सल्तनत कालीन स्थापत्य कला मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकाल को दर्शाती है, जहाँ सत्ता, धर्म और स्थानीय परंपराओं का स्थापत्य रूप में समन्वय दिखाई देता है। तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच विकसित इस स्थापत्य परंपरा में मेहराब, गुंबद और नई निर्माण तकनीकों का प्रयोग हुआ, जो आगे चलकर इंडो-इस्लामी स्थापत्य की पहचान बने। यह लेख सल्तनत काल में स्थापत्य के विकास, वंशानुसार परिवर्तनों, क्षेत्रीय शैलियों और मुगल स्थापत्य से इसके संबंध का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
सल्तनत कालीन स्थापत्य कला की प्रारंभिक पृष्ठभूमि
नए शासकों की पहली आवश्यकताओं में से एक थी रहने के लिए घर और उनके अनुयायियों के लिए पूजा स्थल। पूजा स्थलों के निर्माण के लिए प्रारंभिक चरण में उन्होंने नई इमारतें बनाने के बजाय मंदिरों और अन्य मौजूदा संरचनाओं को मस्जिदों में परिवर्तित किया। यह न केवल संसाधनों की तत्काल उपलब्धता का परिणाम था, बल्कि उस संक्रमणकालीन अवस्था को भी दर्शाता है जिसमें सल्तनत कालीन स्थापत्य कला का आरंभ हुआ।
दिल्ली में कुतुब मीनार के समीप स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद और अजमेर की अढ़ाई दिन का झोंपड़ा इसके प्रमुख उदाहरण हैं। कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद प्रारंभ में एक जैन मंदिर से संबद्ध संरचना थी, जिसे बाद में विष्णु को समर्पित मंदिर के रूप में प्रयुक्त किया गया और अंततः मस्जिद में परिवर्तित किया गया। अजमेर की अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मूलतः एक मठ था। इन दोनों उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक सल्तनत स्थापत्य किसी पूर्ण विकसित इस्लामी शैली का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि यह एक संक्रमणशील स्थापत्य परंपरा थी।
दिल्ली में किए गए नए निर्माणों में केवल गर्भगृह के सामने तीन विस्तृत रूप से नक्काशीदार मेहराबों का मुखौटा शामिल था, जबकि सामने का मेहराबदार आंगन आसपास के लगभग सैंतीस मंदिरों से लाए गए स्तंभों से निर्मित किया गया था। इन स्तंभों का पुनः उपयोग यह दर्शाता है कि प्रारंभिक निर्माण में स्थानीय स्थापत्य परंपराओं और सामग्री पर गहरी निर्भरता थी।
प्रारंभिक अलंकरण और धार्मिक सीमाएँ
इन मेहराबों पर प्रयुक्त सजावट विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मानव या पशु आकृतियों का प्रयोग नहीं किया गया, क्योंकि इस्लामी दृष्टि में इसे गैर-अनुमेय माना जाता था। इसके स्थान पर फूलों की बेलें, ज्यामितीय आकृतियाँ और कुरान की आयतों का प्रयोग किया गया, जिन्हें अत्यंत कलात्मक ढंग से एक-दूसरे में गूंथा गया था। यहीं से सल्तनत कालीन स्थापत्य कला में अरबी सुलेख के एक स्वतंत्र कला रूप के रूप में उभरने की प्रक्रिया शुरू होती है। शीघ्र ही तुर्क शासकों ने अपनी स्वतंत्र इमारतों का निर्माण आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने मुख्यतः स्वदेशी कारीगरों पत्थर काटने वालों, राजमिस्त्रियों और शिल्पियों की सेवाएँ लीं, जो पहले से ही मंदिर स्थापत्य में दक्ष थे। बाद के चरणों में पश्चिम एशिया से कुछ प्रशिक्षित वास्तुकार भी भारत आए, जिससे स्थापत्य प्रयोगों को नई दिशा मिली।
मेहराब और गुंबद का आरंभिक प्रयोग
इन नई इमारतों में मेहराब और गुंबद का व्यापक प्रयोग किया गया। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि न तो मेहराब और न ही गुंबद तुर्कों की मौलिक खोज थे। अरबों ने इन्हें रोमन स्थापत्य परंपरा से, बीजान्टिन साम्राज्य के माध्यम से अपनाया था और समय के साथ इन्हें विकसित किया। भारत में इनका प्रयोग एक नए संदर्भ में हुआ, जहाँ स्थानीय निर्माण तकनीकों और सामग्री के साथ इन संरचनाओं को अनुकूलित किया गया।
मेहराब, गुंबद और निर्माण तकनीक का विकास
मेहराब और गुंबद के प्रयोग से सल्तनत कालीन स्थापत्य कला में कई व्यावहारिक और सौंदर्यपरक लाभ प्राप्त हुए। गुंबद ने इमारतों को एक विशिष्ट और प्रभावशाली आकाशरेखा प्रदान की। जैसे-जैसे वास्तुकारों का अनुभव और आत्मविश्वास बढ़ता गया, गुंबदों की ऊँचाई भी बढ़ती चली गई। वर्गाकार इमारतों पर गोल गुंबद स्थापित करने की समस्या को हल करने के लिए विभिन्न प्रयोग किए गए, जिनके परिणामस्वरूप अधिक ऊँची और प्रभावशाली संरचनाएँ संभव हो सकीं। मेहराब और गुंबद के प्रयोग से छत को सहारा देने के लिए बड़ी संख्या में स्तंभों की आवश्यकता समाप्त हो गई। इससे बड़े, खुले और स्पष्ट दृश्य वाले सभागारों का निर्माण संभव हुआ। ऐसे विशाल कक्ष न केवल मस्जिदों में, बल्कि महलों और अन्य प्रशासनिक भवनों में भी उपयोगी सिद्ध हुए। इस प्रकार सल्तनत कालीन स्थापत्य कला में संरचनात्मक उपयोगिता और सौंदर्य एक साथ विकसित होते दिखाई देते हैं।
हालाँकि, मेहराब और गुंबद के सफल निर्माण के लिए मजबूत गारे की आवश्यकता थी। बिना उपयुक्त सीमेंटिंग सामग्री के पत्थरों को स्थायी रूप से जोड़ना संभव नहीं था। तुर्क शासकों ने अपनी इमारतों में उच्च गुणवत्ता वाले चूने के गारे का प्रयोग किया, जिसने संरचनाओं को दीर्घायु और मजबूती प्रदान की। इसी कारण उत्तरी भारत में तुर्कों के आगमन के साथ न केवल नई स्थापत्य शैलियाँ, बल्कि निर्माण तकनीक में भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है।
संरचनात्मक मजबूती और जल प्रबंधन
संरचनात्मक स्थायित्व को और सुदृढ़ करने के लिए, विशेष रूप से भूकंप संभावित क्षेत्रों में, कुछ इमारतों में पत्थरों को आपस में बाँधने हेतु लोहे के क्लैंप और डॉवेल का प्रयोग किया गया। यद्यपि प्रारंभिक चरणों में यह तकनीक व्यापक नहीं थी, फिर भी यह इस तथ्य को रेखांकित करती है कि सल्तनत कालीन स्थापत्य केवल रूपात्मक नहीं, बल्कि तकनीकी प्रयोगों से भी जुड़ा हुआ था।
इसी काल में जल प्रबंधन प्रणालियाँ भी स्थापत्य का एक अभिन्न अंग बन गईं। बावलियाँ (कुंड) और कृत्रिम जलाशय (हौज) न केवल सिंचाई और पेयजल की आवश्यकता को पूरा करते थे, बल्कि गर्म जलवायु में ठंडक प्रदान करने और इमारतों की शोभा बढ़ाने का कार्य भी करते थे। परावर्तक जलाशयों और फव्वारों के प्रयोग से स्थापत्य में एक अतिरिक्त सौंदर्य आयाम जुड़ गया। यह स्पष्ट करता है कि सल्तनत कालीन स्थापत्य कला भारतीय मानसूनी परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने में सक्षम थी।
अलंकरण की विकसित परंपरा
सजावट के क्षेत्र में भी इस काल में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है। तुर्क शासकों ने इमारतों में मानव और पशु आकृतियों के चित्रण से परहेज किया, किंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि अलंकरण को महत्व नहीं दिया गया। इसके स्थान पर ज्यामितीय डिज़ाइन, पुष्पीय रूपांकन और कुरान की आयतों वाले सुलेखीय पैनलों का प्रयोग किया गया। इस प्रकार अरबी लिपि स्वयं एक कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में उभर कर सामने आई।
इन विभिन्न सजावटी तत्वों के संयोजन को सामान्यतः ‘अरबेस्क’ शैली कहा जाता है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि तुर्कों ने भारतीय रूपांकनों जैसे बेलें, कमल, स्वस्तिक और घंटी को भी स्वतंत्र रूप से अपनाया। भारतीय पत्थर काटने वालों की कुशलता का इस उद्देश्य के लिए व्यापक उपयोग किया गया, जिससे सल्तनत कालीन स्थापत्य कला में स्थानीय और विदेशी परंपराओं का गहरा समन्वय दिखाई देता है। रंगों के प्रयोग में लाल बलुआ पत्थर का विशेष महत्व था। इसके साथ पीले बलुआ पत्थर और संगमरमर का प्रयोग सजावटी संतुलन के लिए किया गया। बाद के कालों में फारसी परंपराओं के प्रभाव से नीले और फ़िरोज़ी रंगों वाली चमकदार टाइलों का प्रयोग भी शुरू हुआ, जिससे मुखौटों और गुंबदों में अतिरिक्त जीवंतता आई।

कुतुब मीनार और प्रारंभिक सल्तनत स्थापत्य की परिपक्वता
तेरहवीं शताब्दी के दौरान तुर्कों द्वारा निर्मित सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली संरचना कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद से संलग्न मीनार थी, जिसे आरंभ में ‘मज़ाना’ कहा जाता था, अर्थात वह स्थान जहाँ से अज़ान दी जाती थी। बाद में यह कुतुब मीनार के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। कुछ इसे कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ते हैं, जिन्होंने इसका निर्माण आरंभ कराया, जबकि कुछ इसे सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से संबद्ध मानते हैं, जिनकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा उस समय दिल्ली में अत्यंत प्रभावशाली थी।
यह धारणा कि कुतुब मीनार किसी प्राचीन राजपूत मीनार पर आधारित थी, ऐतिहासिक साक्ष्यों से पुष्ट नहीं होती। यह विचार मुख्यतः इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि मीनार के आधार में प्रयुक्त कुछ पत्थर आसपास के ध्वस्त मंदिरों से लिए गए प्रतीत होते हैं। मीनार पर उपलब्ध शिलालेख में फज़ल इब्न अबुल माली का नाम मिलता है, किंतु क्षतिग्रस्त स्थिति के कारण यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि वह वास्तुकार था या केवल निर्माण कार्य का पर्यवेक्षक। अपने स्थापत्य सौंदर्य के साथ-साथ कुतुब मीनार का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व भी था। इसकी विशाल ऊँचाई दिल्ली के परिदृश्य पर इस्लामी सत्ता की उपस्थिति का दृश्य दावा प्रस्तुत करती थी। साथ ही, स्थानीय स्थापत्य सामग्री और रूपांकनों के पुनः उपयोग से यह संरचना सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया को भी दर्शाती है, जो सल्तनत कालीन स्थापत्य कला की एक प्रमुख विशेषता रही।
संरचनात्मक विशेषताएँ और स्थापत्य सौंदर्य
कुतुब मीनार अपनी ऊँचाई और पतले अनुपात के कारण विशेष रूप से प्रभावशाली प्रतीत होती है। वर्तमान में इसकी ऊँचाई लगभग 71.4 मीटर है। मूल रूप से यह चार मंज़िलों तक ही सीमित थी, किंतु बाद में बिजली गिरने से क्षति पहुँचने पर फिरोज तुगलक द्वारा इसकी मरम्मत कर पाँचवीं मंज़िल जोड़ी गई। मीनार की स्थापत्य सुंदरता मुख्यतः इसकी प्रक्षेपित बालकनियों और उन्हें सहारा देने वाली मधुमक्खी के छत्ते जैसी अलंकरण तकनीक में निहित है। मीनार के शरीर पर रिब्ड और कोणीय उभारों का प्रयोग, विभिन्न मंज़िलों पर लाल और हल्के रंग के पत्थरों का संयोजन, और ऊपर की ओर क्रमशः हल्के होते अनुपात, ये सभी तत्व इसे एक गतिशील दृश्य रूप प्रदान करते हैं। इस प्रकार कुतुब मीनार न केवल सल्तनत कालीन स्थापत्य की तकनीकी उपलब्धि थी, बल्कि सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण प्रयोग थी।
इल्तुतमिश और प्रारंभिक स्थापत्य परंपरा का सुदृढ़ीकरण
इल्तुतमिश के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का राजनीतिक सुदृढ़ीकरण हुआ, जिसका प्रभाव स्थापत्य गतिविधियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस काल से संबंधित अनेक इमारतें जैसे बदायूं की मस्जिदें, नागौर का विशाल प्रवेश द्वार, और हरियाणा के हांसी व पलवल में निर्मित संरचनाएँ तुर्क शासकों के आत्मविश्वास और स्थायित्व को दर्शाती हैं।
इल्तुतमिश का मकबरा, जो उनके शासन के अंतिम वर्षों में निर्मित हुआ, सल्तनत कालीन स्थापत्य कला के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह मूलतः एक वर्गाकार संरचना थी, किंतु कोनों में स्क्विंच मेहराबों के प्रयोग से इसे अष्टकोणीय रूप दिया गया, जिस पर गुंबद स्थापित किया गया। यह तकनीक आगे चलकर अनेक वर्गाकार इमारतों में अपनाई गई। मकबरे की दीवारों पर की गई जटिल नक्काशी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ कुरानिक सुलेख को भारतीय पुष्पीय रूपांकनों के साथ संयोजित किया गया है, जिससे स्थापत्य में सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट हो जाती है। इल्तुतमिश के संरक्षण में निर्मित ये संरचनाएँ न केवल स्थापत्य प्रयोगों का प्रमाण थीं, बल्कि मंगोल आक्रमणों की पृष्ठभूमि में शासन की वैधता और स्थिरता को स्थापित करने का माध्यम भी बनीं।
बलबन काल और ‘सच्ची मेहराब’ का प्रयोग
तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिम एशिया में मंगोल आक्रमणों के कारण अनेक विद्वान, गणितज्ञ और वास्तुकार भारत आए। इस प्रवाह का प्रभाव सल्तनत कालीन स्थापत्य कला पर भी पड़ा। बलबन के मकबरे में पहली बार भारत में ‘सच्ची मेहराब’ का स्पष्ट प्रयोग दिखाई देता है।
यह मेहराब कोर्बेल्ड प्रणाली पर आधारित नहीं थी, जिसमें पत्थरों को क्रमशः आगे बढ़ाकर अंतर को ढका जाता था, बल्कि यह विकिरणित वूस्वारों पर आधारित थी, जो भार को अधिक कुशलता से वितरित करती थी। इस परिवर्तन से अधिक चौड़े विस्तार और ऊँची संरचनाओं का निर्माण संभव हुआ। इस प्रकार गयासुद्दीन बलबन का काल भारतीय स्थापत्य में तकनीकी परिपक्वता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
खिलजी कालीन स्थापत्य कला और स्थापत्य प्रयोग
खिलजी काल में सल्तनत कालीन स्थापत्य कला में उल्लेखनीय तीव्रता दिखाई देती है। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में निर्माण गतिविधियाँ केवल धार्मिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि शहरी विस्तार और सैन्य सुरक्षा से भी जुड़ गईं। अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी नई राजधानी सीरी में स्थापित की, जो कुतुब परिसर से कुछ दूरी पर स्थित थी। दुर्भाग्यवश, इस नगरी के अवशेष आज बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हैं, किंतु समकालीन विवरणों से इसके नियोजित स्वरूप का संकेत मिलता है।
अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब मीनार से भी ऊँची एक मीनार के निर्माण की योजना बनाई थी, किंतु यह योजना उनके जीवनकाल में पूर्ण नहीं हो सकी। इसके स्थान पर उन्होंने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में एक भव्य प्रवेश द्वार का निर्माण कराया, जिसे अलाई दरवाज़ा कहा जाता है। यह संरचना सल्तनत कालीन स्थापत्य कला के विकास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करती है।

अलाई दरवाज़ा और स्थापत्य परिपक्वता
अलाई दरवाज़ा कई दृष्टियों से अभिनव था। यह पहली इमारत मानी जाती है जिसमें गुंबद का निर्माण कोर्बेल्ड पद्धति के बजाय विकिरणित वूस्वारों पर आधारित सच्ची मेहराब प्रणाली से किया गया। घोड़े की नाल के आकार की मेहराबें न केवल संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ थीं, बल्कि सौंदर्य की दृष्टि से भी आकर्षक थीं।
अलंकरण में भी यहाँ स्पष्ट परिपक्वता दिखाई देती है। मेहराबों के भीतर मर्लोन का प्रयोग, स्पैंड्रेल पर कमल रूपांकन, और सफेद संगमरमर तथा लाल बलुआ पत्थर का संतुलित संयोजन, इन सभी ने इमारत को गरिमा और सौंदर्य प्रदान किया। यह वह चरण था जब सल्तनत स्थापत्य ने केवल प्रयोगशीलता से आगे बढ़कर एक आत्मविश्वासी स्थापत्य भाषा विकसित की। अलाउद्दीन की स्थापत्य परियोजनाएँ उनके सैन्य अभियानों और केंद्रीकृत शासन की आवश्यकताओं से भी जुड़ी थीं। सीरी में जल आपूर्ति और सार्वजनिक सुविधाओं का विकास इस बात का संकेत देता है कि स्थापत्य को प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में भी देखा जा रहा था।
सूफी स्थापत्य और सामाजिक आयाम
इस काल में मस्जिद स्थापत्य के साथ-साथ सूफी संतों से जुड़े स्थलों का भी विकास हुआ। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह परिसर में स्थित जमात खाना मस्जिद इसका प्रमुख उदाहरण है। ऐसे सूफी केंद्र केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क के केंद्र भी थे। इन स्थलों की स्थापत्य योजना अपेक्षाकृत सरल थी, किंतु इनके खुले प्रांगण और सभा कक्ष सामूहिक प्रार्थना, संगीत और संवाद के लिए उपयुक्त थे। इस प्रकार सल्तनत कालीन स्थापत्य कला ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संपर्क और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने में भी भूमिका निभाई।
तुगलक कालीन स्थापत्य कला: सादगी और सैन्य चरित्र
तुगलक काल में निर्माण गतिविधियाँ व्यापक थीं और यह काल दिल्ली सल्तनत के उत्कर्ष के साथ-साथ उसके संकट का भी संकेत देता है। गयासुद्दीन तुगलक और मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा निर्मित तुगलकाबाद का विशाल किला-महल परिसर इस चरण की सबसे प्रमुख उपलब्धि है। यमुना के मार्ग को अवरुद्ध कर एक कृत्रिम झील का निर्माण किया गया, जिससे दुर्ग की सुरक्षा और जल आपूर्ति दोनों सुनिश्चित होती थीं।
गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा स्थापत्य में एक नई प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसे एक ऊँचे चबूतरे पर स्थापित किया गया, जिससे इमारत को प्रभावशाली आकाशरेखा प्राप्त हुई। संगमरमर का गुंबद इसकी सादगी में भी एक विशिष्ट गरिमा जोड़ता है।
बैटर शैली और संरचनात्मक प्रयोग
तुगलक स्थापत्य की सबसे विशिष्ट पहचान ढलान वाली दीवारें थीं, जिन्हें ‘बैटर’ कहा जाता है। इस तकनीक से इमारतों को मजबूती का आभास मिलता था और वे सैन्य दृष्टि से अधिक सुरक्षित प्रतीत होती थीं। हालाँकि, फिरोज तुगलक के काल में बैटर का प्रयोग अपेक्षाकृत कम हो गया।
तुगलक काल की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता मेहराब तथा लिंटेल-बीम प्रणालियों को एक साथ प्रयोग करने का सचेत प्रयास था। हौज खास और फिरोज शाह कोटला में वैकल्पिक मंज़िलों पर इन दोनों प्रणालियों का प्रयोग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह दर्शाता है कि सल्तनत स्थापत्य में भारतीय और इस्लामी परंपराओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश जारी थी। सामग्री के चयन में भी परिवर्तन दिखाई देता है। महंगे लाल बलुआ पत्थर के स्थान पर ग्रे स्टोन और मलबे की चिनाई का प्रयोग बढ़ा, जिन्हें मोटे चूने के प्लास्टर से ढका जाता था। चूँकि इस सतह पर सूक्ष्म नक्काशी संभव नहीं थी, इसलिए तुगलक स्थापत्य में अलंकरण न्यूनतम रहा। फिर भी कमल जैसे पारंपरिक रूपांकन कई इमारतों में निरंतर दिखाई देते हैं।
तुगलक स्थापत्य की यह सादगी पिछले वंशों की भव्यता के बाद आर्थिक विवेक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को दर्शाती है। फ़िरोज़शाह तुगलक के संरक्षण में नहरों, अस्पतालों और सार्वजनिक भवनों का निर्माण यह संकेत देता है कि स्थापत्य को सामाजिक कल्याण से भी जोड़ा जा रहा था।
सैय्यद और लोदी कालीन स्थापत्य: संक्रमण और परिपक्वता
तुगलकों के बाद सैय्यद वंश (1414–1451 ई.) का शासन दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक विघटन का काल था। इस अस्थिरता का प्रभाव स्थापत्य गतिविधियों पर भी पड़ा। बड़े पैमाने पर भव्य निर्माण नहीं हुए, फिर भी इस काल की इमारतें सल्तनत कालीन स्थापत्य परंपरा में एक संक्रमणकालीन चरण को दर्शाती हैं।
सैय्यद कालीन स्थापत्य मुख्यतः मकबरों तक सीमित रहा। दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में स्थित मुबारक शाह सैय्यद का मकबरा इसका प्रमुख उदाहरण है। इन संरचनाओं में तुगलक काल की सादगी बनी रही, किंतु कुछ नए तत्व भी उभरने लगे, जैसे ऊँचे चबूतरे पर निर्मित सरल गुंबद और स्क्विंच के माध्यम से गुंबद का समर्थन। अलंकरण न्यूनतम रहा, जो सैय्यद शासकों की सीमित राजनीतिक शक्ति और संसाधनों को प्रतिबिंबित करता है।

लोदी कालीन स्थापत्य और संरचनात्मक आत्मविश्वास
लोदी काल में सल्तनत कालीन स्थापत्य कला एक नए स्तर की परिपक्वता प्राप्त करती है। यद्यपि लोदियों ने भी मलबे की चिनाई और चूने के प्लास्टर की तुगलक परंपरा को बनाए रखा, किंतु इस समय तक भारतीय कारीगरों और वास्तुकारों ने मेहराब और गुंबद जैसी संरचनाओं में पूर्ण आत्मविश्वास प्राप्त कर लिया था। परिणामस्वरूप, गुंबद अधिक ऊँचे और संतुलित रूप में दिखाई देने लगे।
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि डबल गुंबद का विकसित रूप है। प्रारंभिक प्रयोगों के बाद इसका परिपक्व उदाहरण सिकंदर लोदी के मकबरे में देखने को मिलता है। बाहरी ऊँचे गुंबद और आंतरिक अपेक्षाकृत निम्न गुंबद के माध्यम से आंतरिक अनुपात और बाहरी भव्यता के बीच संतुलन स्थापित किया गया। यह तकनीक आगे चलकर मुगल स्थापत्य की एक अनिवार्य विशेषता बन गई। लोदी काल में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयोग अष्टकोणीय मकबरे का विकास था, जिसका आरंभ खान-ए-जहाँ तेलंगानी के मकबरे से माना जाता है। इन मकबरों के चारों ओर बरामदे बनाए गए, जिनमें ढलानदार छज्जे सूर्य और वर्षा से सुरक्षा प्रदान करते थे। छतों के कोनों पर निर्मित छतरियाँ स्पष्ट रूप से राजस्थानी और गुजराती स्थापत्य परंपराओं से प्रेरित थीं।
बाग स्थापत्य और सांस्कृतिक विस्तार
लोदी काल में मकबरों को ऊँचे चबूतरों पर स्थापित करने और उन्हें बागों के मध्य रखने की प्रवृत्ति भी विकसित हुई। दिल्ली का लोदी गार्डन इस परंपरा का प्रतिनिधि उदाहरण है। बाग-मकबरे न केवल सौंदर्यबोध को दर्शाते हैं, बल्कि वे स्थापत्य को ध्यान, स्मृति और अवकाश के सांस्कृतिक स्थलों में रूपांतरित करते हैं। इन संरचनाओं में मेहराब के साथ-साथ लिंटेल और बीम प्रणालियों का भी प्रयोग जारी रहा। इस प्रकार लोदी स्थापत्य में भारतीय और इस्लामी निर्माण परंपराओं का संतुलित समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सामाजिक दृष्टि से भी ये स्थल महत्वपूर्ण थे, क्योंकि सूफी परंपराओं और स्मारकीय स्थापत्य के माध्यम से वे विभिन्न समुदायों के लिए साझा सांस्कृतिक स्थान बनते थे। दिल्ली में विकसित स्थापत्य परंपराएँ केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहीं। राजनीतिक विघटन और क्षेत्रीय सत्ताओं के उदय के साथ ये स्थापत्य तत्व प्रांतीय संदर्भों में नए रूप ग्रहण करने लगे।
क्षेत्रीय शैलियों का उदय और विकेंद्रीकरण
दिल्ली सल्तनत के विघटन के साथ-साथ भारत के विभिन्न भागों में स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इसके परिणामस्वरूप बंगाल, गुजरात, मालवा, जौनपुर और दक्कन जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट स्थापत्य शैलियाँ विकसित हुईं। इन शैलियों पर स्थानीय जलवायु, निर्माण सामग्री और क्षेत्रीय परंपराओं का गहरा प्रभाव था। इन प्रांतीय शैलियों में दिल्ली में विकसित स्थापत्य तत्वों, जैसे मेहराब, गुंबद और मस्जिद योजना को स्थानीय रूपों के साथ जोड़ा गया। इस प्रक्रिया ने सल्तनत कालीन स्थापत्य कला को केवल राजधानी तक सीमित न रखकर एक व्यापक उपमहाद्वीपीय स्वरूप प्रदान किया।
बंगाल की स्थापत्य परंपरा
बंगाल में इलियास शाही और हुसैन शाही सुल्तानों के अधीन स्थापत्य कला ने क्षेत्र की नम जलवायु और प्रचुर ईंट संसाधनों के अनुसार स्वयं को ढाला। पांडुआ में निर्मित आदिना मस्जिद (1375 ई.) इस शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसमें विशाल हाइपोस्टाइल हॉल है, जिसमें 300 से अधिक स्तंभ हैं। इसकी वक्र छतें स्थानीय बांस की झोपड़ियों से प्रेरित थीं, जो भारी वर्षा के जल निकास में सहायक थीं।
बंगाल की इमारतों में टेराकोटा टाइलों का व्यापक प्रयोग किया गया, जिन पर जटिल पुष्पीय और ज्यामितीय अलंकरण अंकित थे। इन सजावटी तत्वों में इस्लामी सुलेख के साथ-साथ हिंदू पौराणिक रूपांकन भी सम्मिलित थे। एकलखी मकबरा जैसी संरचनाओं में गोलाकार गुंबद और बंद आंगनों का प्रयोग सामुदायिक धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है।
गुजरात की स्थापत्य शैली
गुजरात में अहमद शाही सुल्तानों के अधीन स्थापत्य कला ने विशेष परिपक्वता प्राप्त की। यहाँ जटिल पत्थर नक्काशी और समुद्री व्यापार से जुड़े सांस्कृतिक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। अहमदाबाद की जामा मस्जिद (1424 ई.) इस शैली का प्रमुख उदाहरण है, जिसमें 260 स्तंभों द्वारा समर्थित विशाल प्रार्थना कक्ष और जालीदार स्क्रीनें हैं। ये जालियाँ प्रकाश और वायु के प्रवाह की अनुमति देते हुए आंतरिक गोपनीयता बनाए रखती हैं। गुजरात की बावलियाँ, जैसे आदलज वाव, इस क्षेत्र की स्थापत्य विशिष्टता को और स्पष्ट करती हैं। इनमें जल प्रबंधन को जैन मंदिर स्थापत्य से प्रेरित ब्रैकेटों और अलंकरणों के साथ जोड़ा गया। यह शैली गुजरात की समृद्ध व्यापारिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक सहिष्णुता को भी प्रतिबिंबित करती है, जहाँ हिंदू कारीगर इस्लामी संरचनाओं के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
मालवा की स्थापत्य परंपरा
मालवा क्षेत्र में, विशेष रूप से मांडू को केंद्र बनाकर, स्थापत्य कला ने एक रोमांटिक और रक्षात्मक स्वरूप ग्रहण किया। जहाज महल (लगभग 1469 ई.) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो एक कृत्रिम झील के बीच स्थित है और अपनी लम्बी आकृति के कारण जलयान जैसा प्रतीत होता है। इसमें मंडपों और बालकनियों का प्रयोग राजकीय विश्राम के लिए किया गया था।
हिंदोला महल, जिसकी ढलान वाली दीवारें इसे “झूलता हुआ” रूप प्रदान करती हैं, इस शैली की एक अन्य विशेष संरचना है। मालवा की स्थापत्य परंपरा में विशाल मेहराबों जैसे अफगान तत्वों को स्थानीय जल संरचनाओं और उद्यानों के साथ जोड़ा गया। इन परिसरों में जेनाना जैसे अलगावयुक्त खंड भी बनाए गए, जो तत्कालीन दरबारी जीवन और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं। मालवा की स्थापत्य शैली में जल, भू-आकृति और दरबारी जीवन का संयोजन दिखाई देता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ स्थापत्य केवल रक्षा का साधन नहीं, बल्कि शाही विलास और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी था।
जौनपुर और शर्की स्थापत्य
जौनपुर में शर्की वंश ने एक विशिष्ट स्थापत्य शैली विकसित की। अटाला मस्जिद (1408 ई.) इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें विशाल प्रोपाइलॉन प्रवेश द्वार और मुखौटे के दोनों ओर स्थित पाइलोन दिखाई देते हैं। यहाँ तुगलक काल की बैटर दीवारों को स्थानीय ईंट कार्य और छिद्रित पत्थर जालियों के साथ संयोजित किया गया। यह शैली जौनपुर की बौद्धिक और शैक्षिक भूमिका को भी दर्शाती है, जहाँ मस्जिदें केवल धार्मिक स्थल नहीं थीं, बल्कि मदरसों और विद्वत गतिविधियों के केंद्र भी थीं। किले जैसी मजबूत संरचनाएँ सांस्कृतिक संश्लेषण का स्थापत्य माध्यम बन गईं।
दक्कन की स्थापत्य परंपरा
दक्कन में बहमनी सल्तनत और उसके उत्तराधिकारी राज्यों के अधीन स्थापत्य ने एक अलग पहचान विकसित की। बिदर किला, गोलकुंडा जैसे दुर्ग और महमूद गवान का मदरसा (1472 ई.) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस क्षेत्र में फारसी-प्रेरित चमकदार टाइलों का प्रयोग विशेष रूप से गुंबदों और मीनारों पर किया गया। दक्कनी स्थापत्य में फारसी प्रभाव, स्थानीय द्रविड़ तत्वों और सैन्य आवश्यकताओं का समन्वय दिखाई देता है, जो इस क्षेत्र को उत्तर भारतीय सल्तनत स्थापत्य से भिन्न पहचान प्रदान करता है।
दक्कनी स्थापत्य में पठारी भू-प्रकृति के अनुरूप ऊँची दीवारें, गहरी खाइयाँ और मजबूत किलेबंदी प्रमुख थीं। साथ ही कमल जैसे स्थानीय रूपांकनों का प्रयोग यह दर्शाता है कि यहाँ भी इंडो-इस्लामी समन्वय की प्रक्रिया सक्रिय थी। ये संरचनाएँ दक्कन के सुल्तानों के सांस्कृतिक संपर्कों और धार्मिक संतुलन को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
क्षेत्रीय शैलियों से मुगल स्थापत्य की ओर
पंद्रहवीं शताब्दी में उभरी इन क्षेत्रीय स्थापत्य परंपराओं में दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य भाषा को स्थानीय परंपराओं के साथ जोड़ने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही संलयन आगे चलकर मुगल स्थापत्य की नींव बना। लोदी काल का डबल गुंबद हुमायूँ के मकबरे में विकसित हुआ, तुगलक काल की बैटर दीवारों ने मुगल किलाबंदियों को प्रभावित किया, और प्रांतीय उद्यान योजनाएँ ताजमहल के चारबाग बागों में परिष्कृत रूप में सामने आईं। इस प्रकार सल्तनत कालीन स्थापत्य कला केवल एक युग तक सीमित न रहकर, भारतीय स्थापत्य इतिहास में एक दीर्घकालीन और अनुकूली परंपरा के रूप में स्थापित हुई, जिसने सदियों तक सांस्कृतिक संश्लेषण और स्थापत्य विकास को दिशा प्रदान की।
निष्कर्ष: सल्तनत कालीन स्थापत्य कला का ऐतिहासिक महत्व
सल्तनत कालीन स्थापत्य कला केवल धार्मिक या प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं थी। यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें सत्ता, समाज और संस्कृति का स्थापत्य रूपांतरण हुआ। प्रारंभिक संक्रमणकालीन प्रयोगों से लेकर लोदी काल की स्थापत्य परिपक्वता तक, इस कला ने भारतीय और इस्लामी परंपराओं के बीच एक स्थायी सेतु का निर्माण किया।
मेहराब, गुंबद, डबल गुंबद, जल प्रबंधन प्रणालियाँ और बाग-स्थापत्य, ये सभी तत्व आगे चलकर मुगल स्थापत्य की भव्यता का आधार बने। इस प्रकार सल्तनत कालीन स्थापत्य कला भारतीय स्थापत्य इतिहास में एक निर्णायक चरण का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने आने वाले युगों की स्थापत्य दिशा निर्धारित की।
इस प्रकार सल्तनत कालीन स्थापत्य कला केवल मध्यकालीन सत्ता की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि एक ऐसी अनुकूली परंपरा थी जिसने स्थानीय शिल्प, तकनीक और सांस्कृतिक अंतःक्रिया को आत्मसात करते हुए भारतीय स्थापत्य को एक नई दिशा प्रदान की।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
