खिलजी क्रांति: दिल्ली सल्तनत का क्रांतिकारी पुनर्गठन और शासक वर्ग का उदय

Historical portrait of Jalaluddin Khilji, founder of the Khilji dynasty and pioneer of the Khilji Revolution in Delhi Sultanate, 13th-century Indian medieval history.
जलालुद्दीन खिलजी का चित्र, खिलजी वंश के संस्थापक और दिल्ली सल्तनत में खिलजी क्रांति के प्रमुख व्यक्तित्व

दिल्ली सल्तनत का आंतरिक पुनर्गठन: खिलजी क्रांति और शासक वर्ग का परिवर्तन

 

दिल्ली सल्तनत के इतिहास में खिलजी शासन (1290-1320) एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दौरान, शासक वर्ग, प्रशासन और समाज में बड़े बदलाव हुए। इस दौरान, खिलजी क्रांति ने न केवल राजनीतिक ढांचे को बदला, बल्कि शासक वर्ग का परिवर्तन, प्रशासन और समाज में बड़े बदलाव लाए। आइए, इस लेख में जलालुद्दीन खिलजी और अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल की नीतियों, तुर्क वर्चस्व के अंत और सामाजिक आधार विस्तार के प्रभावों को विस्तार से समझते हैं।

क्या आप जानते हैं कि खिलजी क्रांति ने दिल्ली सल्तनत को तुर्की एकाधिकार से मुक्त कर भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की दिशा बदल दी? आगे पढ़ें कैसे।

 

खिलजी क्रांति के तहत शासक वर्ग का विस्तार

 

खिलजी शासन से पहले, दिल्ली सल्तनत पर तुर्क अभिजात वर्ग का वर्चस्व था लेकिन, खिलजी क्रांति ने यह परंपरा तोड़ दी।। ममलुक या इलबारी कहलाने वाले तुर्क शासकों ने केवल उच्च वंश के तुर्कों को ही महत्वपूर्ण पद दिए थे। लेकिन, खिलजियों के सत्ता में आने के बाद यह परंपरा टूट गई।

 

पूर्ववर्ती शासन (ममलुक/इलबारी) बनाम खिलजी क्रांति के बाद: शासक वर्ग में बदलाव

पूर्ववर्ती शासन (ममलुक/इलबारी)खिलजी क्रांति के बाद
केवल उच्च वंश के तुर्कों को पदगैर-तुर्कों का उदय (जैसे मलिक काफूर)
संकीर्ण सामाजिक आधारविविधता और समावेशिता

 

खिलजी क्रांति में गैर-तुर्कों का उदय और शासक वर्ग का परिवर्तन

 

जलालुद्दीन खिलजी ने शासक वर्ग के सामाजिक आधार को विस्तारित किया। उन्होंने तुर्कों के साथ-साथ अन्य जातियों और वर्गों के लोगों को भी उच्च पदों पर नियुक्त किया। इससे शासन में विविधता आई और गैर-तुर्कों को आगे बढ़ने का मौका मिला।

उदाहरण के लिए, मलिक नायक, एक हिंदू, को समाना और सुनाम का गवर्नर बनाया गया। जैसे कि रायहान और याकूत जैसे गैर-तुर्कों को उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। इसी तरह, मलिक काफूर जैसे गैर-तुर्क गुलामों को भी उच्च पद मिले। यह बदलाव न केवल राजनीतिक था, बल्कि प्रशासनिक सुधार का आधार बना, क्योंकि गैर-तुर्क अधिकारी अधिक वफादार साबित हुए। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के अनुसार, इससे सल्तनत की स्थिरता बढ़ी। इस प्रकार, शासक वर्ग के सामाजिक आधार का विस्तार हुआ, और सत्ता में विविधता आई। यह बदलाव दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था।

 

तुर्क अभिजात वर्ग का विरोध: खिलजी क्रांति की चुनौतियाँ

 

खिलजियों के सत्ता में आने से तुर्क अभिजात वर्ग नाराज हो गया। बरनी के अनुसार, दिल्ली के लोग, जो अस्सी साल से तुर्क शासकों के अधीन थे, खिलजियों को सिंहासन पर देखकर हैरान रह गए। खिलजी क्रांति ने तुर्क वर्चस्व के अंत को चिह्नित किया। हालांकि, जलालुद्दीन ने तुर्क अभिजात वर्ग को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने बलबन के भतीजे मलिक छज्जू को कारा का गवर्नर बनाया, जो एक समृद्ध और महत्वपूर्ण क्षेत्र था। 1290 में जलालुद्दीन के सत्ता प्राप्ति पर तुर्क सरदारों ने षड्यंत्र रचे, लेकिन उनकी उदार नीति ने विद्रोह को दबाया।

 

जलालुद्दीन खिलजी की उदार नीतियाँ: खिलजी क्रांति का प्रारंभिक चरण

 

जलालुद्दीन खिलजी (1290-96) ने खिलजी क्रांति में उदार और मानवतावादी नीतियों को अपनाया। जलालुद्दीन खिलजी ने संकीर्ण एकाधिकारवाद की बजाय एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। उनका मानना था कि शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण करना है। उन्होंने अपनी नीतियों में सभी समुदायों के सहयोग की आवश्यकता को स्वीकार किया। उनका मानना था कि राज्य का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण होना चाहिए।

 

हिंदुओं के प्रति उदार नीति

 

जलालुद्दीन ने हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता दिखाई। उन्होंने हिंदुओं को मूर्ति पूजा और धार्मिक प्रथाओं का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता दी। उनका मानना था कि जबरन धर्मांतरण या आतंक की नीति से सच्चा इस्लामिक राज्य नहीं बनाया जा सकता। उनकी नीतियों ने धर्मनिरपेक्ष शासन की नींव रखी, जो अलाउद्दीन ने आगे बढ़ाया। इससे सल्तनत में सामाजिक सद्भाव बढ़ा, जो मंगोल आक्रमणों के खिलाफ एकजुटता लाया।

 

खिलजी क्रांति में सद्भावना: जलालुद्दीन की राज्य अवधारणा

 

जलालुद्दीन ने एक नए प्रकार के राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की। यह राज्य सभी समुदायों के लोगों की सद्भावना और समर्थन पर आधारित था। उनका मानना था कि राज्य का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण होना चाहिए। बरनी के अनुसार, जलालुद्दीन “चींटी को भी नुकसान नहीं पहुंचाने” की नीति में विश्वास रखते थे।

इसके अलावा, उन्होंने तुर्क अभिजात वर्ग को भी महत्व दिया। उदाहरण के लिए, बलबन के भतीजे मलिक छज्जू को कारा का गवर्नर बनाया गया। हालांकि, मलिक छज्जू ने विद्रोह किया, लेकिन जलालुद्दीन ने उसे कठोर सजा नहीं दी। यह उनकी उदारता को दर्शाता है।

 

अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार: खिलजी क्रांति का चरम

 

जलालुद्दीन के बाद, अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) ने सत्ता संभाली। उन्होंने अपने चाचा की उदार नीतियों को छोड़कर कठोरता और भय को शासन का आधार बनाया। उनका मानना था कि राज्य की स्थिरता के लिए भय आवश्यक है।

 

अभिजात वर्ग पर नियंत्रण

 

अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) ने खिलजी क्रांति में कठोरता को आधार बनाया। अलाउद्दीन ने अभिजात वर्ग पर कड़ा नियंत्रण रखा। उन्होंने बलबन के द्वारा स्थापित की जासूसी प्रणाली को फिर से शुरू किया। अभिजात वर्ग को एक-दूसरे के साथ संबंध बनाने या पार्टियां आयोजित करने से मना किया गया। शादी के गठजोड़ के लिए भी सुल्तान की अनुमति लेनी पड़ती थी।

इसके अलावा, उन्होंने दान की गई भूमि को जब्त कर लिया और शराब पीने पर प्रतिबंध लगा दिया। इन नीतियों से अभिजात वर्ग में भय का माहौल बना। उन्होंने 4 मुख्य बाजारों (अनाज, कपड़ा, घोड़े, पशु) पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे महंगाई रुकी। अमीर खुसरो के अनुसार इससे राज्य की आय 4 गुना बढ़ी। यह आर्थिक स्थिरता ने दक्षिण भारत विजय को संभव बनाया।

 

खिलजी क्रांति में गैर-तुर्कों को बढ़ावा

 

अलाउद्दीन ने शासक वर्ग का परिवर्तन जारी रखा। अलाउद्दीन ने गैर-तुर्कों को भी महत्व दिया। उन्होंने जफर खान, नुसरत खान और मलिक काफूर जैसे गैर-तुर्कों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। इससे दिल्ली सल्तनत की सेना और प्रशासन में विविधता आई, जो तुगलक काल तक प्रभावी रही।

 

खिलजी क्रांति: प्रशासनिक और सामाजिक बदलाव

 

खिलजी शासन के दौरान, दिल्ली सल्तनत में एक क्रांति आई। इस क्रांति ने प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बदल दिया। भूमि राजस्व सुधार और व्यापार नियंत्रण ने आर्थिक क्रांति लाई। उन्होंने शरिया से ऊपर राज्य कल्याण रखा, जैसे हिंदू मंदिरों को संरक्षण। यह नीति ने सल्तनत को लंबे समय तक टिकाया, लेकिन उलेमा का विरोध भी झेला।

 

भूमि राजस्व और व्यापार नियंत्रण

 

अलाउद्दीन ने भूमि राजस्व और व्यापार को नियंत्रित किया। उन्होंने भूमि की पैमाइश की और किसानों से लिया जाने वाला कर बढ़ाया। इससे राज्य की आय में वृद्धि हुई। इसके अलावा, उन्होंने व्यापार को भी नियंत्रित किया। इससे प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत हुई और राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी।

अलाउद्दीन ने राज्य के प्रशासन को केंद्रीकृत किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी विद्रोह न हो और प्रशासन में कोई असहमति न आए। इसके लिए उन्होंने अपने अधिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी और उन पर विशेष नियंत्रण स्थापित किया।

 

अलाउद्दीन की धर्मनिरपेक्ष नीति

 

अलाउद्दीन ने यह माना कि भारत में एक वास्तविक इस्लामी राज्य स्थापित करना मुश्किल है। उन्होंने शरिया के नियमों से परे, राज्य के कल्याण के लिए जो आवश्यक था, वह किया। यह धर्मनिरपेक्ष नीति दिल्ली सल्तनत के लिए नई थी।

 

खिलजी क्रांति का प्रभाव: दिल्ली सल्तनत पर दीर्घकालिक विरासत

 

खिलजी क्रांति ने न केवल प्रशासनिक ढांचे को बदला, बल्कि तुर्क वर्चस्व के अंत से नई शुरुआत की। जलालुद्दीन ने उदारता और मानवतावाद को बढ़ावा दिया, जबकि अलाउद्दीन ने कठोरता और प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया। इस क्रांति ने तुगलक और लोदी वंशों को प्रभावित किया, जैसे मुहम्मद बिन तुगलक ने अलाउद्दीन के बाजार नियंत्रण को अपनाया।

इस दौरान, “खिलजी क्रांति” ने न केवल प्रशासनिक ढांचे को बदला, बल्कि शासक वर्ग का सामाजिक आधार विस्तारित हुआ, गैर-तुर्कों को महत्व मिला, और प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव हुए। इससे सामाजिक गतिशीलता बढ़ी, जिससे मध्यकालीन भारत में गैर-तुर्क मुस्लिमों का उदय हुआ। खिलजी क्रांति ने न केवल दिल्ली सल्तनत, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित किया।

इस प्रकार, खिलजी शासन दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बना। यह काल न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों का भी साक्षी रहा।  क्या खिलजी क्रांति को भारत की पहली ‘सामाजिक क्रांति’ कहा जा सकता है? कमेंट कर के बताएं।

 

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