सल्तनत कालीन संगीत : दरबार, सूफी परंपरा और भारतीय शास्त्रीय संगीत की नींव

 

सल्तनत कालीन संगीत (13वीं-15वीं शताब्दी) भारतीय संगीत इतिहास का वह चरण था, जहाँ दरबारी संरक्षण, सूफी परंपरा और क्षेत्रीय प्रयोगों ने मिलकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की आधारभूमि तैयार की। सल्तनत कालीन संगीत को भारतीय इतिहास लेखन में प्रायः दो सीमित दृष्टियों के भीतर बाँध दिया गया है। एक ओर इसे मुग़ल कालीन संगीत की केवल प्रस्तावना (prelude) मान लिया जाता है, तो दूसरी ओर इसे सूफी भक्ति और अमीर खुसरो तक सीमित एक सांस्कृतिक प्रसंग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ये दोनों ही दृष्टियाँ ऐतिहासिक रूप से अपूर्ण हैं। वास्तव में, दिल्ली सल्तनत (13वीं-15वीं शताब्दी) का काल भारतीय संगीत के इतिहास में एक ऐसा निर्णायक संक्रमणकाल था, जहाँ संगीत पहली बार राजकीय संस्थाओं, धार्मिक राजनीति और शहरी समाज, तीनों के साथ एक साथ अंतःक्रिया में आया।

सल्तनत की स्थापना केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि उत्तर भारत की सांस्कृतिक संरचना में एक गहरा हस्तक्षेप भी थी। तुर्क-अफ़ग़ान शासक मध्य एशिया और ईरान की उस दरबारी परंपरा से आए थे, जहाँ संगीत शाही वैधता, अनुशासन और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का माध्यम माना जाता था। इसके विपरीत, भारत में संगीत की जड़ें वैदिक सामगान, मंदिर परंपराओं, क्षेत्रीय दरबारों और लोक समाज में फैली हुई थीं। जब ये दोनों सांस्कृतिक संसार आमने-सामने आए, तो संगीत किसी सरल ‘प्रभाव-स्वीकार’ की प्रक्रिया में नहीं गया, बल्कि संघर्ष, सह-अस्तित्व और क्रमिक अनुकूलन के चरणों से गुज़रा। इस प्रक्रिया को समझने में इतिहास लेखन की एक प्रमुख कमजोरी यह रही है कि सल्तनत कालीन संगीत को या तो धार्मिक विरोध (उलेमा बनाम सूफी) के नैतिक विमर्श में सीमित कर दिया गया, या फिर उसे व्यक्तित्व-केंद्रित कथाओं, विशेषतः अमीर खुसरो में समेट दिया गया। परिणामस्वरूप यह प्रश्न प्रायः अनदेखा रह गया कि संगीत किस प्रकार दरबारी संस्थाओं, क्षेत्रीय सत्ता केंद्रों, सूफी खानकाहों, और शहरीकरण की प्रक्रिया से जुड़ता गया।

वास्तविकता यह है कि इसी काल में संगीत पहली बार नियमित रूप से दरबार में संरक्षित हुआ, सूफी ‘समा’ के माध्यम से उसे आध्यात्मिक वैधता मिली, और जौनपुर तथा ग्वालियर जैसे क्षेत्रीय केंद्रों में उसे संरचनात्मक और शास्त्रीय दिशा प्रदान की गई। साथ ही, धार्मिक राजनीति के कारण संगीत न तो पूरी तरह मुक्त रहा और न ही पूर्णतः प्रतिबंधित, जिससे वह एक लचीली और अनुकूलनशील परंपरा के रूप में विकसित हुआ।

यह लेख सल्तनत कालीन संगीत को न तो एक स्वर्ण युग के रूप में प्रस्तुत करता है और न ही एक असफल सांस्कृतिक प्रयोग के रूप में। इसके बजाय, यह उसे भारतीय संगीत इतिहास का एक संस्थागत और सांस्कृतिक संक्रमणकाल मानते हुए विश्लेषित करता हैएक ऐसा काल, जिसके बिना न मुग़ल संगीत की परिपक्वता को समझा जा सकता है और न ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के ऐतिहासिक विकास को।

सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक महत्व क्या था?

सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसी काल में संगीत पहली बार राज्य, धर्म और शहरी समाज, तीनों से संस्थागत रूप में जुड़ा। यह न तो पूर्ण परिपक्वता का काल था और न ही सांस्कृतिक अव्यवस्था का, बल्कि एक संक्रमणकाल था जिसने मुग़ल कालीन संगीत की संरचनात्मक नींव तैयार की।

 

सल्तनत काल से पहले उत्तर भारत की संगीत परंपरा

 

सल्तनत कालीन संगीत को ऐतिहासिक रूप से समझने के लिए यह अनिवार्य है कि उससे पहले उत्तर भारत में विद्यमान संगीत परंपराओं की संरचनात्मक प्रकृति को स्पष्ट किया जाए। अक्सर सल्तनत काल को संगीत के “आगमन” या “परिवर्तन” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि तुर्क शासन ऐसे भूभाग में स्थापित हुआ जहाँ संगीत पहले से ही धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग था। सल्तनत कालीन परिवर्तन का महत्व इसी तथ्य में निहित है कि उसने एक पहले से मौजूद, सुदृढ़ किंतु बिखरी हुई परंपरा को नए संस्थागत और सांस्कृतिक ढाँचों में पुनर्संयोजित किया।

 

वैदिक-शास्त्रीय परंपरा और संगीत का बौद्धिक आधार

उत्तर भारत में संगीत की सबसे पुरानी व्यवस्थित परंपरा सामवेद से जुड़ी है, जहाँ ध्वनि और स्वर को धार्मिक कर्मकांड की प्रभावशीलता से जोड़ा गया। यहाँ संगीत का उद्देश्य सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि यज्ञीय अनुष्ठान की पवित्रता और लयात्मक शुद्धता था। यह परंपरा स्वभावतः संस्कृत-आधारित और पुरोहित वर्ग तक सीमित थी।

शास्त्रीय काल तक आते-आते यह धार्मिक परंपरा एक सैद्धांतिक अनुशासन में विकसित होती है, जिसका सबसे व्यवस्थित रूप नाट्यशास्त्र में मिलता है। इसमें संगीत को नाटक और नृत्य के साथ एक संगठित कलात्मक प्रणाली के रूप में परिभाषित किया गया। यह बिंदु ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि सल्तनत काल से बहुत पहले ही उत्तर भारत में संगीत नियमबद्ध, शिक्षण-योग्य और बौद्धिक अनुशासन बन चुका था।

 

मंदिर संस्थाएँ और क्षेत्रीय दरबार – संरक्षण का विकेंद्रीकृत स्वरूप

गुप्तोत्तर और प्रारंभिक मध्यकालीन उत्तर भारत में संगीत का प्रमुख संरक्षण मंदिर संस्थाओं और क्षेत्रीय राजदरबारों के माध्यम से हुआ। मंदिरों में संगीत भक्ति अनुष्ठानों, उत्सवों और सामूहिक आराधना का अंग था, जिससे उसका सामाजिक आधार विस्तृत हुआ।

साथ ही, क्षेत्रीय राजाओं के दरबारों में संगीत राजकीय प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक वैधता का प्रतीक बना। किंतु यह संरक्षण विकेंद्रीकृत था, हर क्षेत्र की अपनी शैली, परंपरा और वंशानुगत संगीतज्ञ थे। इस चरण में संगीत का कोई अखिल-उत्तर भारतीय संस्थागत ढाँचा विकसित नहीं हुआ, जो आगे चलकर सल्तनत कालीन हस्तक्षेप को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

 

लोक परंपराएँ और सामाजिक जड़ें

सल्तनत से पूर्व उत्तर भारत की संगीत संस्कृति का सबसे व्यापक आधार लोक परंपराएँ थीं। कृषि-चक्र, ऋतु-परिवर्तन, विवाह, जन्म और मौखिक कथा परंपराएँ, इन सभी में संगीत एक स्वाभाविक सामाजिक अभिव्यक्ति के रूप में मौजूद था।

यह लोक संगीत:

  • न संस्कृत तक सीमित था
  • न शास्त्रीय नियमों से बँधा
  • और न ही किसी संस्थागत नियंत्रण में

इसी कारण इसकी सामाजिक पकड़ अत्यंत गहरी थी। आगे चलकर यही लोक आधार सल्तनत काल में सूफी संगीत और शहरी सांस्कृतिक रूपों को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है।

 

सल्तनत से पूर्व परंपरा की सीमाएँ: परिवर्तन की पूर्वशर्त

यद्यपि सल्तनत से पूर्व उत्तर भारत में संगीत एक सुदृढ़ परंपरा था, फिर भी उसकी कुछ स्पष्ट सीमाएँ थीं। संरक्षण का ढाँचा विखंडित था, भाषिक संसार मुख्यतः संस्कृत और स्थानीय बोलियों तक सीमित था, और संगीत की पहुँच क्षेत्रीय स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई थी। यही वे संरचनात्मक सीमाएँ थीं जिन पर सल्तनत कालीन राजनीतिक सत्ता, शहरीकरण और दरबारी संस्कृति ने हस्तक्षेप किया।

 

शून्य नहीं, पुनर्गठन

इस प्रकार, सल्तनत काल से पहले उत्तर भारत में संगीत किसी भी अर्थ में अपरिपक्व या अनुपस्थित नहीं था। वह धार्मिक, दरबारी और लोक, तीनों स्तरों पर सुदृढ़ था, किंतु संस्थागत रूप से बिखरा हुआ था। सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक महत्व इसी तथ्य में निहित है कि उसने इस परंपरा को नष्ट नहीं किया, बल्कि उसे नई भाषाओं, नई संस्थाओं और नए सामाजिक संदर्भों के भीतर पुनर्गठित किया।

 

तुर्क-फ़ारसी परंपरा का आगमन और प्रारंभिक सांस्कृतिक टकराव

 

13वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, जब दिल्ली सल्तनत एक स्थायी राजनीतिक सत्ता के रूप में उभर रही थी, उसी समय उत्तर भारत में तुर्क-फ़ारसी संगीत परंपरा का क्रमिक आगमन प्रारंभ हुआ। यह एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रक्रिया थी, जिसकी जड़ें मध्य एशिया और ईरान में विकसित उस दरबारी संस्कृति में थीं, जहाँ संगीत सत्ता, शाही वैधता और सामाजिक अनुशासन का स्वीकृत अंग बन चुका था। जब तुर्क शासक भारत पहुँचे, तो वे केवल सैन्य और प्रशासनिक संरचनाएँ नहीं लाए; वे अपने साथ एक अलग सांस्कृतिक दृष्टि भी लेकर आए, जिसमें संगीत का स्थान भारतीय परंपरा से भिन्न था।

इस आगमन को “प्रभाव” या “आदान-प्रदान” के सरल शब्दों में समझना ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त होगा। प्रारंभिक चरण में यह संपर्क सांस्कृतिक टकराव के रूप में सामने आया, जहाँ न तो भारतीय संगीत ने तुरंत अपना स्वरूप बदला और न ही तुर्क-फ़ारसी परंपरा बिना संशोधन के स्वीकार की गई।

 

मध्य एशिया-ईरान की दरबारी परंपरा और संगीत की भूमिका

मध्य एशिया और ईरान में संगीत लंबे समय से दरबार की संरचना का अंग था। अब्बासी काल से लेकर खुरासान और ट्रांसऑक्सियाना तक, संगीत को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शाही गरिमा और सांस्कृतिक परिष्कार का प्रतीक माना जाता था। इस परंपरा में संगीत का स्थान मंदिर या लोक समाज में नहीं, बल्कि दरबार और अभिजात वर्ग में था।

यही सांस्कृतिक अनुभव उन तुर्क शासकों के साथ भारत पहुँचा, जिन्होंने आगे चलकर दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। प्रारंभिक अभियानों के संदर्भ में, जैसे कि महमूद ग़ज़नवी, यह स्पष्ट होता है कि इस चरण में सांस्कृतिक अनुकूलन प्राथमिकता नहीं था। संगीत, जहाँ उपस्थित था, वह सीमित और दरबारी दायरे में ही रहा।

 

भारतीय संगीत परंपरा से प्रारंभिक असहजता

भारतीय संगीत परंपरा, जो रागात्मक संरचना, धार्मिक अनुभूति और लोक सहभागिता पर आधारित थी, तुर्क-फ़ारसी दरबारी संगीत से मूलतः भिन्न थी। भारतीय संगीत में स्वर और लय का संबंध भाव और आध्यात्मिक अनुभव से जुड़ा था, जबकि तुर्क-फ़ारसी परंपरा में संगीत अधिक औपचारिक, नियंत्रित और प्रदर्शन-केंद्रित था।

इस भिन्नता के कारण प्रारंभिक संपर्क में दोनों परंपराओं के बीच असहजता दिखाई देती है। वाद्ययंत्रों, प्रस्तुति शैली और संगीत के सामाजिक स्थान, तीनों स्तरों पर अंतर स्पष्ट था। यही कारण है कि प्रारंभिक सल्तनत काल में संगीत का कोई त्वरित समन्वय नहीं हुआ।

 

सह-अस्तित्व और क्रमिक अनुकूलन की शुरुआत

वास्तविक परिवर्तन तब आरंभ होता है जब दिल्ली सल्तनत एक स्थायी राजनीतिक सत्ता के रूप में स्थापित हो जाती है। राजधानी, शहरी जीवन और नियमित दरबारी संरचनाओं के विकास के साथ तुर्क-फ़ारसी संगीत परंपरा को यह स्वीकार करना पड़ा कि भारत में दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भों से संवाद अनिवार्य है।

यहीं से वह चरण शुरू होता है, जहाँ दोनों परंपराएँ कुछ समय तक समानांतर रूप से सह-अस्तित्व में रहती हैं। यह सह-अस्तित्व निर्णायक है, क्योंकि इसी के भीतर धीरे-धीरे अनुकूलन की संभावनाएँ विकसित होती हैं, वाद्ययंत्रों का स्थानीय ध्वनि-संवेदनशीलता के अनुसार ढलना, भाषिक तत्वों का मिश्रण, और प्रस्तुति शैलियों में लचीलापन।

 

टकराव से संरचनात्मक समन्वय की ओर

इस प्रकार, तुर्क–फ़ारसी परंपरा का आगमन भारतीय संगीत इतिहास में किसी “अचानक परिवर्तन” का कारण नहीं बना। यह एक ऐसा चरण था जिसमें टकराव, असहजता और सह-अस्तित्व ने मिलकर आगे के विकास की शर्तें तय कीं।

यही प्रारंभिक सांस्कृतिक टकराव आगे चलकर:

  • दरबारी संगीत के संस्थानीकरण
  • सूफी संगीत के विकास
  • और क्षेत्रीय दरबारों में विविध प्रयोगों

की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बनता है।

दिल्ली सल्तनत में संगीत का संस्थानीकरण: दरबार, संरक्षण और नियंत्रण

 

दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत संगीत का सबसे निर्णायक रूपांतरण उसका संस्थागत ढाँचे में प्रवेश था। सल्तनत से पूर्व उत्तर भारत में संगीत का संरक्षण मंदिरों, लोक समाज और क्षेत्रीय दरबारों में बिखरा हुआ था; इसके विपरीत, दिल्ली सल्तनत ने संगीत को पहली बार राज्य-केंद्रित सांस्कृतिक व्यवस्था के भीतर रखा। इस परिवर्तन का अर्थ संगीत का सर्वत्र विस्तार नहीं था, बल्कि यह कि उसके संरक्षण, उपयोग और सीमाएँ अब राजकीय सत्ता और धार्मिक राजनीति के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने लगीं।

यह संस्थानीकरण एकरूप या स्थायी नहीं था। अलग-अलग सुल्तानों के शासनकाल में संगीत के प्रति दृष्टिकोण बदला, कहीं नियंत्रित संरक्षण, कहीं प्रयोगशील खुलापन, और कहीं धार्मिक अनुशासन। 14वीं शताब्दी के मध्य तुगलक काल में यह अस्थिरता विशेष रूप से स्पष्ट हो जाती है, इसी नीतिगत अस्थिरता में सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक चरित्र निहित है।

 

दरबार और संगीत: सत्ता, वैधता और सांस्कृतिक प्रदर्शन

दिल्ली सल्तनत के दरबार में संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सत्ता की दृश्य-श्रव्य भाषा था। राजकीय समारोह, उत्सव और दरबारी अनुष्ठानों में संगीत शासक की सांस्कृतिक श्रेष्ठता और अनुशासन को अभिव्यक्त करता था। इस चरण में संगीत पहली बार राजकीय वैधता (legitimacy) के साथ जुड़ता है, वह दिखाता है कि सत्ता केवल सैन्य नहीं, सांस्कृतिक भी है।

इस प्रवृत्ति को अलाउद्दीन खिलजी के काल में स्पष्ट देखा जा सकता है। अलाउद्दीन ने संगीत को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे दरबारी अनुशासन के भीतर रखने का प्रयास किया। इसका अर्थ था, संरक्षण है, पर स्वायत्तता नहीं। यह नीति बताती है कि प्रारंभिक सल्तनत में संगीत को राज्य के अनुरूप ढालने की कोशिश की गई, न कि उसे नकारने की।

 

मुहम्मद बिन तुगलक: अस्थिर राजनीति, सांस्कृतिक प्रयोग

यदि किसी शासक के समय संगीत में प्रयोगशीलता और लचीलापन दिखाई देता है, तो वह मुहम्मद बिन तुगलक का काल है। राजनीतिक स्तर पर अस्थिरता के बावजूद, सांस्कृतिक जीवन अपेक्षाकृत खुला रहा। समकालीन संकेत बताते हैं कि दरबार में बौद्धिक और कलात्मक गतिविधियाँ पुनः सक्रिय हुईं।

यह स्थिति दर्शाती है कि संगीत पर उलेमा का प्रभाव पूर्ण या निर्णायक नहीं था। नीति-निर्माण में शासक की वैचारिक प्रवृत्ति निर्णायक बनी रहती थी। इस काल का महत्व इस बात में है कि यह स्पष्ट करता है, सल्तनत काल में संगीत की स्थिति किसी स्थायी धार्मिक सिद्धांत पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संदर्भ पर निर्भर थी।

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक: धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक विरोधाभास

संगीत के संस्थानीकरण का सबसे जटिल चरण फ़िरोज़ शाह तुगलक के शासनकाल में सामने आता है। समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी अपनी रचना तारीखे फ़ीरोज़शाही में संकेत देते हैं कि फ़िरोज़ शाह तुगलक  के शासनकाल में सार्वजनिक सांस्कृतिक गतिविधियों पर धार्मिक अनुशासन को प्राथमिकता दी गई, जिसके कारण दरबारी संगीत अधिक नियंत्रित रूप में सीमित होता गया। फिर भी, यही वह काल है जब भारतीय संगीत-ज्ञान का संरक्षण जारी रहा, उदाहरणतः रागदर्पण’ जैसे ग्रंथ का फ़ारसी अनुवाद। यह विरोधाभास निर्णायक है: फ़िरोज़ शाह संगीत को सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में सीमित करना चाहते थे, पर उसे ज्ञान-परंपरा के रूप में समाप्त नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि सल्तनत में नियंत्रण और संरक्षण एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते थे।

 

संस्थानीकरण की सीमाएँ: दरबार के बाहर का संगीत

यद्यपि दरबार में संगीत का संस्थानीकरण एक महत्वपूर्ण विकास था, उसकी पहुँच सीमित रही। यह संरक्षण मुख्यतः दरबारी और शहरी अभिजात वर्ग तक सिमटा रहा। परिणामस्वरूप, संगीत के व्यापक सामाजिक जीवन लोक परंपराएँ और सूफी खानकाहें राज्य के बाहर अपेक्षाकृत स्वायत्त बनी रहीं। यही द्वैत, नियंत्रित दरबारी संगीत और अपेक्षाकृत मुक्त सामाजिक-धार्मिक संगीत सल्तनत कालीन सांस्कृतिक संरचना की पहचान बना।

 

संस्थानीकरण बिना स्थायित्व

दिल्ली सल्तनत में संगीत का संस्थानीकरण अपूर्ण लेकिन निर्णायक था। पहली बार संगीत:

  • राज्य के संरक्षण में आया,
  • सत्ता की भाषा बना,
  • और धार्मिक राजनीति से टकराया।

परंतु यह संरक्षण स्थायी नहीं था। हर शासन के साथ नीति बदल सकती थी। यही अस्थिरता वह कारण बनी, जिसने संगीत को राज्य के बाहर वैकल्पिक आधार (सूफी खानकाहें और क्षेत्रीय दरबार) विकसित करने के लिए प्रेरित किया, और आगे चलकर मुग़ल कालीन स्थिर संरक्षण की पृष्ठभूमि तैयार की।

 

अमीर खुसरो: व्यक्ति नहीं, एक ऐतिहासिक प्रक्रिया

 

सल्तनत कालीन संगीत के इतिहास में अमीर खुसरो का उल्लेख लगभग अनिवार्य है। किंतु ऐतिहासिक समस्या तब उत्पन्न होती है, जब खुसरो को एक असाधारण “आविष्कारक” या “स्वर्णिम प्रतिभा” के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है। ऐसी प्रस्तुति न केवल प्रमाणहीन लोक-किंवदंतियों पर निर्भर करती है, बल्कि उन संस्थागत और सामाजिक परिस्थितियों को भी अदृश्य बना देती है, जिनके बिना खुसरो जैसा व्यक्तित्व संभव ही नहीं था।

इतिहासकार के लिए अधिक उपयुक्त दृष्टि यह है कि अमीर खुसरो को किसी अलग-थलग प्रतिभा के रूप में नहीं, बल्कि दिल्ली सल्तनत में विकसित हो रही एक व्यापक सांस्कृतिक प्रक्रिया के प्रतिनिधि के रूप में समझा जाए, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें दरबार, सूफी खानकाह, फ़ारसी साहित्यिक परंपरा और भारतीय लोक-सांस्कृतिक तत्व एक साझा क्षेत्र में अंतःक्रिया कर रहे थे।

 

ऐतिहासिक संदर्भ: खुसरो का उदय क्यों संभव हुआ

अमीर खुसरो का सक्रिय जीवनकाल (13वीं-14वीं शताब्दी) वही चरण है, जब दिल्ली सल्तनत राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर हो चुकी थी और राजधानी एक स्थायी शहरी-सांस्कृतिक केंद्र में बदल रही थी। फ़ारसी प्रशासन और साहित्य की प्रमुख भाषा बन चुकी थी, जबकि भारतीय समाज की भाषिक और सांस्कृतिक परंपराएँ भी जीवित थीं।

खुसरो इसी द्विभाषिक और द्विसांस्कृतिक वातावरण की उपज थे। उनकी रचनात्मकता किसी एक परंपरा से नहीं, बल्कि फ़ारसी दरबारी सौंदर्यबोध और भारतीय सामाजिक-सांगीतिक अनुभव के संयोजन से उत्पन्न हुई। इस दृष्टि से खुसरो अपवाद नहीं, बल्कि उस संक्रमणकालीन समाज का सबसे स्पष्ट उदाहरण थे।

 

दरबार और खानकाह के बीच: सांस्कृतिक सेतु की भूमिका

खुसरो का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि वे एक साथ दरबारी कवि-संगीतज्ञ भी थे और सूफी परिवेश से गहराई से जुड़े हुए भी। चिश्ती परंपरा और विशेषतः निज़ामुद्दीन औलिया की खानकाह से उनका संबंध उन्हें दरबार की औपचारिक संस्कृति से बाहर की दुनिया से जोड़ता है।

यह द्वैत निर्णायक है। दरबार में संगीत सत्ता और अनुशासन का माध्यम था; खानकाह में वही संगीत आध्यात्मिक अनुभूति और भावनात्मक सहभागिता का साधन। खुसरो इन दोनों क्षेत्रों के बीच संस्कृतिक मध्यस्थ (cultural mediator) के रूप में कार्य करते हैं, वे संगीत को न तो केवल अभिजात विलास बनने देते हैं, न ही उसे केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित करते हैं। खुसरो की रचनाएँ, विशेषतः खज़ाइन-उल-फुतूह, उन्हें केवल कवि या संगीतज्ञ नहीं, बल्कि सल्तनत कालीन राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन का प्रत्यक्ष साक्षी भी बनाती हैं।

 

कव्वाली: आविष्कार नहीं, संस्थानीकरण और प्रसार

कव्वाली को अमीर खुसरो की “रचना” या “आविष्कार” कहना ऐतिहासिक साक्ष्यों के अभाव में समस्याग्रस्त है। सूफी ‘समा’ की परंपरा खुसरो से पहले भी विद्यमान थी। खुसरो का वास्तविक योगदान इसे शहरी, भाषिक और सामाजिक रूप से संस्थागत करना था।

उनके काल में कव्वाली:

  • फ़ारसी के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं में व्यक्त होने लगी,
  • सामूहिक गायन का रूप ग्रहण करती गई,
  • और सूफी खानकाहों के बाहर शहरी समाज तक पहुँची।

इस प्रकार, खुसरो ने किसी नई विधा का सृजन नहीं किया, बल्कि एक मौजूदा परंपरा को पहचान, निरंतरता और लोकप्रियता प्रदान की।

 

राग, वाद्य और लोक-किंवदंतियाँ: इतिहास बनाम स्मृति

लोक परंपरा में अमीर खुसरो को अनेक रागों तथा सितार और तबले जैसे वाद्यों का आविष्कारक बताया जाता है। संगीत इतिहास के दृष्टिकोण से इन दावों का समर्थन करने वाले ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, विशेषतः तबले का विकास बहुत बाद के काल से जोड़ा जाता है।

इन कथाओं का ऐतिहासिक महत्व तथ्यात्मक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के रूप में है। समाज ने खुसरो को उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का प्रतीक बना दिया, जिसके अंतर्गत भारतीय और फ़ारसी संगीत तत्वों का समन्वय हुआ। इसलिए, ये किंवदंतियाँ खुसरो के “किया-धरा” से अधिक, उनके प्रतीकात्मक स्थान को दर्शाती हैं।

 

खुसरो एक प्रक्रिया क्यों हैं

अमीर खुसरो का महत्व किसी एक रचना, राग या वाद्य से नहीं मापा जा सकता। उनका वास्तविक योगदान इस बात में निहित है कि वे उस कालखंड का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब संगीत:

  • दरबार और खानकाह, दोनों में सक्रिय था,
  • भाषा, धर्म और सामाजिक सीमाओं को पार कर रहा था,
  • और एक साझा शहरी संस्कृति का अंग बन रहा था।

इस दृष्टि से, अमीर खुसरो किसी अकेले “महापुरुष” से अधिक सल्तनत कालीन संगीत की ऐतिहासिक प्रक्रिया का मानवीय रूप हैं, एक ऐसी प्रक्रिया, जिसने आगे चलकर हिंदुस्तानी संगीत परंपरा के विकास की दिशा तय की।

 

क्षेत्रीय दरबार और संगीत का विविधीकरण: जौनपुर, ग्वालियर और कश्मीर

 

15वीं शताब्दी के क्षेत्रीय सल्तनत चरण में दिल्ली सल्तनत के भीतर संगीत का विकास कभी एक-केन्द्रित नहीं रहा। राजधानी की राजनीतिक-धार्मिक अस्थिरता, उलेमा के प्रभाव और नीति-परिवर्तन के बीच संगीत को स्थायित्व और प्रयोग के लिए क्षेत्रीय दरबारों की ओर झुकना पड़ा। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जिसमें जौनपुर, ग्वालियर और कश्मीर जैसे केंद्र उभरते हैं, न तो दिल्ली की नकल के रूप में, न ही उससे अलग-थलग, बल्कि स्थानीय सामाजिक संरचनाओं, सत्ता-स्वभाव और सांस्कृतिक संपर्कों के अनुसार।

इन दरबारों का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहीं संगीत को वैकल्पिक संरक्षण, संरचनात्मक प्रयोग और दीर्घकालिक निरंतरता मिली, जो आगे चलकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय परंपरा की बहु-धाराओं का आधार बनी।

 

जौनपुर: सूफी वातावरण और संगीत का सामाजिक विस्तार

पंद्रहवीं शताब्दी का जौनपुर दरबार, विशेषतः शर्की शासकों के अधीन, संगीत के लिए अपेक्षाकृत कम नियंत्रित और अधिक सहभागी वातावरण प्रस्तुत करता है। हुसैन शाह शर्की के समय काव्य-संगीत को दरबारी प्रतिष्ठा के साथ-साथ सूफी खानकाहों से भी सहारा मिला। इस द्वैत ने जौनपुर में संगीत को केवल अभिजात प्रदर्शन न रहने देकर शहरी समाज की भावनात्मक अभिव्यक्ति बना दिया।

जौनपुर की विशिष्टता यह है कि यहाँ संगीत का वैधकरण केवल राज्य से नहीं, बल्कि सूफी आध्यात्मिकता से भी हुआ। परिणामस्वरूप, राग-आधारित गायन की भावात्मक धारा को सामाजिक स्वीकार्यता मिली। यही कारण है कि जौनपुर को अक्सर हिंदुस्तानी संगीत की भाव-प्रधान धारा से जोड़ा जाता है, यह दिल्ली की औपचारिकता से अलग, सहभागिता की संस्कृति है।

 

ग्वालियर: शास्त्रीय अनुशासन और संगीत का ग्रंथीकरण

यदि जौनपुर संगीत के सामाजिक विस्तार का प्रतीक है, तो ग्वालियर उसके शास्त्रीय अनुशासन का। राजपूत संरक्षण के अंतर्गत विकसित ग्वालियर परंपरा ने संगीत को भावनात्मक अनुभव के साथ-साथ नियमबद्ध अध्ययन का विषय बनाया। यहीं संगीत पहली बार व्यवस्थित रूप से ग्रंथबद्ध होने की दिशा में बढ़ता है।

मान कौतुहल’ जैसे ग्रंथ संकेत देते हैं कि राग, स्वर और अभ्यास को संहिताबद्ध करने की कोशिशें तेज़ हुईं। यह प्रक्रिया निर्णायक है, क्योंकि यह संगीत को मौखिक परंपरा से आगे ले जाकर शिक्षण-योग्य शास्त्र की ओर ले जाती है। आगे चलकर यही अनुशासन मुग़ल काल में स्थिर ढाँचे का रूप लेता है। इस अर्थ में, ग्वालियर संरचनात्मक धारा का केंद्र बनता है।

 

कश्मीर: फारसीकृत दरबारी सौंदर्यबोध और सीमित सामाजिक पहुँच

कश्मीर का उदाहरण सल्तनत-कालीन विविधीकरण को भौगोलिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए आवश्यक है। भौगोलिक अलगाव और ईरानी-मध्य एशियाई संपर्कों के कारण यहाँ संगीत पर फ़ारसी सौंदर्यबोध का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक रहा। कश्मीरी दरबारों में संगीत मुख्यतः अभिजात, नियंत्रित और परिष्कृत रूप में विकसित हुआ।

इस परंपरा की सीमा यह थी कि उसका सामाजिक प्रसार मैदानी उत्तर भारत जितना व्यापक नहीं हुआ। फिर भी, कश्मीर यह दिखाता है कि सल्तनत-कालीन संगीत का स्वरूप केवल सत्ता से नहीं, बल्कि भूगोल और सांस्कृतिक नेटवर्क से भी गहराई से निर्धारित होता था।

 

तुलनात्मक विश्लेषण: एक काल, तीन दिशाएँ

इन तीनों केंद्रों को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि सल्तनत-कालीन संगीत किसी एक आदर्श मॉडल में विकसित नहीं हुआ।
जौनपुर ने संगीत को सामाजिक-भावनात्मक आधार दिया;
ग्वालियर ने उसे शास्त्रीय-संरचनात्मक रूप प्रदान किया;
और कश्मीर ने दरबारी-अभिजात सौंदर्यबोध को सुदृढ़ किया।

यह विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि उस काल की रचनात्मक शक्ति थी, क्योंकि इसी बहु-धारात्मकता ने आगे चलकर मुग़ल काल में स्थिर, समन्वित और परिपक्व परंपरा के लिए कच्चा-माल (raw material) उपलब्ध कराया।

 

क्षेत्रीय दरबार क्यों निर्णायक थे

यदि सल्तनत-कालीन संगीत केवल दिल्ली पर निर्भर रहता, तो वह या तो धार्मिक अस्थिरता में सीमित हो जाता, या दरबारी औपचारिकता में सिमट जाता। क्षेत्रीय दरबारों ने उसे वैकल्पिक संरक्षण, प्रयोग की स्वतंत्रता और निरंतरता प्रदान की। इस दृष्टि से, जौनपुर, ग्वालियर और कश्मीर सल्तनत-कालीन संगीत के अपवाद नहीं, बल्कि उसकी स्थायित्व-रणनीति थे, और यही रणनीति मुग़ल कालीन संगीत के उत्कर्ष की ऐतिहासिक पूर्वशर्त बनी।

 

उलेमा, सूफी और संगीत: धार्मिक राजनीति और सामाजिक यथार्थ

 

सल्तनत कालीन संगीत को प्रायः उलेमा बनाम सूफी के सीधे और नैतिक द्वंद्व में रख दिया जाता है, मानो उलेमा पूर्णतः संगीत-विरोधी थे और सूफी सर्वथा संगीत-समर्थक। यह प्रस्तुति ऐतिहासिक वास्तविकता को सरल बना देती है। वास्तव में, संगीत को लेकर दृष्टिकोण इस बात पर निर्भर करता था कि धर्म सत्ता से किस रूप में जुड़ा हुआ है, और समाज उस सत्ता से कैसे संवाद कर रहा है।

दिल्ली सल्तनत में इस्लाम केवल आस्था की प्रणाली नहीं, बल्कि राजकीय वैधता का वैचारिक आधार था। इसी कारण संगीत पर होने वाली धार्मिक बहसें केवल नैतिक नहीं थीं; वे यह तय करती थीं कि कौन-सी सांस्कृतिक प्रथाएँ सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य होंगी और किन पर नियंत्रण लगाया जाएगा।

 

उलेमा का दृष्टिकोण: धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक नियंत्रण

उलेमा वर्ग के भीतर संगीत के प्रति कोई एकरूप मत नहीं था, किंतु कठोर फ़िक़्ही व्याख्याओं में संगीत को प्रायः मक़रूह या नैतिक रूप से संदिग्ध माना गया, विशेषतः तब, जब वह नृत्य, सार्वजनिक प्रदर्शन या सांसारिक विलास से जुड़ा हो। यह विरोध सिद्धांत से अधिक सामाजिक प्रभाव पर केंद्रित था: संगीत मनुष्य को अनुशासन से विचलित कर सकता है।

इस दृष्टिकोण का राजनीतिक प्रभाव तब बढ़ता है, जब उलेमा को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता है। फ़िरोज़ शाह तुगलक के शासनकाल में धार्मिक अनुशासन को सुदृढ़ करने के प्रयासों के बीच सार्वजनिक सांस्कृतिक गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ता दिखाई देता है। समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी के विवरण संकेत देते हैं कि यह नियंत्रण पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुशासन स्थापित करने का प्रयास था।

यही कारण है कि इसी काल में संगीत-ज्ञान का संरक्षण और अनुवाद भी जारी रहता है, जिससे स्पष्ट होता है कि उलेमा का विरोध संगीत के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उसके सार्वजनिक और अनियंत्रित रूपों से था।

 

सूफी परंपरा: ‘समा’ और आध्यात्मिक वैधता

उलेमा के विपरीत, सूफी संतों ने संगीत को आध्यात्मिक अनुभव का विरोधी नहीं, बल्कि उसका माध्यम माना। विशेषतः चिश्ती परंपरा में ‘समा’ का विकास हुआ, जहाँ संगीत और कविता के माध्यम से ईश्वर-प्रेम, आत्मविस्मरण और आध्यात्मिक एकाग्रता को बढ़ाया जाता था।

निज़ामुद्दीन औलिया की खानकाह इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहाँ संगीत केवल स्वीकार्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अभ्यास का अंग था, बशर्ते वह अहंकार को न बढ़ाए और सांसारिक विलास का साधन न बने। यह दृष्टिकोण धार्मिक उदारता नहीं, बल्कि एक सुसंगठित वैचारिक विकल्प था, जिसने संगीत को वैधता प्रदान की।

इस दृष्टिकोण की पुष्टि प्रारंभिक फ़ारसी सूफी तज़्किरों में भी होती है, जहाँ ‘समा’ को नियंत्रित और अनुशासित आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में स्वीकार किया गया है।

 

दरबार और खानकाह: दो सांस्कृतिक क्षेत्र

सल्तनत काल में दरबार और खानकाह दो भिन्न, किंतु परस्पर जुड़े सांस्कृतिक क्षेत्र बनकर उभरे। दरबार में संगीत सत्ता की गरिमा, अनुशासन और वैधता का प्रतीक था; खानकाह में वही संगीत भावनात्मक और सहभागी आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम बना।

यह विभाजन निर्णायक है, क्योंकि जब दरबार में धार्मिक दबाव बढ़ता, तब भी संगीत खानकाहों और शहरी समाज में जीवित रहता। इस प्रकार, संगीत का अस्तित्व केवल राज्य पर निर्भर नहीं रहा; उसने राज्य के बाहर एक वैकल्पिक सामाजिक आधार विकसित कर लिया।

 

समाज और लोक-यथार्थ”: बहसों के बीच निरंतरता

यदि सल्तनत काल का समाज वास्तव में संगीत-विरोधी होता, तो न सूफी संगीत का प्रसार संभव होता और न ही क्षेत्रीय दरबारों में उसका विकास। वास्तविकता यह है कि संगीत विवाह, उत्सव, मौसमी अनुष्ठानों और लोक परंपराओं में निरंतर उपस्थित रहा।

इस सामाजिक यथार्थ ने उलेमा और सूफी, दोनों की सीमाएँ तय कीं। उलेमा संगीत को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके, और सूफी उसे सार्वभौमिक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बना सके। परिणामस्वरूप, संगीत एक लचीली, मध्यवर्ती और अनुकूलनशील परंपरा के रूप में विकसित हुआ।

 

धार्मिक राजनीति के भीतर सांस्कृतिक निरंतरता

सल्तनत काल में संगीत का इतिहास किसी एक विचारधारा की विजय का इतिहास नहीं है। यह उलेमा, सूफी और समाज, तीनों के बीच निरंतर संवाद, तनाव और समझौते का परिणाम है। उलेमा ने सीमाएँ निर्धारित कीं, सूफियों ने अर्थ और वैधता दी, और समाज ने संगीत को अपने दैनिक जीवन में बनाए रखा।

इसी त्रिकोणीय प्रक्रिया ने सल्तनत कालीन संगीत को नष्ट नहीं होने दिया, बल्कि उसे वह सांस्कृतिक लचीलापन प्रदान किया, जिसके बिना मुग़ल कालीन संगीत की स्थिर और परिपक्व परंपरा की कल्पना संभव नहीं।

 

सल्तनत से मुग़ल काल: निरंतरता, परिपक्वता और विरासत

 

भारतीय संगीत इतिहास में मुग़ल काल को अक्सर एक स्वतंत्र “स्वर्ण युग” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि सल्तनत काल को या तो उसकी भूमिका भर मान लिया जाता है, या अस्थिर प्रयोगों का युग कहकर सीमित कर दिया जाता है। यह दृष्टि ऐतिहासिक रूप से अपूर्ण है। वास्तविकता यह है कि मुग़ल कालीन संगीत का उत्कर्ष किसी आकस्मिक सांस्कृतिक उछाल का परिणाम नहीं था, बल्कि सल्तनत काल में विकसित उन संस्थागत, सामाजिक और वैचारिक प्रक्रियाओं की परिपक्व परिणति था, जिनकी नींव 13वीं–15वीं शताब्दी के बीच रखी जा चुकी थी। सल्तनत काल ने संगीत को पहली बार दरबार, खानकाह और शहरी समाज, तीनों के साथ एक साथ जोड़ दिया था। मुग़ल काल ने इसी बहुस्तरीय संरचना को स्थायित्व और स्पष्टता प्रदान की।

 

दरबारी संरक्षण: अस्थिर प्रयोग से स्थायी नीति तक

सल्तनत काल में दरबारी संगीत का संरक्षण मौजूद था, किंतु वह शासक-निर्भर और अस्थिर था। अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक और फ़िरोज़ शाह तुगलक, तीनों के काल में संगीत की स्थिति बदलती रही। इसके बावजूद, एक निर्णायक परिवर्तन हो चुका था: संगीत दरबार का अंग बन चुका था।

मुग़ल काल में यही परंपरा स्थायी नीति का रूप लेती है। विशेषतः अकबर के शासनकाल में संगीत को नियमित संरक्षण, संस्थागत सम्मान और दीर्घकालिक आश्रय प्राप्त होता है। यह परिवर्तन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि मुग़ल दरबार ने संगीत को “खोजा” नहीं, बल्कि सल्तनत काल से विरासत में मिली परंपरा को स्थिर और सुदृढ़ किया।

 

संगीतज्ञों की सामाजिक स्थिति: दरबारी कारीगर से सांस्कृतिक प्रतीक तक

सल्तनत काल में संगीतज्ञों की स्थिति अनिश्चित थी। वे दरबार से जुड़े अवश्य थे, पर धार्मिक दबाव और नीतिगत परिवर्तन उनके अस्तित्व को अस्थिर बनाए रखते थे। इसके बावजूद, इसी काल में संगीतज्ञ पहली बार राजकीय संरचना के नियमित अंग बनते हैं।

मुग़ल काल में यह प्रक्रिया परिपक्व होती है। तानसेन जैसे संगीतज्ञ केवल कलाकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक बन जाते हैं। उनकी प्रतिष्ठा यह दर्शाती है कि संगीत अब केवल दरबारी मनोरंजन नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यह सामाजिक उन्नयन सल्तनत कालीन प्रयोगों की स्वाभाविक परिणति था।

 

शास्त्रीय ढाँचे की परिपक्वता: प्रयोग से संहिताबद्ध परंपरा तक

सल्तनत काल में जौनपुर और ग्वालियर जैसे क्षेत्रों में राग-रचना, वर्गीकरण और ग्रंथीकरण के प्रयास हुए थे, किंतु वे अभी प्रारंभिक अवस्था में थे। मुग़ल काल में इन्हीं प्रयासों को संस्थागत ढाँचा प्राप्त होता है। राग प्रणाली का स्थिरीकरण, ताल संरचनाओं की स्पष्टता और प्रस्तुति शैलियों की मान्यता, ये सभी उस दीर्घकालिक प्रक्रिया के परिणाम हैं, जिसकी शुरुआत सल्तनत काल में हुई थी। इस दृष्टि से, मुग़ल कालीन शास्त्रीय संगीत किसी नए आरंभ का नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिपक्वता का प्रतिनिधित्व करता है।

 

धार्मिक राजनीति: टकराव से समन्वय की ओर

सल्तनत काल में संगीत निरंतर धार्मिक बहसों के केंद्र में रहा। उलेमा और सूफी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन अस्थिर था। मुग़ल काल में यह स्थिति बदलती है, विशेषतः अकबर के शासनकाल में अपनाई गई अपेक्षाकृत समावेशी धार्मिक नीति के कारण। इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक प्रश्न समाप्त हो गए, बल्कि यह कि राज्य ने उन्हें सांस्कृतिक विकास में बाधा नहीं बनने दिया। यह संतुलन बिना सल्तनत काल के संघर्षों और प्रयोगों के संभव नहीं था।

 

ऐतिहासिक विरासत: सल्तनत काल क्यों अपरिहार्य था

यदि सल्तनत काल न होता, तो न संगीत का दरबार में प्रवेश होता, न सूफी परंपरा के माध्यम से उसका सामाजिक आधार बनता, और न ही क्षेत्रीय दरबारों में वह प्रयोगशीलता विकसित होती, जिसने शास्त्रीय ढाँचे की नींव रखी। इस अर्थ में, सल्तनत कालीन संगीत कोई असफल प्रयोग नहीं, बल्कि भारतीय संगीत इतिहास का निर्णायक संक्रमणकाल था। मुग़ल कालीन उत्कर्ष उसी संक्रमण की परिपक्व परिणति है।

 

सल्तनत कालीन संगीत : प्रमुख चरण, संरक्षक और ऐतिहासिक विशेषताएँ

 

ऐतिहासिक चरणप्रमुख संरक्षक / संदर्भसंगीत का स्वरूपऐतिहासिक महत्व
13वीं शताब्दी (प्रारंभिक सल्तनत)गुलाम व खिलजी कालदरबारी मनोरंजन, सीमित संरक्षणसंगीत पहली बार राज्य-संरचना से जुड़ा
14वीं शताब्दी (तुगलक काल)मुहम्मद बिन तुगलक, फ़िरोज़ शाहनियंत्रित दरबारी संगीत, धार्मिक बहसेंउलेमा–सूफी तनाव के बीच सांस्कृतिक संतुलन
सूफी खानकाहेंचिश्ती परंपरा‘समा’, कव्वाली, भावनात्मक गायनसंगीत को आध्यात्मिक वैधता प्राप्त
क्षेत्रीय दरबार (15वीं शताब्दी)जौनपुर, ग्वालियर, कश्मीरप्रयोगशील, शास्त्रीय व भावात्मक रूपबहु-धारात्मक विकास और संरचनात्मक विविधता
संक्रमण चरणसल्तनत से मुग़ल कालस्थायित्व की ओर बढ़ता ढाँचामुग़ल संगीत की ऐतिहासिक नींव

 

निष्कर्ष: सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

सल्तनत कालीन संगीत को भारतीय इतिहास में सही स्थान पर रखने के लिए दो प्रचलित अतियों से बचना आवश्यक है। पहली प्रवृत्ति सल्तनत काल को मुग़ल संगीत की केवल भूमिका मानकर उसकी स्वतंत्र ऐतिहासिक पहचान को नकार देती है। दूसरी प्रवृत्ति उसे एक सुव्यवस्थित और पूर्ण विकसित “स्वर्ण युग” के रूप में प्रस्तुत कर देती है। ऐतिहासिक साक्ष्य इन दोनों दृष्टियों का समर्थन नहीं करते। सल्तनत काल न तो केवल संक्रमण का निष्क्रिय चरण था और न ही पूर्ण सांस्कृतिक परिपक्वता का काल; वह एक निर्णायक संरचनात्मक परिवर्तन का युग था। सल्तनत से पूर्व उत्तर भारत में संगीत धार्मिक अनुष्ठानों, लोक जीवन और क्षेत्रीय दरबारों में बिखरा हुआ था। दिल्ली सल्तनत के साथ पहली बार संगीत राज्य, धर्म और शहरी समाज, तीनों के साथ एक साथ जुड़ा। यह जुड़ाव सहज नहीं था। तुर्क-फ़ारसी दरबारी संस्कृति और भारतीय रागात्मक परंपरा के बीच प्रारंभिक टकराव, असहजता और सह-अस्तित्व की प्रक्रियाएँ सामने आईं। किंतु इसी तनावपूर्ण संपर्क ने संगीत को नए सामाजिक और संस्थागत संदर्भ प्रदान किए।

सल्तनत काल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान संगीत का संस्थानीकरण था, भले ही वह अस्थिर और शासक-निर्भर रहा। दरबार में संगीत सत्ता की भाषा बना, सूफी खानकाहों में उसे आध्यात्मिक वैधता मिली, और क्षेत्रीय दरबारों में प्रयोगशीलता तथा संरचनात्मक विकास की संभावना पैदा हुई। इस बहुस्तरीय विकास ने संगीत को केवल अभिजात कला न रहने देकर एक सांस्कृतिक प्रक्रिया में बदल दिया।

धार्मिक राजनीति ने इस प्रक्रिया को निरंतर प्रभावित किया। उलेमा के अनुशासनात्मक प्रयास संगीत को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सके, क्योंकि उसका सामाजिक आधार अत्यंत व्यापक था। वहीं सूफी परंपरा ने संगीत को अर्थ और वैधता दी, किंतु उसे एकमात्र धार्मिक अभ्यास में परिवर्तित नहीं किया। समाज ने इन दोनों दृष्टियों के बीच संगीत को अपने दैनिक जीवन में बनाए रखा। इसी कारण सल्तनत काल में संगीत न तो पूर्णतः नियंत्रित रहा और न ही पूर्णतः मुक्त, बल्कि एक लचीली और अनुकूलनशील परंपरा के रूप में विकसित हुआ। अमीर खुसरो जैसे व्यक्तित्व इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के प्रतीक हैं, उसके कारण नहीं। उनका महत्व इस तथ्य में निहित है कि वे उस कालखंड का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ दरबार, खानकाह और शहरी समाज पहली बार एक साझा सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय हुए। इसी प्रकार, जौनपुर, ग्वालियर और कश्मीर जैसे क्षेत्रीय केंद्र यह स्पष्ट करते हैं कि सल्तनत कालीन संगीत कभी एक-केन्द्रित नहीं रहा; उसका विकास बहु-दिशात्मक था, कहीं भावनात्मक, कहीं शास्त्रीय, कहीं अभिजात।

मुग़ल कालीन संगीत का उत्कर्ष इसी पृष्ठभूमि पर संभव हुआ। स्थायी संरक्षण, शास्त्रीय अनुशासन और कलाकारों की सामाजिक प्रतिष्ठा, ये सभी उसी प्रक्रिया की परिपक्व परिणति थे, जिसकी नींव सल्तनत काल में रखी गई थी। इस अर्थ में, सल्तनत काल को न तो एक विफल प्रयोग कहा जा सकता है और न ही केवल एक सेतु; वह स्वयं में भारतीय संगीत इतिहास का निर्णायक संक्रमणकाल था।

अंततः, सल्तनत कालीन संगीत का ऐतिहासिक मूल्यांकन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस काल ने भारतीय संगीत को संरचनात्मक रूप से बदल दिया। उसने संगीत को मंदिर और लोक से निकालकर दरबार और शहर तक पहुँचाया, धार्मिक बहसों के बीच उसे जीवित रखा, और उसे वह सांस्कृतिक लचीलापन प्रदान किया जिसके बिना हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दीर्घकालिक परंपरा की कल्पना संभव नहीं।

 

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