सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वास अभी भी रहस्यों से भरी हुई हैं। लिखित स्रोत उपलब्ध न होने के कारण पुरातात्विक खोजें ही इसके विश्वासों को समझने की एकमात्र कुंजी हैं। मुहरों पर अंकित देव-प्रतिमाएँ, अग्निकुंड, वृक्ष–पूजा, पशुपति-आकृति, मातृ-देवी की मूर्तियाँ – सभी मिलकर यह संकेत देती हैं कि यह सभ्यता प्रकृति-प्रधान और प्रतीकवादी धार्मिक व्यवस्था का पालन करती थी।
इस लेख में आप जानेंगे:
- प्रमुख धार्मिक प्रतीक
- वृक्ष पूजा, पशु पूजा और मातृ-देवी की परंपरा
- अग्निपूजा के प्रमाण
- पशुपति-सिंहासन पर बैठे देवता की व्याख्याएँ
- दफनाने और अंतिम संस्कार की प्रथाएँ
- इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की व्याख्या
सैंधव सभ्यता, जिसे हम सिंधु घाटी सभ्यता भी कहते हैं, प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस सभ्यता का उदय लगभग 3300 से 1300 ईसा पूर्व हुआ था और यह वर्तमान पाकिस्तान और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में फैली हुई थी। हालांकि सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वासों और पूजा पद्धतियों के बारे में कोई लिखित प्रमाण नहीं मिले हैं, फिर भी पुरातात्विक अनुसंधान से यह पता चलता है कि इस सभ्यता के लोग प्रकृति और जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी धार्मिकता में विश्वास रखते थे। ये सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वास प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव दर्शाते हैं, जो पूजा पद्धतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वास न केवल प्रकृति-पूजा पर आधारित थे, बल्कि ये बाद के वैदिक और हिंदू धर्म के मूल तत्व भी साबित होते हैं। सिंधु घाटी के लोग अपनी पूजा पद्धतियों में मुख्य रूप से मातृदेवी पूजा, पशु पूजा और जल जैसे प्राकृतिक तत्वों की आराधना करते थे। साथ ही, उनकी धार्मिकता में शिव जैसे देवता के प्रतीकों का भी संकेत मिलता है।
सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वास (Religious Beliefs in the Indus Valley Civilization)
सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों की खुदाई में किसी मंदिर, समाधि या धार्मिक स्थल के अवशेष नहीं मिले हैं। हालांकि, कालीबंगन की खुदाई में एक घर से यज्ञवेदी के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सैंधव संस्कृति में धर्म और धार्मिक विश्वासों का अध्ययन मुख्यतः मुद्राओं, छोटी मूर्तियों, और पाषाण-प्रतिमाओं से किया जाता है। इन अवशेषों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में धार्मिक विश्वासों का एक विस्तृत और विविध रूप था। यह कहा जा सकता है कि सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का एक विस्तृत और विविध रूप था, जो पूजा पद्धतियों में स्पष्ट झलकता है।
हड़प्पा सभ्यता में मातृदेवी की पूजा (Mother Goddess Worship in Harappan Culture)

सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में मातृदेवी की पूजा का प्रमुख स्थान था, जो उर्वरता और जीवन चक्र का प्रतीक थी। सैंधव सभ्यता में मातृदेवी की पूजा का प्रमुख स्थान था। हड़प्पा, मोहेनजोदड़ो, चन्हूदड़ों जैसी साइट्स से मिट्टी की नारी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन मूर्तियों में नारी के सिर पर पंखे जैसे आभूषण, हार, चूड़ियाँ, कर्णफूल, और मेखला आदि दिखाई देती हैं। कुछ मूर्तियों पर दीपक जैसी आकृतियाँ भी बनी हुई हैं, जो संकेत देती हैं कि इन मूर्तियों का उपयोग दीपक के रूप में किया जाता था। इसके अलावा, मोहेनजोदड़ो से एक देवी की मूर्ति मिली है, जिसे देवी के रूप में पहचाना जाता है। इस मूर्ति में देवी के सिर पर पंखे जैसे आभूषण हैं और वह करधनी, हार, चूड़ियाँ, कर्णफूल जैसी आभूषणों से सुसज्जित है। मैके ने इन मूर्तियों को ‘दीपलक्ष्मी’ से भी संबंधित किया है।
सिंधु घाटी सभ्यता में बलि की प्रथा और यज्ञ (Human Sacrifice and Rituals in the Indus Valley Civilization)
कुछ मुद्राओं पर देवी के चित्रण से यह संकेत मिलता है कि उस समय मनुष्यों की बलि देने की प्रथा भी रही होगी। हड़प्पा से मिली एक मुद्रा में देवी के पैरों के बीच से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है और दूसरी तरफ एक आदमी खड़ा है, जो बलि देने का प्रतीक हो सकता है। एक और मुद्रा में पीपल के वृक्ष की दो शाखाओं के बीच नारी की आकृति दिखायी गई है, जो यह संकेत करती है कि पीपल वृक्ष की पूजा देवी की उपासना से जुड़ी थी। इसके अलावा, बकरा बलि देने का दृश्य भी कुछ मुद्राओं में दिखाई देता है, जो मातृदेवी की पूजा से संबंधित था। सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में बलि और यज्ञ जैसे अनुष्ठान उर्वरता और समृद्धि के लिए किए जाते थे।
सिंधु घाटी सभ्यता में शिव की पूजा (Shiva Worship in the Indus Valley Civilization)

मातृदेवी की पूजा के साथ-साथ सिंधु घाटी सभ्यता में पुरुष देवता की पूजा का भी प्रमाण मिलता है। मोहेनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा में पद्मासन की मुद्रा में एक योगी की आकृति दिखायी गई है। इस योगी के दाहिने ओर चीता और हाथी तथा बाईं ओर गैंडा और भैंसा चित्रित हैं। इस देवता के सिर पर त्रिशूल जैसा आभूषण है और उनके चारों ओर विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ हैं। मार्शल ने इसे ‘रुद्र शिव’ से संबंधित माना है। सिंधु घाटी सभ्यता में शिव की पूजा का प्रमाण अन्य मुद्राओं में भी मिलता है, जिसमें शिव के तीन मुख दिखाई देते हैं, जो उन्हें ‘त्रिमुख’ देवता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, सिंधु घाटी की धार्मिक मान्यताएँ शिव जैसे पुरुष देवता की पूजा को भी शामिल करते थे, जो प्रोटो-शैववाद का संकेत देते हैं। इसके अलावा, एक अन्य मुद्रा में देवता के सिर से फूल और पत्तियाँ निकलती हुई दिखायी गई हैं, जो उर्वरता और प्रकृति की शक्ति का प्रतीक हो सकती हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता में लिंग पूजा और योनि पूजा (Lingam & Yoni Worship in Indus Valley Civilization)
सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में लिंग-योनि पूजा उर्वरता और सृजन चक्र का प्रतीक थी, जो बाद की शैव परंपराओं में विकसित हुई। सैंधव सभ्यता में लिंग पूजा का प्रचलन था। खुदाई में ऐसे लिंग मिले हैं, जो पत्थर, सीप, कांच और मिट्टी से बने थे। इन लिंगों का उपयोग ताबीज के रूप में भी किया जाता था, जैसा कि कुछ लिंगों में छेद पाया गया है। इन लिंगों का आकार भिन्न-भिन्न था और ये पूजा के उद्देश्य से उपयोग किए जाते थे। इसके अलावा, चक्र और छल्ले जैसी वस्तुएं भी मिली हैं, जिन्हें ‘योनि’ के रूप में पहचाना गया है। यह संकेत करता है कि योनिपूजा भी सैंधव धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही होगी।
पशु, पक्षी और वृक्षों की पूजा (Animal, Bird & Tree Worship in Harappa)
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग पशुओं, पक्षियों और वृक्षों की भी पूजा करते थे। खुदाई में जिन पशुओं के चित्र मिले हैं, उनमें गैंडा, बैल, हाथी, चीता, और भैंसा प्रमुख हैं। इन शक्तिशाली पशुओं को धार्मिक रूप से पूजा जाता था। फाख्ता (पंछी) को पवित्र माना जाता था और पीपल के वृक्ष को सबसे पवित्र माना गया था। पीपल के वृक्ष का चित्र मुद्राओं पर सबसे अधिक पाया जाता है और इसके अलावा मृदभाण्डों पर भी पीपल की पत्तियाँ चित्रित हैं। एक मुद्रा में दो एकश्रृंगी पशुओं के संयुक्त सिर से पीपल की शाखा निकलती हुई दिखाई गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इन एकश्रृंगी पशुओं को पीपल देवता का वाहन माना जाता होगा। इस प्रकार, सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में पशु और वृक्ष पूजा एक-दूसरे से गहराई से जुड़े थे, जो प्रकृति संरक्षण का प्राचीन रूप दर्शाते हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता में जल पूजा और महान स्नानागार (Water Worship and the Great Bath in Indus Valley Civilization)

सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में जल पूजा एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जो शुद्धि और पुनर्जन्म के विचारों से जुड़ी थी। सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में जल को जीवनदायिनी और शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता था, जो उनकी पूजा पद्धतियों का अभिन्न अंग था। यह प्रकृति-केंद्रित धर्म का स्पष्ट प्रमाण है, जहां जल न केवल उपयोगिता के लिए बल्कि आध्यात्मिक अनुष्ठानों के लिए पवित्र था। मोहेनजो-दारो के प्रसिद्ध महान स्नानागार (Great Bath) इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। यह 12 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर गहरा आयताकार पूल, जलरोधक ईंटों और जिप्सम प्लास्टर से निर्मित था। इसमें पूर्व-पश्चिम दिशा में सीढ़ियां थीं, जो स्नान के क्रम को दर्शाती हैं, और एक केंद्रीय द्वार से जल-निकासी व्यवस्था जुड़ी हुई थी।
पुरातत्वविद् सर जॉन मार्शल, जो 1920 के दशक में इसकी खुदाई के प्रमुख थे, ने इसे धार्मिक स्नान का केंद्र माना। संभवतः यह जन्म, विवाह, मृत्यु या मौसमी उत्सवों जैसे संस्कारों के लिए उपयोग होता था, जहां लोग पवित्र जल में डुबकी लगाकर शुद्धि प्राप्त करते। अन्य साइट्स जैसे कालीबंगन और धोलावीरा से भी जल-कुंड (reservoirs) और नालियां मिली हैं, जो सामूहिक स्नान रिचुअल्स का संकेत देती हैं। मुद्राओं पर मछली, कछुए और जल-जीवों के चित्र भी जल देवताओं की आराधना को इंगित करते हैं।
हाल की खोजों में, 2024 की एक स्टडी (राखीगढ़ी साइट) से पता चला है कि ये स्नानागार जल-आधारित चिकित्सा या योग-संबंधी प्रथाओं से जुड़े हो सकते हैं, जो बाद के हिंदू तीर्थ स्नानों (जैसे प्रयागराज कुंभ) का आधार बने। यह सैंधव सभ्यता की उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली को भी रेखांकित करता है, जो धार्मिक और व्यावहारिक दोनों थी।
प्रमुख विशेषताएं:
- आकार और निर्माण: जलरोधक ईंटें, 2.4 मी. गहराई।
- धार्मिक महत्व: शुद्धिकरण अनुष्ठान, मौसमी पूजा।
- प्रभाव: वैदिक ‘स्नान’ परंपरा का पूर्ववर्ती।
स्वास्तिक और चक्र (Swastika & Chakra in Indus Valley Religion)
स्वास्तिक और चक्र जैसे पवित्र प्रतीकों का भी सैंधव धर्म में महत्व था। कई मुद्राओं पर सूर्य, सर्प और नाग के चित्रण मिलते हैं, जो सूर्योपासना और नागपूजा से संबंधित हो सकते हैं। स्वास्तिक को पवित्र चिन्ह माना जाता था, जिसे विभिन्न वस्तुओं पर अंकित किया गया था। इसके अलावा, ताबीजों पर विभिन्न धार्मिक चित्रण भी किए गए थे, जो सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक विश्वासों और शक्तियों का प्रतीक थे।
सैंधव लिपि और धार्मिक प्रतीकों का रहस्य (The Mystery of Indus Script and Religious Symbols)
सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों को समझने में सबसे बड़ी बाधा उनकी अनपढ़ लिपि है, जो मुद्राओं, मृदभांडों और ताम्रपत्रों पर 400 से अधिक चिन्हों में उत्कीर्ण है। ये चिन्ह – जो 5,000 से ज्यादा उदाहरणों में पाए गए हैं – संभवतः धार्मिक मंत्र, प्रार्थनाएं या देवताओं के नाम दर्शाते हैं, लेकिन अभी तक डिकोड नहीं हो सके। उदाहरणस्वरूप, यूनिकॉर्न सील (एकशृंगी पशु वाला प्रतीक) सबसे सामान्य है, जो जादुई रक्षा या उर्वरता पूजा का प्रतीक माना जाता है। इसमें पशु के सिर पर सींग और चारों ओर वनस्पतियां चित्रित हैं, जो पशुपति या मातृदेवी से जुड़ी हो सकती हैं।
अन्य प्रमुख प्रतीक:
- स्वास्तिक: शुभता और चक्र-चालन का प्रतीक, जो बाद में हिंदू धर्म में अपनाया गया।
- त्रिशूल: शिव-जैसे देवता का आभूषण, जो त्रिमुख मुहरों में दिखता है।
- पशु-मानव संयोजन: योगी मुद्रा वाले चित्र, जो प्रोटो-शैव परंपरा का संकेत।
हाल की प्रगति में, 2025 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा ग्रेटर नोएडा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस (20-22 अगस्त) पर फोकस है, जहां वैश्विक विद्वान इंडस लिपि डिकोडिंग पर चर्चा करेंगे। IIT कानपुर की 2023-24 स्टडी से संकेत मिला कि ये चिन्ह द्रविड़ियन भाषा से संबंधित हो सकते हैं, जो धार्मिक प्रतीकों को दक्षिण भारतीय देवी-पूजा से जोड़ती है। यदि डिकोड हो जाए, तो सैंधव पूजा पद्धतियों के लिखित प्रमाण मिल सकते हैं, जो उनके बहुदेववादी विश्वासों को स्पष्ट करेंगे।
यह रहस्य सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों को और गहरा बनाता है, जहां प्रतीक ही धार्मिक इतिहास की कुंजी हैं।
यज्ञ और पशुबली (Yajna & Animal Sacrifice in Indus Valley)
सिंधु घाटी सभ्यता में यज्ञ और पशुबली की परंपरा भी थी। लोथल और कालीबंगन जैसे स्थलों से यज्ञीय वेदियाँ और पशुओं की जली हुई हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं। लोथल में एक चबूतरे पर ईंट की बनी वेदी मिली है, साथ ही यहां पशुओं की हड्डियाँ, मनके और चित्रित मृदभाण्ड के टुकड़े भी पाए गए हैं, जो यज्ञ या बलि के अनुष्ठानों से संबंधित हो सकते हैं। कालीबंगन में सात आयताकार वेदियाँ एक पंक्ति में मिली हैं, और निचली बस्ती के घरों में भी अग्नि वेदियाँ पाई गई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वेदियों का धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था।
सिंधु सभ्यता धर्म का वैदिक और द्रविड़ियन परंपराओं पर प्रभाव (Influence of Indus Religion on Vedic and Dravidian Traditions)
सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वास और पूजा पद्धतियां वैदिक और द्रविड़ियन परंपराओं को कैसे प्रभावित करती हैं, यह समझना आवश्यक है। सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वास और पूजा पद्धतियां न केवल स्वतंत्र थीं, बल्कि बाद की भारतीय परंपराओं का आधार भी बनीं। लगभग 1900 ई.पू. में इस सभ्यता के पतन के बाद, उसके तत्व वैदिक आर्यों (उत्तर से आए) और स्थानीय द्रविड़ियन संस्कृतियों में विलीन हो गए, जिससे एक अद्भुत सिंक्रेटिज्म (मिश्रण) का निर्माण हुआ। विद्वान शरीन रत्नागर अपनी पुस्तक Understanding Harappa में लिखती हैं कि यह मिश्रण भारतीय धर्म की जड़ें मजबूत करता है।
वैदिक प्रभाव:
- यज्ञ और अग्नि वेदी: कालीबंगन की वेदियां वैदिक होम का पूर्ववर्ती हैं।
- पशुपति मुहर: रुद्र (शिव का प्रारंभिक रूप) से जुड़ी, ऋग्वेद में उल्लिखित।
- पीपल पूजा: वैदिक वृक्ष-आराधना का आधार।
द्रविड़ियन प्रभाव:
- मातृदेवी: तमिलनाडु की अम्मन देवी से समानता।
- लिंग-योनि पूजा: दक्षिण भारतीय शैव मंदिरों में प्रचलित।
- जल अनुष्ठान: तमिल तीर्थ स्नानों का स्रोत।
बी.बी. लाल के अनुसार, यह प्रभाव DNA स्टडीज से सिद्ध होता है। 2024-25 की सरकारी जीनोमिक प्रोजेक्ट (राखीगढ़ी) से पता चला कि सैंधव लोग द्रविड़ियन पूर्वज थे, जो उनके प्रतीकों को दक्षिण भारतीय धर्म से जोड़ता है। 2024 की सेंचुरी सेलिब्रेशन में भी यह चर्चा हुई कि सैंधव ‘यूटोपिया’ (धर्म-रहित शांतिपूर्ण समाज) का विचार गलत है – बल्कि यह बहुदेववाद का प्रतीक था।
| सैंधव तत्व | वैदिक समकक्ष | द्रविड़ियन समकक्ष |
| मातृदेवी पूजा | उमा/पार्वती | अम्मन देवी |
| पशुपति | रुद्र/शिव | अरुणाचलेश्वर |
| स्वास्तिक | शुभ चिन्ह | मंदिर प्रतीक |
| यज्ञ वेदी | होम | अग्नि पूजा |
यह तुलना सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों को वैदिक और द्रविड़ियन परंपराओं के साथ जोड़ती है, जो भारतीय धर्म की निरंतरता को रेखांकित करती है। यह प्रभाव दर्शाता है कि सैंधव धर्म आधुनिक हिंदू परंपराओं का प्राचीन पुल है।
निष्कर्ष
सैंधव सभ्यता का धर्म, विशेष रूप से इसके धार्मिक विश्वास, बहुत विविध था। सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में मातृदेवी और पुरुष देवता दोनों की पूजा होती थी। इसके अलावा, पशु, पक्षी, वृक्ष और अन्य प्राकृतिक शक्तियों की पूजा भी होती थी। इस धर्म में योनिपूजा, लिंग पूजा, स्वास्तिक और चक्र जैसे प्रतीकों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। इसके साथ-साथ यज्ञ, पशुबली, और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का हिस्सा थे। इन सभी प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि सैंधव सभ्यता का धर्म बहुत विकसित और विविध था, और इसके कई पहलु बाद में हिन्दू धर्म के रूप में प्रकट हुए। सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का यह विरासत आज भी हिंदू पूजा पद्धतियों में जीवित है, जैसे शिवलिंग और पीपल पूजा में। सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वास आज भी भारतीय संस्कृति की नींव बने हुए हैं। इस प्रकार, सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों ने भारतीय संस्कृति को एक मजबूत नींव प्रदान की, जो आज भी प्रासंगिक है।
Further Reference
ये स्रोत सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों पर गहन अध्ययन के लिए आदर्श हैं।
- Irfan Habib : The Indus Civilization.
- A.L. Basham : The Wonder that was India.
- Shereen Ratnagar : Understanding Harappa: Civilization in the Greater Indus Valley.
- S.P. Gupta : The lost Sarasvati and the Indus Civilisation.
- B.B. Lal : India 1947–1997: New Light on the Indus Civilization.
- Vasant Shinde (2024): DNA and the Indus Civilization (Cell Journal).
- ASI Report (2025): Decoding the Indus Script.
आधुनिक खोजें (Recent Discoveries in Indus Religion)
ये आधुनिक खोजें सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों को नई रोशनी डालती हैं, जो पुरातत्व से परे जीनोमिक्स तक फैली हैं। कुल मिलाकर, ये खोजें सैंधव सभ्यता के धार्मिक विश्वासों को भविष्य की स्टडीज के लिए खोलती हैं।
- 2024 सेंचुरी सेलिब्रेशन: 20 सितंबर 2024 को इंडस घाटी सभ्यता की खोज की शताब्दी मनाई गई। इसमें जॉन मार्शल के योगदान पर फोकस हुआ, और नई स्टडीज से पता चला कि सैंधव ‘धर्म-रहित यूटोपिया’ नहीं थे, बल्कि प्रकृति-पूजक थे।
- 2024-25 जीनोमिक प्रोजेक्ट: राखीगढ़ी DNA विश्लेषण से सैंधव लोगों को द्रविड़ियन पूर्वज सिद्ध किया, जो मातृदेवी और लिंग पूजा को दक्षिण भारतीय परंपराओं से जोड़ता है।
- 2025 लिपि डिकोडिंग कॉन्फ्रेंस: ASI का इवेंट (अगस्त 2025) वैश्विक विद्वानों को एकत्र करेगा, जहां AI से लिपि के धार्मिक चिन्हों (जैसे यूनिकॉर्न) पर चर्चा होगी।
- अन्य: जनवरी 2025 का इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस (पुणे) ने पशुपति मुहर को शैववाद से जोड़ा।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
