प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को प्रायः राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक उत्कर्ष और प्रशासनिक सुदृढ़ता के युग के रूप में देखा जाता है। किंतु इस काल की वास्तविक समझ केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रह सकती। सामाजिक संरचना, वर्ण व्यवस्था, पेशागत परिवर्तन, स्त्रियों और शूद्रों की स्थिति तथा धार्मिक परंपराओं के आपसी संबंधों का अध्ययन किए बिना गुप्त युग का समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है।
यह लेख गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन को ऐतिहासिक स्रोतों स्मृति ग्रंथों, साहित्य, अभिलेखों और फाह्यान जैसे समकालीन यात्रियों के विवरण के आधार पर समझने का प्रयास करता है। इसमें यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार सामाजिक असमानताओं के बावजूद सांस्कृतिक परिष्कार विकसित हुआ और वैष्णव प्रधानता के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन परंपराएँ सह-अस्तित्व में बनी रहीं। इस दृष्टि से गुप्तकाल को न तो पूर्ण “स्वर्णयुग” कहा जा सकता है और न ही सामाजिक जड़ता का काल, बल्कि यह संतुलन और संक्रमण का एक महत्वपूर्ण चरण था।
गुप्तकालीन समाज की संरचना और वर्ण व्यवस्था
गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन का सामाजिक पक्ष उस चरण को दर्शाता है जब वर्ण-व्यवस्था भारतीय समाज में पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चारों वर्णों के अतिरिक्त अनेक उपजातियाँ और पेशागत समूह भी अस्तित्व में आ चुके थे। सामाजिक पदानुक्रम स्पष्ट था और वर्णों के बीच असमानता को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त थी।
वाराहमिहिर का यह कथन कि विभिन्न वर्णों के लिए अलग-अलग आकार के आवास उपयुक्त माने गए, इस असमानता का वैचारिक प्रतिबिंब है। न्याय-व्यवस्था में भी वर्णानुसार दंड-विधान मिलता है। फिर भी यह उल्लेखनीय है कि गुप्तकालीन जाति-व्यवस्था अभी उतनी कठोर नहीं थी जितनी उत्तरवर्ती मध्यकाल में दिखाई देती है। सामाजिक व्यवहार में लचीलापन और व्यावहारिक समायोजन अभी शेष था।
गुप्तकाल में पेशागत परिवर्तन और सामाजिक गतिशीलता
गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में पेशागत परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण संकेतक था। यद्यपि वर्ण-व्यवस्था सिद्धांततः बनी रही, किंतु व्यवहार में विभिन्न वर्णों के लोगों ने पारंपरिक पेशों से हटकर नई आर्थिक गतिविधियाँ अपनाईं। व्यापार-वाणिज्य, शिल्प और प्रशासन के विस्तार ने सामाजिक जीवन को अधिक व्यावहारिक बनाया। इस प्रक्रिया ने सीमित स्तर पर ही सही, परंतु गुप्तकालीन समाज में पेशे और सामाजिक स्थिति के बीच संबंध को कुछ हद तक लचीला अवश्य बनाया।
ब्राह्मणों और क्षत्रियों की वृत्तियों में परिवर्तन
ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था, किंतु गुप्तकाल में उनकी आर्थिक भूमिका केवल धार्मिक-साहित्यिक नहीं रह गई थी। मृच्छकटिक में वर्णित चरुदत्त का ‘सार्थवाह’ होना इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रमाण है। उसका परिवार कई पीढ़ियों से व्यापार से जुड़ा था, जो यह दिखाता है कि आर्थिक यथार्थ वर्णीय आदर्शों को प्रभावित कर रहा था। बौद्ध साहित्य भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करता है। स्मृति ग्रंथों द्वारा इसे ‘आपद्धर्म’ कहे जाने से यह स्पष्ट होता है कि यह व्यवहार अस्थायी नहीं, बल्कि स्वीकृत सामाजिक अनुकूलन था।
क्षत्रिय वर्ग भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा। अनेक क्षत्रियों ने व्यापार और औद्योगिक गतिविधियाँ अपनाईं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गुप्तकालीन समाज में पेशे और वर्ण के बीच संबंध पूर्णतः स्थिर नहीं रह गया था।
गुप्तकालीन व्यापार, श्रेणियाँ और शहरी अर्थव्यवस्था
गुप्तकाल में व्यापार-वाणिज्य के विस्तार ने सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। वैश्यों की श्रेणियाँ (गिल्ड) केवल आर्थिक संस्थाएँ नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक प्रतिष्ठा और सामूहिक पहचान का भी माध्यम थीं। ये श्रेणियाँ व्यापार के नियम निर्धारित करती थीं, ऋण प्रदान करती थीं और कभी-कभी धार्मिक एवं दानात्मक गतिविधियों में भी भाग लेती थीं।
अभिलेखों से संकेत मिलता है कि श्रेणियों को भूमि-दान और कर-रियायतें भी प्राप्त होती थीं, जिससे उनकी स्थिति सुदृढ़ हुई। शहरी केंद्रों जैसे उज्जयिनी, पाटलिपुत्र और प्रयाग में व्यापारिक गतिविधियों की सघनता ने गुप्तकालीन समाज को अपेक्षाकृत नगरीय और मुद्रा-आधारित बनाया। इस प्रक्रिया ने सामाजिक गतिशीलता को सीमित रूप में ही सही, परंतु संभव अवश्य बनाया।
सांकर जातियाँ और सामाजिक मिश्रण
पेशागत विभाजन के परिणामस्वरूप कृषक, पशुपालक, धातुकार, तैलकार, जुलाहे, माली आदि की पृथक जातियाँ विकसित हो चुकी थीं। इसके साथ-साथ अनेक मिश्रित (सांकर) जातियाँ भी अस्तित्व में आईं। स्मृति ग्रंथों में मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ, पारशव और उग्रकरण जैसी जातियों का उल्लेख मिलता है। यह सामाजिक मिश्रण गुप्तकालीन समाज की सीमित गतिशीलता को दर्शाता है।
कायस्थ: उभरता हुआ प्रशासनिक वर्ग
समकालीन अभिलेखों में कायस्थों का उल्लेख विशेष महत्व रखता है। वे पेशेवर लेखक और अभिलेखकर्ता थे, जिनकी कोई स्पष्ट वर्णीय पहचान नहीं बन पाई थी। कायस्थों का उदय गुप्तकालीन प्रशासन के विस्तार और भूमि-दान व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ था, और यह बाद के मध्यकालीन नौकरशाही वर्ग का पूर्वरूप माना जा सकता है।
गुप्तकालीन समाज में शूद्र और अस्पृश्य वर्ग
गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन के अध्ययन में शूद्रों और अस्पृश्य वर्गों की स्थिति विशेष महत्व रखती है। यह काल शूद्रों के प्रति दृष्टिकोण में आंशिक परिवर्तन का संकेत देता है, जहाँ उन्हें कुछ आर्थिक और धार्मिक अधिकार प्राप्त हुए, किंतु सामाजिक समानता अभी भी दूर थी। एक ओर शूद्रों की आर्थिक भूमिका में विस्तार दिखाई देता है, तो दूसरी ओर अस्पृश्यता जैसी प्रथाएँ समाज में गहराई से जमी हुई थीं। इस विरोधाभास के माध्यम से गुप्तकालीन समाज की सीमाएँ स्पष्ट होती हैं।
शूद्रों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति
गुप्तकालीन स्मृतियाँ शूद्रों को व्यापार, शिल्प और कृषि करने की अनुमति देती हैं। बृहस्पति का कथन,
“विक्रयः सर्वपण्यानां शूद्रधर्म उदाहृतः” (प्रत्येक प्रकार की वस्तुओं की बिक्री करना शूद्र का सामान्य धर्म है),
यह दर्शाता है कि शूद्र आर्थिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। कुछ शूद्र सेना में भी भर्ती होते थे। मृच्छकटिक में उज्जयिनी के शूद्र अधिकारियों का उल्लेख प्रशासनिक सहभागिता की ओर संकेत करता है।
धार्मिक-साहित्यिक अधिकार
गुप्तकालीन समाज में शूद्रों को महाकाव्यों और पुराणों के श्रवण का अधिकार मिलना एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन था। यह अधिकार वैदिक अध्ययन तक विस्तृत नहीं था, किंतु इसके माध्यम से शूद्रों का धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन से आंशिक जुड़ाव संभव हुआ।
पुराणों की कथात्मक शैली और भक्ति-प्रधान स्वरूप ने उन्हें अपेक्षाकृत व्यापक सामाजिक वर्गों के लिए सुलभ बनाया। इससे यह संकेत मिलता है कि गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में धर्म केवल उच्च वर्णों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सीमित रूप में ही सही, सामाजिक विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाया।
चांडाल और अस्पृश्यता
इन सुधारों के बावजूद अस्पृश्यता समाज में प्रचलित थी। फाह्यान के अनुसार चांडाल गाँवों और नगरों के बाहर रहते थे तथा नगर में प्रवेश करते समय लकड़ी पीटते थे। वे आखेट और मांस-व्यवसाय से जुड़े थे। यह स्थिति गुप्तकालीन सामाजिक जीवन के अंतर्विरोध को उजागर करती है, जहाँ सीमित समावेशन के साथ-साथ कठोर बहिष्कार भी मौजूद था।
गुप्तकालीन समाज में दास प्रथा और सामाजिक असमानताएँ
गुप्तकालीन समाज में दास-प्रथा का अस्तित्व स्मृति ग्रंथों और साहित्यिक स्रोतों से प्रमाणित होता है। युद्ध में बंदी बनाए गए व्यक्ति तथा ऋण न चुका सकने वाले लोग प्रायः दास बनाए जाते थे। मृच्छकटिक जैसे ग्रंथों से यह ज्ञात होता है कि दास पर स्वामी का अधिकार होता था, किंतु यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं था।
गुप्तकालीन दास-प्रथा को सामान्यतः सीमित और नियंत्रित माना जाता है। स्मृति ग्रंथों में ऐसे संकेत मिलते हैं कि दास निश्चित अवधि तक सेवा करने अथवा ऋण चुका देने के पश्चात् स्वतंत्र हो सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि गुप्तकालीन समाज में दास-प्रथा किसी केंद्रीय सामाजिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सहायक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में विद्यमान थी।
गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति
गुप्तकालीन सामाजिक जीवन में स्त्रियों की स्थिति जटिल और बहुआयामी थी। शास्त्रीय ग्रंथों और साहित्य में उन्हें सम्मानजनक स्थान दिया गया, किंतु व्यावहारिक जीवन में यह स्थिति समान नहीं थी। विवाह, विधवापन, संपत्ति अधिकार और धार्मिक कर्तव्यों को लेकर समाज में एकरूपता नहीं दिखाई देती। इसलिए गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति को न तो पूर्णतः प्रगतिशील कहा जा सकता है और न ही पूर्णतः पतनशील।
विवाह व्यवस्था और अनुलोम विवाह
गुप्तकालीन साहित्य और स्मृति ग्रंथों में विवाह को एक पवित्र सामाजिक संस्कार के रूप में मान्यता दी गई थी। गुप्त युग में कन्याओं का विवाह सामान्यतः 12-13 वर्ष की अवस्था में होता था, अतः उनका उपनयन संस्कार बंद हो गया। याज्ञवल्क्य-स्मृति कन्या के लिए उपनयन एवं वेदाध्ययन का निषेध करती है। सामान्यतः सजातीय विवाह को ही आदर्श माना जाता था, जिससे वर्ण-आधारित सामाजिक संरचना को स्थिरता मिलती थी। याज्ञवल्क्य और मनु की स्मृतियों में विवाह के विभिन्न रूपों जैसे ब्राह्म, दैव और आर्ष का उल्लेख मिलता है, जो उच्च वर्णों में प्रचलित थे।
इसके साथ ही अनुलोम विवाह, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष का निम्न वर्ण की स्त्री से विवाह, को भी सैद्धांतिक मान्यता प्राप्त थी। स्मृति ग्रंथ इसे सामाजिक रूप से स्वीकार्य मानते हैं, यद्यपि इसे आदर्श नहीं कहा गया। यह तथ्य गुप्तकालीन समाज में वर्ण-व्यवस्था की कठोरता के बावजूद व्यवहारिक लचीलेपन की ओर संकेत करता है।
इसके विपरीत प्रतिलोम विवाह (निम्न वर्ण के पुरुष का उच्च वर्ण की स्त्री से विवाह) को सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अस्वीकार्य माना गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि विवाह व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक पदानुक्रम को बनाए रखने का प्रयास किया जाता था। इस प्रकार गुप्तकालीन विवाह प्रणाली में एक ओर शास्त्रीय आदर्श दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर सीमित सामाजिक समायोजन की प्रवृत्ति भी दृष्टिगोचर होती है।
| स्मृतिकार | विधवा विवाह पर मत | संपत्ति अधिकार |
| नारद/पाराशर | समर्थन | कन्या को पिता का हक |
| बृहस्पति | ब्रह्मचर्य-तप | सीमित |
| कात्यायन | – | अचल संपत्ति बिक्री |
विधवा-विवाह पर स्मृतिकारों के मतभेद और सती प्रथा
गुप्तकालीन समाज में विधवा-विवाह को लेकर स्मृतिकारों के मतभेद स्त्रियों की स्थिति की जटिलता को दर्शाते हैं। नारद और पाराशर द्वारा विधवा-विवाह का समर्थन यह संकेत देता है कि समाज में पुनर्विवाह को पूरी तरह निषिद्ध नहीं माना गया था।
इसके विपरीत, बृहस्पति द्वारा विधवा के लिए कठोर तपस्वी जीवन का विधान समाज के रूढ़िवादी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है। यह मतभेद इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर एकरूप सामाजिक सहमति नहीं थी, बल्कि यह बहस और संक्रमण के दौर से गुजर रही थी।
सती प्रथा: एरण अभिलेख का ऐतिहासिक महत्व
भानुगुप्त के एरण अभिलेख (510 ई.) में सती-प्रथा का उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इस प्रथा का एकमात्र समकालीन अभिलेखीय प्रमाण है। गोपराज की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी के सती होने का उल्लेख व्यक्तिगत घटना के रूप में किया गया है, न कि किसी सामाजिक नियम के रूप में।
इसी कारण अधिकांश इतिहासकार इसे गुप्तकालीन समाज की सामान्य प्रथा मानने से इनकार करते हैं। यह उदाहरण यह भी दर्शाता है कि किसी एक अभिलेखीय साक्ष्य के आधार पर सामाजिक संरचना के व्यापक निष्कर्ष निकालना इतिहासलेखन की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
स्त्रीधन और संपत्ति अधिकार
गुप्तकालीन स्मृतियों में स्त्रीधन का दायरा विस्तृत किया गया। पुत्र के अभाव में पत्नी को पति की संपत्ति का अधिकार प्राप्त था। नारद और कात्यायन ने कन्याओं को भी संपत्ति का अधिकार दिया, यहाँ तक कि अचल संपत्ति पर भी।
गुप्तकालीन सामाजिक जीवन की सांस्कृतिक विशेषताएँ
गुप्तकालीन सामाजिक जीवन की सांस्कृतिक विशेषताएँ उस शहरी और अभिजात्य समाज को प्रतिबिंबित करती हैं, जो राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि के कारण विकसित हुआ था। इस काल में सामाजिक व्यवहार, मनोरंजन, कला-बोध और जीवन-शैली में स्पष्ट परिष्कार दिखाई देता है। साहित्यिक ग्रंथों से यह संकेत मिलता है कि संस्कृति केवल उच्च वर्ग तक सीमित नहीं थी, बल्कि शहरी समाज के विभिन्न स्तरों में उसका प्रभाव विद्यमान था। इन्हीं सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के माध्यम से गुप्तकालीन समाज की मानसिकता और जीवन-दृष्टि को समझा जा सकता है।
गुप्तकालीन उच्च वर्ग का जीवन और मनोरंजन
गुप्तकालीन समाज में उच्च वर्ग का जीवन अपेक्षाकृत विलासपूर्ण और सांस्कृतिक गतिविधियों से युक्त था। राजदरबार और सभाएँ केवल प्रशासनिक निर्णयों के केंद्र नहीं थीं, बल्कि साहित्य, संगीत और बौद्धिक विमर्श के प्रमुख स्थल भी थीं। कामसूत्र से यह संकेत मिलता है कि नगरों में अभिजात वर्ग के लिए संगीत, नृत्य, काव्य-पाठ और द्यूत-क्रीड़ा जैसे मनोरंजन सामान्य थे।
कालिदास के नाटकों और काव्यों में वर्णित नगर-जीवन यह दर्शाता है कि अभिजात वर्ग सौंदर्यबोध, शिष्टाचार और सामाजिक व्यवहार के निश्चित मानकों का पालन करता था। उत्सवों, व्रतों और सार्वजनिक समारोहों में उनकी सक्रिय भागीदारी सामाजिक प्रतिष्ठा का माध्यम थी। इस प्रकार गुप्तकालीन उच्च वर्ग का जीवन केवल भौतिक सुखों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें सांस्कृतिक परिष्कार और बौद्धिक रुचि भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
गणिका और देवदासी प्रथा
गुप्तकालीन सामाजिक जीवन में गणिकाओं का एक संगठित और विशिष्ट स्थान था। कामसूत्र में गणिकाओं के प्रशिक्षण, आय के स्रोत और सामाजिक व्यवहार का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे केवल मनोरंजन का साधन नहीं थीं, बल्कि शहरी सांस्कृतिक जीवन का एक स्वीकृत अंग थीं। नगरों में वे उत्सवों, सभाओं और सार्वजनिक आयोजनों से जुड़ी रहती थीं।
देवदासी प्रथा का स्वरूप इस काल में अभी संस्थागत नहीं हुआ था, जैसा कि उत्तरवर्ती मध्यकाल में दिखाई देता है। गुप्तकाल में देवदासियाँ मुख्यतः मंदिरों में नृत्य और संगीत से जुड़ी थीं, और उनका कार्य धार्मिक अनुष्ठानों से संबद्ध था। कालिदास द्वारा उज्जयिनी के महाकाल मंदिर के संदर्भ इस प्रारंभिक रूप की पुष्टि करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गुप्तकालीन देवदासी प्रथा सांस्कृतिक-धार्मिक भूमिका तक सीमित थी, न कि किसी कठोर सामाजिक संस्था के रूप में विकसित।
सामाजिक विषमता
यद्यपि गुप्तकाल को प्रायः “स्वर्णयुग” कहा जाता है, तथापि सामाजिक विषमता इस काल की एक स्थायी विशेषता बनी रही। उच्च वर्गों का जीवन विलासपूर्ण था, जबकि निम्न वर्गों को कठोर श्रम और सीमित साधनों में जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
यह विषमता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी दिखाई देती है। अतः गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन का मूल्यांकन करते समय इस असमानता को ध्यान में रखना आवश्यक है, ताकि “स्वर्णयुग” की अवधारणा को संतुलित और आलोचनात्मक दृष्टि से समझा जा सके।
गुप्तकालीन धार्मिक जीवन और राज्य की नीति
गुप्तकालीन धार्मिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि राज्य ने किसी एक धर्म को औपचारिक रूप से “राज्य-धर्म” घोषित नहीं किया। यद्यपि गुप्त शासक वैष्णव परंपरा से जुड़े थे और परमभागवत जैसी उपाधियाँ धारण करते थे, फिर भी शासन-व्यवस्था किसी संकीर्ण धार्मिक नीति पर आधारित नहीं थी। समुद्रगुप्त द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आयोजन वैदिक परंपरा के पुनरुत्थान का संकेत देता है, किंतु उसी समय बौद्ध और जैन संस्थाओं को भूमि-दान भी मिलता है।
चीनी यात्री फाह्यान का विवरण इस बात की पुष्टि करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता व्यापक थी और राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम। इससे स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल में धर्म राजकीय वैधता का साधन था, नियंत्रण का उपकरण नहीं।
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म का उत्कर्ष
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म का प्रसार केवल राजकीय संरक्षण का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे सामाजिक कारण भी थे। अवतार सिद्धांत विशेषतः राम और कृष्ण ने वैष्णव भक्ति को जनसामान्य के लिए सुलभ बनाया। पुराणिक परंपरा के प्रसार ने इस प्रक्रिया को और सुदृढ़ किया। मंदिर-उपासना का महत्व बढ़ने लगा और यज्ञ-प्रधान वैदिक परंपरा के साथ-साथ मूर्ति-पूजा सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बन गई। देवगढ़ का दशावतार मंदिर इस परिवर्तन का स्थापत्य प्रमाण प्रस्तुत करता है। मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहे, बल्कि भूमि-दान के कारण आर्थिक संस्थाओं के रूप में भी विकसित हुए।
गुप्तकाल में बौद्ध और जैन धर्म की स्थिति
गुप्तकाल को बौद्ध और जैन धर्म का “पतन-काल” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। यह सत्य है कि मौर्य और कुषाण काल जैसी राजकीय प्रधानता अब नहीं रही, किंतु बौद्ध संघ और विहार सक्रिय बने रहे। फाह्यान के विवरण से ज्ञात होता है कि भिक्षु-समुदाय, मठ और बौद्ध शिक्षा निरंतर चल रही थी।
कुमारगुप्त प्रथम द्वारा नालंदा महाविहार की स्थापना इस निरंतरता का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। नालंदा केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा-केंद्र था, जहाँ चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्यार्थी आते थे।
जैन धर्म भी गुप्तकाल में क्षेत्रीय स्तर पर सशक्त रहा। स्कंदगुप्त के काल में जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का निर्माण और वैन्यगुप्त द्वारा जैन-बौद्ध संस्थाओं को दान यह दर्शाता है कि जैन धर्म को भी राजकीय विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।
गुप्तकाल में धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक समन्वय
गुप्तकालीन धार्मिक सहिष्णुता को आधुनिक अर्थों में “धर्मनिरपेक्षता” कहना उचित नहीं होगा, किंतु यह स्पष्ट है कि विभिन्न धर्मों के बीच टकराव के प्रमाण अत्यंत सीमित हैं। प्रशासन में विभिन्न धर्मों के अनुयायियों की नियुक्ति इस सहिष्णुता का व्यावहारिक रूप थी।
समुद्रगुप्त द्वारा बौद्ध विद्वान वसुबंधु का संरक्षण, चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में शैव वीरसेन और बौद्ध आम्रकार्दव जैसे अधिकारियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि धर्म प्रशासनिक उन्नति में बाधा नहीं था।
गुप्तकाल में भारतीय धर्मों का अंतर्राष्ट्रीय प्रसार
गुप्तकाल में भारतीय धर्मों का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी स्पष्ट दिखाई देता है। जावा, सुमात्रा और बोर्नियो जैसे क्षेत्रों में संस्कृत अभिलेख, भारतीय देवी-देवताओं के स्थानीय रूप और मंदिर स्थापत्य इसके प्रमाण हैं। यह प्रसार किसी गुप्त सम्राट की सैन्य नीति का परिणाम नहीं था, बल्कि व्यापार, ब्राह्मण प्रवास और सांस्कृतिक संपर्कों की दीर्घकालिक प्रक्रिया का फल था। इसी कारण इतिहासकार इसे “भारतीयकरण” की सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हैं, न कि राजनीतिक उपनिवेशवाद।
गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन: एक समग्र मूल्यांकन
गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन को केवल “स्वर्णयुग” की संज्ञा देकर समझना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा। इस काल में एक ओर वर्ण-व्यवस्था की संरचना स्पष्ट रूप से विद्यमान थी, सामाजिक असमानताएँ बनी रहीं और शूद्रों व स्त्रियों की स्थिति सीमित रही; वहीं दूसरी ओर पेशागत गतिशीलता, शहरी जीवन का विस्तार और सांस्कृतिक परिष्कार समाज में परिवर्तन की प्रवृत्तियों को भी दर्शाते हैं। इस प्रकार गुप्तकालीन समाज स्थिरता और परिवर्तन, दोनों का सहअस्तित्व प्रस्तुत करता है। इसी सामाजिक ढाँचे के भीतर गुप्तकालीन धार्मिक जीवन विकसित हुआ। वैष्णव धर्म को राजकीय संरक्षण अवश्य प्राप्त था, किंतु राज्य ने किसी एक धार्मिक परंपरा को समाज पर थोपने का प्रयास नहीं किया। बौद्ध और जैन धर्मों की स्थिति को ‘पतन’ कहना भ्रामक होगा, क्योंकि नालंदा जैसे संस्थानों का विकास, जैन प्रतिमाओं का निर्माण और विभिन्न धर्मों को दिए गए दान उनकी संस्थागत निरंतरता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। अभिलेखीय साक्ष्य और फाह्यान का विवरण यह संकेत देता है कि धार्मिक बहुलता इस युग की व्यावहारिक वास्तविकता थी।
राज्य और धर्म के संबंधों में भी संतुलन दिखाई देता है। गुप्त शासकों ने धर्म को राजकीय वैधता का आधार बनाया, किंतु उसे प्रशासनिक दमन का उपकरण नहीं बनने दिया। प्रशासन में विभिन्न धर्मों के अनुयायियों की उपस्थिति और धार्मिक संघर्षों के अभाव से स्पष्ट होता है कि सहिष्णुता किसी घोषित नीति से अधिक शासन की व्यवहारिक आवश्यकता थी। इस प्रकार गुप्तकाल को न तो पूर्ण आदर्श समाज कहा जा सकता है और न ही सामाजिक जड़ता का काल, बल्कि यह संतुलन, समन्वय और सीमित परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक चरण था।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
