सातवाहन वंश की उत्पत्ति और उदय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सातवाहन साम्राज्य का उदय और विस्तार भारतीय इतिहास के उस संक्रमणकाल से जुड़ा है जिसमें मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण और मध्य भारत में राजनीतिक रिक्ति उत्पन्न हुई। इस रिक्ति को भरने के लिए अनेक स्थानीय कुलों ने अपनी-अपनी शक्ति का विस्तार करना शुरू किया, लेकिन उनमें सातवाहन वंश एक स्थायी और संगठित शक्ति के रूप में उभरा। सातवाहन वंश की उत्पत्ति भले ही विवादों से घिरी रही हो, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह वंश उसी ऐतिहासिक परिस्थिति में जन्मा, जहाँ दक्कन को पहली बार एक सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान मिल रही थी।
सातवाहन वंश की प्रारंभिक जानकारी विभिन्न साहित्यिक और पुरातात्त्विक स्रोतों से मिलती है। इन स्रोतों की विश्वसनीयता और विश्लेषण पर आधारित विस्तृत लेख सातवाहन इतिहास के स्रोत और उनकी प्रमाणिकता अवश्य पढ़ें।
सातवाहनों की उत्पत्ति और जातीय स्थिति को लेकर विभिन्न प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में अलग-अलग धारणाएँ मिलती हैं। पुराणों में उनके संस्थापक सिमुक को ‘आंध्रजातीय’ बताया गया है, जबकि सातवाहन अभिलेखों में राजाओं ने स्वयं को केवल ‘सातवाहन’ कहा है। कृष्णा–गोदावरी क्षेत्र के समुदायों को ऐतरेय ब्राह्मण तथा महाभारत में अनार्य, म्लेच्छ या वर्णसंकर के रूप में देखा गया है। कुछ विद्वानों ने इन्हीं उल्लेखों के आधार पर सातवाहनों को निम्न जातीय स्तर से जोड़ा है, परंतु अभिलेखीय प्रमाण इसके विपरीत जाते हैं।
विशेषकर नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘एकबह्यन्’ (अद्वितीय ब्राह्मण) कहा गया है जिसमें क्षत्रियों के दर्प को चूर्ण (खतियदपमानमदनस) कर दिया था। यदि ‘एकबह्यन्’ को ‘खतियदपमानमदनस’ के साथ सयुक्त कर दिया जाय तो इससे यह निःसन्देह सिद्ध हो जाता है कि गौतमीपुत्र न केवल एक ब्राह्मण था, अपितु वह परशुराम की प्रकृति का ब्राह्मण था जिन्होंने क्षत्रियों के अभिमान को चूर्ण किया था। यह सिद्ध करता है कि सातवाहन वंश उच्च कुल परंपरा से सम्बद्ध था।
ऐसा लगता है कि शको द्वारा परास्त होने पर सातवाहन लोग अपना मूल स्थान छोड़कर आन्ध्र प्रदेश में जाकर बस गये और इसी कारण पुराणों में उन्हें ‘आन्ध्र’ कहा गया। अतः ‘आन्ध्र जातीय’ विरुद को प्रादेशिक संज्ञा मानना उचित प्रतीत होता है। मूलतः सातवाहन ब्राह्मण जाति के ही थे। उनका ब्राह्मण धर्म एवं संस्कृति को रक्षा के लिये शस्त्र ग्रहण करना तत्कालीन परिस्थितियो में सर्वथा उपयुक्त था। मौर्य युग में वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा गिर गयी थी तथा क्षत्रिय बड़ी संख्या में बौद्ध बन गये थे। ऐसी स्थिति में ब्राह्मण धर्म की रक्षा के लिये ब्राह्मणों का आगे आना आवश्यक था। इसी प्रकार की परिस्थितियो में मगध में शुंग तथा कण्व राजवंश ने सत्ता संभाली थी। यही कार्य दक्षिणापथ में सातवाहनों ने किया।
इस विरोधाभास के प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
- पुराणों में ‘आंध्र’ का प्रयोग जाति के लिए नहीं, कभी-कभी क्षेत्रीय पहचान के लिए किया गया।
- सातवाहनों के प्रारंभिक अभिलेख किसी भी स्थान पर ‘आंध्र’ शब्द का प्रयोग नहीं करते।
- शुंग, कण्व और सातवाहन – तीनों ही ब्राह्मण वंश थे जिन्होंने मौर्योत्तर काल में सत्ता संभाली।
अतः यह निष्कर्ष तार्किक है कि सातवाहन वंश का उदय सामाजिक-धार्मिक संरचनाओं के उस परिवर्तित वातावरण में हुआ, जहाँ वैदिक परंपराओं का पुनर्संगठन हो रहा था और ब्राह्मण कुलों का राजनीतिक उभार स्वाभाविक था।
सातवाहन शासन के सामाजिक व आर्थिक रूपांतरण का विस्तृत प्रभाव बाद के काल में कैसे विकसित हुआ, इसका गहन विश्लेषण सातवाहन काल का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन में उपलब्ध है।
सातवाहन वंश का मूल निवास और उदय का भौगोलिक आधार
सातवाहनों का मूल निवास कौन-सा क्षेत्र था, इस पर भी विद्वानों में मतभेद रहे हैं। रेप्सन, स्मिथ तथा भण्डारकर जैसे कुछ विद्वान् आन्ध्र प्रदेश में हो उनका मूल निवास स्थान निर्धारित करते है। स्मिथ ने श्रीकाकुलम् तथा भण्डारकर ने धान्नकटक में उनका मूल निवास स्थान माना है। इतिहासकार सुक्थंकर सातवाहनों का आदि स्थान बेलारी (मैसूर) बताते है। किंतु इन सभी मतों की एक प्रमुख कमजोरी यह है कि इन स्थलों से सातवाहन अभिलेख या सिक्के प्राप्त नहीं हुए।
इसके विपरीत महाराष्ट्र के प्रतिष्ठान (प्राचीन पैठण) और उसके आसपास का क्षेत्र सातवाहनों की प्रारंभिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र सिद्ध होता है, क्योंकि, सातवाहन राजाओं के बहुसंख्यक अभिलेख तथा सिक्के महाराष्ट्र के प्रतिष्ठान (पैठन) के समीपवर्ती भाग से प्राप्त हुए है। नानाघाट का प्रसिद्ध अभिलेख, जिसमें शातकर्णि प्रथम और उनकी रानी नागनिका का वर्णन है, प्रतिष्ठान से लगभग सौ मील दूर मिला है। नासिक से दो और लेख मिले है। पहले में सातवाहन कुल के दूसरे राजा कन्ह (कृष्ण) तथा दूसरे में इस वंश के तीसरे राजा शातकर्णि प्रथम की प्रपौत्री का उल्लेख मिलता है। जो यह स्पष्ट करता है कि सातवाहन वंश की प्रारंभिक शक्ति पश्चिमी भारत में ही विकसित हुई।
प्रतिष्ठान क्षेत्र सातवाहन उदय के लिए क्यों उपयुक्त था?
- यह दक्षिणापथ (उत्तर–दक्षिण व्यापार मार्ग) का केंद्रीय पड़ाव था।
- नर्मदा–गोदावरी तंत्र के कारण यह क्षेत्र उत्तरी और दक्षिण भारतीय संस्कृतियों के संपर्क में था।
- महाराष्ट्र के शक्तिशाली महारथी कुल से सातवाहनों के संबंध ने उन्हें सामरिक और राजनीतिक समर्थन दिया।
इस प्रकार अभिलेखों के अतिरिक्त सातवाहनों के सिक्के भी महाराष्ट्र से ही पाये गये है। इस प्रकार अभिलेखीय तथा मुद्रा सम्बन्धी प्रमाणो के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सातवाहन साम्राज्य का उद्भव दक्कन के पश्चिमी भाग में हुआ, जहाँ से आगे यह पूरे दक्षिणापथ पर विस्तारित हुआ। सातवाहनों का मूल निवास स्थान पश्चिमी भारत के किसी भाग में ही था। बहुत संभव है यह स्थान प्रतिष्ठान ही रहा हो।
सिमुक – सातवाहन साम्राज्य के उदय का प्रारंभ
सातवाहन साम्राज्य का वास्तविक प्रारंभ सिमुक (शिमुक अथवा सिन्धुक) से माना जाता है। वायु पुराण के अनुसार, आन्ध्रजातीय सिन्धुक (सिमुक) ने कण्व वंश के अंतिम राजा सुशर्मा को समाप्त कर दक्कन और मध्य भारत में अपनी सत्ता स्थापित की। पुराणों के अनुसार शिमुक ने 23 वर्षों तक शासन किया। नानाघाट चित्र-फलक अभिलेख में वे ‘राजा शिमुक सातवाहन’ के रूप में प्रकट होते हैं। उनके शासनकाल के संबंध में साहित्यिक और अभिलेखीय स्रोत यह दर्शाते हैं कि सिमुक ने न केवल क्षेत्रीय सत्ता प्राप्त की, बल्कि एक स्थायी राज्य-व्यवस्था की नींव रखी।
सिमुक का शासनकाल सातवाहनों के राजनीतिक उदय का पहला चरण था।
उनकी उपलब्धियों में शामिल हैं:
- शुंग–कण्व प्रभाव को दक्कन से समाप्त करना
- विदिशा क्षेत्र तक राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना
- धार्मिक संरचनाओं का संरक्षण (जैन परंपराओं में उल्लेख)
यद्यपि उनके अंतिम दिनों में दुराचार और हत्या का उल्लेख मिलता है, किंतु यह निर्विवाद है कि सातवाहन वंश के उत्थान की वास्तविक शुरुआत सिमुक से ही हुई।
कन्ह (कृष्ण) – उदय से विस्तार की ओर संक्रमण
सिमुक के पश्चात् उनके भाई कन्ह (कृष्ण) ने शासन संभाला। सिमुक का पुत्र शातकर्णि उस समय छोटा था, इसलिए राज्य का भार कन्ह (कृष्ण) ने उठाया। उसके श्रमण नामक एक महामात्र ने नासिक में एक गुहा का भी निर्माण करवाया था। यहां से प्राप्त एक लेख में कृष्ण के नाम का उल्लेख मिलता है। उसने 18 वर्षों तक राज्य किया।
नासिक गुफा के अभिलेख से ज्ञात होता है कि कण्ह के शासन में सातवाहन राज्य नासिक क्षेत्र तक विस्तारित हो चुका था। कन्ह (कृष्ण) के काल में दक्कन के पश्चिमी मैदा नों में सातवाहन सत्ता की जड़ें और मजबूत हुईं।
कन्ह का शासन सातवाहन साम्राज्य के उदय का स्थिरीकरण चरण था, जिसने आगे होने वाले विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं।
शातकर्णि प्रथम – सातवाहन साम्राज्य का व्यापक विस्तार
सातवाहन साम्राज्य का विस्तार अपने प्रारंभिक चरम पर शातकर्णि प्रथम के समय पहुँचा। वे प्रारंभिक सातवाहन शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली थे और दक्कन को पहली बार व्यापक राजनीतिक संरचना प्रदान करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।
उनके शासनकाल का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि सातवाहन साम्राज्य के उदय और विस्तार का केन्द्रीय स्तंभ वही थे।
महारथियों से वैवाहिक गठबंधन और राजनीतिक शक्ति का उभार
शातकर्णि प्रथम ने अंगीय कुल के महारठी. त्रनकयिरों की पुत्री नायानिका (नागनिका) के साथ विवाह कर अपना प्रभाव बढ़ाया। महारठियों के कुछ सिक्के उत्तरी मैसूर से मिलते है जिनसे पता चलता है कि वे काफी शक्तिशाली थे तथा नाममात्र के लिये शातकर्णि की अधीनता स्वीकार करते थे। उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध में शातकर्णि को राजनैतिक प्रभाव के विस्तार में अवश्यमेव सहायता प्रदान किया होगा। नानाघाट अभिलेख में नागनिका द्वारा स्थापित शिलालेख में शातकर्णि की उपाधियों और विजयों का उल्लेख मिलता है। यह संबंध न केवल सम्मानजनक था, बल्कि राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्व का था, क्योंकि महारथी उस समय महाराष्ट्र और उत्तर दक्कन की एक प्रभावशाली शक्ति थे।
मालवा, अनूप और विदर्भ में सातवाहन विस्तार
शातकर्णि प्रथम ने पश्चिमी मालवा, अनूप (नर्मदा तटवर्ती क्षेत्र) और विदर्भ पर अधिकार स्थापित किया। विदर्भ को उन्होंने शुंगों से छीनकर अपने राज्य में सम्मिलित किया।
इसके प्रमुख प्रमाण:
- सांची स्तूप के तोरण पर वासिष्ठिपुत्र आनंद (शातकर्णि प्रथम के कारीगरों का मुखिया) का अभिलेख
- मालवा क्षेत्र में ‘श्रीसात’ चिह्नित सिक्कों की खोज
इन साक्ष्यों से पता चलता है कि सातवाहन साम्राज्य का विस्तार नर्मदा घाटी से लेकर मध्य भारत तक पहुँच चुका था।
कोकण और गुजरात की दिशा में विस्तार
शातकर्णि प्रथम का प्रभाव उत्तरी कोकण और गुजरात के कुछ भागों तक भी बढ़ा। यह क्षेत्र समुद्री व्यापार के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण था और सातवाहनों ने इस विस्तार से दक्कन के पश्चिमी व्यापारिक मार्गों पर अपनी पकड़ मजबूत की।
खारवेल का आक्रमण और सातवाहन प्रतिरोध
हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार, कलिंग के खारवेल ने राज्यारोहण के दूसरे वर्ष सातवाहन क्षेत्र पर आक्रमण किया। असिक नगर तक उनकी सेना पहुँच गई, लेकिन आगे बढ़ने में असफल रही। यह स्थान शातकर्णि प्रथम के ही अधिकार में था। यहाँ की खुदाई से हाल ही में शातकर्णि प्रथम का सिक्का मिला है। यदि खारवेल ने निर्णायक विजय पाई होती, तो हाथीगुम्फा अभिलेख में इसका विस्तारपूर्ण उल्लेख अवश्य होता। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि शातकर्णि प्रथम ने खारवेल के आक्रमण का प्रभावी प्रतिरोध किया और अपने साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा की।
अश्वमेध यज्ञ, सार्वभौम सत्ता और आर्थिक समृद्धि
शातकर्णि प्रथम ने दो अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञों का अनुष्ठान किया। प्रथम अश्वमेध यज्ञ राजा बनने में तत्काल बाद तथा द्वितीय अपने शासनकाल के अन्त में किया होगा। अश्वमेध यज्ञ के बाद उसने अपनी पत्नी के नाम पर रजत मुद्राये उत्कीर्ण करवायी। इनके ऊपर अश्व को आकृति मिलती है। उसने दक्षिणापथपति’ तथा अप्रतिहतचक्र’ जैसी महान् उपाधियाँ धारण की। उसका शासन काल भौतिक दृष्टि से समृद्धि एवं सम्पन्नता का काल था। शातकर्णि प्रथम पहला शासक था जिसने सातवाहनों को सार्वभौम स्थिति में ला दिया। उसकी विजयो के फलस्वरूप गोदावरी घाटी में प्रथम विशाल साम्राज्य का उदय हुआ जो शक्ति तथा विस्तार में गंगा घाटी में शुंग तथा पंजाब में यवन-साम्राज्य को बराबरी कर सकता था।
पेरीप्लस से पता चलता है कि एल्डर सैरागोनस एक शक्तिशाली राजा वा जिसके समय में सुप्पर तथा कलीन (सोपारा तथा कल्यान) के बन्दरगाह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-वाणिज्य के लिये पूर्णरूपेण सुरक्षित हो गये थे। इस शासक से तात्पर्य शातकर्णि प्रथम से हो है। प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाकर उसने शासन किया। मालवा के ‘सात’ नामधारी कुछ सिक्के मिलते है। इनका प्रचलनकर्ता शातकर्णि प्रथम को ही माना जाता है।
शातकर्णि प्रथम के बाद सातवाहन शक्ति का संक्रमण
शातकर्णि प्रथम की मृत्यु के बाद सातवाहन साम्राज्य में कुछ समय के लिए दुर्बलता दिखाई देती है। नानाघाट अभिलेख में उनके पुत्र वेदश्री और शक्तिश्री बालक बताए गए हैं, इसलिए शासन की जिम्मेदारी रानी नागनिका ने संभाली। इस काल के अभिलेखों की संख्या कम है, इसलिए इतिहासकार इसे सातवाहन इतिहास का अंधकारकाल कहते हैं। किंतु सातवाहन सत्ता समाप्त नहीं हुई; यह केवल पुनर्संगठन की अवस्था में थी, जिसके बाद आगे चलकर गौतमीपुत्र शातकर्णि के समय साम्राज्य ने पुनः चरम विस्तार प्राप्त किया।
सातवाहन साम्राज्य के उदय और विस्तार का ऐतिहासिक महत्व
अंततः यह स्पष्ट होता है कि सातवाहन साम्राज्य का उदय और विस्तार दक्कन की राजनीतिक चेतना के निर्माण का प्रथम महान अध्याय था।
सातवाहन विस्तार का ऐतिहासिक महत्व
- दक्कन को पहली बार एक राजनीतिक रूप से एकीकृत रूप मिला।
- मध्य भारत और दक्कन के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक सेतु बना।
- शुंगों और यवनों जैसी बड़ी शक्तियों के समकक्ष एक नई भारतीय शक्ति उभरी।
- समुद्री व्यापार के माध्यम से दक्कन अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से जुड़ा।
सिमुक से लेकर शातकर्णि प्रथम तक का यह साम्राज्य-निर्माण भारतीय उपमहाद्वीप में सत्ता-संतुलन का नया अध्याय था, जिसने आने वाली सदियों में दक्कन की राजनीति, समाज और संस्कृति को गहरी दिशा प्रदान की।
आगे पढ़ें: गौतमीपुत्र शातकर्णि – सातवाहन वंश का पुनरुत्थान और नहपान पर ऐतिहासिक विजय
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
