मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति : अभियान, प्रयोग और ऐतिहासिक परिणाम

मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति से संबद्ध शासक चित्रण
1534 ई० में अंकित मुहम्मद बिन तुगलक का चित्र

भूमिका : मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति

 

मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति दिल्ली सल्तनत के इतिहास की उन नीतियों में से थी, जिनका उद्देश्य दक्षिणी राज्यों को केवल करदाता नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से सल्तनत के अधीन प्रशासनिक इकाइयों में परिवर्तित करना था। इस नीति के अंतर्गत सैन्य अभियान, प्रांतीय पुनर्गठन, राजधानी परिवर्तन और केंद्रीकृत शासन की स्थापना जैसे प्रयोग किए गए।

अलाउद्दीन खिलजी की सीमित अधीनता-नीति से भिन्न, मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण भारत पर सीधा और स्थायी नियंत्रण स्थापित करना चाहता था। किंतु भौगोलिक दूरी, प्रशासनिक दुर्बलता, सत्ताधिकारियों की महत्वाकांक्षा और निरंतर विद्रोहों के कारण यह नीति सफल नहीं हो सकी। इसी कारण इतिहासकारों के बीच यह प्रश्न उठता रहा है कि मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति क्यों सफल नहीं हो सकी, और किन संरचनात्मक कारणों ने इसे व्यवहार में अस्थिर बना दिया।

यह लेख दक्षिण भारत में तुगलक अभियानों, प्रशासनिक प्रयोगों, विद्रोहों और उनके दीर्घकालिक परिणामों का स्रोत-आधारित और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

 

तुगलक काल में दक्षिण भारत नीति की पृष्ठभूमि

 

तुगलक काल की दक्षिण भारत नीति को खलजी युग की विस्तारवादी परंपरा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अलाउद्दीन खिलजी ने जहाँ दक्षिणी राज्यों से केवल अधीनता और वार्षिक कर लेकर संतोष किया था, वहीं गयासुद्दीन तुगलक ने यह अनुभव किया कि दक्षिण में केवल नाममात्र की अधीनता बनाए रखना दीर्घकाल में सल्तनत की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी कारण तुगलक शासकों ने दक्षिणी प्रदेशों को प्रत्यक्ष प्रशासन के अंतर्गत लाने की नीति अपनाई।

फ़रिश्ता, बरनी और इसामी जैसे समकालीन स्रोत संकेत देते हैं कि अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का प्रभुत्व शिथिल पड़ गया था। अनेक शासकों ने कर देना बंद कर दिया, दिल्ली सल्तनत के अधिकारियों को निष्कासित किया और स्वतंत्र सत्ता के प्रयास आरंभ कर दिए। ऐसी परिस्थिति में गयासुद्दीन तुगलक ने दक्षिण नीति में मौलिक परिवर्तन करने का निर्णय लिया।

 

प्रमुख घटनाओं की समयरेखा: एक नजर में

नीचे दी गई टेबल मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति की प्रमुख घटनाओं का संक्षिप्त ओवरव्यू प्रदान करती है।

मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति की प्रमुख घटनाएं

घटना/नीतिवर्षप्रमुख विवरणमुख्य प्रभाव/परिणाम
वारंगल प्रथम अभियान1321 ई.उलुग खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) का नेतृत्व, घेराबंदी, आंतरिक षड्यंत्र से असफलतासैन्य सबक, दूसरा अभियान की तैयारी, दक्षिण प्रतिरोध की शुरुआत
वारंगल द्वितीय अभियान1323 ई.पुनः घेराबंदी, प्रताप रुद्रदेव का आत्मसमर्पण, तेलंगाना विलयवारंगल का नाम सुल्तानपुर, दिल्ली सल्तनत में दक्षिण विस्तार, प्रशासनिक पुनर्गठन
गुर्शप विद्रोह1327 ई.गुर्शप (बहमान) का स्वतंत्रता घोषणा, महत्वाकांक्षा और दक्षिण समृद्धिबहमनी राज्य की पृष्ठभूमि, दक्षिण में सत्ता कमजोर
दौलताबाद राजधानी परिवर्तन1327-1329 ई.देवगिरि को दौलताबाद बनाना, जनता स्थानांतरणप्रशासनिक संकट, विद्रोह बढ़ावा, उत्तर-दक्षिण संतुलन असफल
सत्ताधिकारी विद्रोह1340s ई.मालवा/देवगिरि में भ्रष्टाचार, हसन गंगू का नेतृत्वदेवगिरि पतन, बहमनी राज्य स्थापना (1346 ई.), साम्राज्य विघटन
विजयनगर उदय1336 ई.हरिहर-बुक्का की नियुक्ति, हिंदू शक्ति पुनरुत्थानदक्षिण में स्वतंत्र राज्य, दिल्ली सल्तनत के लिए स्थायी चुनौती
मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति का क्षेत्रीय विस्तार मानचित्र
मुहम्मद बिन तुगलक के अंतर्गत दिल्ली सल्तनत

वारंगल अभियान : तेलंगाना विजय (1321-1323 ई०)

 

वारंगल अभियान मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति की प्रथम निर्णायक अभिव्यक्ति था। इसका उद्देश्य केवल काकतीय शासक प्रताप रुद्रदेव को दंडित करना नहीं, बल्कि तेलंगाना क्षेत्र को स्थायी रूप से दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित करना था। यह अभियान खलजी कालीन अस्थायी अधीनता की नीति से आगे बढ़कर सीधे साम्राज्य-विस्तार का प्रयास था।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वारंगल दक्षिण भारत का एक सुदृढ़ दुर्ग-नगर था, जिसकी सामरिक स्थिति और आर्थिक समृद्धि उसे सल्तनत के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाती थी। इसी कारण गयासुद्दीन तुगलक ने इस अभियान का नेतृत्व अपने पुत्र उलुग खाँ को सौंपा।

 

अभियान की तैयारी और उद्देश्य

उत्तर भारत में सत्ता को संगठित करने के पश्चात गयासुद्दीन तुगलक ने बदायूँ, अवध, कड़ा और चंदेरी जैसे क्षेत्रों से विशाल सेना एकत्रित की। उलुग खाँ को इस अभियान का सेनापति नियुक्त किया गया। उसका लक्ष्य केवल सैन्य विजय तक सीमित नहीं था। इस अभियान के माध्यम से तेलंगाना की राजनीतिक स्वतंत्रता को समाप्त करना, काकतीय शक्ति को निर्णायक रूप से कुचलना और दक्षिण भारत में स्थायी दिल्ली सल्तनत प्रशासन की नींव रखना उसका प्रमुख उद्देश्य था। उस समय वारंगल में काकतीय वंश के शासक प्रताप रुद्रदेव का शासन था, जिसने अलाउद्दीन खिलजी के समय अधीनता स्वीकार करने के बाद पुनः स्वतंत्रता घोषित कर दी थी और खराज देना बंद कर दिया था।

 

प्रथम घेराबंदी और असफलता

उलुग खाँ दिल्ली से प्रस्थान कर देवगिरि पहुँचा, जहाँ उसे मराठा क्षेत्र की दिल्ली सल्तनत की सेना का सहयोग मिला। मार्ग में किसी संगठित प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। वारंगल पहुँचकर उसने उस विशाल और दुर्गम किले की घेराबंदी आरंभ की, जो दक्षिण भारत के सबसे सुदृढ़ दुर्गों में गिना जाता था।

लगभग आठ महीनों तक घेराबंदी जारी रही, किंतु सफलता नहीं मिली। रसद संकट, संचार-व्यवस्था का टूटना और आंतरिक षड्यंत्रों ने दिल्ली सल्तनत की सेना को कमजोर कर दिया। अंततः उलुग खाँ को घेरा उठाकर देवगिरि की ओर पीछे हटना पड़ा।

 

ऐतिहासिक स्रोतों में विफलता की व्याख्या

वारंगल की प्रथम असफलता के कारणों पर समकालीन इतिहासकारों में मतभेद दिखाई देते हैं।

  • बरनी के अनुसार, उबैद खाँ और शेखज़ादा दमश्की की कपटपूर्ण गतिविधियों ने सेना का मनोबल तोड़ दिया।
  • याहिया बिन अहमद सरहिंदी के अनुसार, इनका उद्देश्य उलुग खाँ की हत्या तक था।
  • इब्नबतूता एक भिन्न मत प्रस्तुत करता है, जिसमें उलुग खाँ स्वयं सुल्तान की मृत्यु की अफवाह फैलवाता है।
  • इसामी, जो दक्षिण का निवासी था, इस घटना को सबसे अधिक यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करता है। इसामी इसे ज्योतिषीय भविष्यवाणी और अफवाह-प्रसार से जोड़ता है।

इन सभी वृत्तांतों के तुलनात्मक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि संचार व्यवस्था का टूटना, अफवाहें और आंतरिक षड्यंत्र, सैनिक मनोबल के पतन ही वारंगल की प्रथम असफलता के प्रमुख कारण थे। अंततः उलुग खाँ को देवगिरि तक पीछे हटना पड़ा।

 

वारंगल पर दूसरा आक्रमण और तेलंगाना का विलय

 

वारंगल की प्रथम असफलता ने गयासुद्दीन तुगलक और उलुग खाँ को निरुत्साहित नहीं किया। इसके विपरीत, इस विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि दक्षिण भारत को सल्तनत में स्थायी रूप से सम्मिलित करना है, तो अधिक संगठित सैन्य रणनीति और दृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होगी। इसामी के विवरण से ज्ञात होता है कि उलुग खाँ लगभग चार महीने तक देवगिरि में ठहरा रहा और उत्तरी भारत से सहायक सेना की प्रतीक्षा करता रहा।

यह तथ्य दक्षिण भारत के तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य की एक बड़ी कमजोरी को भी उजागर करता है। इतने लंबे समय तक देवगिरि में शाही सेना की उपस्थिति के बावजूद दक्षिण के शासक न तो संगठित हो सके और न ही उलुग खाँ को चारों ओर से घेरकर पराजित करने का साहस कर पाए। यह उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता और पारस्परिक विभाजन का प्रमाण था।

 

दूसरी घेराबंदी की रणनीति

दूसरे अभियान में उलुग खाँ पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क था। उसने संचार-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए मार्ग में स्थित किलों जैसे बीदर और बोधन पर अधिकार कर वहाँ दिल्ली सल्तनत की टुकड़ियाँ तैनात कीं। इसका उद्देश्य यह था कि सेना की रसद, सूचना और सहायता-व्यवस्था बाधित न हो।

पाँच महीने की घेराबंदी के बाद वारंगल की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। दुर्ग के भीतर भूख और महामारी फैल चुकी थी। अंततः काकतीय शासक प्रताप रुद्रदेव ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसे उसके परिवार और आश्रितों सहित दिल्ली भेजा गया, किंतु दिल्ली पहुँचने से पूर्व ही उसकी मृत्यु हो गई। कुछ इतिहासकार इसे स्वाभाविक मृत्यु मानते हैं, जबकि कुछ इसे मान-हानि से बचने के लिए आत्महत्या के रूप में देखते हैं।

 

तेलंगाना का प्रशासनिक पुनर्गठन

वारंगल विजय के पश्चात तेलंगाना को दिल्ली सल्तनत का अभिन्न अंग बना दिया गया। वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर रखा गया और वहाँ सल्तनत का प्रशासन की स्थापना की गई। उलुग खाँ स्वयं कुछ समय तक वहीं ठहरा और शांति-व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया।

यह उल्लेखनीय है कि इस चरण में दिल्ली सल्तनत की नीति अपेक्षाकृत संतुलित और व्यवहारिक दिखाई देती है। अनेक पुराने हिंदू अधिकारियों को उनके पदों पर बनाए रखा गया, मंदिरों और कलाकृतियों को नष्ट नहीं किया गया और स्थानीय अभिजात वर्ग को प्रशासन में सम्मिलित किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि इस समय उद्देश्य केवल दमन नहीं, बल्कि स्थायी शासन की स्थापना था। फिर भी, इतनी सावधानियों के बावजूद तेलंगाना में दिल्ली सल्तनत की सत्ता पूर्णतः स्थिर नहीं हो सकी। यह क्षेत्र आगे चलकर विद्रोहों का केंद्र बना।

 

दक्षिण भारत में तुगलक विस्तार और उसकी सीमाएँ

 

तेलंगाना की विजय के बाद मुहम्मद बिन तुगलक की विस्तारवादी आकांक्षाएँ और भी प्रबल हो गईं। उसने द्वारसमुद्र, माबर और अनैगोंडी जैसे दक्षिणी राज्यों के विरुद्ध अभियान चलाए। कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ मानो दिल्ली सल्तनत का प्रभुत्व पूरे दक्षिण भारत पर स्थापित हो जाएगा। इस प्रकार तुगलक विस्तार के ये अभियान यह संकेत देते हैं कि मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति अपने उद्देश्यों में स्पष्ट होने के बावजूद व्यवहार में टिकाऊ सिद्ध नहीं हो सकी।

किन्तु ये सफलताएँ क्षणिक सिद्ध हुईं। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत की सेना आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे प्रशासनिक बोझ, दूरी की समस्या और स्थानीय प्रतिरोध भी बढ़ता गया। शीघ्र ही इन क्षेत्रों में विद्रोह भड़क उठे और दिल्ली सल्तनत का नियंत्रण ढीला पड़ने लगा।

 

प्रारंभिक विद्रोह और प्रशासनिक संकट

 तेलंगाना और अन्य दक्षिणी क्षेत्रों की विजय के पश्चात यह स्पष्ट हो गया कि सैन्य सफलता प्रशासनिक स्थिरता की गारंटी नहीं होती। दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत की सत्ता भौगोलिक दूरी, स्थानीय सामाजिक संरचना और सीमित संसाधनों के कारण आरंभ से ही कमजोर बनी रही। दिल्ली सल्तनत के अधिकारियों को विशाल और दूरस्थ प्रांतों का प्रशासन संभालना पड़ा, जहाँ न तो केंद्रीय निगरानी प्रभावी थी और न ही स्थानीय समाज में सुल्तान के प्रति स्वाभाविक निष्ठा विकसित हो सकी। इन्हीं परिस्थितियों के परिणामस्वरूप मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति की सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी सामने आईं और दक्षिण भारत में विद्रोहों की श्रृंखला का आधार बनीं।

इस परिस्थिति में दक्षिण भारत के अनेक सूबेदार और सामंत स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होने लगे। राजस्व-संग्रह में अनियमितता बढ़ी, सैनिक अनुशासन शिथिल हुआ और प्रशासनिक भ्रष्टाचार फैलने लगा। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर प्रारंभिक विद्रोहों का आधार बनीं, जिनमें बहाउद्दीन गुर्शप का विद्रोह विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

 

बहाउद्दीन गुर्शप का विद्रोह

समकालीन स्रोतों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल का पहला बड़ा विद्रोह उसके चचेरे भाई बहाउद्दीन गुर्शप द्वारा किया गया। सरहिंदी और इब्नबतूता के विवरणों से संकेत मिलता है कि गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद गुर्शप ने नए सुल्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से इंकार कर दिया।

इसामी का मत कुछ भिन्न है। उसके अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक ने स्वयं गुर्शप को ‘गुर्शप’ की उपाधि देकर सागर का सूबेदार नियुक्त किया था, जहाँ उसने प्रशासनिक और सैनिक क्षमता का परिचय दिया। किंतु दरबार की राजनीति, अमीरों की ईर्ष्या और अपेक्षित पदोन्नति न मिलने से वह असंतुष्ट हो गया।

गुर्शप के विद्रोह के पीछे एक और व्यावहारिक कारण भी था, दक्षिण का समृद्ध और दूरस्थ सूबा किसी भी महत्वाकांक्षी सेनापति को स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का अवसर प्रदान करता था। उसने दक्षिण के शक्तिशाली सामंतों से संपर्क स्थापित किया और स्वतंत्र शासन की घोषणा कर दी।

 

कंपिली संघर्ष और उसका ऐतिहासिक महत्व

गुर्शप के विद्रोह ने कंपिली के शासक को भी दिल्ली सल्तनत की सत्ता के विरुद्ध खड़ा कर दिया। प्रारंभिक अभियानों में दिल्ली सल्तनत की सेना की पराजय से दक्षिण भारत में यह धारणा फैल गई कि दिल्ली की शक्ति को चुनौती दी जा सकती है। यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।

कंपिली के राजा ने अपनी रक्षा के लिए दुर्गों को सुदृढ़ किया और अंततः भीषण संघर्ष के बाद वीरगति प्राप्त की। जौहर और अंतिम युद्ध के वर्णन इस संघर्ष को दक्षिण भारत में हिंदू प्रतिरोध का प्रतीक बना देते हैं। यद्यपि दिल्ली सल्तनत की सेना अंततः विजयी रही, किंतु यह विजय प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महँगी सिद्ध हुई।

 

राजधानी परिवर्तन : देवगिरि (दौलताबाद) और दक्षिण भारत नीति

 

मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति का सबसे साहसिक और साथ ही सबसे विवादास्पद प्रयोग राजधानी परिवर्तन था। देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद रखा गया और उसे दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत ने शासन का केंद्र बनाने का प्रयास किया गया। यह निर्णय आकस्मिक नहीं था। इसके पीछे यह धारणा कार्य कर रही थी कि जब तक सुल्तान स्वयं दक्षिण के निकट नहीं रहेगा, तब तक वहाँ के सूबेदारों, सत्ताधिकारियों और स्थानीय शासकों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना संभव नहीं होगा।

दक्षिण भारत में निरंतर उठते विद्रोह, कर-वसूली में अनियमितता और प्रशासनिक शिथिलता ने सुल्तान को यह विश्वास दिला दिया था कि दिल्ली से बैठकर इतने दूरस्थ प्रदेशों पर शासन करना व्यावहारिक नहीं है। इसी कारण देवगिरि को राजधानी बनाकर दक्षिण और उत्तर, दोनों पर समान दृष्टि रखने का प्रयास किया गया। प्रो. इरफ़ान हबीब का यह कथन कि मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण को अपने किसी भी समकालीन से अधिक जानता था, इसी संदर्भ में अर्थपूर्ण प्रतीत होता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजधानी परिवर्तन से वह परिणाम प्राप्त नहीं हो सका जिसकी अपेक्षा की गई थी।

किन्तु व्यवहार में यह योजना अनेक कठिनाइयों से घिर गई। राजधानी परिवर्तन से उत्तर भारत में असंतोष फैला, जनसामान्य को भारी कष्ट उठाना पड़ा और प्रशासनिक व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव पड़ा। स्वयं सुल्तान भी उत्तर भारत के विद्रोहों और अकालों के कारण दौलताबाद में स्थायी रूप से नहीं रह सका। परिणामस्वरूप न तो उत्तर की समस्याएँ सुलझ सकीं और न ही दक्षिण में स्थिर शासन की स्थापना हो सकी।

 

राजधानी परिवर्तन के उद्देश्य

राजधानी परिवर्तन के पीछे अनेक स्पष्ट उद्देश्य निहित थे। सुल्तान का विश्वास था कि दक्षिणी विद्रोहों पर त्वरित नियंत्रण तभी संभव है जब शासन का केंद्र दक्षिण के समीप हो। देवगिरि को उत्तर और दक्षिण के बीच संपर्क का केंद्र बनाकर वह शक्तिशाली सूबेदारों की बढ़ती स्वतंत्र प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहता था और पूरे साम्राज्य में संतुलित प्रशासन की स्थापना करना उसका लक्ष्य था।

 

व्यावहारिक विफलता के कारण

यद्यपि राजधानी परिवर्तन के उद्देश्य तार्किक प्रतीत होते थे, किंतु व्यवहार में यह योजना अनेक कठिनाइयों से घिर गई। उत्तर भारत में निरंतर विद्रोह और अकाल की स्थिति बनी रही, जिससे प्रशासनिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा। विशाल जनसंख्या का जबरन स्थानांतरण जनसामान्य के असंतोष का कारण बना। इन परिस्थितियों के कारण सुल्तान स्वयं भी दौलताबाद में अधिक समय तक नहीं ठहर सका। परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में वह प्रशासनिक स्थिरता स्थापित नहीं हो सकी जिसकी अपेक्षा की गई थी।

 

दक्षिण भारत में सत्ताधिकारी अमीर और प्रशासनिक संकट

 

दक्षिण भारत की समस्याओं को और अधिक जटिल बनाने में सत्ताधिकारी अमीरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। मुहम्मद बिन तुगलक की उदार नीति के कारण मध्य एशिया से बड़ी संख्या में महत्वाकांक्षी व्यक्ति भारत आए। सुल्तान ने उन्हें सेना और प्रशासन के उच्च पद प्रदान किए। इन्हें समकालीन स्रोतों में प्रायः ‘सादा अमीर’ या ‘सत्ताधिकारी अमीर’ कहा गया है।

बरनी के विवरण से संकेत मिलता है कि ये अधिकारी केवल सैनिक नायक नहीं थे, बल्कि उन्हें प्रशासनिक और राजस्व-संबंधी दायित्व भी सौंपे गए थे। प्रत्येक सत्ताधिकारी के अधीन सैनिक रहते थे और उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे कर वसूल कर शांति बनाए रखें। किंतु व्यवहार में ये अमीर अत्यंत स्वार्थी और महत्वाकांक्षी सिद्ध हुए।

विदेशी होने के कारण इनके मन में न तो स्थानीय समाज के प्रति संवेदनशीलता थी और न ही सुल्तान के प्रति स्वाभाविक निष्ठा। इन्हें प्रायः गुजरात, मालवा और दक्षिण भारत जैसे दूरस्थ प्रांतों में नियुक्त किया गया, जहाँ केंद्रीय नियंत्रण पहले से ही कमजोर था। इससे देशी अमीरों और विदेशी सत्ताधिकारियों के बीच ईर्ष्या और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। धीरे-धीरे यही वर्ग सुल्तान के लिए सबसे गंभीर समस्या बन गया।

 

सत्ताधिकारी विद्रोह और देवगिरि का पतन

 

मालवा और देवगिरि में सत्ताधिकारियों द्वारा किए गए विद्रोहों ने दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत की सत्ता की जड़ों को हिला दिया। अजीज खुम्मार द्वारा सत्ताधिकारियों के दमन ने स्थिति को सुधारने के स्थान पर और अधिक बिगाड़ दिया। भय और अविश्वास का वातावरण फैल गया और सत्ताधिकारियों ने संगठित होकर खुला विद्रोह आरंभ कर दिया।

देवगिरि में कुतुलुग खाँ की उदारता का लाभ उठाकर प्रशासनिक भ्रष्टाचार फैल गया और राजकोष रिक्त होने लगा। जब सुल्तान गुजरात के विद्रोहों में व्यस्त था, तब देवगिरि के सत्ताधिकारियों ने विद्रोह कर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। यद्यपि सुल्तान ने कुछ समय के लिए देवगिरि पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया, किंतु विद्रोह की जड़ें समाप्त नहीं हो सकीं।

इसी बीच हसन गंगू का उदय हुआ, जिसने अवसर का लाभ उठाकर देवगिरि को दिल्ली सल्तनत से अलग कर दिया। 1346 ई० में उसने अलाउद्दीन हसन बहमन शाह की उपाधि धारण कर बहमनी राज्य की स्थापना की। इस घटना के साथ ही मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति को निर्णायक आघात पहुँचा।

 

विजयनगर राज्य का उदय और दक्षिण में शक्ति-संतुलन

 

दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत की सत्ता के क्षीण होने के साथ ही हिंदू शक्ति के पुनरुत्थान की प्रक्रिया भी तेज हो गई। कंपिली के पतन के समय हरिहर और बुक्का को बंदी बनाकर दिल्ली भेजा गया था। बाद में दक्षिण में अशांति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सुल्तान ने इन्हीं के सहयोग से शांति स्थापित करने का प्रयास किया।

हरिहर को दक्षिण में शांति-व्यवस्था से जुड़ा दायित्व सौंपा गया और बुक्का को मंत्री बनाया गया। प्रारंभ में हरिहर ने सुल्तान के प्रति निष्ठा प्रदर्शित की, किंतु वस्तुतः वह अपनी स्वतंत्र शक्ति को संगठित करने में लगा रहा। स्थानीय जनता ने इसे विदेशी सत्ता के अंत की शुरुआत के रूप में देखा। धर्मगुरुओं और मंत्रियों के परामर्श से 1336 ई० में विजयनगर राज्य की स्थापना हुई।

मुहम्मद बिन तुगलक की शक्ति के क्षीण होते ही हरिहर ने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार प्रारंभ कर दिया। कुछ ही वर्षों में विजयनगर दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता बनकर उभरा और दिल्ली सल्तनत के लिए एक स्थायी चुनौती बन गया।

 

समग्र परिप्रेक्ष्य में दक्षिण भारत नीति

 

इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति अत्यंत व्यापक, साहसिक और प्रयोगधर्मी थी। उसने दक्षिण को केवल कर देने वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि सल्तनत का अभिन्न अंग बनाने का प्रयास किया। किंतु भौगोलिक दूरी, प्रशासनिक दुर्बलता, सत्ताधिकारियों की महत्वाकांक्षा और निरंतर विद्रोहों ने इस नीति को सफल नहीं होने दिया। दक्षिण भारत में अभियानों, प्रशासनिक प्रयोगों और विद्रोहों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति के कारण और परिणाम परस्पर गहराई से जुड़े हुए थे।

दक्षिण भारत की घटनाओं का प्रभाव उत्तर भारत पर भी पड़ा। मालवा, गुजरात और सिंध में विद्रोह फैल गए और प्रशासनिक ढाँचा शिथिल हो गया। अंततः न तो दक्षिण को ही नियंत्रित किया जा सका और न ही उत्तर में स्थिरता बनी रह सकी।

 

निष्कर्ष

 

मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति दिल्ली सल्तनत के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। यह नीति जहाँ एक ओर सुल्तान की दूरदृष्टि और महत्वाकांक्षा को प्रकट करती है, वहीं दूसरी ओर मध्यकालीन भारत में साम्राज्य-निर्माण की व्यावहारिक सीमाओं को भी उजागर करती है। दक्षिण भारत में विजयनगर और बहमनी जैसे स्वतंत्र राज्यों का उदय इसी नीति की अप्रत्यक्ष परिणति था, जिसने आगे चलकर भारतीय इतिहास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण भारत नीति न तो केवल एक असफल प्रयोग थी और न ही पूर्णतः अव्यावहारिक, बल्कि यह मध्यकालीन भारत में साम्राज्य-निर्माण की सीमाओं को उजागर करने वाली एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।

 

 

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