केन्या के राष्ट्रपिता और पहले राष्ट्रपति Jomo Kenyatta ने अपनी किताब Suffering without Bitterness: The founding of the Kenya Nation में लिखते है कि “जब ब्रिटिश पहली बार अफ्रीका आए, तो उनके हाथों में बाइबल थी, और हमारे पास जमीन। उन्होंने हम से कहा चलो प्रार्थना करते हैं, हमने जब आंखें खोली तो हमारे हाथों में बाइबल थी और उनके पास हमारी जमीनें।”
औपनिवेशिक शासन की संस्कृति ने कुछ ऐसे ही भारत में भी काम किया।
1857 की क्रांति भले ही कुचली जा चुकी थी पर दूध के जले अंग्रेज अब भी सतर्क थे। अंग्रेजो के कई कानून अभी भी भारतीयों को खून के आंसू रुला रहे थे। खासतौर पर कृषि से जुड़े ऐसे कई कानून थे जिनके चलते किसानों और आदिवासियों की जमीनी छानी जा रही थी।
औपनिवेशिक शासन की पृष्ठभूमि और भारतीय आदिवासी समाज
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन भारत के विभिन्न हिस्सों में न केवल राजनैतिक दमन का प्रतीक था, बल्कि उसने भारतीय कृषि और समाज के मौलिक ढांचे को भी बदल दिया। ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने भारतीय कृषि व्यवस्था को एक सामंती व्यवस्था में बदलना शुरू कर दिया। जब ब्रिटिश भारत में आए, तो उन्होंने अपनी व्यवस्था लागू करने के लिए जमीन, संसाधनों और स्थानीय समुदायों का शोषण किया। आदिवासी समाज, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर थे, सबसे अधिक प्रभावित हुए। अंग्रेजों द्वारा गैर आदिवासियों को छोटा नागपुर पठार पर बसने और खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा। इसका नतीजा यह निकला कि कुछ जगहों पर जनजातियां अपनी जमीनों पर अपना अधिकार खो चुकी थी। वह अब मात्र खेतिहर मजदूर बनकर रह गई थी।
ब्रिटिश नीतियों का प्रभाव और मुंडा समाज का संकट
ब्रिटिश शासन के अधीन, राजस्व संग्रहण की नई प्रणालियाँ लागू की गईं, जिससे मुंडा समाज पर भारी बोझ पड़ा। भूमि अधिग्रहण और नए जमींदारी कानूनों ने आदिवासी समाज को हाशिए पर धकेल दिया। कई गैर-आदिवासी लोग इस क्षेत्र में आकर बसने लगे और धीरे-धीरे आदिवासी समुदाय की जमीनों पर कब्जा कर लिया। मुंडाओं को उनकी जमीनों से बेदखल किया गया, जिससे वे केवल खेतिहर मजदूर बन कर रह गए।
इस लेख में हम बात करेंगे हाशिए पर चल रही एक ऐसी लड़ाई के बारे में जिसने आजादी के मायने पर सवाल खड़े कर दिए। हम बात करेंगे मुंडा विद्रोह की। हम बात करेंगे धरती आबा यानी पिता बिरसा मुंडा की जो डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी अपने लोगों के लिए ईश्वर की तरह पूजनीय है।
बिरसा मुंडा का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र के उलीहातु गांव में हुआ था। वह मुंडा जनजाति से संबंध रखते थे, जो छोटानागपुर पठार में रहने वाली प्रमुख आदिवासी जनजातियों में से एक थी। उस समय, ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आदिवासी समाज की स्थिति दयनीय थी। ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने आर्थिक और सामाजिक शोषण के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों की परंपरागत संरचना को तोड़ दिया था।
बिरसा का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों से भरा था। उनका परिवार गरीबी में जीता था और ब्रिटिश नीतियों के कारण उनकी ज़मीन भी छीनी जा रही थी। बिरसा मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा सालगा में जयपाल नाग की देखरेख में शुरू हुई थी। उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए एक जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लिया, जिसके लिए उन्हें ईसाई धर्म अपनाना पड़ा। लेकिन यह कदम उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। मिशनरी शिक्षा के दौरान ही उन्होंने अंग्रेजों के द्वारा आदिवासी समाज पर किए जा रहे अत्याचारों को करीब से समझा। जल्द ही उन्हें यह एहसास हुआ कि ब्रिटिश मिशनरियां आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने के प्रयास में लगी हुई हैं। इस बोध ने उनके अंदर गहरा असंतोष पैदा किया, और उन्होंने ईसाई धर्म छोड़ने का निर्णय लिया।
एक घटना का उल्लेख मिलता है, जिसमें उनके एक ईसाई अध्यापक ने कक्षा में मुंडा समुदाय के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। बिरसा ने इसका विरोध करते हुए कक्षा का बहिष्कार कर दिया। उनके इस कदम के बाद उन्हें वापस कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया, और अंततः उन्हें स्कूल से भी निकाल दिया गया।
इसके बाद, बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म का परित्याग करते हुए ‘बिरसैत’ नामक एक नए धार्मिक आंदोलन की शुरुआत की, और अपने पारंपरिक आदिवासी धार्मिक व्यवस्था, मान्यता और परंपरा में लौट आए। इस नए धर्म को मुंडा और उरांव जनजातियों के लोगों ने तेजी से अपनाया। बिरसा ने अपने धर्म और सांस्कृतिक पहचान को अंग्रेजों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण अभियानों के खिलाफ एक चुनौती के रूप में खड़ा किया।
बिरसा का धार्मिक और सामाजिक आंदोलन
1895 में, बिरसा ने खुद को एक मसीहा घोषित किया और दावा किया कि वह अपने लोगों की खोई हुई गरिमा और स्वाधीनता को वापस दिलाने के लिए आया है। उन्होंने अपने अनुयायियों से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह करने का आह्वान किया। इस विद्रोह को “उलगुलान” (महान विद्रोह) के नाम से जाना गया। यह न सिर्फ ब्रिटिश शासन के खिलाफ, बल्कि जमींदारों और मिशनरियों के खिलाफ भी था, जो आदिवासियों का शोषण कर रहे थे।
बिरसा ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे लगान न चुकाएं और ब्रिटिश कानूनों का पालन न करें। इसके साथ ही, उन्होंने आदिवासी समाज में सामाजिक सुधारों की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने शराब सेवन, अंधविश्वास और धार्मिक अनुष्ठानों को समाप्त करने पर जोर दिया। उन्होंने आदिवासी समाज को एकजुट करने और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
उलगुलान का आरंभ और संघर्ष
बिरसा मुंडा के संघर्ष की शुरुआत चाईबासा से हुई थी, जहां उन्होंने 1886 से 1890 तक चार वर्ष बिताए। इसी दौरान उनके मन में आदिवासियों की दुर्दशा और अंग्रेजों की भूमि नीति के प्रति आक्रोश बढ़ता गया। चाईबासा से ही उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आदिवासी आंदोलन की नींव रखी। इसी समय उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया:
“अबूया राज एते जाना/ महारानी राज टुडू जाना”
(अर्थात, अब मुंडा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज खत्म हो गया है)
बिरसा मुंडा ने अपने लोगों को ब्रिटिश सरकार को कोई टैक्स न देने का आदेश दिया। 19वीं सदी के अंत तक अंग्रेजों की भूमि नीति ने पारंपरिक आदिवासी भूमि व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया था। साहूकारों और बाहरी लोगों ने आदिवासियों की ज़मीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया था, और उन्हें जंगल के संसाधनों का उपयोग करने से भी रोक दिया गया था। यह स्थिति आदिवासियों के लिए बेहद कठिन थी, और इसी के खिलाफ बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) का आह्वान किया।
बिरसा अपने समय के एक प्रभावशाली नेता और वक्ता थे। उनके जोशीले भाषण आदिवासी समुदाय को संगठित करने का एक प्रमुख साधन बन गए थे। बिरसा अपने भाषणों में कहते थे:
“डरो मत। मेरा साम्राज्य शुरू हो चुका है। सरकार का राज समाप्त हो चुका है। उनकी बंदूकें लकड़ी में बदल जाएंगी। जो लोग मेरे राज को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उन्हें रास्ते से हटा दो।”
इस आंदोलन में मुंडाओं ने पुलिस स्टेशनों और ज़मींदारों की संपत्ति पर हमले शुरू कर दिए थे। कई स्थानों पर ब्रिटिश यूनियन जैक को उतारकर सफ़ेद झंडा फहराया जाने लगा, जो मुंडा राज का प्रतीक था।
बिरसा को पहली बार 24 अगस्त 1895 को गिरफ्तार किया गया था, और उन्हें दो साल की सज़ा सुनाई गई। 1897 में जब उन्हें रिहा किया गया, तो उन्होंने भूमिगत होकर अंग्रेजों के खिलाफ अपने आंदोलन को और संगठित किया। गुप्त बैठकों के ज़रिए बिरसा अपने लोगों को संगठित करते रहे और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष जारी रखा।
जेल से रिहा होने के बाद इस बार उनके रडार पर इसी मिशनरियां भी शामिल थी। मिशनरियों द्वारा कराए जा रहे धर्म परिवर्तन के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल दिया। इसके चलते ईसाई मिशनरियों का नाराज होना लाज़मी था। इसी के चलते बिरसा मुंडा को कुछ समय के लिए भूमिगत होना पड़ा पर भूमिगत रहते हुए वह क्रांति की मिसाल जलाए रखें।
28 जून 1898 को सामाजिक बराबरी के लिए उन्होंने चुटियां के मंदिर में आंदोलन शुरू किया। 1899 के दिसंबर माह में लगभग 7000 लोगों उलगुलान की शुरुआत करने के लिए एकत्रित हुए। यहां स्वराज कायम करने की घोषणा की गई। खुले तौर पर यह घोषणा की गई की असली दुश्मन अंग्रेज हैं ना कि ईसाई धर्म अपना चुके मुंडा लोग। इसी से पता चलता है कि धर्म परिवर्तन उसे वक्त अपने चरम पर था।
बिरसा अपने आदिवासी लोगों के लिए एक गुरु, एक संत, ईश्वर बन गए थे। आज भी वह तमाम लोक गीतों में अमर हैं। आज भी वह अपने लोगों पर और अपने क्षेत्र में, उनका जबरदस्त प्रभाव दिखाई देता है।
5 जनवरी 1990 को बिरसा के साथियों ने खूंटी गांव में दो पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी और 2 दिन के बाद उन्होंने खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला कर एक पुलिस वाले को मार दिया। साथ ही इलाके की कई जमींदारों पर हमले किए गए। इन घटनाओं से ब्रिटिश शासन परेशान हो गया और उन्होंने बिरसा मुंडा पर 500 रुपए का इनाम रखा, जो आज से लगभग 125 साल पहले के हिसाब से एक बड़ी राशि थी। विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने डेढ़ सौ सैनिकों को खूंटी गांव भेजा। दमवारी हिल्स पर इन सैनिकों ने आदिवासियों का वैसा ही नरसंहार किया जैसा लगभग 20 साल बाद जलियांवाला बाग में किया गया था। मंजर यह था की पहाड़ियां इंसानी लाशों से पट गई थी।
हालांकि बिरसा मुंडा इससे बच निकले थे और उन्होंने सिंहभूमि की पहाड़ियों में शरण ली। बिरसा मुंडा कभी पकड़ में ना आते पर उनके सर पर रखा गया ₹500 के सरकारी इनाम ने उनके करीबियों को इनाम के लालच में आने से ना रोक सकी। इसी कारण 3 फरवरी 1900 को उनको गिरफ्तार कर लिया गया।
बिरसा पर लूट, दंगा, और हत्या के 15 मामलों में आरोप लगाए गए थे, लेकिन यह साफ़ था कि जनता अब उसे केवल एक अपराधी नहीं बल्कि अपने नायक के रूप में देख रही थी। जेल में बिरसा मुंडा को पूरी तरह से एकांत में रखा गया। तीन महीने तक उन्हें किसी से मिलने की अनुमति नहीं थी, और केवल एक घंटे के लिए रोज़ सूरज की रोशनी पाने के लिए अपनी कोठरी से बाहर निकाला जाता था।
एक दिन, बिरसा जब सोकर उठे तो उन्हें तेज़ बुख़ार और पूरे शरीर में भयानक दर्द महसूस हुआ। उनका गला इतना ख़राब हो चुका था कि एक घूंट पानी पीना भी मुश्किल हो गया। धीरे-धीरे उनकी स्थिति बिगड़ने लगी, और कुछ ही दिनों में उन्हें ख़ून की उल्टियां शुरू हो गईं। 9 जून, 1900 की सुबह 9 बजे, बिरसा ने आखिरी सांस ली और उनका संघर्ष समाप्त हो गया।
बाद में, रांची जेल के अधीक्षक कैप्टन एंडरसन ने जांच समिति के सामने दिए अपने बयान में कहा, “जब बिरसा के शव को उनकी कोठरी से बाहर लाया गया, तो जेल में कोहराम मच गया। उनके सभी अनुयायियों को बुलाकर शव की पहचान करने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने डर के कारण ऐसा करने से इनकार कर दिया।”
9 जून की शाम साढ़े पाँच बजे, उनके शरीर का पोस्टमॉर्टम किया गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मे मौत का आधिकारिक कारण हैजा बताया गया।हालांकि, बिरसा के साथियों का मानना था कि उन्हें ज़हर दिया गया था।
बिरसा मुंडा की मौत के साथ ही उनके आंदोलन की भी मौत हो जाती है। लेकिन उन्होंने जो मांग रखी थी वह 1908 में छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट के माध्यम से मिला। जिसके अंतर्गत आदिवासियों की जमीनों को किसी और को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता और यह एक्ट आज भी आदिवासियों के लिए ढाल की तरह काम कर रहा है।
बिरसा मुंडा की विरासत
बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज को जो पहचान दिलाई, वह आज भी जीवित है। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी शिक्षाएं और उनका संघर्ष आदिवासी समाज में प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। बिरसा मुंडा को आदिवासी समाज में “धरती आबा” (जमीन के पिता) के रूप में पूजा जाता है। उनकी विरासत आज भी झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों में जीवित है।
बिरसा के आंदोलन ने न सिर्फ आदिवासी समाज को ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़ा किया, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उनके संघर्ष ने यह साबित कर दिया कि आदिवासी समाज भी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ सकता है और अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ खड़ा हो सकता है।
निष्कर्ष
बिरसा मुंडा का जीवन और उनका विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके द्वारा किए गए कार्य और उनके संघर्ष ने न केवल आदिवासी समाज को जागरूक किया, बल्कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के शोषणकारी तंत्र को चुनौती दी। आज, बिरसा मुंडा न केवल आदिवासी समाज के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी लड़ाई ने यह सिखाया कि किसी भी समाज की स्वतंत्रता की लड़ाई में उसकी सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण होती है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.


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