवल सामाजिक संस्थाएँ थे, बल्कि उत्पादन, भूमि-स्वामित्व और संसाधनों के वितरण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े आर्थिक घटक भी थे।
समकालीन अभिलेखों, दानपत्रों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि विजयनगर राज्य सामाजिक स्थिरता बनाए रखने के लिए परंपरागत मूल्यों का सहारा लेता था, किंतु साथ ही भूमि-धारण पद्धति, नायकार व्यवस्था, सिंचाई परियोजनाओं और व्यापारिक नेटवर्क के माध्यम से आर्थिक परिवर्तन को भी प्रोत्साहित करता था। इसी अंतर्संबंध ने विजयनगर साम्राज्य को दक्षिण भारत की सबसे सुदृढ़ आर्थिक-राजनीतिक शक्तियों में स्थापित किया।
अतः विजयनगर साम्राज्य का अध्ययन केवल राजनीतिक इतिहास तक सीमित न होकर, उसके समाज, अर्थव्यवस्था और राज्य-नीति के परस्पर संबंधों के विश्लेषण की माँग करता है। प्रस्तुत लेख में विजयनगर कालीन सामाजिक संरचना, स्त्रियों की स्थिति, दास-प्रथा, सामाजिक समस्याएँ तथा कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का समग्र और विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है, जिससे इस साम्राज्य के वास्तविक स्वरूप को संतुलित दृष्टि से समझा जा सके।
विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक संरचना
विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक संरचना मूलतः शास्त्रीय भारतीय परंपराओं पर आधारित थी, जिसमें वर्णाश्रम-धर्म को सामाजिक व्यवस्था का वैचारिक आधार माना गया। समकालीन अभिलेखों, दानपत्रों और साहित्यिक ग्रंथों में बार-बार यह उल्लेख मिलता है कि विजयनगर नरेशों ने स्वयं को समस्त वर्णों और आश्रमों के कल्याण का रक्षक माना।
अभिलेखों में प्रयुक्त वाक्यांश,
‘वर्णाश्रमधर्म मंगलानुपालिसुत्त’ तथा
‘सकलवर्णाश्रमधर्म मंगलानुपालिसुत्तं’
इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि राज्य की वैचारिक नीति किसी एक वर्ण के पक्ष में नहीं, बल्कि सामाजिक समन्वय और स्थिरता बनाए रखने पर केंद्रित थी। यह दृष्टिकोण विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना को उत्तर भारत के कई समकालीन राज्यों से भिन्न बनाता है।
विजयनगर समाज में वर्ण व्यवस्था और सामाजिक श्रेणियाँ
चारों वर्णों में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च थी। वे न केवल धार्मिक और बौद्धिक क्षेत्र में प्रभावशाली थे, बल्कि प्रशासन, कूटनीति और सैन्य संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। अभिलेखीय साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि अनेक ब्राह्मण सेनानायक विजयनगर की सेनाओं का नेतृत्व कर रहे थे, जो इस बात का प्रमाण है कि वर्ण-आधारित कार्य-विभाजन व्यवहार में पूरी तरह कठोर नहीं था।
इसके विपरीत, क्षत्रिय वर्ग के संदर्भ में स्पष्ट विवरणों का अभाव मिलता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि विजयनगर समाज में राजनीतिक-सैन्य शक्ति जन्म से नहीं, बल्कि सेवा और योग्यता से निर्धारित होती थी। यह विशेषता विजयनगर साम्राज्य को एक कार्यात्मक सामाजिक व्यवस्था की ओर ले जाती है।
विजयनगर साम्राज्य में व्यापारी और मध्यवर्गीय समुदाय
विजयनगर काल में शेट्टी या चेट्टी समुदाय एक सशक्त और प्रभावशाली व्यापारी वर्ग के रूप में उभरा। इनकी अनेक शाखाएँ थीं और आंतरिक तथा विदेशी व्यापार का बड़ा भाग इन्हीं के नियंत्रण में था। पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस और बारबोसा जैसे विदेशी पर्यवेक्षकों ने चेट्टियों को धनाढ्य, संगठित और सामाजिक रूप से सम्मानित वर्ग के रूप में वर्णित किया है।
चेट्टियों की विशेषता यह थी कि वे न केवल व्यापारी थे, बल्कि कुशल लेखाकार, लिपिक और वित्तीय प्रबंधक भी थे। उनकी संतानों को अल्पायु से ही व्यापारिक प्रशिक्षण दिया जाता था, जिससे यह वर्ग आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सुदृढ़ बना। इसी वर्ग के समानांतर ‘वीर पंचाल’ नामक दस्तकार-व्यापारी समुदाय सक्रिय था, जिसमें लोहार, स्वर्णकार, बढ़ई और अन्य शिल्पकार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त कैकोल्लार (जुलाहे), कंबलत्तर, नाई तथा आंध्र क्षेत्र के रेड्डी समुदाय भी स्थानीय समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
उत्तर भारतीय प्रवास और विजयनगर समाज में तनाव
विजयनगर काल की एक महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषता उत्तर भारत से दक्षिण में हुए बड़े पैमाने पर प्रवासन से जुड़ी थी। इन प्रवासियों को अभिलेखों में ‘बडवा’ कहा गया है। इन नवागंतुकों ने व्यापार और शहरी अर्थव्यवस्था में शीघ्र स्थान बना लिया, जिससे पारंपरिक दक्षिण भारतीय व्यापारिक समुदायों में आर्थिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक तनाव उत्पन्न हुआ।
इसके साथ-साथ, कुछ निम्न जातीय समूहों द्वारा उच्च जातीय विशेषाधिकारों को अपनाने की प्रक्रिया भी देखने को मिलती है। इस सामाजिक गतिशीलता ने विजयनगर समाज में नए प्रकार के अंतर्विरोध और संघर्ष को जन्म दिया, जो इस काल की सामाजिक संरचना को स्थिर न होकर परिवर्तनशील बनाता है।
श्रमजीवी और हाशिए के समुदाय
छोटे सामाजिक समूहों में लोहार, स्वर्णकार, पीतल-कर्मकार, बढ़ई, मूर्तिकार और जुलाहे प्रमुख थे। विशेष रूप से जुलाहों की स्थिति उल्लेखनीय थी, क्योंकि वे मंदिर परिसरों के निकट निवास करते थे और मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय कर-व्यवस्था में भी भागीदारी रखते थे।
इसके विपरीत, डोमबर, जोगी और मछुआरे जैसे समुदाय सामाजिक दृष्टि से निम्न माने जाते थे। संक्षेप में कहा जा सकता है कि आर्थिक रूप से उपयोगी, भूमि-स्वामी और उत्पादन से जुड़े वर्गों को सामाजिक सम्मान प्राप्त था, जबकि घुमंतू और अस्थिर आजीविका वाले समुदाय हाशिए पर थे।
विजयनगर समाज में दास-प्रथा और स्त्रियों की स्थिति
विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक संरचना को समझने के लिए दास-प्रथा और स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन अनिवार्य है। ये दोनों तत्व उस काल की आर्थिक विषमता, पारिवारिक संगठन और नैतिक मूल्यों को स्पष्ट करते हैं। समकालीन अभिलेखों, दानपत्रों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से यह ज्ञात होता है कि विजयनगर समाज में जहाँ एक ओर श्रम और सेवा को संस्थागत रूप दिया गया था, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों और निर्बल वर्गों की स्थिति परंपरागत सीमाओं में बँधी हुई थी। दास-प्रथा और स्त्री-संबंधी संस्थाएँ इस समाज के विरोधाभासी स्वरूप को उजागर करती हैं, जिसमें सामाजिक उपयोगिता और मानवीय असमानता साथ-साथ विद्यमान थीं।
दास-प्रथा का स्वरूप और सामाजिक आधार
विजयनगर साम्राज्य में दास-प्रथा का अस्तित्व निर्विवाद रूप से स्वीकार्य सामाजिक यथार्थ था। समकालीन अभिलेखों तथा विदेशी यात्रियों के विवरणों में पुरुष और महिला दोनों प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है। यह प्रथा विजयनगर युग की नवीन उत्पत्ति नहीं थी, बल्कि चोल काल से चली आ रही सामाजिक-आर्थिक परंपरा का ही विस्तार थी।
मानवों के क्रय-विक्रय को ‘वेस-वग’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त ऋण न चुका पाने या दिवालिया हो जाने की स्थिति में व्यक्ति को प्रायः ऋणदाता का दास बनना पड़ता था। इस प्रकार दास-प्रथा केवल युद्धबंदियों तक सीमित न होकर आर्थिक विवशताओं से भी जुड़ी हुई थी।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विजयनगर काल की दास-प्रथा को पूर्णतः अमानवीय या गुलामी-प्रणाली के आधुनिक अर्थों में नहीं समझा जाना चाहिए। अनेक मामलों में दासों को घरेलू कार्यों, कृषि, मंदिर सेवाओं अथवा राजकीय संस्थानों में नियोजित किया जाता था। फिर भी, यह व्यवस्था समाज में आर्थिक असमानता और शक्ति-संतुलन की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।
विजयनगर समाज में स्त्रियों की सामान्य स्थिति
मध्यकालीन भारत के अन्य क्षेत्रों की भाँति विजयनगर युग में भी स्त्रियों की स्थिति मूलतः पुरुष-प्रधान सामाजिक ढाँचे के अधीन थी। समकालीन स्रोतों में सामान्य स्त्रियों के जीवन का सीमित उल्लेख मिलता है, जबकि विवरण मुख्यतः राजपरिवार और कुलीन वर्ग की महिलाओं तक सीमित हैं। सभी सामाजिक वर्गों की कन्याएँ विवाह से पूर्व माता-पिता के नियंत्रण में रहती थीं। कुलीन परिवारों में कन्याओं को लोकभाषाओं के साथ-साथ संस्कृत, संगीत और नृत्य की शिक्षा दी जाती थी। यही कारण है कि इस काल के साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी पूर्णतः अनुपस्थित नहीं थी।
सामान्यतः एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी, किंतु राजपरिवार और सामंती वर्ग में बहु-विवाह, रखैलों और दासियों की परंपरा भी विद्यमान थी। राजप्रासाद में निवास करने वाली स्त्रियाँ केवल भोग-वस्तु नहीं थीं; उनमें से अनेक संगीत, नृत्य, ज्योतिष, भविष्यवाणी और अंगरक्षा जैसे कार्यों में प्रशिक्षित होती थीं। कुछ स्त्रियाँ युद्ध अभियानों के समय राजा के साथ भी जाती थीं, जो उनकी सक्रिय भूमिका का संकेत देता है।
देवदासी और गणिकाएँ: सामाजिक स्वीकृति और विरोधाभास
विजयनगर समाज की एक विशिष्ट विशेषता देवदासी और गणिका प्रथा थी। मंदिरों से संबद्ध स्त्रियाँ देवदासी कहलाती थीं और उन्हें जीवनयापन के लिए भूमि अथवा नियमित वेतन प्रदान किया जाता था। वे मंदिर-केंद्रित सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग थीं।
इसके समानांतर गणिकाओं का एक स्वतंत्र और संगठित वर्ग भी विद्यमान था। समकालीन साहित्य में इनका उल्लेख चारों वर्णों के साथ किया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी सामाजिक पहचान जाति से नहीं, बल्कि पेशे से निर्धारित थी। गणिकाएँ प्रायः शिक्षित, कला-प्रवीण और आर्थिक रूप से संपन्न होती थीं। विशेष तथ्य यह है कि गणिकाओं को समाज में पूर्णतः हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सार्वजनिक उत्सवों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी और राजा तथा सामंत उनसे खुले रूप में संपर्क रखते थे। यह स्थिति विजयनगर समाज के नैतिक विरोधाभासों को उजागर करती है, जहाँ एक ओर स्त्रियों की सामान्य स्थिति सीमित थी, वहीं कुछ वर्गों की स्त्रियाँ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का उपभोग कर रही थीं।
सती-प्रथा और राज्य का दृष्टिकोण
विजयनगर साम्राज्य में सती-प्रथा (सहगमन) के प्रचलन का उल्लेख अभिलेखों और विदेशी यात्रियों, दोनों के वृत्तांतों में मिलता है। 1354 ई० के एक अभिलेख में माला गौडा नामक स्त्री द्वारा पति की मृत्यु के पश्चात सती होने का उल्लेख है। इस काल में सती को मुक्ति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता था। फिर भी, अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि यह प्रथा मुख्यतः राजपरिवार और नायक वर्ग तक सीमित थी। विदेशी यात्रियों विशेषतः बारबोसा, फर्नाओ नुनिज़ और हुआर्ट, ने उल्लेख किया है कि यह प्रथा लिंगायतों, चेट्टियों (व्यापारी वर्ग) और ब्राह्मणों में सामान्यतः प्रचलित नहीं थी।
राज्य का दृष्टिकोण सती-प्रथा के प्रति पूर्णतः समर्थनकारी नहीं था। विधवा-विवाह करने वाले दंपत्तियों को विवाह-कर से मुक्त रखा गया, जो यह संकेत देता है कि राज्य व्यवहारिक स्तर पर सती को प्रोत्साहित नहीं करता था। सती-स्मारकों (पाषाण-स्मारक) की स्थापना सामाजिक सम्मान का प्रतीक थी, किंतु इसे राज्य की अनिवार्य नीति नहीं कहा जा सकता।
स्त्रियों का दैनिक जीवन, वस्त्र और सामाजिक भिन्नताएँ
विजयनगर समाज में स्त्री-पुरुष दोनों आभूषणप्रिय थे। सामान्य स्त्रियाँ साड़ी और चोली धारण करती थीं, जबकि राजपरिवार की महिलाएँ जरीदार वस्त्र, पावड, दुपट्टा और बहुमूल्य आभूषण पहनती थीं। कुलीन और अकुलीन स्त्रियों के जीवन-स्तर में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। पर्दा-प्रथा का व्यापक प्रचलन नहीं था और परिवार में स्त्रियों की भूमिका आर्थिक और सामाजिक रूप से उपयोगी मानी जाती थी। किंतु विधवाओं का जीवन अब भी हेय और कष्टदायक था, जो इस समाज की एक गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर करता है।
विजयनगर साम्राज्य में शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक समस्याएँ
विजयनगर साम्राज्य के सामाजिक जीवन को केवल वर्ण, जाति या स्त्री-स्थिति के आधार पर नहीं समझा जा सकता। शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्थाएँ उस समाज की मानसिकता, सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और राज्य-नीति को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करती हैं। समकालीन अभिलेख यह दर्शाते हैं कि यद्यपि राज्य ने प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा या सामाजिक सुधार को अपने हाथ में नहीं लिया, फिर भी उसने संस्थागत संरक्षण और न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया।
विजयनगर काल में शिक्षा की प्रकृति और संस्थाएँ
शिक्षा के क्षेत्र में विजयनगर राज्य की भूमिका प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष थी। चोलों और पल्लवों की भाँति राज्य द्वारा विद्यालयों या विश्वविद्यालयों की स्थापना नहीं की गई, किंतु विद्या के संरक्षण में मठों, मंदिरों और अग्रहारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
विजयनगर नरेशों ने बड़ी संख्या में अग्रहारों की स्थापना की, जहाँ विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे और आसपास के विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। इन ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी, जिससे वे निश्चिंत होकर शिक्षा और अध्यापन में संलग्न रह सकें। इस प्रकार मंदिर, मठ और अग्रहार ज्ञान के प्रमुख केंद्र बन गए।
शिक्षा का मुख्य विषय वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास, काव्य, नाटक और आयुर्वेद था। वैष्णव संतों और भक्ति आंदोलन से जुड़े आचार्यों ने शिक्षा को अपेक्षाकृत उदार और लोकाभिमुख बनाने में योगदान दिया। तुलुव वंश के शासकों विशेषतः कृष्णदेव राय ने विद्वानों और साहित्यकारों को संरक्षण देकर बौद्धिक जीवन को प्रोत्साहित किया। राजकीय सेवा के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए विशेष संस्थाएँ थीं, जहाँ भाषा, लेखन और गणित की शिक्षा दी जाती थी। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक आवश्यकताओं से भी जुड़ा हुआ था।
मनोरंजन और सांस्कृतिक जीवन
विजयनगर समाज में मनोरंजन केवल विलासिता नहीं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक गतिविधि का रूप था। नाटक और यक्षगान अत्यंत लोकप्रिय थे, जिनमें संगीत, वाद्य और अभिनय का समन्वय होता था। ये प्रस्तुतियाँ सामान्यतः उत्सवों, धार्मिक अवसरों और राजकीय समारोहों पर आयोजित की जाती थीं, जिनमें स्त्री और पुरुष दोनों भाग लेते थे।
बोमलाट (छाया-नाटक) भी जनसामान्य में लोकप्रिय था। खेलों में शतरंज और पासा प्रमुख थे। कृष्णदेव राय स्वयं शतरंज-प्रेमी थे और कुशल खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देते थे। अभिजात वर्ग के स्त्री-पुरुषों में जुए के भी प्रमाण मिलते हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ था। इस प्रकार विजयनगर का सांस्कृतिक जीवन धार्मिक, शाही और लोक-तत्वों का मिश्रण था, जो समाज को मानसिक रूप से सक्रिय बनाए रखता था।
सामाजिक समस्याएँ और सामुदायिक पहल
विजयनगर समाज में अनेक सामाजिक कुरीतियाँ और तनाव विद्यमान थे, विशेषतः उत्तर भारत से आए प्रवासियों, जातिगत प्रतिस्पर्धा, बाल-विवाह और दहेज जैसी समस्याओं से संबंधित। इन समस्याओं का समाधान प्रायः समुदाय स्तर पर किया जाता था, किंतु कई अवसरों पर राज्य का हस्तक्षेप भी आवश्यक हो जाता था।
प्रो. महालिंगम ने विजयनगर काल के इन प्रयासों को सामाजिक विधान की संज्ञा दी है। 1424-25 ई० के एक अभिलेख में दहेज-प्रथा को अवैधानिक घोषित किया गया। इसमें स्पष्ट निर्देश दिया गया कि जो पिता दहेज देगा और जो उसे स्वीकार करेगा, दोनों दंड के भागी होंगे तथा जाति-बहिष्कार का भी प्रावधान होगा। यह उल्लेखनीय है कि ब्राह्मण समुदाय ने स्वयं इस सामाजिक सुधार के लिए राज्य से समर्थन माँगा, जिससे समाज और राज्य के सहयोग का स्वरूप स्पष्ट होता है।
जातिगत और सामुदायिक विवादों में राज्य की भूमिका
जातिगत विवादों और सामुदायिक तनावों के समाधान में विजयनगर राज्य की भूमिका न्यायिक और मध्यस्थ की थी। 1379 ई० के एक अभिलेख में नायकों और नगर प्रशासकों को निर्देश दिया गया कि वे जाति-विवादों में संबंधित पक्षों को बुलाकर परामर्श दें और आवश्यकता पड़ने पर दंड भी दें। कई मामलों में विवादों का निपटारा नगर-श्रेष्ठियों, अग्रजों और विद्वान ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। इस प्रक्रिया को कर-मुक्त रखा जाता था, जिससे न्याय तक पहुँच बाधित न हो।
राज्य ने दस्तकारों और बुनकरों जैसे छोटे समुदायों की भी रक्षा की। 1632 ई० के एक अभिलेख में बढ़ई, लोहार और स्वर्णकार समुदायों के साथ दुर्व्यवहार को दंडनीय घोषित किया गया और दोषियों पर अर्थदंड लगाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य उत्पादन-आधारित वर्गों को संरक्षित करने में रुचि रखता था।
सामाजिक अपराध और सांप्रदायिक संतुलन
सामाजिक नियमों के उल्लंघन जैसे मंदिर भूमि पर अवैध कब्ज़ा, दान में हस्तक्षेप, प्रतिबंधित विवाह, गुरु या ब्राह्मण की हत्या, तथा देव-भोग में अपवित्रता को गंभीर अपराध माना जाता था। ऐसे मामलों में संपत्ति की जब्ती और जाति-बहिष्कार तक का प्रावधान था।
सांप्रदायिक विवादों में भी राज्य का दृष्टिकोण संतुलित था। श्रवणबेलगोला के अभिलेखों में जैन और वैष्णव संप्रदायों के विवाद में राज्य द्वारा जैन संप्रदाय के अधिकारों की रक्षा का उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विजयनगर नरेश सामाजिक और धार्मिक एकता बनाए रखने के लिए सक्रिय प्रयास करते थे।
समाज और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंध
विजयनगर साम्राज्य के सामाजिक जीवन का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि समाज और अर्थव्यवस्था को पृथक इकाइयों के रूप में नहीं समझा जा सकता। वर्ण-व्यवस्था, जातीय संगठन, स्त्रियों की स्थिति, दास-प्रथा तथा समुदाय-आधारित संस्थाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक संरचना से जुड़ी हुई थीं। सामाजिक प्रतिष्ठा प्रायः भूमि-स्वामित्व, उत्पादन में भूमिका और राज्य-सेवा से निर्धारित होती थी, जबकि सामाजिक असमानताएँ आर्थिक संसाधनों के असमान वितरण से और अधिक गहरी होती जाती थीं।
मंदिर, मठ, नायक, व्यापारी और कृषक ये सभी केवल सामाजिक वर्ग नहीं थे, बल्कि आर्थिक तंत्र के सक्रिय घटक भी थे। राज्य द्वारा सामाजिक संतुलन बनाए रखने के प्रयास वस्तुतः उत्पादन, कर-व्यवस्था और ग्रामीण स्थिरता को सुरक्षित रखने से जुड़े हुए थे। इसलिए विजयनगर समाज की वास्तविक समझ तभी संभव है, जब उसकी कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था, भूमि-धारण पद्धति, सिंचाई व्यवस्था और नायकार प्रणाली का सम्यक् विश्लेषण किया जाए। इसी परिप्रेक्ष्य में अब विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।
विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना का आर्थिक पक्ष मुख्यतः कृषि-प्रधान था, किंतु भूमि-धारण पद्धति, नायकार व्यवस्था, सिंचाई तंत्र और मंदिर-संस्थाओं की सक्रिय भूमिका ने इसे एक संगठित और व्यावसायिक रूप से विकसित अर्थव्यवस्था का स्वरूप प्रदान किया। विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि-आधारित थी, किंतु इसकी विशेषता यह थी कि कृषि, भूमि-धारण, सिंचाई, मंदिर-संस्थाएँ और राज्य, सभी एक संगठित आर्थिक तंत्र के रूप में कार्य करते थे। चोल काल की तुलना में विजयनगर युग में न केवल ग्रामों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि कृषि उत्पादन, भूमि-स्वामित्व और ग्रामीण संरचना में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं। विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक शक्ति का आधार उसकी उन्नत भूमि-व्यवस्था, नायकार प्रणाली और व्यापक सिंचाई नेटवर्क था, जिसने दक्षिण भारत को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान की।
भू-धारण पद्धति और ग्रामीण संरचना
विजयनगर काल में भू-धारण पद्धति (Land Tenure System) अत्यंत विविध और विकसित थी। चोल युग का नाडु अब सिकुड़कर ग्राम के रूप में एक छोटी प्रशासनिक इकाई बन गया। इस काल में ग्राम ही आर्थिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आने वाले ग्रामों को भंडारवाद ग्राम कहा जाता था, जिनसे किसान सीधे राज्य को कर अदा करते थे। इसके अतिरिक्त धार्मिक और शैक्षणिक संस्थाओं को दी गई कर-मुक्त भूमि को ब्रह्मदेय, देवदेय और मठापुर कहा जाता था। इन अनुदानों से मंदिर और मठ केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि आर्थिक इकाइयाँ भी बन गए।
नायकार व्यवस्था और अमरम् भूमि
विजयनगर अर्थव्यवस्था की सबसे विशिष्ट विशेषता नायकार व्यवस्था थी। इस प्रणाली के अंतर्गत सैनिक और असैनिक अधिकारियों को उनकी सेवाओं के बदले भूमि प्रदान की जाती थी, जिसे अमरम् कहा जाता था। इन भूमि-धारकों को अमर नायक कहा जाता था। प्रारंभिक अवस्था में यह व्यवस्था सेवा-आधारित थी, किंतु समय के साथ यह आनुवंशिक बन गई। इस प्रकार नायकार व्यवस्था मध्यकालीन सामंतवाद से मिलती-जुलती दिखाई देती है। अमर नायकों को भूमि की आय का एक निश्चित भाग राज्य को देना होता था, जिससे केंद्रीय सत्ता और स्थानीय शक्तियों के बीच संतुलन बना रहता था।
कुट्टगि, वारम और कृषक-सम्बंध
विजयनगर युग में ब्राह्मण, मंदिर और बड़े भू-स्वामी स्वयं खेती नहीं करते थे, बल्कि किसानों को पट्टे पर भूमि देते थे। ऐसी भूमि को कुट्टगि कहा जाता था। किसान उपज का एक निश्चित भाग नकद या जिन्स के रूप में भू-स्वामी को देता था। भू-स्वामी और पट्टेदार के बीच उपज की हिस्सेदारी को वारम व्यवस्था कहा जाता था। यदि पट्टेदार शर्तों का पालन करता था, तो उसे भूमि से हटाया नहीं जा सकता था, यह व्यवस्था कृषकों को एक सीमा तक सुरक्षा प्रदान करती थी।
हालाँकि इस काल में दूरवासी भू-स्वामित्व (absentee landlordism) में वृद्धि हुई, जिससे रैयतों का शोषण भी बढ़ा। अभिलेखों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से स्पष्ट होता है कि बड़े भू-स्वामी और सामंत प्रायः कृषकों पर अत्यधिक कर-भार डालते थे। राज्य यथासंभव ऐसे शोषण को नियंत्रित करने का प्रयास करता था।
कृषि-मजदूर और भूमि-अधिकार
विजयनगर युग में कृषक-मजदूरों को ‘कुदि’ कहा जाता था। भूमि के क्रय-विक्रय के साथ ये कृषक-मजदूर भी स्थानांतरित हो जाते थे, किंतु उन्हें मनमाने ढंग से सेवामुक्त नहीं किया जा सकता था। यह स्थिति दर्शाती है कि कृषक-मजदूर पूर्ण दास नहीं थे, बल्कि अर्ध-आश्रित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे।
राज्य व्यक्तिगत भूमि-स्वामित्व का सम्मान करता था। यदि किसी निजी भूमि को मंदिर या ब्राह्मण को दान में देना होता था, तो राज्य संबंधित भू-स्वामी को उसका मूल्य अदा करता था। भूमि की कीमत, गिरवी और दहेज में भूमि दिए जाने के उल्लेख भी अभिलेखों में मिलते हैं, जो भूमि को एक व्यापारिक संपत्ति के रूप में स्थापित करते हैं।
सिंचाई व्यवस्था और कृषि विस्तार
विजयनगर प्रशासन में कोई पृथक सिंचाई विभाग नहीं था, फिर भी सिंचाई व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। इसका कारण यह था कि सिंचाई को पुण्य-कर्म माना जाता था। मंदिरों, मठों, संस्थाओं और व्यक्तियों ने तड़ागों, तालाबों, बाँधों और नहरों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राजधानी विजयनगर इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, जहाँ नदी पर बाँध बनाकर नहरें निकाली गई थीं। सिंचाई साधनों की देखरेख करने वालों को कर-मुक्त भूमि दी जाती थी। यदि कोई व्यक्ति बिना वारिस के मर जाता था, तो उसकी संपत्ति का उपयोग सिंचाई-साधनों की मरम्मत के लिए किया जाता था। यदि सिंचाई के अभाव में गाँव उजड़ जाते थे, तो राज्य स्वयं हस्तक्षेप कर नहरों और तालाबों का पुनर्निर्माण कराता था और कई बार स्थानीय कर भी माफ कर देता था। यह राज्य की कृषि-हितैषी नीति को दर्शाता है।
फसलें, उत्पादन और वाणिज्यिक कृषि
भूमि को दो श्रेणियों में बाँटा गया था,
- सिंचित भूमि
- शुष्क भूमि
सिंचित भूमि से दो या तीन फसलें ली जाती थीं। प्रमुख फसलों में चावल, दालें, चना, जौ और तिलहन शामिल थे। नील और कपास की खेती भी व्यापक थी। पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्रों में काली मिर्च, अदरक और मसालों का उत्पादन होता था, जिनका निर्यात विश्व के विभिन्न भागों में किया जाता था। कर्नाटक क्षेत्र में इलायची का उत्पादन प्रसिद्ध था। नारियल और उपवन-कृषि का भी व्यापक विकास हुआ। इस प्रकार विजयनगर अर्थव्यवस्था केवल आत्मनिर्भर नहीं थी, बल्कि व्यावसायिक और निर्यातोन्मुख भी थी।
समग्र मूल्यांकन और निष्कर्ष
विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि यह राज्य केवल सैन्य शक्ति या राजनीतिक विस्तार के आधार पर स्थिर नहीं रहा, बल्कि उसकी स्थायित्वशीलता का वास्तविक आधार सामाजिक संगठन और आर्थिक तंत्र का परस्पर संबंध था। समाज और अर्थव्यवस्था यहाँ स्वतंत्र इकाइयाँ नहीं थीं, बल्कि एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित और नियंत्रित करने वाली व्यवस्थाएँ थीं।
सामाजिक दृष्टि से विजयनगर समाज वर्णाश्रम परंपरा पर आधारित था, किंतु यह व्यवस्था पूर्णतः जड़ नहीं थी। ब्राह्मणों और व्यापारिक समुदायों की प्रधानता के बावजूद, दस्तकार, कृषक और सेवा-आधारित वर्ग आर्थिक उपयोगिता के कारण सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करते थे। उत्तर भारत से आए प्रवासियों, सामाजिक गतिशीलता और कुछ निम्न वर्गों के उदय ने इस समाज को परिवर्तनशील और तनावग्रस्त भी बनाया। राज्य ने इन तनावों को नियंत्रित करने के लिए सामुदायिक संस्थाओं, नायकों और नगर प्रशासकों के माध्यम से हस्तक्षेप किया।
स्त्रियों की स्थिति विजयनगर समाज के विरोधाभासी स्वरूप को उजागर करती है। एक ओर सामान्य स्त्रियाँ पारंपरिक सीमाओं में बँधी थीं, वहीं दूसरी ओर देवदासियाँ और गणिकाएँ सामाजिक स्वीकृति, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का उपभोग कर रही थीं। दास-प्रथा, सती-प्रथा और विधवाओं की स्थिति यह दर्शाती है कि सामाजिक सुधार राज्य की प्राथमिक नीति नहीं था, किंतु व्यावहारिक स्तर पर राज्य ने अत्यधिक कठोर प्रथाओं को संस्थागत समर्थन भी नहीं दिया।
आर्थिक क्षेत्र में विजयनगर साम्राज्य की शक्ति उसकी कृषि-प्रधान लेकिन व्यावसायिक रूप से विकसित अर्थव्यवस्था में निहित थी। भूमि-धारण पद्धति, नायकार व्यवस्था, कुट्टगि और वारम प्रणाली ने उत्पादन और प्रशासन को जोड़े रखा। सिंचाई को पुण्य-कर्म मानकर मंदिरों, मठों और व्यक्तियों को इसमें भागीदार बनाना विजयनगर राज्य की एक दूरदर्शी नीति थी। मसालों, कपास, नील और नारियल जैसी फसलों का उत्पादन इस अर्थव्यवस्था को केवल आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि निर्यातोन्मुख भी बनाता था।
राज्य की भूमिका न तो पूर्णतः laissez-faire थी और न ही अत्यधिक केंद्रीकृत। सामाजिक विवादों, जातिगत संघर्षों और सांप्रदायिक तनावों में राज्य ने न्यायिक और संतुलनकारी भूमिका निभाई, जिससे उत्पादन और सामाजिक स्थिरता प्रभावित न हो। यही कारण है कि विजयनगर साम्राज्य दीर्घकाल तक दक्षिण भारत की सबसे सुदृढ़ राजनीतिक-आर्थिक शक्ति बना रहा।
अतः यह कहा जा सकता है कि विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना मध्यकालीन भारत की एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें परंपरा और परिवर्तन, धर्म और उत्पादन, राज्य और समाज सभी तत्व एक साथ क्रियाशील थे। इसी संतुलन ने विजयनगर साम्राज्य को न केवल समकालीन राज्यों से भिन्न बनाया, बल्कि उसे मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान भी प्रदान किया।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
