कृष्णदेव राय का शासनकाल – ऐतिहासिक महत्व और पृष्ठभूमि
कृष्णदेव राय का शासनकाल (1509-1529 ई.) विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में केवल एक शासक के दीर्घकालीन शासन का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह वह चरण है जहाँ राजनीतिक शक्ति, प्रशासनिक दक्षता, सैन्य संगठन और सांस्कृतिक चेतना एक साथ परिपक्व रूप में दिखाई देती है। दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास में इस कालखंड को सामान्यतः विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण युग कहा जाता है, और इसके पीछे ठोस ऐतिहासिक कारण निहित हैं।
15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक विजयनगर साम्राज्य निरंतर आंतरिक संघर्षों और बाह्य दबावों से जूझ रहा था। संगम और सालुव वंशों के बाद तुलुव वंश के शासनकाल में साम्राज्य को पुनः संगठित करने का प्रयास किया गया, किंतु राजनीतिक स्थिरता अभी भी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हो पाई थी। ऐसे समय में कृष्णदेव राय का सत्ताारोहण हुआ, जब साम्राज्य की सीमाएँ असुरक्षित थीं और केंद्रीय सत्ता को बार-बार चुनौती दी जा रही थी।

तुलुव वंश और विजयनगर की राजनीतिक स्थिति
कृष्णदेव राय तुलुव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था और वह वीर नरसिंह का छोटा भाई था। वीर नरसिंह ने विजयनगर की राजनीतिक एकता को आंशिक रूप से पुनर्स्थापित किया था, परंतु उसकी मृत्यु के समय साम्राज्य की स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई थी। कई सामंत शासक केंद्र की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, जबकि दक्कन और उड़ीसा की शक्तियाँ विजयनगर की सीमाओं पर दबाव बना रही थीं।
तुलुव वंश की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह विजयनगर की वैध शासक परंपरा के रूप में स्वयं को स्थापित करे। कृष्णदेव राय का शासनकाल इसी वैधता-संघर्ष का निर्णायक चरण सिद्ध हुआ, जिसमें उसने सैन्य सफलता, सुशासन और सांस्कृतिक संरक्षण तीनों के माध्यम से तुलुव वंश को स्थायित्व प्रदान किया।
सत्ताारोहण के समय आंतरिक और बाह्य चुनौतियाँ
1509 ई. में सिंहासन पर बैठते समय कृष्णदेव राय को अनेक जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा। आंतरिक रूप से उम्मत्तूर जैसे सामंत स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार कर रहे थे, जिससे केंद्रीय सत्ता की प्रतिष्ठा कमजोर हो रही थी। दूसरी ओर, उड़ीसा के गजपति शासक विजयनगर के पूर्वी और तटीय क्षेत्रों पर अधिकार जमाए हुए थे और अपनी साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ा रहे थे।
उत्तर दिशा में बहमनी साम्राज्य का विघटन हो चुका था, किंतु उसके स्थान पर उभरे उत्तराधिकारी राज्य विशेषतः बीजापुर विजयनगर साम्राज्य के लिए नए खतरे बन गए थे। पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगालियों की बढ़ती उपस्थिति ने भी राजनीतिक समीकरणों को जटिल बना दिया था, क्योंकि वे व्यापार और सैन्य सहायता के माध्यम से क्षेत्रीय राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहते थे।
ऐतिहासिक दृष्टि से शासनकाल का महत्व
इन परिस्थितियों में कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल समस्याओं से निपटने की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि यह राज्य-निर्माण (State Formation) का एक सुविचारित प्रयास था। उसने विजयनगर को एक ऐसी शक्ति में परिवर्तित किया, जो न केवल दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित कर सके, बल्कि दक्कन और समुद्री शक्तियों के साथ संतुलित संबंध भी बनाए रखे।
इसी कारण इतिहासकार कृष्णदेव राय के शासनकाल को विजयनगर साम्राज्य के विकास की पराकाष्ठा मानते हैं। यह कालखंड अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें राजनीतिक एकीकरण, सैन्य विस्तार, प्रशासनिक सुधार और सांस्कृतिक संरक्षण सभी प्रमुख विषय एक साथ समाहित हैं।
सत्ताारोहण और प्रारंभिक राजनीतिक परिस्थितियाँ
कृष्णदेव राय का शासनकाल जिस ऐतिहासिक संदर्भ में आरंभ हुआ, वह विजयनगर साम्राज्य के लिए अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक था। 1509 ई. में सिंहासन पर बैठते समय उसे एक ऐसे साम्राज्य की बागडोर संभालनी पड़ी, जो बाह्य आक्रमणों, आंतरिक असंतोष और बदलते राजनीतिक समीकरणों से घिरा हुआ था। इस चरण में उसकी सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि केंद्रीय सत्ता की वैधता और प्रभावशीलता को पुनः स्थापित करना थी।
वीर नरसिंह की मृत्यु और सत्ता का संक्रमण
वीर नरसिंह ने तुलुव वंश की सत्ता को सुदृढ़ करने का प्रयास अवश्य किया था, किंतु उसकी असमय मृत्यु ने शासन-तंत्र को एक बार फिर अस्थिर कर दिया। सत्ता का संक्रमण उस समय हुआ, जब विजयनगर साम्राज्य किसी मजबूत और निर्णायक नेतृत्व की अपेक्षा कर रहा था। कृष्णदेव राय का सिंहासनारूढ़ होना इसी आवश्यकता की पूर्ति के रूप में देखा जा सकता है।
इतिहासकारों के अनुसार, कृष्णदेव राय का सत्ताारोहण अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, किंतु उसके पीछे छिपी चुनौतियाँ शीघ्र ही प्रकट होने लगीं। कई सामंतों ने इसे सत्ता-संघर्ष का अवसर समझा और केंद्र की अवज्ञा प्रारंभ कर दी।
उम्मत्तूर का सामंत और आंतरिक अस्थिरता
सत्ताारोहण के समय सबसे गंभीर आंतरिक समस्या उम्मत्तूर के सामंत शासक की थी, जो स्वयं को लगभग स्वतंत्र राजा के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। यह स्थिति केवल एक स्थानीय विद्रोह नहीं थी, बल्कि केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का प्रतीक बन चुकी थी। यदि इस प्रकार की प्रवृत्तियों को शीघ्र नियंत्रित नहीं किया जाता, तो विजयनगर साम्राज्य का विघटन अपरिहार्य हो सकता था।
कृष्णदेव राय ने प्रारंभिक वर्षों में इस समस्या को गंभीरता से लिया और स्पष्ट कर दिया कि सामंतों की स्वायत्तता सीमित होगी तथा राज्य की सर्वोच्च सत्ता राजा में निहित रहेगी। यह नीति आगे चलकर उसकी प्रशासनिक सफलता की आधारशिला बनी।
दक्कन और पूर्वी भारत से उत्पन्न बाह्य दबाव
बाह्य मोर्चे पर स्थिति और भी जटिल थी। उत्तर दिशा में बहमनी साम्राज्य का अंत हो चुका था, किंतु उसके स्थान पर उभरे उत्तराधिकारी राज्य, विशेषतः बीजापुर विजयनगर की सीमाओं पर निगाहें गड़ाए हुए थे। रायचूर दोआब जैसे क्षेत्र इन संघर्षों का केंद्र बनते जा रहे थे।
पूर्वी भारत में उड़ीसा के गजपति शासक न केवल तटीय क्षेत्रों पर अधिकार बनाए हुए थे, बल्कि विजयनगर की आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाकर अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे। यह स्थिति कृष्णदेव राय के लिए एक स्पष्ट संकेत थी कि यदि शीघ्र और निर्णायक कार्रवाई नहीं की गई, तो साम्राज्य की क्षेत्रीय अखंडता खतरे में पड़ सकती है।
प्रारंभिक राजनीतिक रणनीति और दृष्टिकोण
इन परिस्थितियों में कृष्णदेव राय ने अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी नीति अपनाई। उसने पहले आंतरिक स्थिरता को प्राथमिकता दी और उसके बाद बाह्य शक्तियों से निपटने की रणनीति बनाई। यह दृष्टिकोण उसके शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था यानी आंतरिक संगठन के बिना बाह्य विस्तार नहीं।
इसी संतुलित नीति के कारण कृष्णदेव राय का शासनकाल आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। सत्ताारोहण के शुरुआती वर्षों में अपनाई गई यही रणनीति उसके दीर्घकालीन शासन की सफलता का आधार बनी।

कृष्णदेव राय का शासनकाल और दक्कन की राजनीति
कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका वास्तविक स्वरूप उसके प्रारंभिक सैन्य अभियानों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में दक्कन की राजनीति अत्यंत अस्थिर थी। बहमनी साम्राज्य के विघटन के बाद दक्कन में अनेक स्वतंत्र सल्तनतें उभर आई थीं, जिनके बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता था। इस राजनीतिक अस्थिरता ने विजयनगर साम्राज्य के लिए अवसर भी प्रदान किए और चुनौतियाँ भी।
बहमनी उत्तराधिकारी राज्यों की स्थिति
बहमनी साम्राज्य के पतन के पश्चात बीदर, बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और बरार जैसे राज्य स्वतंत्र हो गए। इन राज्यों की प्रारंभिक कमजोरी के बावजूद उनकी साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ शीघ्र ही प्रकट होने लगीं। विशेष रूप से बीजापुर की सल्तनत, जो रायचूर दोआब जैसे उपजाऊ और रणनीतिक क्षेत्र पर अधिकार जमाने के लिए प्रयत्नशील थी, विजयनगर साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी। कृष्णदेव राय ने इस स्थिति को केवल सीमा-विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे दक्कन की शक्ति-संरचना में विजयनगर के प्रभुत्व को स्थापित करने का अवसर माना।
1509-1510 ई. का बीदर अभियान
1509-10 ई. में बीदर के सुल्तान महमूद शाह ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से विजयनगर पर आक्रमण किया। यह आक्रमण कृष्णदेव राय के शासनकाल की पहली बड़ी परीक्षा थी। अदोनी के निकट हुए युद्ध में विजयनगर की सेनाओं ने सुल्तानी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। यह विजय केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि इससे नव-आरूढ़ शासक के रूप में कृष्णदेव राय की प्रतिष्ठा भी स्थापित हुई।
यूसुफ़ आदिल की मृत्यु और बीजापुर की अव्यवस्था
इसी संघर्ष के दौरान बीजापुर के सुल्तान यूसुफ़ आदिल की मृत्यु हो गई, जिससे बीजापुर सल्तनत में राजनीतिक अव्यवस्था फैल गई। उसका उत्तराधिकारी इस्माइल आदिल शाह उस समय अल्पवयस्क था, जिससे राज्य की सैन्य क्षमता अस्थायी रूप से कमजोर पड़ गई। कृष्णदेव राय ने इस स्थिति को अत्यंत कुशलता से भांप लिया और रणनीतिक रूप से इसका लाभ उठाने की योजना बनाई।
यह घटना कृष्णदेव राय के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता को उजागर करती है, वह केवल युद्ध जीतने वाला सेनानायक नहीं था, बल्कि अपने शत्रुओं की राजनीतिक कमजोरियों को पहचानने वाला कुशल रणनीतिकार भी था।
रायचूर दोआब पर अधिकार (1512 ई.)
1512 ई. में कृष्णदेव राय ने रायचूर दोआब पर अधिकार कर लिया। यह क्षेत्र विजयनगर और बीजापुर दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह न केवल उपजाऊ था, बल्कि दक्कन और दक्षिण भारत के बीच संपर्क मार्ग भी प्रदान करता था। रायचूर पर अधिकार ने विजयनगर की आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ किया और सैन्य दृष्टि से उसे एक मजबूत अग्रिम मोर्चा प्रदान किया।
इस विजय के साथ ही कृष्णदेव राय का शासनकाल दक्कन की राजनीति में निर्णायक शक्ति के रूप में उभरने लगा। यह स्पष्ट हो गया कि विजयनगर अब केवल एक क्षेत्रीय राज्य नहीं, बल्कि दक्कन की राजनीति को दिशा देने वाली प्रमुख सत्ता बन चुका है।
‘यवनराज्य स्थापनाचार्य’ की उपाधि और बहमनी राजनीति में हस्तक्षेप
कृष्णदेव राय का शासनकाल दक्कन की राजनीति में केवल सैन्य टकरावों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सक्रिय रूप से पड़ोसी राज्यों की आंतरिक राजनीति को भी प्रभावित किया। बहमनी साम्राज्य के विघटन के बाद उत्पन्न सत्ता-संघर्षों में उसका हस्तक्षेप एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति का परिणाम था, जिसका उद्देश्य विजयनगर साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करना और दक्कन में शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ना था।
गुलबर्गा और बीदर की राजनीतिक स्थिति
बहमनी साम्राज्य के पतन के बाद बीदर में महमूद शाह नाममात्र का सुल्तान रह गया था, जबकि वास्तविक सत्ता अमीर अली बरीद जैसे शक्तिशाली सरदारों के हाथों में चली गई थी। इस आंतरिक कमजोरी ने बहमनी राज्य को प्रभावहीन बना दिया था और दक्कन की राजनीति को अस्थिर कर दिया था। ऐसी स्थिति में बीदर और गुलबर्गा के क्षेत्र विजयनगर के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गए।
महमूद शाह की पुनर्स्थापना और राजनीतिक उद्देश्य
कृष्णदेव राय ने इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बीदर पर आक्रमण किया और बहमनी सुल्तान महमूद शाह को अमीर अली बरीद के प्रभाव से मुक्त कराया। इसके पश्चात उसने महमूद शाह को पुनः सिंहासन पर बैठाया। यह कार्य मात्र उदारता का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक गहरी राजनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम था।
महमूद शाह को पुनर्स्थापित करके कृष्णदेव राय ने बहमनी सत्ता को विजयनगर का ऋणी बना दिया और दक्कन की राजनीति में अपने प्रभाव को वैध रूप से स्थापित किया। इससे बीजापुर जैसे आक्रामक राज्यों को यह स्पष्ट संदेश गया कि विजयनगर केवल सीमाओं की रक्षा करने वाला राज्य नहीं, बल्कि दक्कन की राजनीति को नियंत्रित करने वाली शक्ति है।
‘यवनराज्य स्थापनाचार्य’-उपाधि का ऐतिहासिक अर्थ
इस राजनीतिक उपलब्धि के पश्चात कृष्णदेव राय ने ‘यवनराज्य स्थापनाचार्य’ की उपाधि धारण की। इस उपाधि का आशय किसी धार्मिक संघर्ष से नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षक के रूप में उसकी भूमिका से था। वह स्वयं को दक्कन में स्थिरता स्थापित करने वाले शासक के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, जिसने एक पतनशील मुस्लिम राज्य को पुनः संगठित किया।
इतिहासकारों के अनुसार यह उपाधि विजयनगर शासकों की पारंपरिक नीति, यानी आवश्यकता पड़ने पर दक्कन की सल्तनतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का ही परिष्कृत रूप थी। इससे कृष्णदेव राय के शासनकाल की कूटनीतिक परिपक्वता स्पष्ट होती है।
दक्कन की शक्ति-संरचना पर प्रभाव
इस हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि दक्कन की राजनीति में शक्ति-संतुलन अस्थायी रूप से विजयनगर के पक्ष में झुक गया। बीजापुर और अन्य उत्तराधिकारी राज्यों को प्रत्यक्ष रूप से विजयनगर की शक्ति का अनुभव हुआ, जिससे वे तत्काल बड़े सैन्य अभियानों से बचने लगे।
इस प्रकार ‘यवनराज्य स्थापनाचार्य’ की उपाधि केवल एक गौरवसूचक पदवी नहीं थी, बल्कि यह कृष्णदेव राय के शासनकाल की उस नीति का प्रतीक थी, जिसमें सैन्य शक्ति, कूटनीति और वैधता तीनों का संतुलित प्रयोग किया गया।
आंतरिक विद्रोहों का दमन और प्रशासनिक स्थिरता
कृष्णदेव राय के शासन की प्रकृति केवल बाह्य शत्रुओं पर विजय का इतिहास नहीं है, बल्कि यह आंतरिक अनुशासन और प्रशासनिक स्थिरता की स्थापना का भी महत्वपूर्ण चरण है। दक्कन और उड़ीसा में अभियानों से पूर्व कृष्णदेव राय ने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि जब तक साम्राज्य के भीतर सत्ता सुदृढ़ नहीं होगी, तब तक दीर्घकालीन विस्तार और सुरक्षा संभव नहीं है। इसी कारण उसने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में आंतरिक विद्रोहों को प्राथमिकता के आधार पर नियंत्रित किया।
उम्मत्तूर के सामंत का विद्रोह
उम्मत्तूर का सामंत शासक विजयनगर की केंद्रीय सत्ता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था और स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार कर रहा था। यह विद्रोह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं था, बल्कि यह अन्य सामंतों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता था। यदि इसे समय रहते दबाया नहीं जाता, तो साम्राज्य की प्रशासनिक एकता गंभीर संकट में पड़ सकती थी।
कृष्णदेव राय ने निर्णायक सैन्य कार्रवाई करते हुए उम्मत्तूर के शासक गंगराजा को पराजित किया और श्रीरंगम् तथा शिवसुंदरम् जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को विजयनगर के प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि सामंतों की सत्ता राजा की अधीनता में ही वैध है।
सामंतों पर नियंत्रण और नायक व्यवस्था
उम्मत्तूर की विजय के बाद कृष्णदेव राय ने नायक व्यवस्था को पुनः संगठित किया। सामंतों और प्रांतीय अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे सैन्य और राजस्व संबंधी दायित्वों का निर्वहन केंद्रीय सत्ता के निर्देशन में करेंगे। यह व्यवस्था विजयनगर प्रशासन की रीढ़ थी और इसके प्रभावी संचालन से साम्राज्य की आंतरिक स्थिरता सुनिश्चित हुई।
कृष्णदेव राय का शासनकाल इस दृष्टि से विशेष है कि उसने नायकों को पूर्णतः समाप्त नहीं किया, बल्कि उन्हें एक नियंत्रित ढांचे में समाहित किया। इससे स्थानीय प्रशासन की दक्षता बनी रही और केंद्र की सर्वोच्चता भी सुरक्षित रही।
आंतरिक शांति और बाह्य अभियानों की तैयारी
उम्मत्तूर विद्रोह के दमन के बाद विजयनगर साम्राज्य में अपेक्षाकृत शांति स्थापित हो गई। यह आंतरिक स्थिरता आगे चलकर कृष्णदेव राय के उड़ीसा और दक्कन अभियानों की आधारशिला बनी। अब वह अपनी सेनाओं और संसाधनों को बाह्य शत्रुओं के विरुद्ध केंद्रित कर सकता था, बिना इस चिंता के कि पीछे से कोई विद्रोह उठ खड़ा होगा। इतिहासकारों का मानना है कि यदि कृष्णदेव राय ने पहले आंतरिक विद्रोहों को नियंत्रित न किया होता, तो उसका शासनकाल इतना दीर्घ और सफल नहीं हो पाता।
शासन की वैधता और प्रजा का विश्वास
आंतरिक व्यवस्था की स्थापना ने कृष्णदेव राय को केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि एक वैध और उत्तरदायी शासक के रूप में भी स्थापित किया। सामंतों पर नियंत्रण, न्यायपूर्ण प्रशासन और स्थानीय अत्याचारों पर अंकुश से प्रजा में उसके प्रति विश्वास उत्पन्न हुआ।
इस प्रकार, आंतरिक विद्रोहों का दमन कृष्णदेव राय के शासनकाल का एक अनिवार्य चरण था, जिसने आगे आने वाले सैन्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
उड़ीसा अभियान और गजपति शासकों से संघर्ष
कृष्णदेव राय का शासनकाल जिस बिंदु पर विजयनगर साम्राज्य की वास्तविक साम्राज्यवादी शक्ति को प्रकट करता है, वह उसका उड़ीसा अभियान है। आंतरिक विद्रोहों के दमन और दक्कन में प्रारंभिक सफलताओं के बाद अब वह पूर्वी भारत की ओर उन्मुख हुआ, जहाँ उड़ीसा के गजपति शासक लंबे समय से विजयनगर की सीमाओं और तटीय क्षेत्रों के लिए चुनौती बने हुए थे। यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय प्रभुत्व का प्रश्न नहीं था, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत की राजनीतिक दिशा को निर्धारित करने वाला संघर्ष था।
गजपति शासकों की विस्तारवादी नीति
उड़ीसा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव एक महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली शासक था। उसके शासनकाल में गजपति राज्य ने कृष्णा नदी तक अपने प्रभाव का विस्तार कर लिया था और कई तटीय दुर्गों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। यह स्थिति विजयनगर साम्राज्य की सुरक्षा और समुद्री व्यापार दोनों के लिए गंभीर खतरा थी।
गजपतियों की नीति स्पष्ट रूप से साम्राज्यवादी थी और वे विजयनगर की अस्थिरता का लाभ उठाकर पूर्वी तट पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। कृष्णदेव राय ने इस चुनौती को टालने के बजाय उसका निर्णायक समाधान करने का निश्चय किया।
1513-1518 ई. के सैन्य अभियान
1513 से 1518 ई. के बीच कृष्णदेव राय ने उड़ीसा के विरुद्ध क्रमिक रूप से चार सैन्य अभियान किए। इन अभियानों में विजयनगर की संगठित और अनुशासित सेनाओं ने गजपति सेना को अनेक मोर्चों पर पराजित किया। एक-एक करके उदयगिरि, कोंडविदु और अन्य दुर्ग विजयनगर के अधिकार में आ गए। इन विजयों का महत्व केवल क्षेत्रीय विस्तार तक सीमित नहीं था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि विजयनगर साम्राज्य अब न केवल दक्कन, बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति को भी प्रभावित करने की स्थिति में पहुँच चुका है।
कटक तक विजयनगर की विजय यात्रा
लगातार पराजयों के बाद विजयनगर की सेनाएँ गजपतियों की राजधानी कटक तक जा पहुँचीं। यह उड़ीसा के लिए एक निर्णायक क्षण था। प्रतापरुद्र देव को यह स्वीकार करना पड़ा कि अब युद्ध जारी रखना उसके राज्य के अस्तित्व के लिए घातक हो सकता है। इस चरण पर कृष्णदेव राय की नीति केवल सैन्य दमन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी। यह उसके शासनकाल की व्यावहारिक राजनीति का स्पष्ट उदाहरण है।
वैवाहिक संधि और राजनीतिक समझौता
अंततः गजपति शासक ने संधि की याचना की और अपनी पुत्री का विवाह कृष्णदेव राय के साथ कर दिया। इस वैवाहिक संधि के माध्यम से शांति स्थापित हुई और दोनों राज्यों के बीच स्थायी संघर्ष का अंत हुआ। इसके प्रत्युत्तर में कृष्णदेव राय ने कृष्णा नदी के उत्तर में स्थित विजित प्रदेश गजपति शासक को लौटा दिए।
यह समझौता मध्यकालीन भारतीय राजनीति में वैवाहिक कूटनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ युद्ध में विजय के बाद भी दीर्घकालीन स्थिरता को प्राथमिकता दी गई। इससे कृष्णदेव राय का युग केवल विजयों का नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता और संतुलन का भी प्रतीक बन गया।
गोलकुंडा की चुनौती और कुतुबशाही संघर्ष
कृष्णदेव राय का शासनकाल जिस प्रकार दक्कन और उड़ीसा की राजनीति को प्रभावित कर रहा था, उसी क्रम में गोलकुंडा की कुतुबशाही सल्तनत भी विजयनगर साम्राज्य के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरी। उड़ीसा अभियान में विजयनगर की व्यस्तता का लाभ उठाकर गोलकुंडा के सुल्तान कुली कुतुब शाह ने आंध्र क्षेत्र में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। यह संघर्ष केवल सीमाओं का प्रश्न नहीं था, बल्कि दक्षिण-पूर्वी भारत में प्रभुत्व की होड़ का हिस्सा था।
कुतुबशाही विस्तार की नीति
कुली कुतुब शाह ने अपनी सैन्य शक्ति का प्रयोग करते हुए विजयनगर की सीमा से लगे पांगल और गुंटूर के किलों पर अधिकार कर लिया। इसके अतिरिक्त उसने गजपति शासक को विवश कर कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्य के प्रदेश गोलकुंडा को सौंपने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार गोलकुंडा ने न केवल क्षेत्रीय विस्तार किया, बल्कि विजयनगर के प्रभाव क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी किया। यह स्थिति कृष्णदेव राय के लिए स्पष्ट चेतावनी थी कि यदि कुतुबशाही शक्ति को शीघ्र नियंत्रित नहीं किया गया, तो पूर्वी दक्कन में विजयनगर की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
कोंडविदु पर कुतुबशाही अधिकार
गोलकुंडा की बढ़ती शक्ति का सबसे गंभीर प्रमाण तब मिला, जब कुतुबशाही सेनाओं ने कोंडविदु जैसे महत्वपूर्ण दुर्ग पर अधिकार कर लिया। कोंडविदु का पतन केवल एक सैन्य घटना नहीं था, बल्कि यह विजयनगर की प्रतिष्ठा पर भी आघात था। यह दुर्ग लंबे समय से विजयनगर के अधीन रहा था और इसके हाथ से निकलने का अर्थ था क्षेत्रीय नियंत्रण में स्पष्ट कमी।
सालुव तिम्म की नियुक्ति और सैन्य प्रतिक्रिया
इस चुनौती का सामना करने के लिए कृष्णदेव राय ने अपने विश्वासपात्र सेनापति सालुव तिम्म को कुतुबशाही मोर्चे पर भेजा। सालुव तिम्म ने संगठित रणनीति के साथ कुतुबशाही सेनाओं पर आक्रमण किया और उन्हें निर्णायक रूप से पराजित किया। उसके नेतृत्व में विजयनगर की सेनाओं ने पांगल, गुंटूर और अन्य पूर्ववर्ती क्षेत्रों को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। यह अभियान इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल राजा की व्यक्तिगत वीरता पर नहीं, बल्कि सक्षम सेनापतियों और सुव्यवस्थित सैन्य नेतृत्व पर आधारित था।
पूर्वी दक्कन में विजयनगर की पुनर्स्थापना
सालुव तिम्म की विजय के बाद पूर्वी दक्कन में विजयनगर की स्थिति पुनः सुदृढ़ हो गई। गोलकुंडा की सल्तनत को यह स्पष्ट संदेश मिल गया कि विजयनगर की सीमाओं में हस्तक्षेप बिना गंभीर परिणामों के संभव नहीं है। इस संघर्ष के बाद कुछ समय तक कुतुबशाही शक्ति आक्रामक नीति अपनाने से बचती रही।
इस प्रकार गोलकुंडा के विरुद्ध सफलता ने कृष्णदेव राय के शासनकाल को एक बार फिर यह सिद्ध करने का अवसर दिया कि विजयनगर साम्राज्य न केवल पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर, बल्कि पूर्वी दक्कन में भी निर्णायक शक्ति बना हुआ है।
बीजापुर के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष और रायचूर का पुनः अधिग्रहण
कृष्णदेव राय का शासनकाल जिस संघर्ष के लिए विशेष रूप से जाना जाता है, वह है बीजापुर सल्तनत के साथ रायचूर दोआब को लेकर हुआ निर्णायक संघर्ष। रायचूर दोआब न केवल उपजाऊ क्षेत्र था, बल्कि यह दक्कन और दक्षिण भारत के बीच सामरिक संपर्क का मुख्य मार्ग भी था। इसी कारण बीजापुर और विजयनगर दोनों के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना हुआ था।
इस्माइल आदिल शाह की आक्रामक नीति
यूसुफ़ आदिल की मृत्यु के बाद बीजापुर का सुल्तान इस्माइल आदिल शाह हुआ, जिसने धीरे-धीरे अपनी सत्ता को सुदृढ़ किया और रायचूर दोआब पर पुनः अधिकार जमाने की योजना बनाई। उसने विजयनगर की पूर्वी व्यस्तताओं का लाभ उठाते हुए रायचूर के किले पर अधिकार कर लिया। यह घटना विजयनगर के लिए केवल एक क्षेत्रीय हानि नहीं थी, बल्कि उसकी सैन्य प्रतिष्ठा के लिए भी चुनौती थी। कृष्णदेव राय ने इस आक्रमण को अस्थायी घटना मानकर छोड़ने के बजाय इसे निर्णायक संघर्ष में बदलने का निश्चय किया।
विजयनगर की सैन्य तैयारी और रणनीति
रायचूर अभियान से पूर्व कृष्णदेव राय ने व्यापक सैन्य तैयारी की। सेना का पुनर्गठन किया गया, तोपखाने को सुदृढ़ किया गया और रसद की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। इस अभियान में राजा स्वयं नेतृत्व कर रहा था, जबकि रणनीतिक योजना और सैन्य संचालन में उसके विश्वसनीय मंत्री और सेनापति सालुव तिम्म की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि विजयनगर का स्वर्ण काल (कृष्णदेव राय) केवल व्यक्तिगत वीरता पर आधारित नहीं था, बल्कि संगठित सैन्य तंत्र और अनुभवी अधिकारियों पर निर्भर था।
रायचूर का निर्णायक युद्ध
रायचूर के युद्ध में विजयनगर और बीजापुर की सेनाओं के बीच घोर संघर्ष हुआ। विजयनगर की संगठित पैदल सेना, घुड़सवार दस्ते और तोपखाने ने बीजापुर की सेना को पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। अंततः रायचूर का किला पुनः विजयनगर के अधिकार में आ गया।
इस विजय का प्रभाव केवल एक दुर्ग की प्राप्ति तक सीमित नहीं था। इससे दक्कन की राजनीति में यह स्पष्ट संदेश गया कि विजयनगर साम्राज्य अब भी सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति बना हुआ है।
बीजापुर पर आक्रमण और गुलबर्गा अभियान
रायचूर विजय के पश्चात विजयनगर की सेनाएँ बीजापुर की ओर बढ़ीं और नगर को क्षति पहुँचाई। इसके बाद लौटते समय उन्होंने गुलबर्गा के किले पर आक्रमण किया और वहाँ कैद तीन बहमनी शहजादों को मुक्त कराया। यह कार्य केवल मानवीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक के रूप में भी महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इससे बहमनी परंपरा के प्रति विजयनगर की संरक्षक भूमिका पुनः रेखांकित हुई।
1520 ई. तक विजयनगर की अजेय शक्ति
इन सभी सफलताओं के परिणामस्वरूप 1520 ई. तक कृष्णदेव राय ने विजयनगर के प्रमुख शत्रुओं बीजापुर, गोलकुंडा और गजपति को पराजित या नियंत्रित कर लिया। इस चरण पर विजयनगर साम्राज्य दक्कन और दक्षिण भारत की निर्विवाद शक्ति बन चुका था। इस प्रकार, बीजापुर के विरुद्ध यह निर्णायक संघर्ष कृष्णदेव राय के शासनकाल का वह मोड़ था, जिसने विजयनगर को राजनीतिक और सैन्य शिखर पर पहुँचा दिया।
पुर्तगालियों के साथ संबंध और विदेशी नीति
कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल स्थल-आधारित सैन्य संघर्षों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वह काल था जब हिंद महासागर की राजनीति और यूरोपीय शक्तियों की उपस्थिति ने दक्षिण भारत के राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दी। पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगालियों के आगमन ने विजयनगर साम्राज्य के सामने एक नई कूटनीतिक चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत किए।
प्रारंभिक तटस्थ नीति और पुर्तगाली प्रस्ताव
शासनकाल के आरंभिक वर्षों में कृष्णदेव राय ने पुर्तगालियों के प्रति सतर्क और तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया। 1510 ई. में पुर्तगाली गवर्नर अल्फ़ोंसो द अलबुकर्क ने अपने दूत फ़ादर लुई को विजयनगर भेजकर कालीकट के जमोरिन के विरुद्ध सैन्य सहयोग तथा मत्कल और मंगलौर के बीच एक पुर्तगाली कारखाने की स्थापना की अनुमति माँगी।
कृष्णदेव राय ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट उत्तर देकर दूत को लौटा दिया। यह निर्णय इस तथ्य को दर्शाता है कि वह किसी भी विदेशी शक्ति को विजयनगर की राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की अनुमति देने के पक्ष में नहीं था।
गोआ पर पुर्तगाली अधिकार और बदलती परिस्थितियाँ
स्थिति उस समय बदलने लगी जब पुर्तगालियों ने गोआ पर अधिकार कर लिया और फ़ारस की खाड़ी तथा अरब सागर के महत्वपूर्ण बंदरगाह उनके नियंत्रण में आ गए। इसके साथ ही अरबी और फ़ारसी घोड़ों का व्यापार, जो मध्यकालीन भारतीय सेनाओं की शक्ति का आधार था, लगभग पूर्णतः पुर्तगालियों के हाथों में चला गया।
इन परिस्थितियों में कृष्णदेव राय के लिए पुर्तगालियों से पूर्ण दूरी बनाए रखना व्यावहारिक नहीं रह गया। उसे यह समझ आ गया कि घोड़ों की निरंतर आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए पुर्तगालियों के साथ सीमित सहयोग आवश्यक है।
व्यावहारिक मैत्री और पारस्परिक हित
कृष्णदेव राय का शासनकाल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उसने पुर्तगालियों के साथ व्यावहारिक मैत्री की नीति अपनाई। विजयनगर को उच्च गुणवत्ता के घोड़े, आग्नेयास्त्रों का ज्ञान और समुद्री व्यापार में सहायता प्राप्त हुई, जबकि पुर्तगालियों को दक्षिण भारतीय बंदरगाहों पर व्यापारिक सुविधाएँ मिलीं। यह संबंध किसी औपनिवेशिक अधीनता का नहीं, बल्कि पारस्परिक हितों पर आधारित था। विजयनगर की संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता इस मैत्री से किसी भी रूप में प्रभावित नहीं हुई।
पुर्तगाली यात्रियों के विवरण और विजयनगर की समृद्धि
कृष्णदेव राय के शासनकाल में अनेक पुर्तगाली व्यापारी और यात्री विजयनगर आए। उनके विवरणों में विजयनगर नगर की समृद्धि, विशाल बाजारों, सुव्यवस्थित सड़कों और राज्य की आर्थिक शक्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है। ये विवरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कृष्णदेव राय के काल में विजयनगर न केवल दक्षिण भारत, बल्कि संपूर्ण एशिया के प्रमुख नगरों में से एक था।
विदेशी नीति का ऐतिहासिक मूल्यांकन
विदेशी नीति के क्षेत्र में कृष्णदेव राय का दृष्टिकोण न तो अंध-समर्थन का था और न ही पूर्ण विरोध का। उसने परिस्थितियों के अनुसार नीति बदली और विदेशी शक्ति को अपने राज्यहित के अधीन रखा। इसी संतुलित नीति के कारण उसका शासनकाल समुद्री व्यापार और सैन्य संसाधनों, दोनों दृष्टियों से लाभकारी सिद्ध हुआ। इस प्रकार, पुर्तगालियों के साथ संबंध कृष्णदेव राय के शासनकाल की कूटनीतिक परिपक्वता और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
कृष्णदेव राय एक महान सेनानायक के रूप में
कृष्णदेव राय का शासनकाल भारतीय मध्यकालीन इतिहास में जिस विशेषता के लिए सबसे अधिक जाना जाता है, वह है उसका असाधारण सैन्य नेतृत्व। वह केवल युद्ध जीतने वाला राजा नहीं था, बल्कि एक ऐसा सेनानायक था जिसने सेना के संगठन, अनुशासन और मनोबल, तीनों को नई ऊँचाई तक पहुँचाया। उसके सैन्य अभियानों की निरंतर सफलता इस बात का प्रमाण है कि उसकी शक्ति केवल संख्या पर नहीं, बल्कि रणनीति और नेतृत्व पर आधारित थी।
सेना का संगठन और संरचना
कृष्णदेव राय ने विजयनगर की सेना को सुव्यवस्थित और बहुआयामी बनाया। पैदल सेना, घुड़सवार सेना और तोपखाने, तीनों का संतुलित प्रयोग उसके अभियानों की विशेषता थी। उसने विदेशी घोड़ों की आपूर्ति सुनिश्चित कर घुड़सवार सेना की गुणवत्ता में सुधार किया और तोपखाने को युद्धनीति का अनिवार्य अंग बनाया।
सेना का संगठन केवल युद्ध के समय सक्रिय नहीं होता था, बल्कि शांति काल में भी नियमित प्रशिक्षण और निरीक्षण के माध्यम से उसे युद्ध-तैयार रखा जाता था। यह व्यवस्था दक्कन की अन्य सल्तनतों की तुलना में विजयनगर को स्पष्ट बढ़त प्रदान करती थी।
राजा की प्रत्यक्ष भूमिका और नेतृत्व शैली
कृष्णदेव राय स्वयं युद्धभूमि में सेना का नेतृत्व करता था। उसकी उपस्थिति सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने का सबसे प्रभावी साधन थी। समकालीन स्रोतों के अनुसार, वह युद्ध के समय न केवल आदेश देता था, बल्कि सैनिकों की कठिनाइयों को प्रत्यक्ष रूप से समझता और साझा करता था। यह नेतृत्व शैली उसे अन्य शासकों से अलग करती है। उसकी सेना उसे केवल राजा नहीं, बल्कि अपना सेनानायक मानती थी, और यही भावना युद्धों में उसकी विजय का एक प्रमुख कारण बनी।
सैनिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण
कृष्णदेव राय के शासनकाल की एक उल्लेखनीय विशेषता उसका सैनिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण है। युद्ध में घायल सैनिकों की चिकित्सा और देखभाल की व्यवस्था पर वह व्यक्तिगत रूप से ध्यान देता था। वीरता दिखाने वाले सैनिकों को सम्मान और पुरस्कार दिए जाते थे, जिससे सेना में निष्ठा और समर्पण की भावना उत्पन्न होती थी। यह नीति केवल नैतिक नहीं थी, बल्कि व्यावहारिक भी थी, क्योंकि इससे सेना में अनुशासन और स्थायित्व बना रहता था।
सैन्य सफलता के कारणों का मूल्यांकन
इतिहासकारों के अनुसार कृष्णदेव राय की सैन्य सफलता के प्रमुख कारण थे, स्पष्ट लक्ष्य, सुदृढ़ संगठन, अनुभवी सेनापति और स्वयं राजा का सक्रिय नेतृत्व। उसने युद्ध को केवल बल-प्रयोग का साधन नहीं, बल्कि राज्य-नीति का विस्तार माना।
इसी कारण कृष्णदेव राय का शासनकाल सैन्य दृष्टि से विजयनगर साम्राज्य की पराकाष्ठा माना जाता है। उसकी सेनानायक के रूप में भूमिका ने न केवल तत्काल विजय सुनिश्चित की, बल्कि विजयनगर को दीर्घकाल तक एक अजेय शक्ति के रूप में स्थापित किया।
प्रशासक के रूप में कृष्णदेव राय
कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल सैन्य विजय और विस्तार का इतिहास नहीं है, बल्कि यह कुशल, उत्तरदायी और जनोन्मुख प्रशासन का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक सेनानायक के रूप में उसकी सफलता जितनी उल्लेखनीय थी, उतनी ही महत्त्वपूर्ण उसकी प्रशासनिक दक्षता भी थी। वास्तव में, विजयनगर साम्राज्य की दीर्घकालीन स्थिरता उसके सुशासन की ही देन थी।
‘अमुक्तमाल्यद’ और शासन-दर्शन
कृष्णदेव राय की प्रशासनिक सोच का सर्वश्रेष्ठ परिचय उसके तेलुगु ग्रंथ ‘अमुक्तमाल्यद’ से मिलता है। यह ग्रंथ केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक प्रकार का राज्यशास्त्रीय दस्तावेज़ भी है। इसमें राजा और प्रजा के संबंध, मंत्रियों की नियुक्ति, अधिकारियों पर नियंत्रण, न्याय व्यवस्था और विदेश नीति जैसे विषयों पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इस ग्रंथ में राजा को प्रजा का संरक्षक और कल्याणकर्ता माना गया है, न कि केवल कर वसूलने वाला शासक। यह दृष्टिकोण कृष्णदेव राय के शासनकाल की वैचारिक नींव को स्पष्ट करता है।
केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन
कृष्णदेव राय ने केंद्रीय प्रशासन को सुदृढ़ करने के साथ-साथ प्रांतीय प्रशासन का भी पुनर्गठन किया। नायक व्यवस्था को बनाए रखते हुए उसने उस पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया, जिससे सामंतों की स्वायत्त प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जा सका। प्रांतीय अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे राजस्व संग्रह, न्याय और स्थानीय सुरक्षा, तीनों क्षेत्रों में केंद्रीय सत्ता के प्रति उत्तरदायी रहेंगे। इससे प्रशासनिक एकरूपता बनी रही और सत्ता का विकेंद्रीकरण अव्यवस्था में परिवर्तित नहीं हुआ।
न्याय व्यवस्था और प्रजा की शिकायतें
कृष्णदेव राय के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वह स्वयं प्रजा की शिकायतों पर ध्यान देता था। वह समय-समय पर साम्राज्य का भ्रमण करता और स्थानीय अधिकारियों के आचरण की जाँच करता था। जिन क्षेत्रों में कुप्रशासन या अन्याय की शिकायतें मिलतीं, वहाँ त्वरित सुधारात्मक कदम उठाए जाते थे। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता और कठोरता, दोनों का संतुलन रखा गया, जिससे प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास सुदृढ़ हुआ।
प्रशासनिक सफलता का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकारों का मत है कि यदि कृष्णदेव राय केवल एक विजेता होता और कुशल प्रशासक नहीं, तो विजयनगर साम्राज्य उसकी मृत्यु के बाद शीघ्र ही कमजोर पड़ जाता। किंतु उसके शासनकाल में स्थापित प्रशासनिक ढाँचा इतना सुदृढ़ था कि उसने साम्राज्य को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखा। इस प्रकार, प्रशासक के रूप में कृष्णदेव राय विजयनगर इतिहास की सबसे परिपक्व और प्रभावशाली शासकीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
आर्थिक नीति और राजस्व व्यवस्था
कृष्णदेव राय का शासनकाल आर्थिक दृष्टि से विजयनगर साम्राज्य की सर्वाधिक समृद्ध अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। निरंतर सैन्य अभियानों के बावजूद राज्य की अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा, जिसका प्रमुख कारण उसकी सुव्यवस्थित राजस्व नीति और उत्पादन-वृद्धि पर आधारित आर्थिक दृष्टि थी। उसने राज्य की आय बढ़ाने के लिए केवल करों पर निर्भर रहने के बजाय कृषि, व्यापार और शहरी विकास को समान रूप से प्रोत्साहित किया।
कृषि विस्तार और सिंचाई व्यवस्था
कृष्णदेव राय ने कृषि को राज्य की अर्थव्यवस्था की आधारशिला माना। उसने बड़े पैमाने पर तालाबों, नहरों और जलाशयों का निर्माण कराया, जिससे सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार हुआ। बंजर और जंगली भूमि को कृषि योग्य बनाने के प्रयास किए गए, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषक वर्ग की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई। यह नीति न केवल खाद्यान्न आपूर्ति सुनिश्चित करती थी, बल्कि राजस्व वृद्धि का स्थायी स्रोत भी प्रदान करती थी।
कर नीति और राजस्व प्रशासन
कृष्णदेव राय के शासनकाल में कर व्यवस्था अपेक्षाकृत व्यावहारिक और जनोन्मुख रही। उसने विवाह-कर जैसे अलोकप्रिय करों को समाप्त कर प्रजा को राहत प्रदान की। राजस्व संग्रह में अधिकारियों की मनमानी पर नियंत्रण रखा गया और यह सुनिश्चित किया गया कि कर निर्धारण कृषि उत्पादन की वास्तविक क्षमता के अनुरूप हो। इस संतुलित नीति से राज्य की आय भी बढ़ी और जनता में असंतोष भी नहीं पनपा।
व्यापार, शहरीकरण और आर्थिक समृद्धि
आंतरिक और विदेशी व्यापार दोनों ही कृष्णदेव राय के शासनकाल में फले-फूले। सुव्यवस्थित बाजार, सुरक्षित व्यापार मार्ग और सक्रिय बंदरगाह विजयनगर की आर्थिक शक्ति के प्रमुख आधार थे। विदेशी व्यापार से राज्य को बहुमूल्य धातुएँ, घोड़े और अन्य संसाधन प्राप्त होते थे। समकालीन यात्रियों के विवरणों से स्पष्ट होता है कि विजयनगर नगर एक समृद्ध, सुव्यवस्थित और आर्थिक रूप से सशक्त महानगर था।
आर्थिक नीति का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकारों के अनुसार कृष्णदेव राय की आर्थिक नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी स्थायित्व क्षमता थी। उसने अल्पकालिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालीन समृद्धि को प्राथमिकता दी। कृषि, कर और व्यापार, तीनों क्षेत्रों में संतुलन बनाए रखकर उसने एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया, जो उसके शासनकाल में निरंतर सैन्य अभियानों का भार उठाने में भी सक्षम रही। इसी कारण कृष्णदेव राय का शासनकाल आर्थिक दृष्टि से विजयनगर साम्राज्य का स्वर्णिम चरण माना जाता है।
साहित्य, शिक्षा और बौद्धिक संरक्षण
कृष्णदेव राय का शासनकाल केवल राजनीतिक और आर्थिक उत्कर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि यह दक्षिण भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहास का भी एक निर्णायक चरण था। इस काल में साहित्य, शिक्षा और विद्वानों को जिस स्तर का संरक्षण प्राप्त हुआ, उसने विजयनगर को एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। शासक स्वयं विद्वान होने के कारण ज्ञान और संस्कृति को राज्य-नीति का अनिवार्य अंग मानता था।
तेलुगु साहित्य का क्लासिकी युग
कृष्णदेव राय के शासनकाल को तेलुगु साहित्य का ‘क्लासिकी युग’ माना जाता है। इस समय साहित्यिक रचनाओं में भाषा की परिष्कृत शैली, विषयों की विविधता और कलात्मक अभिव्यक्ति का उच्च स्तर दिखाई देता है। राजकीय संरक्षण के कारण कवि और विद्वान बिना आर्थिक चिंता के सृजन कर सके, जिससे तेलुगु साहित्य को स्थायी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
आष्टदिग्गज और दरबारी विद्वान
कृष्णदेव राय के दरबार को आठ महान तेलुगु विद्वानों जिन्हें ‘आष्टदिग्गज’ कहा जाता है का संरक्षण प्राप्त था। जिन्हें “भुवन विजयम” (दुनिया की विजय) के रूप में जाना जाता था। ये विद्वान न केवल कवि थे, बल्कि समाज, धर्म और राजनीति पर भी गहन दृष्टि रखते थे। इनके माध्यम से दरबार केवल सत्ता का केंद्र नहीं रहा, बल्कि बौद्धिक विमर्श और साहित्यिक सृजन का प्रमुख स्थल बन गया।
| कवि | उपाधि/भूमिका/विवरण | उल्लेखनीय रचनाएँ |
| अल्लासानी पेद्दना | तेलुगु कविता के पितामह के रूप में प्रसिद्ध; प्रबंध शैली के संस्थापक, जिन्होंने जटिल काव्य को लोकप्रिय बनाया। | मनुचरित्र (स्वरोचिष मनु संभवम), जो मार्कंडेय पुराण से प्रेरित है। |
| नंदी थिम्मना | मुक्कु थिम्मना के नाम से जाना जाता है, क्योंकि उन्होंने एक स्त्री की नाक की प्रशंसा में कविता रची; सरल भाषा में रोमांटिक काव्य के विशेषज्ञ। | पारिजातापहरणम, एक प्रेम कथा जो राजा को समर्पित है। |
| मदय्यागरी मल्लना | राजा के साथ युद्ध अभियानों में शामिल; उनके काव्यों में वीरता और प्रेम के प्रसंग प्रमुख हैं। | राजशेखर चरित्रम, जिसमें एक राजा के जीवन की घटनाओं का वर्णन है। |
| धुर्जटी | शिव भक्ति में डूबे हुए; कई स्वतंत्र छंदों के रचयिता, जिन्हें पेद्दा धुर्जटी कहा जाता है। | श्रीकालहस्तीश्वर महात्म्यम, श्रीकालहस्ती मंदिर के देवता पर केंद्रित। |
| अय्यलराजु रामभद्रुडु | शुरू में राजा के संरक्षण में, बाद में अन्य दरबारों में; पिल्लला रामभद्रुडु के नाम से भी विख्यात। | रामाभ्युदयमु और सकल कथा सार संग्रहम, जो पुराणों का अनुवाद है। |
| तेनाली रामकृष्ण | विकटकवि उपाधि से सम्मानित; हास्य और बुद्धिमत्ता के लिए मशहूर, दरबार में सलाहकार की भूमिका। | पांडुरंग महात्म्यम और उद्भटाराध्य चरितमु, भक्ति और शिक्षक की कहानियों पर आधारित। |
| रामराजभूषणुडु | भट्टु मूर्ति मूल नाम; संगीतकार और पेद्दना के शिष्य, दोहरे अर्थ वाले शब्दों के प्रयोग में निपुण। | वसुचरित्र और हरिश्चंद्र नलोपाख्यानम, राजाओं की कथाओं से भरे। |
| पिंगली सुरना | 16वीं शताब्दी के प्रमुख कवि, आंध्र प्रदेश के एक गांव से; बहुमुखी रचनाकार। | गरुड़ पुराणम, प्रभावती प्रद्युम्नमु, राघव पांडवीयम और कालपूर्णोदयमु। |
शासक-लेखक के रूप में कृष्णदेव राय
कृष्णदेव राय स्वयं भी उच्च कोटि का विद्वान था। उसकी तेलुगु कृति ‘अमुक्तमाल्यद’ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उसमें निहित सामाजिक और राजनीतिक विचार भी उल्लेखनीय हैं। उसने संस्कृत भाषा में एक नाटक ‘जाम्बवती कल्याण’ की रचना की थी। इसके अतिरिक्त उसने सत्यवदु परिणय, और उषापरिणयम की रचना की। यह तथ्य उसे उन विरले शासकों की श्रेणी में स्थापित करता है, जो स्वयं ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया में सक्रिय रहे।
सांस्कृतिक नीति का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकारों के अनुसार कृष्णदेव राय की सांस्कृतिक नीति का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने साहित्य और शिक्षा को राज्य की शक्ति से जोड़ा। सांस्कृतिक उत्कर्ष को उसने राजनीतिक वैधता और सामाजिक स्थिरता का साधन बनाया। इसी कारण कृष्णदेव राय का शासनकाल न केवल विजयनगर की राजनीतिक पराकाष्ठा का, बल्कि दक्षिण भारत के बौद्धिक पुनर्जागरण का भी प्रतीक बन गया।
कला, स्थापत्य और धार्मिक नीति
कृष्णदेव राय का शासनकाल दक्षिण भारत के कला और स्थापत्य इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। इस काल में विजयनगर साम्राज्य ने न केवल राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि कला और वास्तुकला के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को भी अभिव्यक्त किया। मंदिर, नगर और राजकीय भवन सत्ता और धर्म के समन्वय के प्रतीक बन गए।
हम्पी और नागलापुर का स्थापत्य विकास
कृष्णदेव राय ने हम्पी को विजयनगर साम्राज्य की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित किया। इसके अतिरिक्त उसने नागलापुर नामक नए नगर की स्थापना की, जहाँ भव्य भवनों और मंदिरों का निर्माण कराया गया। इन नगरों की योजना में धार्मिक, प्रशासनिक और नागरिक आवश्यकताओं का संतुलित समावेश किया गया, जो विजयनगर स्थापत्य की परिपक्वता को दर्शाता है।
मंदिर निर्माण और शिल्पकला
इस शासनकाल में सहस्र-स्तंभ मंडपों, विशाल गोपुरमों और अलंकृत प्रांगणों का व्यापक निर्माण हुआ। मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। शिल्पकला में सूक्ष्मता, स्थापत्य में भव्यता और प्रतीकात्मकता, इन तीनों का समन्वय कृष्णदेव राय के संरक्षण में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
धार्मिक नीति और सहिष्णुता
कृष्णदेव राय वैष्णव परंपरा का अनुयायी था, किंतु उसकी धार्मिक नीति संकीर्ण नहीं थी। उसने शैव, जैन और अन्य संप्रदायों को भी संरक्षण प्रदान किया। धार्मिक संस्थाओं को दान देना और मंदिरों के माध्यम से सामाजिक एकता को प्रोत्साहित करना उसकी नीति का हिस्सा था। इस संतुलित दृष्टिकोण से धार्मिक सहअस्तित्व को बल मिला।
कला और धर्म का ऐतिहासिक मूल्यांकन
इतिहासकारों के अनुसार कृष्णदेव राय ने कला और धर्म को केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि राज्य की वैधता और सामाजिक स्थिरता के साधन के रूप में प्रयोग किया। स्थापत्य और धार्मिक संरक्षण ने विजयनगर को सांस्कृतिक पहचान प्रदान की, जो उसके राजनीतिक पतन के बाद भी जीवित रही। इसी कारण कृष्णदेव राय का शासनकाल दक्षिण भारत के कला-इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।
ऐतिहासिक मूल्यांकन और निष्कर्ष
कृष्णदेवराय का शासनकाल भारतीय मध्यकालीन इतिहास में एक ऐसे शासक का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसने सैन्य शक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक संरक्षण, तीनों को संतुलित रूप में विकसित किया। उसका शासन किसी एक क्षेत्र की उपलब्धियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने विजयनगर साम्राज्य को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक संगठित और सुदृढ़ राज्य में परिवर्तित कर दिया। इसी समग्रता के कारण इतिहास में उसका स्थान विशिष्ट है।
समकालीन स्रोतों और इतिहासकारों की दृष्टि
समकालीन अभिलेखों, साहित्यिक कृतियों और विदेशी यात्रियों के विवरणों में कृष्णदेव राय को एक शक्तिशाली, न्यायप्रिय और विद्वान शासक के रूप में चित्रित किया गया है। इन स्रोतों से यह स्पष्ट होता है कि उसका शासनकाल केवल सैन्य विजयों का काल नहीं था, बल्कि सामाजिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि का भी समय था। आधुनिक इतिहासकार भी इस बात पर सहमत हैं कि विजयनगर साम्राज्य की सर्वोच्च अवस्था इसी काल में आई।
शासनकाल की सीमाएँ और यथार्थ
इतना सब होने के बावजूद कृष्णदेव राय का शासनकाल पूर्णतः दोषरहित नहीं था। साम्राज्य की अत्यधिक निर्भरता एक सक्षम शासक पर भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण सिद्ध हुई। उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार की समस्या और केंद्रीय नेतृत्व की कमजोरी धीरे-धीरे उभरने लगी। इससे यह स्पष्ट होता है कि उसकी सफलता काफी हद तक उसके व्यक्तिगत नेतृत्व से जुड़ी हुई थी।
निष्कर्षात्मक मूल्यांकन
समग्र रूप से देखा जाए तो कृष्णदेव राय का शासनकाल विजयनगर साम्राज्य की पराकाष्ठा का प्रतीक है। उसने जिस प्रकार शक्ति और संस्कृति, युद्ध और सुशासन, धर्म और सहिष्णुता को एक साथ साधा, वह उसे भारतीय इतिहास के महान शासकों की श्रेणी में स्थापित करता है। इसी कारण उसका शासनकाल न केवल दक्षिण भारत, बल्कि संपूर्ण भारतीय इतिहास में एक मानक युग के रूप में स्मरण किया जाता है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
