सातवाहन कालीन कला एवं स्थापत्य: दक्खिन की सांस्कृतिक उन्नति का स्वर्णिम अध्याय

 

सातवाहन कालीन कला एवं स्थापत्य भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का वह महत्वपूर्ण अध्याय है जिसमें दक्खिन के धार्मिक, आर्थिक और कलात्मक जीवन का समन्वित स्वरूप स्पष्ट रूप से उभरता है। ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर ईसा की तृतीय शताब्दी तक विस्तृत इस काल में स्तूप, चैत्यगृह, विहार और मूर्तिकला की परंपराओं ने अभूतपूर्व विकास प्राप्त किया। बौद्ध धर्म के प्रति सातवाहन शासकों की सहिष्णु नीति, समुद्री व स्थल व्यापार की समृद्धि तथा दक्किनी शिल्पकारों की उत्कृष्ट तकनीक ने इस युग को एक विशिष्ट कलात्मक पहचान प्रदान की।

अमरावती का महास्तूप, नागार्जुनकोण्ड की शिल्प-श्रृंखला, तथा पश्चिमी भारत की गुफाओं में विकसित चैत्य-विहार संरचनाएँ न केवल सातवाहन काल की कलानिष्ठ संवेदना का प्रमाण हैं, बल्कि भारतीय बौद्ध स्थापत्य के उत्कर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति भी हैं। प्रस्तुत आलेख में सातवाहन कालीन कला एवं स्थापत्य की प्रमुख विशेषताओं, महत्वपूर्ण केंद्रों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का तथ्यपूर्ण और समग्र अध्ययन किया गया है।

 

सातवाहन कालीन कला एवं स्थापत्य का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

 

सातवाहन शासन दक्खिन के उस विस्तृत भू-भाग पर उभरा जहाँ सामाजिक और आर्थिक गतिविधियाँ पूर्व से ही सशक्त थीं। प्राकृत भाषा के व्यापक प्रयोग, गिल्ड-आधारित व्यापारिक संरचना, रोमन संसार से संपर्क, तथा बौद्ध धर्म के दान-संस्कृति ने इस युग की कलात्मक प्रवृत्तियों को परिभाषित किया। सातवाहन शासक स्वयं विविध पंथों का सम्मान करते थे; अतः धार्मिक सहिष्णुता के वातावरण में बौद्ध स्मारक-निर्माण अत्यंत प्रभावित हुआ। गौतमीपुत्र शातकर्णि के शासनकाल में प्राप्त राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक पुनरुत्थान ने दक्खिन में कला संरक्षण को नई गति प्रदान की, जिसका विस्तृत विश्लेषण गौतमीपुत्र शातकर्णि सातवाहन साम्राज्य का पुनरुत्थान में उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त, शुंग-कुशाण युग की उत्तरी कला तथा पश्चिमी भारत की गुफा परंपरा का प्रभाव भी दक्षिण भारत के शिल्पकारों ने ग्रहण किया, किंतु इसे स्थानीय दक्कनी सौंदर्य-बोध के साथ इस प्रकार संयोजित किया कि परिणामस्वरूप एक स्वतंत्र कलाशैली अस्तित्व में आई।

सातवाहन कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समग्रता में समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि यह सत्ता किस प्रकार उभरी और विस्तार पाई; इसी संदर्भ में सातवाहन साम्राज्य का उदय और विस्तार विषयक यह लेख अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

 

सातवाहन कालीन स्तूप-निर्माण परंपरा

 

सातवाहन काल में स्तूप-निर्माण धार्मिक समर्पण का एक प्रमुख रूप बन गया था। इस समय नये स्तूपों का निर्माण हुआ तथा प्राचीन स्तूपों का व्यापक रूप से पुनरुद्धार किया गया। यद्यपि समय की मार और प्राकृतिक क्षरण के कारण अधिकांश स्तूप आज अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं हैं, तथापि उनके अवशेषों से उनकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है।

 

अमरावती महास्तूप: सातवाहन कालीन कला का उत्कृष्ट उदाहरण

 

अमरावती का महास्तूप सातवाहन कालीन स्थापत्य-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। सबसे पहले 1797 ई. में कर्नल मैकेंजी को इसकी जानकारी हुई। उन्होंने यहां से प्राप्त शिलापट्टों और मूर्तियों के आकर्षक चित्र बनवाए। 1840 ई. में इलियट ने स्तूप के एक हिस्से की खुदाई कराई, जिसमें कई मूर्तियां मिलीं।

अमरावती स्तूप की वेदिका संगमरमर से बनी थी, और इसका गुम्बद भी संगमरमर की पट्टियों से सजाया गया था। गुम्बद के ऊपर एक छत्रिका (हर्मिका) स्थापित थी, जिसके शीर्ष पर लोहे का छत्र लगा हुआ था। अनुमान है कि स्तूप का आधार विशाल रहा होगा। वेदिका के स्तंभ ईंटों के पट्टों पर खड़े किए गए थे। स्तंभों के ऊपर उष्णीष पत्थर था, और दो स्तंभों के बीच तीन-तीन क्रॉस-बार लगाए गए थे। इन सभी पर बारीक नक्काशी की गई थी। वेदिका के चारों ओर 26 फुट चौड़े तोरण द्वार बने थे। मूल रूप से यह स्तूप लगभग 200 ई.पू. में निर्मित हुआ था, लेकिन वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी के शासनकाल में इसका नवीनीकरण हुआ और इसे कलाकृतियों से सजाया गया। इन पर अंकित मूर्तिकल्पना सातवाहन शिल्पकला की परिपक्वता का परिचायक है।

इसी दौरान चारों ओर पत्थर की रेलिंग (वेदिका) बनाई गई। वेदिका और स्तंभों पर अधिकांश चित्र जातक कथाओं पर आधारित हैं। स्तंभों पर बोधिवृक्ष, धर्मचक्र, स्तूप आदि के दृश्य उकेरे गए हैं। यहां बुद्ध का चित्रण प्रतीकों और मूर्तियों दोनों रूपों में मिलता है। शिलापट्टों पर बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाओं को चित्रित किया गया है। इन शिल्पखंडों से यह ज्ञात होता है कि यहाँ बौद्ध धर्म के अकन-प्रतीक (aniconic symbols) और मूर्त-रूप दोनों का प्रयोग समान रूप से स्वीकार्य था। इस प्रकार, अमरावती का महास्तूप भारतीय वास्तुकला की एक चमकदार रचना है, जहां सौंदर्य के विभिन्न तत्वों का अद्भुत संयोजन दिखाई देता है। भारतीय कला इतिहास के विख्यात अध्येता कुमारस्वामी अमरावती शैली को भारतीय कला का ‘विलासपूर्ण और अत्यंत कोमल फूल’ कहते हैं। यह वर्णन इस कला की लयात्मकता, सूक्ष्मता तथा रचना-संपन्नता को अत्यंत सटीक रूप से व्यक्त करता है।

अमरावती स्तूप के निर्माण में जिन सामाजिक-धार्मिक शक्तियों ने योगदान दिया, उन्हें समझने हेतु सातवाहन कालीन समाज और आर्थिक ढाँचे का अध्ययन अनिवार्य है, जिसका विवेचन सातवाहन काल का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन नामक लेख में प्राप्त होता है।

 

नागार्जुनकोण्ड: ईक्ष्वाकु संरक्षण में विकसित बौद्ध स्थापत्य-परंपरा

 

अमरावती के उत्तर में कृष्णा नदी के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित नागार्जुनकोण्ड भी सातवाहन-ईक्ष्वाकु युग का एक प्रमुख बौद्ध केंद्र रहा। अमरावती से करीब 95 किलोमीटर उत्तर में, कृष्णा नदी के किनारे स्थित नागार्जुन पहाड़ी पर तीसरी शताब्दी ई. में स्तूपों का निर्माण हुआ, जिसे नागार्जुनकोंडा स्तूप के नाम से जाना जाता है। सबसे पहले 1926 ई. में डॉ. लागहर्स्ट ने यहां के अवशेषों की खोज की। उसके बाद 1927 से 1959 तक कई खुदाई अभियान चले। इनसे कई स्तूप, चैत्य, विहार, मंदिर आदि सामने आए।

नागार्जुनकोंडा के स्तूप अमरावती के समान ही हैं। यहां का मुख्य स्तूप गोलाकार था, जिसका व्यास 106 फुट और ऊंचाई करीब 80 फुट थी। आधार पर 13 फुट चौड़ा परिक्रमा पथ था, जिसके इर्द-गिर्द वेदिका बनी हुई थी। ऊपरी भाग को बाद में शिलापट्टों से सजाया गया। इन पट्टों पर बौद्ध कथाओं को भरपूर उकेरा गया है, जिनमें कुछ जातक कथाओं से प्रेरित हैं। प्रमुख दृश्यों में बुद्ध का जन्म, महाभिनिष्क्रमण, बोधि प्राप्ति, धर्मचक्र प्रवर्तन, माया का स्वप्न तथा मार-विजय आदि शामिल हैं। इस स्तूप की सबसे विशिष्ट स्थापत्य उपलब्धि आयक (आयताकार चबूतरे) हैं। आयक एक विशेष प्रकार का मंच होता था, जो स्तूप के आधार को चारों दिशाओं में बाहर की ओर बढ़ाकर बनाया जाता था। नागार्जुनकोंडा के आयकों पर अमरावती की तरह सजे शिलापट्ट लगे थे। वेदिका में प्रवेश द्वार तो हैं, लेकिन तोरणों का अभाव है। यह तकनीक अमरावती शैली से प्रभावित अवश्य है, किंतु स्थानीय विशेषताओं के कारण इसका स्वरूप भिन्न प्रतीत होता है। अभिलेखों से पता चलता है कि ईक्ष्वाकु राजाओं की रानियां बौद्ध धर्म से गहराई से जुड़ी थीं, और उनके प्रोत्साहन से यहां स्तूप बने।

कला-संरक्षण में राज्य की भूमिका को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि सातवाहन प्रशासन, राजस्व प्रणाली और सामन्तीय ढाँचे की संरचना क्या थी; इस विषय में सातवाहन शासन व्यवस्था का विश्लेषण अत्यंत प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत करता है।

 

सातवाहन काल के अन्य स्तूप केंद्र

 

सातवाहन–ईक्ष्वाकु युग में दक्खिन के विस्तृत भूभाग में कई अन्य स्थान भी बौद्ध स्थापत्य के केंद्र बने, जैसे-

  • भट्टिप्रोलु,
  • पेऊगंज,
  • गोली,
  • जगय्यपेट,
  • घण्टशाल इत्यादि।

इन स्थलों से प्राप्त स्तूपों, रेलिंगों, शिलापट्टों तथा अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव व्यापक था और स्थानीय समुदाय इस निर्माण-परंपरा के सक्रिय सहयोगी थे।

 

सातवाहन कालीन चैत्यगृह स्थापत्य

 

इस काल में पश्चिमी भारत की पहाड़ियों में गुफाओं को काटकर चैत्यगृह और विहार बनाए गए। ‘चैत्य’ शब्द का मूल अर्थ चिता या समाधि से जुड़ा है। प्रारंभ में शवदाह के बाद बचे अवशेषों को दफनाकर ऊपर समाधि बनाई जाती थी, जिन्हें चैत्य या स्तूप कहा जाता था। इनमें महापुरुषों के अवशेष रखे जाते थे, इसलिए ये पूजा के केंद्र बने। बाद में बौद्धों ने इन्हें अपनी उपासना का हिस्सा बना लिया, और चैत्य बौद्ध वास्तुकला का अभिन्न भाग हो गया। शुरू में स्तूप खुले में होते थे, लेकिन बाद में इन्हें भवनों में रखा जाने लगा, जिन्हें चैत्यगृह कहा गया।

ये दो प्रकार के थे: चट्टानें काटकर बने (रॉक-कट) और ईंट-पत्थरों से खुले में बने (संरचनात्मक)। दक्कन की गुफाओं में मुख्यतः चट्टान कट चैत्य मिलते हैं। चैत्यगृहों के पास भिक्षुओं के लिए विहार (आवास) भी बनाए जाते थे। चैत्यगृह वास्तव में प्रार्थना कक्ष (गुफा-मंदिर) थे, जहां स्तूप की पूजा होती थी, जबकि विहार मठ या संघाराम थे। चैत्यगृह कम संख्या में हैं, लेकिन विहारों की संख्या लगभग 100 है, जिनमें ज्यादातर बौद्ध हैं। चैत्यगृह हिंदू मंदिरों से मिलते-जुलते हैं। इनके अंत में ढोलाकार पूजा-स्थल होता था, जहां स्तूप रखा जाता था। साथ ही मंडप और परिक्रमा पथ भी बनाए जाते थे।

 

चैत्यगृह की वास्तु-योजना

 

चैत्यगृह प्रायः एक बड़ी दीर्घाकार गुफा अथवा भवन होता था, जिसके अंतिम भाग में अर्धवृत्ताकार संरचना (ऐप्स) में स्तूप रखा जाता था। इसके आगे एक विस्तृत मण्डप (नेव) होता था और उसके दोनों ओर प्रदक्षिणापथ (आइल) की व्यवस्था रहती थी। इस योजना में वह धार्मिक गंभीरता और स्थापत्य संतुलन निहित था जिससे चैत्यगृह न केवल उपासना का स्थल बल्कि कलात्मक उपलब्धि का उत्कृष्ट उदाहरण भी बन जाते थे।

विद्वान् वी. एस. अग्रवाल ने चैत्यगृह की तुलना ईसाई गिरजाघरों की योजना से की है, जहाँ नेव (मंडप), आइल (परिक्रमा) और ऐप्स (गर्भगृह) का अनुपात कुछ हद तक समान दिखाई देता है। इन्हें हिंदू मंदिरों से भी तुलना की जा सकती है। बाद में चैत्यगृहों पर ही हिंदू मंदिरों का विकास हुआ। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि भारतीय वास्तु-परंपरा में यह संरचनात्मक प्रारूप अत्यंत प्राचीन है।

 

सातवाहन कालीन प्रमुख चैत्यगृह: शैली और विशेषताएँ

 

१. भाजा चैत्यगृह

भाजा का चैत्यगृह पश्चिमी भारत की प्रारंभिक गुफा-परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भाजा चैत्य में 27 स्तंभ हैं। कन्हेरी चैत्य कार्ले का अनुकरण है, और बाहर बुद्ध की कई मूर्तियां हैं, जो महायान प्रभाव दर्शाती हैं। ये सभी एकमंजिले थे, जिसमें चौकोर मंडप और तीन ओर कमरे (भिक्षुओं के लिए) थे।

२. कार्ले चैत्यगृह

कार्ले का चैत्यगृह प्राचीन भारत की सर्वाधिक भव्य गुफा-संरचनाओं में गिना जाता है। यह 24 फुट 3 इंच लंबा, 25 फुट 7 इंच चौड़ा और 45 फुट ऊंचा है। यह प्राचीन भारत के सबसे सुंदर स्मारकों में से एक है। प्रवेश पर विशाल स्तंभ है, जिसके ऊपर चार सिंह हैं। मंडप में तीन द्वार हैं। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि वैजयन्ती नगर के ‘भूतपाल’ नामक श्रेष्ठि ने इसके निर्माण में उदारतापूर्वक दान दिया था।

३. अन्य चैत्यगृह

कन्हेरी, नासिक, जुन्नार, पीतलखोरा तथा अजन्ता की आरंभिक गुफाओं में निर्मित चैत्यगृह भी इसी परंपरा का विकास दर्शाते हैं। इन सभी में स्तूप प्रमुख उपासना-केंद्र के रूप में स्थापित था तथा प्रदक्षिणा-पथ की व्यवस्था अवश्य मिलती है। नासिक के विहार में शिलालेख मिला है, जो सातवाहन राजा कृष्ण के समय का निर्माण बताता है। नासिक चैत्य के प्रवेश पर प्रतीक-युक्त आकर्षक अर्धचंद्र है। गौतमीपुत्र और यज्ञश्री ने नासिक में विहार बनवाए। गौतमीपुत्र के विहार में 18 कमरे और छह स्तंभयुक्त बरामदा है, जहां वृषभ, घोड़ा, हाथी आदि की मूर्तियां हैं।

 

सातवाहन कालीन विहार स्थापत्य

 

विहार बौद्ध भिक्षुओं के आवासीय परिसर थे, जिनका निर्माण बड़ी संख्या में हुआ। ये प्रायः एक-तल वाले होते थे और इनकी भीतरी संरचना में बहुकोणीय अथवा आयताकार कक्षों की पंक्ति, बरामदा तथा कभी-कभी सभा-कक्ष भी सम्मिलित होता था।

नासिक और कार्ले के विहारों में स्तम्भों पर पशु-आकृतियों का उत्कीर्णन देखने को मिलता है। नासिक के जिस विहार का निर्माण गौतमीपुत्र शातकर्णि के काल में हुआ, उसमें कुल अठारह कोशिकाएँ थीं। इन विहारों की भीतरी दीवारों पर मिलने वाली चिकनी पालिश सातवाहन काल की तकनीकी दक्षता को इंगित करती है।

दक्खिन के नगरों, गिल्डों और व्यापार मार्गों ने सातवाहन शिल्प-परंपरा को जिस प्रकार सुदृढ़ किया, उसका विस्तृत विवरण सातवाहन काल का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन में स्पष्ट रूप से मिलता है।

 

सातवाहन कालीन मूर्तिकला: कथानक और प्रतीक

 

सातवाहन काल की मूर्तिकला मुख्यतः अमरावती और नागार्जुनकोण्ड केंद्रित थी, जहाँ के शिल्पकारों ने बौद्ध धर्म की कथाओं और प्रतीकों को अत्यंत सजीव रूप में अंकित किया।

 

अमरावती की संगमरमर-शिला शैली

 

अमरावती की मूर्तिकला अपने सूक्ष्म उत्कीर्णन, दृश्य-समग्रता और गतिशीलता के लिए प्रसिद्ध है। शिलापट्टों पर अंकित कथानकों में जातक प्रसंग, बुद्धचरित के विभिन्न चरण और सामाजिक जीवन के दृश्य अत्यंत विशद रूप से प्रत्यक्ष होते हैं। आकृतियों में भावाभिव्यक्ति, मुद्रा और वस्त्र-लालित्य का जो सामंजस्य है, वह इस शैली की परिपक्वता का प्रतीक है।

 

नागार्जुनकोण्ड की मूर्तिकला-परंपरा

 

नागार्जुनकोण्ड में प्राप्त मूर्तिकला में महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव विशिष्ट रूप से दिखाई देता है। कई शिलाखंडों पर उत्कीर्ण कथाएँ अधिक विस्तृत, शिल्प-अनुशासन में व्यवस्थित और प्रादेशिक सौंदर्य-बोध से परिपूर्ण प्रतीत होती हैं। कुछ मूर्तियों पर शिल्पकारों के नाम भी अंकित मिले हैं, जो उस समय की शिल्प-परंपरा के संगठनात्मक स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।

 

स्थानीय व यवन शैली का समन्वय

 

सातवाहन कला पर यवन (Indo-Greek) प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है, विशेषतः आकृतियों की शारीरिक रचना, प्राकृतिकता और मुद्राओं की लयात्मकता में। स्थानीय दक्कनी परंपराएँ इसके साथ घुल-मिलकर एक विशिष्ट मिश्रित शैली का निर्माण करती हैं। व्यावसायिक गिल्डों और स्थानीय दानदाताओं ने भी इन मूर्तियों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

अभिलेखों में सातवाहन कालीन कला संरक्षण

 

सातवाहन युग के अनेक निर्माण कार्यों के संदर्भ अभिलेखों में प्राप्त होते हैं। कार्ले, कन्हेरी और नासिक के अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि श्रेष्ठियों, गाहपतियों, सेठों, व्यापारिक संघों तथा शाही परिवार की महिलाओं ने उदारतापूर्वक दान देकर चैत्यगृहों, विहारों तथा स्तूपों के निर्माण एवं अलंकरण का कार्य सम्पन्न करवाया। इन अभिलेखों में प्रयुक्त प्राकृत भाषा उस समय की सामाजिक-आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

इन अभिलेखों के आधार पर सातवाहन कला के विकासक्रम का जो ऐतिहासिक ढाँचा निर्मित होता है, उसे और स्पष्ट रूप से समझने के लिए सातवाहन इतिहास के प्रमुख स्रोत एवं उनकी प्रमाणिकता अत्यंत महत्त्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है।

 

सातवाहन कालीन कला एवं इसकी विशिष्टताएँ और भारतीय कला इतिहास में उसका स्थान

 

सातवाहन कालीन कला ने भारतीय बौद्ध परंपरा को एक नया भौगोलिक विस्तार प्रदान किया। अमरावती और नागार्जुनकोण्ड की संगमरमर-शिला शैली ने भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की मूर्तिकला पर गहरा प्रभाव छोड़ा। स्तूप, चैत्यगृह और गुफा-विहारों की यह परंपरा आगे चलकर गुप्त, चालुक्य तथा राष्ट्रकूट युग की स्थापत्य शैलियों में भी प्रतिध्वनित हुई।

इस प्रकार, सातवाहन युग भारतीय कला के विकासक्रम में न केवल एक संक्रमण-काल है, बल्कि वह आधार-स्तम्भ भी है जिस पर दक्षिण भारत की धार्मिक व स्थापत्य परंपराएँ आगे विकसित हुईं।

 

निष्कर्ष: सातवाहन कालीन कला की अमर विरासत

 

सातवाहन कालीन कला एवं स्थापत्य भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इस युग में विकसित स्तूप, चैत्यगृह, विहार और मूर्तिकला केवल धार्मिक अभिव्यक्ति के साधन नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि भी थे जिसने भारतीय कला को नई दिशा दी। सातवाहन काल की कलात्मक उपलब्धियाँ आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं और अध्ययनकर्ताओं को निरंतर प्रेरित करती हैं।

 

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