सल्तनत कालीन साहित्य को प्रायः एकांगी दृष्टि से देखा गया है, जहाँ उसका मूल्यांकन केवल फारसी दरबारी रचनाओं या इस्लामी विद्वत साहित्य तक सीमित कर दिया जाता है। इस संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण यह धारणा बन गई कि तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच भारत में संस्कृत साहित्य का ह्रास हो गया और साहित्यिक सृजन का केंद्र केवल सल्तनत के दरबारों तक सिमट गया। किंतु उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य इस धारणा की पुष्टि नहीं करते।
वास्तव में, सल्तनत कालीन साहित्य एक बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक परिघटना था। इस काल में संस्कृत ने शास्त्रीय बौद्धिक परंपराओं को जीवित रखा, फारसी ने प्रशासन, इतिहास और दरबारी साहित्य को नई दिशा दी, और क्षेत्रीय भाषाओं ने जनसामान्य की भावनाओं और अनुभवों को अभिव्यक्ति प्रदान की। सूफी और भक्ति परंपराओं ने इन भाषाओं के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद को और गहरा किया।
इस लेख का उद्देश्य सल्तनत कालीन साहित्य को किसी एक भाषा या समुदाय के ढाँचे में बाँधने के बजाय, उसे ऐतिहासिक निरंतरता, संवाद और परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में समझना है। संस्कृत, अरबी, फारसी और क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यिक योगदान का समग्र विश्लेषण करते हुए यह लेख उस बौद्धिक संसार को सामने लाने का प्रयास करता है, जिसने मध्यकालीन भारतीय समाज की संरचना और आगे के साहित्यिक विकास को गहराई से प्रभावित किया।
सल्तनत काल में संस्कृत साहित्य : निरंतरता का मिथक और यथार्थ
सल्तनत कालीन साहित्य की चर्चा प्रायः फारसी और अरबी तक सीमित कर दी जाती है, जिससे यह धारणा बन जाती है कि इस काल में संस्कृत साहित्य का ह्रास हो गया था। किंतु ऐतिहासिक साक्ष्य इस सरलीकृत निष्कर्ष का समर्थन नहीं करते। वास्तव में, सल्तनत काल के दौरान संस्कृत उच्च बौद्धिक चिंतन और शास्त्रीय साहित्य की एक प्रभावी भाषा बनी रही। दर्शन, काव्य, नाटक, चिकित्सा, खगोलशास्त्र और संगीत जैसे क्षेत्रों में संस्कृत ग्रंथों का निर्माण न केवल जारी रहा, बल्कि कई मामलों में इसकी मात्रा पूर्ववर्ती कालों से अधिक प्रतीत होती है।
यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बावजूद बौद्धिक परंपराएँ स्वतः समाप्त नहीं होतीं, बल्कि वे अपने-अपने सामाजिक आश्रयों में जीवित रहती हैं।
दार्शनिक परंपरा और संस्कृत का बौद्धिक प्रभुत्व
आठवीं–नवीं शताब्दी में शंकराचार्य द्वारा स्थापित अद्वैत परंपरा के पश्चात् भी संस्कृत दर्शन की भाषा बनी रही। रामानुज, माधव और वल्लभ जैसे आचार्यों ने विशिष्टाद्वैत, द्वैत और शुद्धाद्वैत दर्शन पर संस्कृत में गहन ग्रंथों की रचना की। इन विचारों का तीव्र प्रसार और विभिन्न क्षेत्रों में उन पर हुई बहसें इस बात का प्रमाण हैं कि संस्कृत केवल एक मृत शास्त्रीय भाषा नहीं थी, बल्कि जीवंत दार्शनिक विमर्श का माध्यम बनी हुई थी।
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ये दार्शनिक परंपराएँ भारत के उन क्षेत्रों में भी सक्रिय रहीं, जो राजनीतिक रूप से मुस्लिम शासकों के अधीन थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि सल्तनत शासन ने सामान्यतः इन बौद्धिक संस्थानों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया।
शैक्षणिक संस्थान, पांडुलिपियाँ और काग़ज़ का प्रभाव
सल्तनत काल में देश के विभिन्न भागों में संस्कृत पाठशालाओं, मठों और अकादमियों का एक सघन नेटवर्क मौजूद था। इन संस्थानों ने काग़ज़ के आगमन का लाभ उठाकर पुराने ग्रंथों की नकल और प्रसार को तेज़ किया। इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप रामायण और महाभारत की जो सबसे प्राचीन उपलब्ध प्रतियाँ आज हमारे पास हैं, वे अधिकांशतः ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी या उसके बाद की हैं।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि ग्रंथों का संरक्षण और प्रसार मध्यकालीन समाज की सक्रिय प्रक्रिया थी, न कि केवल प्राचीन काल की विरासत।
धर्मशास्त्र, काव्य और व्यावहारिक ज्ञान
सल्तनत काल में संस्कृत साहित्य केवल दार्शनिक अमूर्तता तक सीमित नहीं रहा। बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच धर्मशास्त्रों पर बड़ी संख्या में टीकाएँ और संकलन तैयार किए गए। विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, जो हिंदू न्यायशास्त्र की दो प्रमुख धाराओं में से एक का आधार बनी, इसी काल की उपज थी। चौदहवीं शताब्दी के चंडेश्वर (मिथिला/बिहार) जैसे विद्वानों ने भी इस विधा को समृद्ध किया।
इसके अतिरिक्त, काव्य (काव्यात्मक आख्यान), नाटक, कथा साहित्य, चिकित्सा और खगोलशास्त्र जैसे विषयों पर भी संस्कृत में निरंतर लेखन होता रहा। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत केवल धार्मिक भाषा नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यावहारिक ज्ञान की भी भाषा थी।
क्षेत्रीय संरक्षण और जैन विद्वानों का योगदान
इस काल में संस्कृत साहित्य का मुख्य उत्पादन दक्षिण भारत में हुआ, उसके बाद बंगाल, मिथिला और पश्चिमी भारत का स्थान आता है। इन क्षेत्रों में हिंदू राजाओं का संरक्षण संस्कृत साहित्य के लिए निर्णायक रहा। जैन विद्वानों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हेमचंद्र सूरी इस संदर्भ में सबसे प्रमुख नाम हैं, जिनकी रचनाएँ व्याकरण, काव्य और दर्शन तक फैली हुई हैं।
हालाँकि, यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि संस्कृत साहित्यकारों ने समकालीन मुस्लिम समाज और शासन को लगभग नज़रअंदाज़ किया। इस्लामी ग्रंथों या फारसी साहित्य को संस्कृत में अनूदित करने के प्रयास अत्यंत सीमित रहे।
संस्कृत साहित्य की सीमाएँ और बौद्धिक आत्मसंकोच
संस्कृत साहित्य की यही विशेषता उसकी सबसे बड़ी सीमा भी बन गई। फारसी कवि जामी की यूसुफ़ और ज़ुलेखा जैसी रचना का संस्कृत अनुवाद एक दुर्लभ अपवाद था। समकालीन यथार्थ से यह दूरी वही प्रवृत्ति दर्शाती है, जिसकी ओर अल्बिरूनी ने पहले संकेत किया था, अर्थात् हिंदू विद्वानों की एक प्रकार की बौद्धिक अंतर्मुखता।
इसका परिणाम यह हुआ कि सल्तनत काल की अनेक संस्कृत रचनाएँ विषयवस्तु और दृष्टि में दोहराव का शिकार हो गईं। हालाँकि, उपलब्ध स्रोतों की सीमाओं के कारण इस प्रवृत्ति को पूर्णतः एकरूप नहीं माना जा सकता। नई सामाजिक परिस्थितियों से टकराने के बजाय उन्होंने पारंपरिक ढाँचों में ही स्वयं को सुरक्षित रखा। संभवतः यही कारण है कि इस काल का संस्कृत साहित्य, अपनी विद्वता के बावजूद, सीमित मौलिकता और नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि संस्कृत की निरंतरता सामाजिक जड़ता का संकेत नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में बौद्धिक आत्मरक्षा की रणनीति थी। कुछ इतिहासकार इस काल को सांस्कृतिक ठहराव का युग मानते हैं, किंतु उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्य इस निष्कर्ष को पूर्णतः स्वीकार नहीं करने देते।
सल्तनत काल में अरबी और फारसी साहित्य : भाषा, सत्ता और बौद्धिक संरचना
सल्तनत कालीन साहित्य की वास्तविक गतिशीलता अरबी और फारसी भाषाओं में दिखाई देती है। यद्यपि इस्लामी विश्व में सर्वाधिक साहित्यिक और दार्शनिक कृतियाँ अरबी में रची गई थीं, जो पैग़म्बर की भाषा होने के कारण स्पेन से बग़दाद तक विद्वत संवाद का माध्यम बनी, भारत में इसकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही। यहाँ अरबी का प्रयोग मुख्यतः धार्मिक और न्यायिक दायरे तक सिमटा रहा।
इसके विपरीत, फारसी का भारतीय संदर्भ में प्रवेश केवल एक नई भाषा का आगमन नहीं था, बल्कि एक संपूर्ण साहित्यिक–प्रशासनिक संस्कृति का आयात था। दसवीं शताब्दी से ही ईरान और मध्य एशिया में फारसी साहित्य का पुनरुत्थान हो चुका था, और तुर्क शासक उसी सांस्कृतिक वातावरण से भारत आए थे।
अरबी साहित्य : धार्मिक विद्वत्ता की भाषा
भारत में अरबी साहित्य का प्रयोग मुख्यतः इस्लामी विद्वानों, न्यायविदों और दार्शनिकों के सीमित वर्ग तक केंद्रित रहा। क़ुरान, हदीस, फ़िक़्ह और कलाम से संबंधित ग्रंथ अरबी में ही लिखे जाते रहे। हालाँकि, समय के साथ प्रशासनिक और व्यावहारिक आवश्यकताओं के कारण इस्लामी क़ानून के कुछ संकलन फारसी में भी तैयार किए गए।
इस प्रक्रिया के बावजूद, अरबी की प्रतिष्ठा बनी रही। मुग़ल काल में तैयार फ़तावा-ए-आलमगीरी जैसे विशाल विधिक ग्रंथ इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाते हैं। यह तथ्य इंगित करता है कि सल्तनत और उसके बाद के काल में अरबी विद्वत्ता की भाषा थी, जनसंचार की नहीं।
फारसी : सल्तनत कालीन साहित्य और प्रशासन की धुरी
फारसी को सल्तनत काल में साहित्य और प्रशासन की भाषा के रूप में अपनाया जाना एक सोची-समझी सांस्कृतिक नीति थी। तुर्क शासकों ने प्रारंभ से ही फारसी को दरबारी भाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण लाहौर फारसी साहित्य का पहला प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
भारत में फारसी लेखन की शुरुआती कृतियाँ बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हैं, किंतु मसूद साद सलमान जैसे कवियों की रचनाओं में स्थानीय परिवेश, विशेषकर लाहौर के प्रति आत्मीय लगाव दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि फारसी लेखक स्वयं को धीरे-धीरे भारतीय भू-सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ने लगे थे।
फारसी के माध्यम से भारत का मध्य एशिया और ईरान से सघन सांस्कृतिक संपर्क स्थापित हुआ। कालांतर में यह भाषा केवल प्रशासन और कूटनीति तक सीमित न रहकर, उच्च वर्गों और उनके आश्रितों की सामाजिक भाषा भी बन गई, पहले उत्तर भारत में और फिर सल्तनत के विस्तार के साथ देश के अन्य भागों में।
अमीर खुसरो : सल्तनत कालीन साहित्य का सांस्कृतिक सेतु
सल्तनत कालीन फारसी साहित्य अपने सर्वोच्च रूप में अमीर खुसरो के व्यक्तित्व में साकार होता है। 1252 ई. में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पटियाली में जन्मे खुसरो केवल दरबारी कवि नहीं थे, बल्कि वे भारत में विकसित हो रही एक नई सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि थे।
उनकी रचनाओं में भारत के प्रति गर्व और आत्मीयता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। जब वे भारत की जलवायु, यहाँ की हरियाली और ब्राह्मण विद्वानों की तुलना अरस्तू से करते हैं, तो यह केवल अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस मानसिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें तुर्क शासक वर्ग स्वयं को विदेशी विजेता के रूप में देखने से आगे बढ़ चुका था।
सबक-ए-हिंदी : फारसी साहित्य की भारतीय शैली
खुसरो का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान सबक-ए-हिंदी या “भारतीय शैली” का विकास था। उन्होंने फारसी कविता में भारतीय उपमानों, लोकजीवन, ऋतुओं और भावनात्मक गहराई को स्थान दिया। इस शैली ने फारसी को एक नई संवेदनशीलता प्रदान की, जो न तो पूरी तरह ईरानी थी और न ही केवल दरबारी।
उन्होंने ऐतिहासिक प्रेम कथाओं, प्रशस्तियों और सूफी काव्य सहित लगभग सभी काव्य विधाओं में प्रयोग किए। यह प्रयोगशीलता सल्तनत कालीन साहित्य को स्थिरता से निकालकर सृजनात्मक गतिशीलता की ओर ले जाती है।
हिंदवी, संगीत और सूफी परंपरा
खुसरो की दृष्टि केवल फारसी तक सीमित नहीं थी। उन्होंने हिंदवी और अन्य भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की और उन्हें जीवंत जनभाषा के रूप में स्वीकार किया। उनकी रचनाओं में बिखरी हुई हिंदवी पंक्तियाँ मिलती हैं, यद्यपि ख़ालिक़ बारी नामक ग्रंथ का श्रेय उन्हें देना ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध है।
एक संगीतज्ञ के रूप में खुसरो की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया की समा सभाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। यह संगति सल्तनत कालीन साहित्य को केवल लिखित परंपरा तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे श्रव्य और सामूहिक अनुभव में भी रूपांतरित करती है।
फारसी इतिहास लेखन की परंपरा
कविता के साथ-साथ फारसी में इतिहास लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा भी विकसित हुई। इस काल के प्रमुख इतिहासकारों में मिन्हाज‑उस‑सिराज, ज़ियाउद्दीन बरनी, अफीफ और इसामी प्रमुख हैं। इन इतिहासकारों ने सल्तनत की राजनीतिक घटनाओं, प्रशासनिक संरचना और दरबारी जीवन का विवरण प्रस्तुत किया।
हालाँकि, इन ग्रंथों में सत्ता-केन्द्रित दृष्टिकोण और नैतिक उपदेशात्मकता स्पष्ट है। फिर भी, सल्तनत कालीन इतिहास के लिए ये कृतियाँ अनिवार्य स्रोत बनी हुई हैं।
बरनी का इतिहास लेखन नैतिक आदर्शवाद और राजनीतिक यथार्थ के बीच तनाव को दर्शाता है, जो सल्तनत कालीन फारसी इतिहास लेखन की विशिष्ट विशेषता बन गया। इस प्रकार, अरबी और फारसी साहित्य सल्तनत कालीन साहित्य की वह धारा है जिसमें राजनीति, धर्म और संस्कृति का घनिष्ठ समन्वय दिखाई देता है। जहाँ अरबी विद्वत परंपरा की भाषा बनी रही, वहीं फारसी ने साहित्य, प्रशासन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को एक साझा मंच प्रदान किया। अमीर खुसरो के माध्यम से यह साहित्य पहली बार भारतीय समाज से भावनात्मक रूप से जुड़ता है, और यहीं से सल्तनत कालीन साहित्य एक नई दिशा ग्रहण करता है।
संस्कृत और फारसी : समानांतर परंपराएँ, सीमित संवाद
सल्तनत कालीन साहित्य की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि संस्कृत और फारसी, दोनों ही भाषाएँ भारत में संपर्क भाषाओं (link languages) के रूप में सक्रिय रहीं, किंतु उनके बीच प्रत्यक्ष संवाद अत्यंत सीमित रहा। दोनों भाषाएँ राजनीति, धर्म, दर्शन और साहित्य की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम थीं, फिर भी प्रारंभिक चरण में वे लगभग समानांतर धाराओं की तरह विकसित होती रहीं।
इस दूरी का कारण केवल भाषाई नहीं था। संस्कृत परंपरा जहाँ शास्त्रीय निरंतरता और आत्मकेन्द्रित बौद्धिक ढाँचे में कार्य कर रही थी, वहीं फारसी साहित्य सत्ता, प्रशासन और सूफी विचारधारा से गहरे जुड़कर आगे बढ़ रहा था। परिणामस्वरूप, दोनों परंपराओं के बीच संवाद की संभावनाएँ होते हुए भी वे लंबे समय तक साकार नहीं हो सकीं।
संस्कृत-फारसी अनुवाद परंपरा, अपनी सीमाओं के बावजूद, सल्तनत कालीन साहित्य में एक संक्रमणकारी भूमिका निभाती है। यह उस बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ अलग-अलग बौद्धिक संसार एक-दूसरे को पहचानने लगते हैं, भले ही पूरी तरह आत्मसात न कर सकें। इसी अधूरे संवाद की पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय भाषाओं का उभार और सूफी-भक्ति साहित्य का प्रसार और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।
अनुवाद परंपरा की शुरुआत : जिया नख्शबी का प्रयोग
संस्कृत-फारसी संवाद की पहली ठोस शुरुआत जिया नख्शबी से जुड़ी मानी जाती है। उन्होंने संस्कृत की कथा परंपरा से प्रेरित कहानियों का फारसी में अनुवाद किया, जिन्हें एक तोते द्वारा एक स्त्री को सुनाए जाने के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह रचना आगे चलकर तुतीनामा के रूप में प्रसिद्ध हुई।
तुतीनामा का महत्व केवल इसके कथानक में नहीं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि यह ग्रंथ फारसी साहित्य के माध्यम से भारतीय कथा परंपरा को तुर्की और बाद में यूरोपीय भाषाओं तक ले गया। यह सल्तनत कालीन साहित्य में संस्कृत-फारसी संवाद का पहला प्रभावी उदाहरण था।
मुहम्मद तुगलक और व्यावहारिक अनुवाद
मुहम्मद बिन तुगलक के काल में अनुवाद परंपरा को कुछ संस्थागत समर्थन मिला। तुतीनामा का अंतिम रूप इसी समय तैयार हुआ। इसके अतिरिक्त, जिया नख्शबी द्वारा प्राचीन भारतीय सेक्सोलॉजी ग्रंथ कोक शास्त्र का फारसी अनुवाद किया गया।
यह चयन स्वयं में महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि अनुवाद का उद्देश्य दार्शनिक संवाद से अधिक व्यावहारिक और दरबारी रुचियों से जुड़ा था। उच्च दर्शन या धर्मशास्त्र के स्थान पर कथात्मक और उपयोगी ग्रंथों को प्राथमिकता दी गई।
फिरोज शाह तुगलक और ज्ञानात्मक ग्रंथों का अनुवाद
फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल में अनुवाद गतिविधियों का दायरा कुछ विस्तृत हुआ। इस काल में चिकित्सा और संगीत से संबंधित संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराया गया। यह कदम सल्तनत प्रशासन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें शासन को ज्ञानआधारित वैधता देने का प्रयास किया जा रहा था।
फिर भी, इन अनुवादों की संख्या सीमित रही और वे किसी व्यापक बौद्धिक आंदोलन का रूप नहीं ले सके।
कश्मीर में संवाद का चरम : ज़ैन-उल-आबिदीन
संस्कृत–फारसी संवाद का सबसे परिपक्व रूप कश्मीर में देखने को मिलता है। सुल्तान ज़ैन-उल-आबिदीन ने सुनियोजित ढंग से संस्कृत साहित्य के अनुवाद को संरक्षण दिया। उनके आदेश पर राजतरंगिणी और महाभारत जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ फारसी में अनूदित किए गए।
इसके अतिरिक्त, चिकित्सा और संगीत से संबंधित संस्कृत ग्रंथों को भी फारसी पाठकों के लिए उपलब्ध कराया गया। यह प्रयास सल्तनत कालीन साहित्य में सबसे गंभीर और व्यापक अनुवाद परियोजना माना जा सकता है।
अनुवाद परंपरा की सीमाएँ और ऐतिहासिक मूल्यांकन
इन सभी प्रयासों के बावजूद, संस्कृत–फारसी संवाद की सीमाएँ स्पष्ट थीं। अधिकांश अनुवाद शासकीय संरक्षण पर निर्भर थे और व्यक्तिगत पहल से आगे नहीं बढ़ सके। न तो संस्कृत विद्वानों ने फारसी साहित्य को गंभीरता से अपनाया, और न ही फारसी साहित्यकारों ने संस्कृत दर्शन की जटिल परंपरा में गहरी रुचि दिखाई।
इस बौद्धिक दूरी का परिणाम यह हुआ कि सल्तनत कालीन साहित्य में संस्कृतिक समन्वय आंशिक और असमान रहा। जहाँ फारसी साहित्य भारतीय समाज से भावनात्मक और भाषाई स्तर पर जुड़ने लगा, वहीं संस्कृत साहित्य काफी हद तक आत्मकेन्द्रित बना रहा। यही वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, जिसने आगे चलकर क्षेत्रीय भाषाओं, भक्ति आंदोलन और सूफी परंपराओं को सांस्कृतिक संवाद का प्रमुख माध्यम बना दिया।
क्षेत्रीय भाषाओं का उदय : सल्तनत कालीन साहित्य की निर्णायक दिशा
सल्तनत कालीन साहित्य का सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में दिखाई देता है। यद्यपि हिंदी, बंगाली, मराठी जैसी भाषाओं की जड़ें आठवीं शताब्दी या उससे पहले तक जाती हैं, और तमिल जैसी भाषाएँ उससे भी प्राचीन हैं, किंतु मध्यकाल में इन भाषाओं का साहित्यिक परिपक्वता की ओर बढ़ना एक नया ऐतिहासिक चरण था।
यह विकास केवल भाषाई नहीं था; यह सामाजिक संरचना में आए परिवर्तनों से जुड़ा था। संस्कृत की विशिष्ट विद्वत भाषा के रूप में प्रतिष्ठा धीरे-धीरे सीमित होती गई, और जनसामान्य की अभिव्यक्ति के लिए स्थानीय भाषाएँ अधिक उपयुक्त सिद्ध होने लगीं। सल्तनत कालीन साहित्य में यही वह बिंदु है जहाँ भाषा सत्ता से हटकर समाज की ओर झुकती है।
सल्तनत कालीन साहित्य में सूफी संतों की भूमिका भक्ति आंदोलन से भिन्न होते हुए भी उससे गहरे रूप से जुड़ी हुई थी। सूफी परंपरा ने फारसी साहित्यिक रूपों को स्थानीय भाषाओं में ढालकर उन्हें जनसामान्य के लिए ग्राह्य बनाया।
अमीर खुसरो और क्षेत्रीय भाषाओं की ऐतिहासिक चेतना
चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अमीर खुसरो द्वारा विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का उल्लेख सिंधी, लाहौरी, कश्मीरी, गुजराती, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, बंगाली, अवध और हिंदवी, इस तथ्य का प्रमाण है कि ये भाषाएँ केवल लोकबोलियाँ नहीं थीं, बल्कि जीवन के सामान्य कार्यों में गहराई से रची-बसी थीं।
खुसरो का यह अवलोकन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आधुनिक भारतीय भाषाओं के उदय को एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में दर्ज करता है, न कि किसी आकस्मिक विकास के रूप में।
भक्ति आंदोलन और लोकभाषाओं का साहित्यिक रूप
क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यिक विकास में भक्ति आंदोलन की भूमिका निर्णायक रही। संत कवियों ने संस्कृत के स्थान पर जनभाषाओं को अपनाया और उन्हें साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। कई क्षेत्रों में इन्हीं संतों ने इन भाषाओं को पहली बार सुव्यवस्थित साहित्यिक रूप प्रदान किया।
यह प्रवृत्ति सल्तनत कालीन साहित्य को अभिजात्य दायरे से बाहर निकालकर सामाजिक धरातल पर ले आती है। यहाँ साहित्य धार्मिक अनुष्ठान से अधिक संवाद का माध्यम बनता है।
पूर्वी उत्तर भारत में सूफी साहित्य
पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुल्ला दाऊद और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे सूफी कवियों ने हिंदी में रचनाएँ कीं। उन्होंने सूफी दर्शन प्रेम, आत्मशुद्धि और ईश्वर से एकत्व को ऐसी भाषा और प्रतीकों में प्रस्तुत किया, जिसे सामान्य व्यक्ति आसानी से समझ सके।
इन कवियों ने फारसी काव्यरूप मसनवी को हिंदी साहित्य में लोकप्रिय बनाया। यह प्रयोग सल्तनत कालीन साहित्य में सांस्कृतिक संवाद का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ विदेशी साहित्यिक रूप स्थानीय संवेदना के साथ घुल-मिल जाता है।
प्रशासन, संरक्षण और क्षेत्रीय साहित्य
क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में राजनीतिक संरचनाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी। तुर्क-पूर्व काल में ही कई क्षेत्रों में तमिल, कन्नड़ और मराठी जैसी भाषाएँ प्रशासनिक कार्यों में प्रयुक्त होती थीं, संस्कृत के साथ-साथ। यह परंपरा सल्तनत काल में भी जारी रही। दिल्ली सल्तनत में हिंदी जानने वाले राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति इसी का प्रमाण है।
सल्तनत के विघटन के बाद क्षेत्रीय राज्यों में फारसी के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं का प्रशासनिक उपयोग बढ़ा। दक्षिण भारत में विजयनगर शासकों के संरक्षण में तेलुगु साहित्य फला-फूला, जबकि दक्खन में बहमनी और बाद में बीजापुर दरबार में मराठी का प्रयोग प्रशासनिक भाषा के रूप में हुआ।
कुछ मुस्लिम शासकों ने इन भाषाओं को साहित्यिक संरक्षण भी दिया। बंगाल के सुल्तान नुसरत शाह के संरक्षण में महाभारत और रामायण का बंगाली में अनुवाद हुआ, और मलाधर बसु ने भागवत का अनुवाद किया। यह संरक्षण सल्तनत कालीन साहित्य को सांप्रदायिक खाँचों से बाहर निकालने में सहायक सिद्ध हुआ। इस प्रकार, जहाँ संस्कृत और फारसी अभिजात्य वर्गों की भाषाएँ बनी रहीं, वहीं क्षेत्रीय भाषाएँ मध्यकालीन समाज की वास्तविक संवाहक शक्ति बनकर उभरीं।
सल्तनत कालीन साहित्य : समग्र ऐतिहासिक मूल्यांकन
सल्तनत कालीन साहित्य का समग्र अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि यह काल न तो केवल सांस्कृतिक विघटन का युग था और न ही मात्र दरबारी साहित्य तक सीमित कोई संकीर्ण चरण। इसके विपरीत, यह वह समय था जब विभिन्न भाषाई और बौद्धिक परंपराएँ संस्कृत, फारसी और क्षेत्रीय भाषाएँ अपने-अपने सामाजिक आधारों पर सक्रिय रहीं और भारतीय समाज के बौद्धिक जीवन को निरंतरता प्रदान करती रहीं।
संस्कृत साहित्य ने शास्त्रीय ज्ञान और दार्शनिक विमर्श की परंपरा को बनाए रखा, भले ही वह समकालीन राजनीतिक यथार्थ से आंशिक रूप से विमुख रहा। फारसी साहित्य ने प्रशासन, इतिहास लेखन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को संगठित रूप दिया, यद्यपि उसमें सत्ता-केन्द्रित दृष्टिकोण की सीमाएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। वहीं क्षेत्रीय भाषाओं और सूफी-भक्ति साहित्य ने जनसामान्य की संवेदनाओं को स्वर देकर साहित्य को अभिजात्य दायरे से बाहर निकाला।
इसी अंतःक्रिया और असमान संवाद के माध्यम से सल्तनत कालीन साहित्य ने वह आधार तैयार किया, जिस पर आगे चलकर मुग़ल काल का समृद्ध साहित्यिक संसार और आधुनिक भारतीय भाषाओं की परंपरा विकसित हुई। इस प्रक्रिया को पूर्ण सांस्कृतिक समन्वय कहना शायद अतिशयोक्ति होगी, किंतु इसे केवल टकराव के रूप में देखना भी ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त है। इस दृष्टि से, सल्तनत कालीन साहित्य भारतीय मध्यकालीन इतिहास का केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि संस्कृति, सत्ता और समाज के बीच चल रहे बौद्धिक संघर्ष और समन्वय का दर्पण है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
