सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था : संरचना, नीति और ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

सल्तनत-काल की स्थापना के साथ ही सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था राज्य की आर्थिक संरचना का केंद्रीय आधार बन गई। मध्यकालीन भारत में, विशेषकर दिल्ली सल्तनत की राजस्व नीति के संदर्भ में, राज्य की स्थिरता और सैन्य-प्रशासनिक शक्ति सीधे उस आय पर निर्भर थी जो उसे भूमि से प्राप्त होती थी। भारत के कृषि-प्रधान सामाजिक ढाँचे में भूमि न केवल उत्पादन का साधन थी, बल्कि सामाजिक प्रभुत्व, ग्रामीण नियंत्रण और राजनीतिक सत्ता का भी प्रमुख स्रोत थी।

सल्तनत काल में भूमि की काश्तकारी की तकनीक मूलतः पूर्ववर्ती हिंदू काल से भिन्न नहीं थी। कृषि के साधन, फसल-चक्र और उत्पादन की प्रकृति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ। किंतु जो परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, वह राज्य द्वारा अधिशेष उत्पादन (surplus produce) के अधिग्रहण की प्रणाली में था। वास्तव में सल्तनतकालीन भूमि-व्यवस्था इस्लामी प्रशासनिक सिद्धांतों और पूर्व-प्रचलित भारतीय राजस्व संस्थाओं का एक व्यावहारिक और परिस्थिति-सापेक्ष सम्मिश्रण थी।

सुल्तानों ने ऐसे भू-राजस्व संबंधी नियम विकसित किए, जिनके माध्यम से अधिशेष उत्पादन मुख्यतः इक्ता-प्रणाली के द्वारा राज्यसत्ता के नियंत्रण में आता था। इस अधिशेष से दो वर्ग विशेष रूप से लाभान्वित होते थे इक्तादार और जमींदार। ये दोनों ही वर्ग मूलतः शासक संरचना के अंग थे, जबकि वास्तविक उत्पादक कृषक वर्ग को राजस्व-भार वहन करना पड़ता था। इस प्रकार प्रारंभ से ही सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था में शासक और कृषक वर्ग के हितों के बीच एक अंतर्निहित असंतुलन विद्यमान रहा, जिसने आगे चलकर ग्रामीण असंतोष और विद्रोहों की पृष्ठभूमि तैयार की।

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की वैचारिक पृष्ठभूमि

 

सल्तनत काल की राजस्व नीति किसी एक सैद्धांतिक ढाँचे पर आधारित नहीं थी। यह इस्लामी अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों, राज्य की व्यावहारिक आवश्यकताओं और भारतीय सामाजिक-आर्थिक यथार्थ, तीनों के अंतःसंयोजन का परिणाम थी। तुर्क शासक एक ऐसे समाज पर शासन कर रहे थे जहाँ भूमि पर पहले से ही अनेक प्रकार के परंपरागत अधिकार, स्थानीय कर-प्रणालियाँ और मध्यस्थ वर्ग मौजूद थे। इस कारण इस्लामी राजस्व सिद्धांतों को यथावत लागू करना संभव नहीं था। परिणामस्वरूप सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था एक लचीली, परिस्थिति-सापेक्ष और प्रयोगशील प्रणाली के रूप में सामने आई।

 

इस्लामी अर्थशास्त्रीय सिद्धांत और प्रशासनिक अनुकूलन

सामान्य रूप से तुर्क शासकों ने इस्लामी अर्थव्यवस्था से संबंधित सिद्धांतों को अपनाने का प्रयास किया। इस्लामी राजस्व सिद्धांतों का शास्त्रीय स्वरूप बग़दाद के प्रमुख क़ाज़ी अबू यूसुफ़ द्वारा रचित किताब-उल-खराज में मिलता है। यह ग्रंथ राज्य और प्रजा के बीच कर-संबंधों को नैतिक और कानूनी आधार प्रदान करता है।

इस व्यवस्था का मूल आधार भूमि की प्रकृति, उसकी उत्पादकता और सिंचाई के साधनों पर निर्भर करता था। इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार भूमि-कर के दो प्रमुख रूप थे, उशर और खराज। किंतु भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना अत्यंत विविध थी। यहाँ भूमि पर पहले से अनेक प्रकार के परंपरागत अधिकार और कर-प्रणालियाँ प्रचलित थीं। इसलिए सल्तनत शासकों को इन सिद्धांतों को यथावत लागू करने के बजाय व्यवहारिक रूप से संशोधित करना पड़ा।

यही कारण है कि सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था किसी एक शुद्ध धार्मिक सिद्धांत पर आधारित न होकर, प्रशासनिक आवश्यकताओं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती रही।

 

भू-राजस्व के प्रमुख प्रकार

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था का व्यावहारिक स्वरूप विभिन्न प्रकार के करों के माध्यम से प्रकट होता है। इन करों का निर्धारण भूमि की प्रकृति, कृषक की धार्मिक पहचान और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता था। इस संदर्भ में उशर और खराज सबसे महत्वपूर्ण थे। इन दोनों करों के माध्यम से राज्य ने न केवल आय सुनिश्चित की, बल्कि सामाजिक वर्गीकरण को भी बनाए रखा।

 

उशर : स्वरूप, दरें और व्यवहार

उशर मुसलमान कृषकों से लिया जाने वाला भूमि-कर था। इसकी दर सिंचाई के साधनों पर आधारित थी। प्राकृतिक साधनों से सिंचित भूमि पर उपज का 1/10 भाग, जबकि कृत्रिम साधनों से सिंचित भूमि पर 1/5 भाग उशर के रूप में लिया जाता था। यद्यपि उशर का आधार धार्मिक था, किंतु इसकी वसूली पूर्णतः प्रशासनिक तंत्र द्वारा की जाती थी। इस कारण व्यवहार में कई बार स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसमें लचीलापन दिखाई देता है।

 

खराज : निर्धारण, सीमा और व्यावहारिक स्वरूप

खराज वह भूमि-कर था जो मुख्यतः हिंदू जमींदारों और कृषकों से वसूला जाता था। इसकी कोई सार्वभौमिक या स्थायी दर नहीं थी। सामान्यतः खराज की मात्रा पूर्ववर्ती हिंदू राजस्व परंपराओं और अनुमानित उपज के आधार पर तय की जाती थी। आम तौर पर खराज उपज के एक-तिहाई से कम और आधे से अधिक नहीं होता था। किंतु अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक के काल में कुछ क्षेत्रों में इसे अधिकतम सीमा तक ले जाया गया, जिससे कृषक वर्ग पर अत्यधिक दबाव पड़ा।

 

भूमि की श्रेणियाँ और प्रशासनिक वर्गीकरण

 

राजस्व-संग्रह को प्रभावी बनाने के लिए सल्तनत काल में भूमि को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया। यह विभाजन केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं था, बल्कि सत्ता के वितरण और नियंत्रण का माध्यम भी था। भूमि का यह वर्गीकरण यह स्पष्ट करता है कि सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था राज्य की राजनीतिक रणनीति से गहराई से जुड़ी हुई थी।

 

भूमि के प्रमुख प्रकार

  1. इक्ता भूमि – प्रशासनिक सेवा के बदले अधिकारियों को दी गई भूमि
  2. खालसा भूमि – प्रत्यक्ष रूप से सुल्तान के अधीन क्षेत्र
  3. अनुदान भूमि – मिल्क, वक्फ और इनाम के रूप में दी गई करमुक्त भूमि
  4. अधीनस्थ हिंदू शासकों की भूमि – वार्षिक कर या नजराने के बदले स्वायत्तता प्राप्त क्षेत्र

 

कृषक समाज और अंतर्निहित सामाजिक तनाव

 

सल्तनत कालीन ग्रामीण समाज एकरूप नहीं था। इसमें जमींदार, मध्यम कृषक और निम्न कृषक तीनों वर्ग सम्मिलित थे। भू-राजस्व व्यवस्था ने इन वर्गों के बीच असमानताओं को और गहरा किया। राज्य की नीति का प्रभाव सबसे अधिक कृषक वर्ग पर पड़ा, क्योंकि वही वास्तविक उत्पादक था और उसी से अधिशेष निकाला जाता था।

 

सामाजिक तनाव के प्रमुख कारण

सल्तनतकालीन कृषक-समाज में तीन प्रमुख प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं:

  1. जिन जमींदारों को तुर्क शासकों द्वारा उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित किया गया, उनमें लगातार विद्रोह की भावना बनी रही।
  2. कृषक वर्ग की परिस्थितियाँ निरंतर बदलती रहीं, कभी करों की कठोरता के कारण, तो कभी प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण।
  3. शासक वर्ग के विभिन्न घटकों के बीच अधिशेष उत्पादन को अधिक से अधिक हड़पने के लिए आपसी संघर्ष चलता रहा।

इन प्रवृत्तियों ने सल्तनत कालीन ग्रामीण समाज को अस्थिर बनाए रखा और यही अस्थिरता आगे चलकर अनेक विद्रोहों का कारण बनी।

 

इक्ता प्रणाली : सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की धुरी

 

इक्ता प्रणाली सल्तनत कालीन राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ थी। इसके माध्यम से सुल्तान ने एक ओर अधिकारियों को पारिश्रमिक दिया, तो दूसरी ओर भूमि से प्राप्त राजस्व पर नियंत्रण बनाए रखा। यह प्रणाली मूलतः सैन्य-प्रशासनिक आवश्यकताओं और केंद्रीकरण की नीति से जुड़ी हुई थी।

 

इक्ता की अवधारणा और स्वरूप

निज़ाम-उल-मुल्क तुसी ने सियासतनाामा में इक्ता को राजस्व-संग्रह का माध्यम बताया है, जिसके द्वारा इक्तादार अपनी सेना का व्यय वहन करता था और क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखता था। इक्तादार भूमि का स्वामी नहीं होता था और उसका स्थानांतरण संभव था। इस प्रकार इक्ता प्रणाली का उद्देश्य अधिकारियों को सुल्तान पर निर्भर बनाए रखना था, न कि उन्हें क्षेत्रीय स्वायत्तता प्रदान करना।

 

अलाउद्दीन खिलजी और इक्ता पर केंद्रीय नियंत्रण

अलाउद्दीन खिलजी ने इक्ता प्रणाली में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। उसने अपने कर्मचारियों को सीधे राजस्व एकत्र करने का कार्य सौंपा, ताकि अधिशेष राशि सरकारी कोष में जमा हो सके। उसका उद्देश्य इक्तादारों की आर्थिक शक्ति को सीमित करना था।

इस व्यवस्था को लागू करने के लिए अलाउद्दीन ने आमिल, मुतसर्रिफ़, मुहासिल, गुमाश्ता, नवीस और सरहंग जैसे अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की। भ्रष्टाचार को रोकने हेतु उसने राजस्व अधिकारियों के वेतन में वृद्धि की। इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी के अनुसार, इस काल में प्रशासनिक भय इतना व्यापक था कि अधिकारी रिश्वत लेने का साहस नहीं करते थे और ग्रामीण समाज पूरी तरह राजस्व तंत्र के अधीन हो गया था।

 

मुकाता (ठेका) प्रथा : राजस्व-संग्रह का प्रयोगात्मक स्वरूप

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था केवल इक्ता और खालसा तक सीमित नहीं थी। कुछ क्षेत्रों में राजस्व-संग्रह के लिए मुकाता (ठेका) प्रथा भी अपनाई गई। इस प्रथा के अंतर्गत किसी व्यक्ति या समूह को निश्चित राशि पर पूरे क्षेत्र का राजस्व वसूल करने का अधिकार दे दिया जाता था। राज्य को पहले से तय रकम मिल जाती थी, जबकि ठेकेदार अतिरिक्त वसूली से लाभ कमाने का प्रयास करता था। यह व्यवस्था सिद्धांततः राज्य के लिए सुविधाजनक थी, किंतु व्यवहार में इससे कृषक शोषण और प्रशासनिक अराजकता बढ़ी।

 

मुकाता प्रथा के उदाहरण और सीमाएँ

समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि मुहम्मद बिन तुगलक के समय मुकाता प्रथा का व्यापक प्रयोग हुआ। बरनी ने तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही में उल्लेख किया है कि बीदर की इक्ता एक व्यक्ति शिहाब को एक करोड़ टंकों में ठेके पर दी गई थी। किंतु वह निर्धारित राशि का एक-तिहाई भाग भी एकत्र नहीं कर सका।

इसी प्रकार दौलताबाद का क्षेत्र एक साहूकार को तेरह करोड़ टंकों में ठेके पर दिया गया। वह भी राजस्व-संग्रह में असफल रहा और उसे कठोर दंड दिया गया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि मुकाता प्रथा के अंतर्गत भूमि उन व्यक्तियों को दी जा रही थी, जिनका प्रशासनिक अनुभव नगण्य था। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि कृषकों पर अत्यधिक दबाव पड़ा, क्योंकि ठेकेदार अपनी निश्चित राशि वसूल करने के लिए हर संभव उपाय अपनाते थे।

 

खालसा भूमि : प्रत्यक्ष राज्य-नियंत्रण का क्षेत्र

 

खालसा भूमि वह क्षेत्र था जिस पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित था। राजस्व के इस प्रत्यक्ष केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बाद में मुगल शासन में और अधिक संस्थागत रूप में विकसित हुई। इन भूमियों से प्राप्त राजस्व सीधे केंद्रीय कोष में जमा होता था और इनका प्रशासनिक महत्व इक्ता भूमि की तुलना में अधिक था। खालसा भूमि के माध्यम से सुल्तान न केवल नियमित आय प्राप्त करता था, बल्कि स्थानीय शक्ति-संतुलन को भी नियंत्रित करता था। सल्तनत काल में खालसा भूमि का विस्तार विशेषकर दिल्ली और दोआब क्षेत्र में अधिक था, क्योंकि ये क्षेत्र राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

 

खालसा भूमि का प्रशासनिक ढाँचा

खालसा भूमि पर राजस्व-संग्रह प्रत्यक्ष रूप से किसानों से नहीं किया जाता था। इसके लिए चौधरी, मुकद्दम और खुत जैसे स्थानीय मध्यस्थ वर्गों की सहायता ली जाती थी। इनके ऊपर आमिल नामक अधिकारी नियुक्त होता था, जो राजस्व एकत्र कर उसे राजकोष में जमा करता था। यद्यपि यह व्यवस्था प्रशासनिक रूप से प्रभावी थी, किंतु इससे स्थानीय मध्यस्थों की शक्ति भी बढ़ी। सुल्तानों को राजस्व-संग्रह के लिए इस वर्ग पर निर्भर रहना पड़ता था, जिसके कारण कई बार वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने लगे।

 

अनुदान भूमि : मिल्क, वक्फ और इनाम

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष करमुक्त अनुदान भूमि थी। इतिहासकार मोरलैंड ने इन्हें grants की संज्ञा दी है। ये भूमि सुल्तान द्वारा व्यक्तियों या संस्थाओं को प्रदान की जाती थीं और इन पर किसी प्रकार का राजस्व नहीं लिया जाता था। अनुदान भूमि का उद्देश्य धार्मिक, शैक्षिक और प्रशासनिक वर्गों को संरक्षण देना था, किंतु समय के साथ यह व्यवस्था राज्य के राजस्व हितों के प्रतिकूल सिद्ध होने लगी।

 

अनुदान भूमि का स्वरूप और प्रभाव

अनुदान भूमि तीन प्रमुख प्रकार की थी,

  1. मिल्क – व्यक्तिगत सेवा या कृपा के बदले दी गई भूमि
  2. वक्फ – धार्मिक संस्थाओं या मस्जिदों के लिए दान की गई भूमि
  3. इनाम – पेंशन या पुरस्कार के रूप में दी गई भूमि

इन भूमियों पर कोई कर नहीं लगता था और समय के साथ ये वंशानुगत संपत्ति में परिवर्तित हो जाती थीं। इससे राज्य के नियंत्रण से बड़ी मात्रा में भूमि बाहर चली जाती थी।

 

अलाउद्दीन खिलजी और अनुदान व्यवस्था पर नियंत्रण

 

अलाउद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था जिसने अनुदान भूमि की समस्या को गंभीरता से लिया। उसने आदेश दिया कि मिल्क, वक्फ और इनाम के रूप में दी गई अनेक भूमियों को वापस लेकर खालसा भूमि में परिवर्तित किया जाए। इतिहासकार डॉ० आर० पी० त्रिपाठी के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी का उद्देश्य उन सभी भूमियों पर सुल्तान का अधिकार स्थापित करना था, जिन पर उसका नियंत्रण शिथिल हो चुका था। इस नीति के परिणामस्वरूप अनेक शक्तिशाली जागीरदारों को हटाया गया और खालसा भूमि का विस्तार हुआ।

 

तुगलक काल में अनुदानों की पुनर्बहाली

अलाउद्दीन खिलजी की कठोर नीति के विपरीत, तुगलक शासकों ने अपेक्षाकृत उदार रुख अपनाया। गयासुद्दीन और मुहम्मद बिन तुगलक के काल में विद्वानों और धार्मिक व्यक्तियों को पुनः भूमि-अनुदान दिए गए। इब्नबतूता के अनुसार, मुहम्मद बिन तुगलक ने शेख रुक्नुद्दीन को सौ गाँव प्रदान किए थे। फ़िरोज़ शाह तुगलक के समय में भी पहले दिए गए अनुदानों की पुष्टि की गई। इससे उलेमा और शेख वर्ग को स्थायित्व मिला, यद्यपि राज्य के राजस्व संसाधनों पर इसका दबाव बढ़ा।

 

अधीनस्थ हिंदू शासक और ग्रामीण मध्यस्थ वर्ग

 

सल्तनत काल के प्रारंभिक चरण में अनेक क्षेत्र ऐसे थे, जो प्रत्यक्ष रूप से सल्तनत में सम्मिलित नहीं थे। ये क्षेत्र अधीनस्थ हिंदू राजाओं के नियंत्रण में थे, जो वार्षिक कर या नजराने के बदले सुल्तान की अधीनता स्वीकार करते थे। इन शासकों को प्रायः राय, राणा या रानका की उपाधियाँ प्राप्त थीं और उन्हें अपनी भूमि पर परंपरागत अधिकार प्राप्त थे।

 

[H3] ग्राम-स्तरीय मध्यस्थ : खुत, मुकद्दम और चौधरी

इन अधीनस्थ क्षेत्रों के नीचे ग्राम-स्तर पर खुत, मुकद्दम और चौधरी जैसे मुखिया कार्यरत थे। ये राजस्व-संग्रह में सरकारी अधिकारियों की सहायता करते थे और इसके बदले उन्हें माल-ए-हक के रूप में कमीशन प्राप्त होता था। बरनी ने इनके वैभव और शक्ति का रोचक वर्णन किया है, उनके अनुसार ये लोग सजे हुए घोड़ों पर सवार रहते थे, अच्छे वस्त्र पहनते थे और ईरानी धनुषों का प्रयोग करते थे। यही शक्ति सुल्तानों के लिए चिंता का विषय बन गई।

 

अलाउद्दीन खिलजी की नीति : ग्रामीण प्रभुत्व वर्ग पर प्रहार

 

अलाउद्दीन खिलजी का दृष्टिकोण स्पष्ट था, जब तक ग्रामीण प्रभुत्व वर्ग सशक्त रहेगा, तब तक विद्रोह की संभावना बनी रहेगी। इसलिए उसने खुतों, मुकद्दमों और जमींदारों की शक्ति को तोड़ने का प्रयास किया। उसकी कर-नीति का मूल सिद्धांत था कि सबल और निर्बल, दोनों पर समान नियम लागू हों। इसी उद्देश्य से उसने भूमिकर की दर बढ़ाकर पचास प्रतिशत कर दी और ग्रामीण अभिजात वर्ग को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया।

 

सामाजिक प्रभाव और ऐतिहासिक मूल्यांकन

बरनी के वर्णन से प्रतीत होता है कि इस नीति के कारण जमींदारों की स्थिति साधारण किसानों जैसी हो गई। यद्यपि उसका वर्णन कभी-कभी हिंदू-विरोधी प्रतीत होता है, किंतु वस्तुतः अलाउद्दीन खिलजी की नीति सभी विशेषाधिकार-प्राप्त वर्गों के विरुद्ध थी, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान। इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार, इन परिवर्तनों से गाँव की सामाजिक संरचना में ऐसा परिवर्तन आया, जिसकी तुलना पहले के किसी काल से नहीं की जा सकती।

 

राज्य का हिस्सा : भूमिकर की दर और उसका परिवर्तन

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था में सबसे जटिल और विवादास्पद प्रश्न यह था कि राज्य किसानों से उनकी कुल उपज का कितना हिस्सा कर के रूप में वसूल करता था। समकालीन स्रोत इस विषय में कोई एकरूप आँकड़ा प्रस्तुत नहीं करते, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य का हिस्सा समय, क्षेत्र और सुल्तान की नीति के अनुसार बदलता रहता था। राज्य का उद्देश्य केवल अधिकतम राजस्व प्राप्त करना नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए रखना भी था जिससे कृषि उत्पादन निरंतर बना रहे। व्यवहार में, हालांकि, यह संतुलन हमेशा बना नहीं रह सका।

 

अलाउद्दीन खिलजी के अधीन राज्य का हिस्सा

राज्य के हिस्से का स्पष्ट उल्लेख हमें पहली बार अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मिलता है। अलाउद्दीन खिलजी पहला तुर्क सुल्तान था जिसने भूमि-प्रबंध में सुनियोजित और व्यापक परिवर्तन किए। उसने भूमिकर की दर बढ़ाकर पचास प्रतिशत कर दी, जिसे इस्लामी विधि के अनुसार अधिकतम सीमा माना जा सकता था।

भूमिकर के अतिरिक्त उसने गृह-कर तथा चरागाह कर भी लगाया। इन अतिरिक्त करों के माध्यम से राज्य की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, किंतु इसके साथ ही कृषकों पर कर का बोझ भी अत्यधिक बढ़ गया। इस संदर्भ में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अलाउद्दीन खिलजी के समय राज्य किसानों से उनकी कुल उपज का एक बड़ा भाग करों के रूप में वसूल कर लेता था।

 

दीवान-ए-मुस्तखराज और राजस्व-संग्रह की कठोरता

 

अलाउद्दीन खिलजी को यह स्पष्ट था कि केवल कर-दर बढ़ाने से राजस्व-संग्रह प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक कि प्रशासनिक तंत्र सुदृढ़ न हो। इसी उद्देश्य से उसने दीवान-ए-मुस्तखराज की स्थापना की। इस विभाग का मुख्य कार्य आमिलों और अन्य राजस्व अधिकारियों के नाम जो बकाया धन होता था, उसकी जाँच करना और समय पर भुगतान न होने की स्थिति में कठोर दंड देना था। इससे एक ओर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा, तो दूसरी ओर प्रशासनिक भय का वातावरण उत्पन्न हुआ।

 

कृषकों पर प्रभाव

इस कठोर व्यवस्था का सीधा प्रभाव कृषक वर्ग पर पड़ा। राजस्व अधिकारियों की सख्ती और करों की ऊँची दरों के कारण किसानों के पास अधिशेष बचत के अवसर सीमित हो गए। यद्यपि राज्य की आय में वृद्धि हुई, किंतु ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिरता कमजोर पड़ने लगी।

 

गयासुद्दीन तुगलक की संतुलित नीति

 

अलाउद्दीन खिलजी की कठोर नीति के बाद गयासुद्दीन तुगलक ने अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उसने आदेश दिया कि राजस्व अधिकारी यह ध्यान रखें कि कृषि उत्पादन में वार्षिक वृद्धि हो, किंतु यह वृद्धि इतनी तीव्र न हो कि कृषक वर्ग पर असहनीय बोझ पड़ जाए।

उसकी नीति का मूल उद्देश्य यह था कि मुखिया और जमींदार न तो इतने शक्तिशाली हों कि विद्रोह कर सकें, और न ही इतने निर्धन कि खेती छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ। इस प्रकार गयासुद्दीन तुगलक की नीति में राजस्व-संग्रह और कृषि-संरक्षण के बीच संतुलन दिखाई देता है।

 

मुहम्मद बिन तुगलक और दोआब का प्रयोग

 

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भू-राजस्व व्यवस्था ने सबसे अधिक प्रयोगात्मक और अस्थिर रूप धारण किया। उसने दोआब क्षेत्र में भूमिकर की दर में वृद्धि की। यद्यपि इसकी सटीक मात्रा ज्ञात नहीं है, किंतु बरनी के अनुसार यह वृद्धि अत्यधिक थी। हालाँकि बरनी का कथन कि लगान दस से बीस गुना बढ़ा अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि कर-वृद्धि पर्याप्त थी।

 

अकाल और विद्रोह

जिस समय दोआब में कर-वृद्धि की गई, उसी समय वहाँ अकाल पड़ रहा था। राजस्व अधिकारियों ने निर्दयता से कर वसूला, जिसके परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर विद्रोह भड़क उठे। बरनी के अनुसार इन विद्रोहों को अत्यंत क्रूरता से दबाया गया। इतिहासकार डॉ० मेहंदी हुसैन ने इस विषय पर एक वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके अनुसार सेना से हटाए गए सैनिकों ने खेती आरंभ की थी और कर-वृद्धि के विरोध में उन्होंने खेती छोड़ दी तथा राजस्व अधिकारियों पर आक्रमण किया। इससे राज्य और ग्रामीण समाज के बीच टकराव और गहरा गया।

 

सुधारात्मक प्रयास और उनकी विफलता

बाद में मुहम्मद बिन तुगलक ने किसानों को बीज, बैल और सिंचाई-सुविधाएँ प्रदान कीं तथा कुएँ खुदवाए। किंतु ये प्रयास देर से किए गए, इसलिए इनका अपेक्षित परिणाम नहीं निकला। इस प्रकार दोआब, जो सल्तनत का सबसे उपजाऊ क्षेत्र था, राज्य-नीति के कारण विद्रोह का केंद्र बन गया।

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक और भूमिकर में नरमी

 

मुहम्मद बिन तुगलक के असफल प्रयोगों से सीख लेते हुए फ़िरोज़ शाह तुगलक ने भूमिकर में कमी की। उसका उद्देश्य यह था कि किसान स्वेच्छा से और बिना कठिनाई के कर का भुगतान कर सकें।  फ़िरोज़ शाह का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि वह कृषि की स्थिरता को राज्य की दीर्घकालिक समृद्धि के लिए आवश्यक मानता था। उसके शासनकाल में राज्य और कृषकों के बीच संबंध अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण हो गए।

 

कर-निर्धारण की पद्धतियाँ : मसाहत, बटाई और अन्य प्रणाली

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था में कर-निर्धारण की पद्धतियाँ समय-समय पर बदलती रहीं। सबसे पहला व्यवस्थित प्रयास अलाउद्दीन खिलजी के काल में देखने को मिलता है।

 

मसाहत (भूमि-मापन) प्रणाली

अलाउद्दीन खिलजी पहला तुर्क सुल्तान था जिसने भूमिकर को भूमि की नाप (मसाहत) के आधार पर निर्धारित किया। भूमि-मापन पर आधारित यह प्रयोग आगे चलकर मुगल काल की ज़ब्त प्रणाली के लिए एक प्रारंभिक आधार सिद्ध हुआ। इसके लिए ‘बिसवा’ को एक इकाई माना गया। यह व्यवस्था मुख्यतः दिल्ली और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों में लागू की गई। डॉ० आर० पी० त्रिपाठी के अनुसार, निचला दोआब, अवध, बिहार, बंगाल, मालवा, पंजाब और गुजरात भी इस व्यवस्था के अंतर्गत आते थे।

 

बटाई और हुक्म-ए-हासिल

गयासुद्दीन तुगलक के समय मसाहत प्रणाली को छोड़कर कटाई अथवा बटाई प्रणाली अपनाई गई। इसके अंतर्गत फसल कटने के बाद राज्य का हिस्सा तय किया जाता था। इससे कृषकों को असामयिक भुगतान से राहत मिली। मुहम्मद बिन तुगलक के काल में पुनः भूमि-मापन की व्यवस्था लागू की गई, जिससे किसानों पर दबाव बढ़ गया।

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक का पुनर्मूल्यांकन कार्य

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने गाँवों, परगनों और सूबों का व्यापक पुनर्मूल्यांकन करवाया। इस कार्य के लिए ख्वाजा हुसामुद्दीन जुनैदी को नियुक्त किया गया। बरनी के अनुसार, छह वर्षों तक निरीक्षण के बाद यह कार्य पूरा हुआ और इसके आधार पर पूरे फ़िरोज़ काल में राजस्व निर्धारित किया गया। मोरलैंड ने इसे मुसलिम युग का पहला प्रयास माना है, जिसके द्वारा सल्तनत की कुल आय का अनुमान लगाया गया।

 

भुगतान की विधि : नकद और अनाज

 

सामान्यतः सल्तनत काल में राजस्व का भुगतान नकद किया जाता था। इससे किसानों को अपना अनाज बाजार में बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता था। हालाँकि अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी बाजार-नियंत्रण नीति के कारण दिल्ली और दोआब क्षेत्र में लगान को अनाज के रूप में भी वसूल किया, ताकि नगरों को पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सके। फ़िरोज़ शाह तुगलक के समय कुछ क्षेत्रों में आधा राजस्व अनाज और आधा नकद लिया जाता था।

 

कृषि विकास, सिंचाई और दीवान-ए-कोही

 

चौदहवीं शताब्दी में कृषि विकास सल्तनत शासकों की प्रमुख चिंता बन गया। गयासुद्दीन तुगलक ने सिंचाई के लिए नहरें खुदवाईं और बाग़ लगवाए। मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि सुधार के लिए दीवान-ए-कोही नामक पृथक विभाग स्थापित किया, जिसका उद्देश्य अनुपजाऊ भूमि को कृषि-योग्य बनाना था। यद्यपि इस योजना पर भारी व्यय हुआ, किंतु उपयुक्त भूमि के चयन के अभाव में यह प्रयोग असफल रहा।

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक के अधीन सिंचाई विस्तार और कृषि प्रगति

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक का शासनकाल सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था में कृषि-संरक्षण और उत्पादन-वृद्धि के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण मोड़ प्रस्तुत करता है। जहाँ उसके पूर्ववर्ती शासकों की नीतियाँ मुख्यतः राजस्व-संग्रह की कठोरता से जुड़ी थीं, वहीं फ़िरोज़ शाह ने यह समझा कि कृषि की स्थिरता के बिना स्थायी राजस्व संभव नहीं है। इसी सोच के अंतर्गत उसने बड़े पैमाने पर सिंचाई-कार्यों को प्रोत्साहित किया और नहरों के निर्माण को राज्य-नीति का अभिन्न अंग बनाया।

 

नहर-निर्माण और उसका आर्थिक महत्व

फ़िरोज़ शाह तुगलक को नहर-निर्माण के क्षेत्र में विशेष श्रेय प्राप्त है। सिरात-ए-फ़िरोज़शाही में उसके द्वारा बनवाई गई अनेक नहरों का उल्लेख मिलता है। इनमें से प्रमुख नहरें यमुना और सतलुज नदियों से निकाली गई थीं। यमुना से निकली नहर लगभग 150 मील लंबी थी और उसने फ़िरोज़ा (हिसार) तथा उसके आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई को संभव बनाया।

इन नहरों के माध्यम से न केवल कृषि-योग्य भूमि का विस्तार हुआ, बल्कि पहले से उपेक्षित या अर्द्ध-बंजर क्षेत्रों में भी नियमित खेती आरंभ हो सकी। राज्य को इन नहरों से वार्षिक आय प्राप्त होती थी, जिससे स्पष्ट होता है कि सिंचाई-नीति राजस्व-वृद्धि से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई थी।

 

फ़सल-विविधता, उत्पादन-वृद्धि और मूल्य-पतन

 

सिंचाई-सुविधाओं के विस्तार का सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ा। गेहूँ, गन्ना, चना, दालें और फल-फूल जैसी फसलों का उत्पादन बढ़ा। बरनी और अफ़ीफ़ जैसे समकालीन इतिहासकारों के विवरण से ज्ञात होता है कि कई क्षेत्रों में ऐसी फसलें उगाई जाने लगीं, जिनके बारे में स्थानीय कृषक पहले केवल सुनते थे। उत्पादन में इस वृद्धि का परिणाम यह हुआ कि फसलों के मूल्यों में गिरावट आई। अनाज और दैनिक उपभोग की वस्तुएँ सस्ती हो गईं, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों वर्गों को लाभ हुआ।

 

कृषक वर्ग की स्थिति में परिवर्तन

मूल्य-पतन का सबसे बड़ा लाभ कृषक वर्ग को मिला। उनके घर अन्न और पशुओं से भरने लगे और दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध होने लगीं। यह स्थिति दर्शाती है कि फ़िरोज़ शाह के काल में राज्य और कृषकों के बीच अपेक्षाकृत सहयोगात्मक संबंध स्थापित हुआ। हालाँकि यह समृद्धि पूर्णतः समान नहीं थी, फिर भी यह अलाउद्दीन खिलजी या मुहम्मद बिन तुगलक के काल की तुलना में कहीं अधिक संतुलित थी।

 

सिंचाई कर (हाब-ए-शर्ब) और राजस्व का नया स्रोत

 

फ़िरोज़ शाह तुगलक पहला सुल्तान था जिसने सिंचाई सुविधाओं के बदले हाब-ए-शर्ब नामक कर लगाया, जो संभवतः 10% अतिरिक्त शुल्क था। यह कर उन कृषकों से लिया जाता था, जिन्हें नहरों के पानी से प्रत्यक्ष लाभ मिलता था। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था केवल दमनकारी नहीं थी, बल्कि उसमें सेवा-आधारित कराधान की अवधारणा भी विकसित होने लगी थी।

 

राजस्व प्रशासन : अधिकारी और संस्थागत ढाँचा

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था का संचालन एक विस्तृत प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से किया जाता था। इस तंत्र का उद्देश्य राजस्व-संग्रह, लेखा-परीक्षा और निगरानी को सुव्यवस्थित करना था। राजस्व प्रशासन की प्रभावशीलता सीधे इस बात पर निर्भर करती थी कि विभिन्न अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन किस प्रकार करते हैं।

 

प्रमुख राजस्व अधिकारी

  • वज़ीर – राज्य का सर्वोच्च वित्तीय अधिकारी
  • नायब वज़ीर – वज़ीर का सहायक
  • मुस्तौफ़ी-ए-मुमालिक – महालेखा परीक्षक
  • वक़ूफ़ – व्यय संबंधी मामलों का निरीक्षक
  • आमिल – क्षेत्रीय स्तर पर राजस्व-संग्रह का अधिकारी
  • पटवारी – गाँव के भूमि-अभिलेखों का रख-रखाव
  • कारकून, गुमाश्ता, सरहंग, नवीस – सहायक प्रशासनिक कर्मचारी

इस प्रशासनिक ढाँचे ने राजस्व-संग्रह को नियमित किया और मध्यकालीन अर्थव्यवस्था में मुद्रा-प्रचलन को बढ़ावा दिया।

 

भू-राजस्व और वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास

 

भूमिकर का नकद भुगतान किसानों को अपना अनाज बाजार में बेचने के लिए बाध्य करता था। इससे अनाज व्यापारियों, साहूकारों और मंडियों की भूमिका बढ़ी। बनजारे, कारवानी व्यापारी, महाजन, मुल्तानी और मारवाड़ी व्यापारी, सभी इस व्यवस्था से जुड़े। इस प्रक्रिया ने मुद्रीकरण (monetization) को गति दी और सल्तनत कालीन अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत गतिशील बनाया।

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था : समग्र मूल्यांकन

 

सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था ने मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक निर्णायक भूमिका निभाई। यह व्यवस्था न तो पूर्णतः इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित थी और न ही पूरी तरह पारंपरिक भारतीय ढाँचों पर। यह दोनों का एक व्यावहारिक समन्वय थी।

अलाउद्दीन खिलजी की नीति ने राजस्व-संग्रह को सुदृढ़ किया, किंतु कृषकों पर अत्यधिक बोझ डाला। मुहम्मद बिन तुगलक के प्रयोग साहसी थे, परंतु समय और परिस्थितियों के गलत आकलन के कारण असफल रहे। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अपेक्षाकृत मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया, जिससे कृषि और ग्रामीण समाज को स्थिरता मिली।

 

निष्कर्ष

 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था ने राज्य की वित्तीय आवश्यकताओं, प्रशासनिक केंद्रीकरण और ग्रामीण समाज तीनों को गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि यह व्यवस्था कृषक वर्ग के लिए कई बार दमनकारी सिद्ध हुई, फिर भी इसी के माध्यम से एक संगठित राजस्व प्रशासन, मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था और आगे चलकर मुगल भू-राजस्व प्रणाली की आधारभूमि तैयार हुई।

इसी कारण सल्तनत कालीन भू-राजस्व व्यवस्था को मध्यकालीन भारत में राज्य-निर्माण (state formation) और प्रशासनिक केंद्रीकरण की प्रक्रिया को समझने की कुंजी माना जा सकता है। दिल्ली सल्तनत की यह विरासत भारतीय आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगी।

 

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