अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान: नीति, विजय और ऐतिहासिक मूल्यांकन

 

भूमिका : अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान – ऐतिहासिक संदर्भ और महत्त्व

 

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना के रूप में देखा जाता है। यह अभियान केवल सैनिक विजय की श्रृंखला नहीं था, बल्कि उत्तर भारत की सल्तनती सत्ता और दक्षिण भारत की प्राचीन, संपन्न तथा राजनीतिक रूप से विभाजित शक्तियों के बीच पहली व्यवस्थित मुठभेड़ का प्रतिनिधित्व करता था। 13वीं शताब्दी के अंत तक दिल्ली सल्तनत उत्तर भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर चुकी थी, किंतु विशाल स्थायी सेना के रख-रखाव, मंगोल आक्रमणों के निरंतर दबाव और आंतरिक प्रशासनिक सुधारों के लिए सुल्तान को पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता थी। ऐसे में दक्षिण भारत, जो लंबे समय तक विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा था और जहाँ मंदिरों तथा राजकोषों में अपार संपत्ति संचित थी, स्वाभाविक रूप से सुल्तान की दृष्टि में आया।

इसी पृष्ठभूमि में अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान आरंभ होता है, जिसका उद्देश्य न तो दक्षिण भारत का तत्काल प्रशासनिक विलय था और न ही केवल सैनिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन, बल्कि आर्थिक संसाधनों की प्राप्ति और राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना था। इस अभियान ने न केवल दिल्ली सल्तनत की आंतरिक नीतियों को प्रभावित किया, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक संबंधों की दिशा को भी परिवर्तित किया।

अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत पर आक्रमण क्यों किया?
अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान मुख्यतः आर्थिक और राजनीतिक कारणों से प्रेरित था। दक्षिण भारत लंबे समय तक विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा था, जिसके कारण वहाँ अपार धन-संपत्ति संचित थी। इस धन का उपयोग अलाउद्दीन ने विशाल स्थायी सेना के रख-रखाव, मंगोल आक्रमणों के प्रतिरोध और अपने प्रशासनिक सुधारों के लिए किया। साथ ही, दक्षिण भारत की राजनीतिक विघटन अवस्था ने इन अभियानों को अपेक्षाकृत सरल बना दिया।

मलिक काफूर का दक्षिण भारत अभियानों में क्या महत्व था?
मलिक काफूर अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियानों का प्रमुख सेनापति और वास्तविक कार्यान्वायक था। उसी के नेतृत्व में देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और माबर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों पर सफल सैन्य अभियान किए गए। मलिक काफूर ने केवल सैन्य विजय ही नहीं प्राप्त की, बल्कि दक्षिणी राज्यों को सल्तनत की आर्थिक अधीनता में लाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

 

अलाउद्दीन (अली गुरशास्प) को नव सिंहासनारूढ़ के साथ।
जामी अल-तवारीख (लगभग 1314 ई.) में चित्रित अलाउद्दीन (अली गुरशास्प)

 

दक्षिण भारत की राजनीतिक स्थिति : 13वीं शताब्दी के अंत का परिदृश्य

 

अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों के समय दक्षिण भारत राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत विखंडित अवस्था में था। यद्यपि यहाँ शक्तिशाली और संपन्न राज्य विद्यमान थे, फिर भी उनमें आपसी एकता, संगठन और सहयोग का अभाव था। प्रमुख राज्य परस्पर ईर्ष्या, सीमा विवादों और उत्तराधिकार संघर्षों में उलझे हुए थे। परिणामस्वरूप दक्षिण भारत किसी भी बाह्य आक्रमण के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ था। यही राजनीतिक विघटन आगे चलकर दिल्ली सल्तनत के दक्षिण भारत अभियान की सफलता का आधार बना।

 

दक्षिण प्रायद्वीप के चार प्रमुख राज्य

इस समय दक्षिण प्रायद्वीप चार प्रमुख राज्यों में विभक्त था,
(1) देवगिरि, (2) तेलंगाना, (3) होयसल और (4) पांड्य।
इनके अतिरिक्त अनेक छोटे सामंत राज्य भी थे, जो प्रायः इन्हीं शक्तियों के अधीन अथवा उनके प्रभाव क्षेत्र में आते थे।

 

देवगिरि राज्य : भौगोलिक स्थिति, शक्ति और महत्व

 

देवगिरि का राज्य उत्तर भारत और दक्षिण प्रायद्वीप के मध्य स्थित होने के कारण विशेष रणनीतिक महत्व रखता था। इसके उत्तर में विंध्याचल पर्वत, उत्तर-पश्चिम में मालवा और गुजरात, पूर्व तथा दक्षिण में तेलंगाना और द्वारसमुद्र तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट स्थित थे। विंध्य पर्वतमाला द्वारा सुरक्षित रहने के कारण यह राज्य 11वीं से 13वीं शताब्दी के तुर्क आक्रमणों से प्रायः बचा रहा। इस सुरक्षा ने देवगिरि को न केवल राजनीतिक रूप से स्थिर रखा, बल्कि आर्थिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध बना दिया। यही कारण है कि अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान में देवगिरि प्रथम लक्ष्य बना।

 

यादव शासक और देवगिरि की समृद्धि

देवगिरि में यादव वंश का शासन था, जो अपनी आर्थिक संपन्नता और क्षेत्रीय विस्तार के लिए प्रसिद्ध था। अलाउद्दीन खिलजी का समकालीन देवगिरि का शासक रामचंद्र देव था। 13वीं शताब्दी में यादव राज्य ने सिंघण और रामचंद्र देव के शासनकाल में उल्लेखनीय उन्नति की। यादवों ने कृष्णा नदी तक के विस्तृत भू-भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया था।

प्रादेशिक विस्तार के साथ-साथ देवगिरि राज्य व्यापारिक गतिविधियों के कारण भी समृद्ध हुआ। उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले मार्गों पर नियंत्रण ने यादव राज्य को आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सुदृढ़ बना दिया। इस समृद्धि ने देवगिरि को दिल्ली सल्तनत के लिए एक आकर्षक लक्ष्य बना दिया।

 

तेलंगाना, होयसल और पांड्य राज्य : शक्ति के साथ अंतर्निहित दुर्बलताएँ

 

देवगिरि के दक्षिण-पूर्व में तेलंगाना राज्य स्थित था, जिसकी राजधानी वारंगल थी। काकतीय शासक प्रतापरुद्र देव के अधीन यह राज्य विदेशी व्यापार के कारण स्वर्ण-रजत से समृद्ध था और उसका दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ था। देवगिरि के दक्षिण में होयसलों का राज्य था, जिसकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। अलाउद्दीन खिलजी का समकालीन होयसल शासक बल्लाल तृतीय था। यादवों और चोलों के साथ निरंतर युद्धों ने होयसल राज्य की आंतरिक शक्ति को क्षीण कर दिया। सुदूर दक्षिण में पांड्य राज्य स्थित था, जिसकी राजधानी मदुरा थी। यहाँ उत्तराधिकार संघर्ष विशेषतः सुंदर पांड्य और वीर पांड्य का गृहयुद्ध ने राज्य को राजनीतिक रूप से अस्थिर कर दिया। यही अस्थिरता आगे चलकर दिल्ली सल्तनत के हस्तक्षेप का कारण बनी।

 

दक्षिण भारत की राजनीतिक विघटन अवस्था

इस प्रकार 13वीं शताब्दी के अंत में दक्षिण भारत राजनीतिक रूप से विभाजित, परस्पर संघर्षरत और असंगठित था। प्रमुख राज्य न तो किसी साझा रणनीति पर सहमत थे और न ही बाह्य आक्रमण के विरुद्ध संयुक्त प्रतिरोध की क्षमता रखते थे। यही राजनीतिक विघटन और पारस्परिक शत्रुता अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान की सफलता का प्रमुख आधार बनी।

 

दक्षिण भारत की आर्थिक संपन्नता : अभियान का वास्तविक आकर्षण

 

दक्षिण भारत लंबे समय तक विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा था। परिणामस्वरूप यहाँ के राजाओं और प्रजा ने सदियों तक धन का संचय किया। फ़ारसी इतिहासकार वस्साफ और मार्को पोलो जैसे विदेशी यात्रियों ने दक्षिण की अपार संपत्ति, बहुमूल्य वस्त्रों, रत्नजटित आभूषणों और विशाल कोषों का उल्लेख किया है। माबर की संपत्ति के बारे में मार्को पोलो का कहना है कि “जब राजा की मृत्यु होती है तो उसका कोई भी पुत्र उसके कोष को स्पर्श तक करने का साहस नहीं करता है, क्योंकि वे कहते हैं- जिस प्रकार हमारे पिता ने सारे कोष को एकत्रित किया है उसी प्रकार हमें अपनी ओर से एकत्र करना चाहिए”। पांड्य, यादव और होयसल शासकों ने मंदिरों और देवालयों के निर्माण पर अपार धन व्यय किया, जिससे ये स्थल केवल धार्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि आर्थिक भंडार भी बन गए। मसालिक उल अबसार के लेखक शिहाबुद्दीन अबुल अब्बास ने भी भारत की अतुल संपत्ति का उल्लेख किया है। उनके अनुसार विदेशियों का सोना हजारों वर्षों से हिंदुस्तान में आता रहा और बाहर कभी नहीं गया। यही अपार संपन्नता अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान का प्रमुख प्रेरक तत्व बनी। अमीर खुसरो, बरनी और फ़रिश्ता इस मत पर सहमत हैं कि अलाउद्दीन और मलिक काफूर दक्षिण से अपार धन-संपत्ति लूटकर दिल्ली लाए थे।

 

अभियानों की समयरेखा: एक नजर में

अलाउद्दीन खिलजी के प्रमुख दक्षिण भारत अभियानों की समयरेखा (UPSC नोट्स के लिए संक्षिप्त ओवरव्यू)

अभियानवर्षप्रमुख घटनामुख्य प्राप्ति/प्रभाव
देवगिरि प्रथम1296 ई.रामचंद्र देव की पराजय, सिंघण देव का हस्तक्षेप, संधि के माध्यम से अधीनताअपार लूट (600 मन सोना, 7 मन मोती, 1000 मन चाँदी), वार्षिक कर वचन, दिल्ली सल्तनत की आर्थिक मजबूती
देवगिरि द्वितीय1307 ई.रामचंद्र देव का विद्रोह दमन, देवल देवी का अपहरणरामचंद्र को ‘रायरायान’ उपाधि, नवसारी जागीर, दक्षिण अभियानों के लिए सहयोगी राज्य की स्थापना
वारंगल1309-1310 ई.प्रतापरुद्र देव की पराजय, मलिक काफूर का नेतृत्व, संधि100 हाथी, अपार धन (सोना-चाँदी), कोहिनूर हीरा, वार्षिक कर, दक्षिण विस्तार की शुरुआत
द्वारसमुद्र (होयसल)1311 ई.बल्लाल तृतीय की अधीनता, मलिक काफूर का अभियानअपार संपत्ति, हाथी-घोड़े, होयसल राज्य की राजनीतिक अधीनता, दक्षिणी राज्यों में प्रभुत्व वृद्धि
माबर (पांड्य)1311 ई.सुंदर पांड्य और वीर पांड्य का गृहयुद्ध, मदुरा की लूटअपार मोती-रत्न, 500 हाथी, 20,000 घोड़े, पांड्य राज्य की अस्थिरता, सल्तनत का सुदूर दक्षिण तक प्रभाव
देवगिरि तृतीय1318 ई.हरपाल देव का विद्रोह दमन, मलिक काफूर का अंतिम अभियानदेवगिरि का पूर्ण विलय, सल्तनती प्रशासन स्थापना, यादव वंश का अंत

 

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान दर्शाता सैन्य मार्ग मानचित्र
अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान के अंतर्गत मलिक काफूर द्वारा देवगिरि से माबर तक किए गए प्रमुख सैन्य अभियानों का ऐतिहासिक मानचित्र।

देवगिरि पर प्रथम आक्रमण (1296 ई.): अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान की शुरुआत

 

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान व्यवहारिक रूप से 1296 ई० में देवगिरि पर आक्रमण के साथ प्रारंभ होता है। यह आक्रमण दिल्ली सल्तनत के इतिहास में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण भारत की ओर किया गया पहला पूर्णतः सफल और निर्णायक अभियान था। यद्यपि समकालीन इतिहासकारों ने इसके कुछ व्यक्तिगत कारण भी बताए हैं, किंतु घटनाओं का क्रम स्पष्ट करता है कि यह आक्रमण अवसरवाद, आर्थिक उद्देश्य और रणनीतिक गणना का संयुक्त परिणाम था।

 

आक्रमण के कारणों की व्याख्या : समकालीन इतिहासकारों के मत

बरनी के अनुसार अलाउद्दीन अपनी पत्नी और सास से मनमुटाव के कारण दुखी होकर दिल्ली से दूर जाना चाहता था और इसी क्रम में वह देवगिरि की ओर गया। निज़ामुद्दीन और बदायूँनी ने भी इस मत का समर्थन किया है। ऊपर से यह प्रचार किया गया कि अलाउद्दीन राजपूत दुर्ग चंदेरी की विजय के लिए जा रहा है।

किन्तु आधुनिक दृष्टि से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह केवल आवरण (pretext) था। वास्तविक कारण देवगिरि की अपार संपन्नता, यादव राज्य की सैन्य स्थिति की कमजोरी तथा दक्षिण भारत की राजनीतिक विघटन अवस्था थी। अतः इस अभियान को आकस्मिक या भावनात्मक निर्णय मानना उचित नहीं होगा।

 

देवगिरि की तत्कालीन स्थिति और सैन्य कमजोरी

अलाउद्दीन खिलजी बड़ी सावधानी और तीव्रता के साथ विंध्य पर्वतों और नदियों को पार करता हुआ एलिचपुर पहुँचा। एलिचपुर से वह घाटी लजौरा की ओर बढ़ा, जो देवगिरि से लगभग बारह मील दूर स्थित थी। इस समय देवगिरि की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि राजा रामचंद्र देव का पुत्र सिंघण देव अपनी सेना के साथ दक्षिण अभियान पर गया हुआ था। अतः देवगिरि में संगठित सेना का अभाव था। फ़रिश्ता का यह कथन कि सिंघण देव तीर्थयात्रा पर गया था, अधिक विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इस उद्देश्य से राज्य की मुख्य सेना को ले जाने का कोई औचित्य नहीं था।

 

घाटी लजौरा का संघर्ष और दक्षिणवासियों का प्रतिरोध

फ़ुतूह-उस-सलातीन के लेखक इसामी के अनुसार घाटी लजौरा में युद्धकला में निपुण दो उच्च कुल की स्त्रियों ने तुर्क सेना का साहसपूर्वक सामना किया। यद्यपि अलाउद्दीन खिलजी ने यह संघर्ष जीत लिया, किंतु इससे उसे दक्षिणवासियों के साहस और युद्ध क्षमता का अनुमान अवश्य हो गया।

इस संघर्ष का प्रभाव यह हुआ कि देवगिरि का राजा और वहाँ के निवासी अत्यंत भयभीत हो गए। यह प्रसंग यह भी दर्शाता है कि दक्षिण भारत की पराजय का कारण कायरता नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य असंतुलन था।

 

देवगिरि दुर्ग और नगर की लूट

रामचंद्र देव आकस्मिक आक्रमण से चिंतित होकर अपनी शेष सेना सहित किले में प्रवेश कर गया। देवगिरि का दुर्ग एक चिकनी ढालू चट्टान की चोटी पर स्थित था और मध्यकालीन भारत के सबसे शक्तिशाली दुर्गों में गिना जाता था। इसके चारों ओर ऊँची दीवारें, गुम्बद और लगभग पचास फुट गहरी खाई थी। किंतु राजा ने किले की तलहटी में बसे नगर और उसके निवासियों की रक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। इसका परिणाम यह हुआ कि अलाउद्दीन खिलजी ने नगर को खुलकर लूटा, हजारों घोड़े और हाथी पकड़ लिए और यह अफवाह फैला दी कि उसके पीछे दिल्ली से एक विशाल सेना आ रही है। यह मनोवैज्ञानिक दबाव की नीति थी, जिसने रामचंद्र की स्थिति को और दयनीय बना दिया।

 

प्रथम संधि और सिंघण देव का लौटना

इस संकटपूर्ण स्थिति में रामचंद्र देव ने संधि के लिए दूत भेजे और अपने पुत्र सिंघण देव को शीघ्र लौट आने का संदेश भेजा। अलाउद्दीन खिलजी ने परिस्थितियों को देखते हुए संधि स्वीकार करना ही उचित समझा और भारी धनराशि लेकर लौट जाने का निश्चय किया। किन्तु जैसे ही वह लौटने की तैयारी कर रहा था, सिंघण देव अपनी सेना के साथ देवगिरि पहुँच गया। रामचंद्र देव ने उसे आक्रमणकारी से युद्ध न करने की सलाह दी, परंतु सिंघण देव युद्ध पर उतारू था।

 

निर्णायक संघर्ष और देवगिरि की पराजय

अलाउद्दीन खिलजी ने नुसरत खाँ को किले की देखरेख के लिए छोड़कर सिंघण देव के विरुद्ध युद्ध किया। जब नुसरत खाँ भी अपने स्वामी को संकट में देखकर सहायता के लिए आगे बढ़ा, तो देवगिरि की सेना ने यह समझ लिया कि दिल्ली का सुल्तान विशाल सेना के साथ स्वयं आ पहुँचा है। इस भ्रांति के कारण देवगिरि की सेना भयभीत होकर रणक्षेत्र से भाग खड़ी हुई।

इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने नगर और व्यापारियों को निर्दयता से लूटा। संकट की इस घड़ी में रामचंद्र देव ने अन्य हिंदू राजाओं से सहायता माँगने का प्रयास किया, किंतु कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई। समय बीतने के साथ किले के भीतर खाद्यान्न का भी अभाव हो गया।

 

दूसरी संधि और अपार क्षतिपूर्ति

इन परिस्थितियों में रामचंद्र देव ने पुनः संधि की प्रार्थना की। इस बार अलाउद्दीन खिलजी की शर्तें अत्यंत कठोर थीं। फ़रिश्ता के अनुसार संधि की शर्तों में,

  • छह सौ मन सोना
  • सात मन मोती
  • दो मन रत्न (लाल, नीलम, हीरा, पन्ना)
  • एक हजार मन चाँदी
  • चार हजार थान रेशमी वस्त्र

सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त रामचंद्र देव ने वार्षिक कर देने का भी वचन दिया। बरनी के अनुसार दक्षिण से इतना धन लाया गया कि उसका एक बड़ा भाग अलाउद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारियों द्वारा व्यय किए जाने के बाद भी फिरोज तुगलक के समय तक शेष रहा। अमीर खुसरो ने भी इस अपार कोष का उल्लेख किया है।

 

प्रथम देवगिरि अभियान का ऐतिहासिक मूल्यांकन

देवगिरि पर 1296 ई० का आक्रमण स्थायी विजय नहीं था, बल्कि आर्थिक प्रभुत्व और कराधान आधारित अधीनता की स्थापना थी। इस अभियान से अलाउद्दीन खिलजी को दक्षिण भारत की राजनीति, सैन्य व्यवस्था और आर्थिक संभावनाओं की स्पष्ट जानकारी प्राप्त हुई।

यही अनुभव आगे चलकर मलिक काफूर के नेतृत्व में किए गए अभियानों देवगिरि का द्वितीय अभियान, वारंगल, द्वारसमुद्र और माबर का आधार बना। इस प्रकार देवगिरि पर प्रथम आक्रमण को अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान का प्रयोगात्मक और निर्णायक प्रारंभिक चरण माना जा सकता है।

 

देवगिरि का द्वितीय अभियान (1307-1308 ई.): अधीनता से मित्रता तक

 

1296 ई० के आक्रमण के पश्चात देवगिरि का यादव शासक रामचंद्र देव अलाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार कर चुका था और वार्षिक कर देने का वचन भी दे चुका था। किंतु कुछ वर्षों के पश्चात यह कर देना बंद कर दिया गया। यह स्थिति दिल्ली सल्तनत के लिए केवल आर्थिक क्षति का प्रश्न नहीं थी, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा और प्रभुत्व को चुनौती देने वाली भी थी। अतः 1307-1308 ई० में देवगिरि पर पुनः आक्रमण अनिवार्य हो गया। यह द्वितीय अभियान अपने स्वरूप और परिणामों में प्रथम अभियान से भिन्न था, क्योंकि इसमें विनाश की अपेक्षा राजनीतिक पुनर्संयोजन अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

 

कर न भेजने के कारण : समकालीन मत और विवेचना

इसामी के अनुसार रामचंद्र देव के पुत्र ने प्रजा की सहायता से विद्रोह किया, जिसमें रामचंद्र को विवशतावश सम्मिलित होना पड़ा। बरनी का मत है कि रामचंद्र देव ने कई वर्षों से वार्षिक कर देना बंद कर दिया था, संभवतः उसने देवगिरि और दिल्ली के बीच दूरी तथा मंगोल आक्रमणों और राजपूत प्रतिरोध में अलाउद्दीन खिलजी की व्यस्तता का लाभ उठाया।

इतिहासकारों में बरनी का विवरण अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है, क्योंकि कर न भेजना ही सल्तनत के हस्तक्षेप का सबसे ठोस कारण था। यह भी स्पष्ट है कि यह विद्रोह किसी संगठित स्वतंत्रता आंदोलन का रूप नहीं था, बल्कि अवसरवादी अवज्ञा का उदाहरण था।

 

देवल देवी का प्रसंग और अल्प खाँ की भूमिका

फ़रिश्ता के अनुसार इस अभियान से एक अन्य प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। गुजरात के शासक राजा कर्ण की पत्नी कमला देवी अपनी पुत्री देवल देवी को देखने के लिए व्याकुल थी। अलाउद्दीन खिलजी ने आदेश दिया कि देवल देवी को दिल्ली लाया जाए।

इस कार्य के लिए सेनापति अल्प खाँ को नियुक्त किया गया। राजा कर्ण, जो तुर्कों से बचने के लिए देवगिरि की ओर भागा, ने देवल देवी को रामचंद्र देव के बड़े पुत्र सिंघण के साथ भेज दिया। किंतु अल्प खाँ के सैनिकों ने देवल देवी को पकड़ लिया और उसे दिल्ली पहुँचा दिया। यद्यपि यह प्रसंग व्यक्तिगत और पारिवारिक प्रतीत होता है, किंतु इससे यह स्पष्ट होता है कि देवगिरि अब सल्तनत की राजनीतिक परिधि में पूर्णतः आ चुका था।

 

मलिक काफूर और देवगिरि की पुनः पराजय

देवल देवी के दिल्ली पहुँचने के पश्चात अल्प खाँ मलिक काफूर से मिलने के लिए देवगिरि की ओर बढ़ा। रामचंद्र देव, जो संभवतः इस आक्रमण के लिए तैयार नहीं था, एक बार फिर पराजित हुआ। यह उल्लेखनीय है कि इस बार अलाउद्दीन खिलजी ने रामचंद्र देव के साथ अत्यधिक कठोर व्यवहार नहीं किया। विद्रोहियों को दंडित किया गया, किंतु स्वयं रामचंद्र देव का सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया। वह छह महीनों तक दिल्ली में रहा और उसे “रायरायान” की उपाधि प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त उसे गुजरात में नवसारी की जागीर तथा एक लाख स्वर्ण टंके भेंट स्वरूप दिए गए।

 

उदार नीति का उद्देश्य : दक्षिण नीति का संकेत

रामचंद्र देव के प्रति यह उदार व्यवहार किसी करुणा का परिणाम नहीं था, बल्कि सुल्तान की सुविचारित दक्षिण नीति का अंग था। अलाउद्दीन खिलजी यह भली-भाँति समझ चुका था कि सुदूर दक्षिण पर प्रत्यक्ष शासन स्थापित करना न तो सरल है और न ही तत्काल लाभकारी। अतः उसने स्थानीय शासकों को अधीन बनाकर, उन्हें मित्र और सहयोगी के रूप में उपयोग करना अधिक उपयुक्त समझा। रामचंद्र देव को सम्मानित करने का उद्देश्य यह था कि भविष्य के दक्षिणी अभियानों में उसे एक निष्ठावान सहयोगी के रूप में प्रयोग किया जा सके। आगे चलकर यह नीति पूर्णतः सफल सिद्ध हुई।

 

देवगिरि की अधीनता और दक्षिण भारत का मार्ग प्रशस्त होना

देवगिरि के यादवों की पुनः पराजय और रामचंद्र देव की अधीनता ने दक्षिण भारत के अन्य हिंदू शासकों के लिए स्पष्ट संदेश दे दिया। इससे दिल्ली सल्तनत का भय और प्रभाव दूर-दूर तक फैल गया। इतिहासकार प्रो० आयंगर के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी का उद्देश्य इन राज्यों को साम्राज्य में विलय करना नहीं था, बल्कि उन्हें धन-संपत्ति की निरंतर आपूर्ति करने वाले राज्य (tributary states) बनाना था। विशाल सेना के रख-रखाव, मंगोल आक्रमणों के प्रतिरोध और आंतरिक विद्रोहों को दबाने के लिए सुल्तान को सदैव धन की आवश्यकता थी, और दक्षिण भारत इस आवश्यकता की पूर्ति का सबसे उपयुक्त साधन था।

 

वारंगल अभियान की तैयारी : नीति और आदेश

देवगिरि की स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात अलाउद्दीन खिलजी ने 1309 ई० में तेलंगाना और वारंगल के शासक पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस अभियान का नेतृत्व मलिक काफूर को सौंपा गया। उसे स्पष्ट आदेश दिए गए कि यदि राय अपने कोष, रत्न, हाथी और घोड़े सौंपने तथा भविष्य में वार्षिक कर देने के लिए तैयार हो जाए, तो उसे अनावश्यक रूप से नष्ट न किया जाए। इस आदेश से यह स्पष्ट हो जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी की नीति दक्षिण में राज्य-विलय नहीं, बल्कि आर्थिक अधीनता स्थापित करने की थी।

 

द्वितीय देवगिरि अभियान का ऐतिहासिक महत्व

देवगिरि का द्वितीय अभियान अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसने न केवल यादव राज्य को स्थायी रूप से सल्तनत की परिधि में ला दिया, बल्कि मलिक काफूर के नेतृत्व में आगे होने वाले अभियानों वारंगल, द्वारसमुद्र और माबर के लिए आधारभूमि भी तैयार कर दी। यहाँ से दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत की नीति अधिक संगठित, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण रूप में सामने आती है।

 

वारंगल अभियान (1309-1310 ई.): काकतीय शक्ति पर निर्णायक प्रहार

 

देवगिरि के द्वितीय अभियान के पश्चात अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान एक अधिक स्पष्ट और सुविचारित नीति के रूप में सामने आता है। अब उसका उद्देश्य न तो तात्कालिक लूट तक सीमित था और न ही स्थायी विलय की दिशा में बढ़ना, बल्कि दक्षिणी शक्तियों को आर्थिक और राजनीतिक रूप से निर्बल बनाकर उन्हें सल्तनत की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश करना था। इसी नीति के अंतर्गत 1309 ई० में तेलंगाना और उसकी राजधानी वारंगल पर आक्रमण का निश्चय किया गया। इस अभियान का नेतृत्व मलिक काफूर को सौंपा गया, जो अब सुल्तान का सबसे विश्वसनीय सेनापति बन चुका था।

 

मलिक काफूर को दिए गए आदेश और अभियान का उद्देश्य

अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि यदि काकतीय शासक अपने कोष, रत्न, हाथी और घोड़े सौंपने तथा भविष्य में वार्षिक कर देने के लिए सहमत हो जाए, तो उसे अनावश्यक रूप से नष्ट न किया जाए। इससे यह स्पष्ट होता है कि वारंगल अभियान का उद्देश्य राज्य को सल्तनत में मिलाना नहीं, बल्कि उसे आर्थिक और सैनिक दृष्टि से शक्तिहीन बनाना था। यह नीति अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान की मूल प्रकृति को उजागर करती है, अर्थात् अधीनता और कराधान, न कि प्रशासनिक विस्तार।

 

देवगिरि से वारंगल तक की कठिन यात्रा

मलिक काफूर बीहड़ और दुर्गम प्रदेशों से होता हुआ वारंगल की ओर बढ़ा। इस यात्रा में देवगिरि के यादव शासक रामचंद्र देव ने काफूर का पूरा सहयोग किया। उसने मार्गदर्शन के लिए अपने सैनिक भेजे, मार्ग में बाजार खुलवाए और सेना की रसद संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति की। यह सहयोग इस बात का प्रमाण है कि देवगिरि अब केवल पराजित राज्य नहीं, बल्कि सल्तनत का सहयोगी बन चुका था। यही कारण था कि काफूर की सेना बिना किसी गंभीर बाधा के तेलंगाना की सीमा तक पहुँच सकी।

 

मार्गस्थ दुर्ग और प्रारंभिक संघर्ष

तेलंगाना राज्य की सीमा में स्थित सादर अथवा सिरपुर दुर्ग पर काफूर ने आक्रमण किया। स्थानीय शासक ने तुर्क सेना का साहसपूर्वक सामना किया, किंतु अंततः पराजित हुआ और रणक्षेत्र में मारा गया। इस विजय के पश्चात काफूर ने 1310 ई० में वारंगल राज्य की सीमा में प्रवेश किया। मार्ग में कई नगरों और गाँवों को लूटा गया, जिससे काकतीय राज्य पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता चला गया।

 

वारंगल दुर्ग की घेराबंदी और प्रतिरोध

मलिक काफूर ने वारंगल नगर और उसके प्रसिद्ध दुर्ग को घेर लिया। अमीर खुसरो के शब्दों में यह दुर्ग इतना सुदृढ़ था कि “इस्पात का भाला भी इसे भेद नहीं सकता था।” घेराबंदी कई महीनों तक चली। काकतीय शासक प्रतापरुद्र देव ने दुर्ग के भीतर रहकर संगठित प्रतिरोध किया। उसने रक्षात्मक युद्ध के साथ-साथ छापामार दलों (गोरिल्ला पद्धति) का भी प्रयोग किया, जो तुर्क सैनिकों पर आकस्मिक आक्रमण करते, रसद मार्गों को बाधित करते और भंडारों को नष्ट करने का प्रयास करते थे। फिर भी यह प्रतिरोध निर्णायक सिद्ध नहीं हो सका।

 

संधि और आत्मसमर्पण की शर्तें

लंबी घेराबंदी, संसाधनों की कमी और नगर की संभावित विनाश-लीला को देखते हुए प्रतापरुद्र देव ने संधि का प्रस्ताव भेजा। उसने अपनी प्रजा और राज्य को व्यापक लूट से बचाने के लिए अधीनता स्वीकार करना उचित समझा।

संधि की शर्तों के अंतर्गत,

  • विशाल कोष
  • बहुमूल्य रत्न
  • हाथी और घोड़े
  • तथा भविष्य में वार्षिक कर

देने का वचन दिया गया। अधीनता के प्रतीक स्वरूप स्वर्ण श्रृंखला युक्त स्वर्ण प्रतिमा भी भेजी गई। बरनी के अनुसार राय ने सौ हाथी, सात हजार घोड़े और अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ दीं। खाफी खाँ का मत है कि प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी इसी अवसर पर दक्षिण से दिल्ली लाया गया, यद्यपि इस विवरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।

 

वारंगल विजय की प्रकृति : आंशिक सफलता

यद्यपि तुर्क सेना को अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई, फिर भी यह स्पष्ट है कि वारंगल का भीतरी दुर्ग पूरी तरह विजित नहीं किया गया। यह विजय मुख्यतः आर्थिक और राजनीतिक अधीनता तक सीमित रही। लूट से प्राप्त धन को मलिक काफूर लगभग एक हजार ऊँटों पर लादकर देवगिरि के मार्ग से दिल्ली ले गया। दिल्ली पहुँचने पर सुल्तान ने उसका भव्य स्वागत किया और उसे सम्मानित किया।

 

वारंगल अभियान का ऐतिहासिक मूल्यांकन

वारंगल अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया कि अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति स्थायी विजय की नहीं, बल्कि नियंत्रित प्रभुत्व और आर्थिक दोहन की थी। काकतीय राज्य को साम्राज्य में मिलाने का प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उसे करदाता राज्य बना दिया गया। इस अभियान ने मलिक काफूर को दक्षिण भारत की भौगोलिक, राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियों से और अधिक परिचित कर दिया, जिसका लाभ आगे चलकर द्वारसमुद्र और माबर अभियानों में उठाया गया।

 

द्वारसमुद्र (होयसाल) अभियान (1310 ई.): दक्षिण भारत में शक्ति-संतुलन का परिवर्तन

 

वारंगल अभियान से लौटने के बाद मलिक काफूर दक्षिण भारत की राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थितियों से भली-भाँति परिचित हो चुका था। उसे अब यह स्पष्ट हो गया था कि दक्षिण प्रायद्वीप की शक्तियाँ परस्पर संघर्षों में इतनी उलझी हुई हैं कि संगठित प्रतिरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं। इसी बीच उसे द्वारसमुद्र और माबर की अपार संपन्नता की भी जानकारी प्राप्त हुई। इन परिस्थितियों में अलाउद्दीन खिलजी की महत्वाकांक्षा और अधिक बढ़ गई तथा उसने सुदूर दक्षिण में भी अपने प्रभुत्व का विस्तार करने का निश्चय किया। इसी नीति के अंतर्गत 1310 ई० में मलिक काफूर को होयसाल राज्य पर आक्रमण के लिए भेजा गया।

 

होयसाल राज्य की स्थिति और आंतरिक दुर्बलताएँ

होयसाल राज्य पर उस समय बल्लाल तृतीय का शासन था। उसका राज्य कांगू प्रदेश, कोंकण क्षेत्र तथा लगभग संपूर्ण वर्तमान मैसूर तक विस्तृत था। यद्यपि यह राज्य समृद्ध और शक्तिशाली था, तथापि यादवों और पांड्यों के साथ निरंतर संघर्षों ने इसकी सैन्य शक्ति को कमजोर कर दिया था। इसी समय होयसाल शासक बल्लाल तृतीय पांड्य राज्य के गृहयुद्ध में वीर पांड्य की सहायता के लिए दक्षिण की ओर गया हुआ था। उसकी अनुपस्थिति ने होयसाल राज्य को तुर्क आक्रमण के प्रति और अधिक असुरक्षित बना दिया।

 

देवगिरि में तैयारी और यादव सहयोग

मलिक काफूर लगभग ढाई महीने की कठिन यात्रा के पश्चात देवगिरि पहुँचा। यहाँ यादव शासक रामचंद्र देव (या उसके उत्तराधिकारी) ने काफूर को पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सेना की आवश्यकताओं के लिए धन-धान्य, सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया।

यह सहयोग केवल भय का परिणाम नहीं था, बल्कि अलाउद्दीन खिलजी की उस नीति का भी प्रमाण था जिसके अंतर्गत पराजित शासकों को मित्र और सहायक के रूप में प्रयोग किया जाता था। होयसाल राज्य के विरुद्ध यह सहयोग यादवों के लिए भी लाभकारी था, क्योंकि बल्लाल तृतीय ने पूर्व में यादव क्षेत्र पर कई आक्रमण किए थे।

 

द्वारसमुद्र पर आक्रमण और बल्लाल तृतीय की प्रतिक्रिया

मलिक काफूर के आक्रमण की सूचना मिलते ही बल्लाल तृतीय शीघ्रता से राजधानी लौटा। उसने तुर्क सेना का सामना करने का प्रयास किया, किंतु परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं। अंततः उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी। बल्लाल तृतीय ने वार्षिक कर देने की शर्त पर संधि की और मलिक काफूर को अनेक बहुमूल्य उपहार दिए। अमीर खुसरो के अनुसार इस संधि के अंतर्गत होयसाल शासक ने अपने राज्य का एक छोटा-सा भाग भी सुल्तान को सौंप दिया। यह विवरण यह दर्शाता है कि होयसाल राज्य ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

 

इस्लाम के प्रसार से संबंधित दावों की समीक्षा

कुछ लेखकों का मत है कि इस विजय के परिणामस्वरूप द्वारसमुद्र में इस्लाम पूरी तरह स्थापित हो गया और वहाँ एक मस्जिद का निर्माण भी कराया गया। किंतु यह कथन ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध प्रतीत होता है। मलिक काफूर द्वारसमुद्र में केवल लगभग दो सप्ताह ही ठहरा था, और इतने कम समय में मस्जिद निर्माण की संभावना अत्यंत कम है। अतः यह अधिक उचित प्रतीत होता है कि द्वारसमुद्र अभियान का प्रभाव मुख्यतः राजनीतिक और आर्थिक था, न कि धार्मिक।

 

द्वारसमुद्र अभियान का ऐतिहासिक महत्व

द्वारसमुद्र की विजय ने दक्षिण भारत में शक्ति-संतुलन को निर्णायक रूप से बदल दिया। होयसाल राज्य, जो अब तक एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति था, सल्तनत का करदाता बन गया। इसके साथ ही मलिक काफूर को माबर (पांड्य राज्य) की ओर बढ़ने का मार्ग भी स्पष्ट रूप से मिल गया।

इस अभियान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान किसी एक राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि यह चरणबद्ध ढंग से पूरे दक्षिण प्रायद्वीप को सल्तनत के आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में लाने की सुविचारित प्रक्रिया थी।

 

माबर (मदुरा) अभियान (1311 ई.): गृहयुद्ध का लाभ और आर्थिक चरमोत्कर्ष

 

द्वारसमुद्र से मुक्त होने के पश्चात मलिक काफूर ने सुदूर दक्षिण में स्थित माबर (पांड्य राज्य) पर आक्रमण की तैयारी की। यह अभियान अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान का सबसे दूरगामी और कठिन चरण था। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम था, पहाड़ी मार्ग, घने वन और प्रतिकूल जलवायु ने तुर्क सेना की गति को अत्यंत धीमा कर दिया। फिर भी दक्षिण की अपार संपन्नता और पांड्य राज्य की राजनीतिक अव्यवस्था ने इस अभियान को अनिवार्य बना दिया।

 

पांड्य राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि : उत्तराधिकार संकट

माबर का पांड्य राज्य इस समय भीषण गृहयुद्ध से ग्रस्त था। सुंदर पांड्य और वीर पांड्य के बीच चल रहे संघर्ष ने राज्य की संगठित शक्ति को नष्ट कर दिया था। वस्साफ और अमीर खुसरो सुंदर पांड्य को वैध तथा वीर पांड्य को अवैध पुत्र बताते हैं। सत्ता संघर्ष में वीर पांड्य ने मदुरा पर अधिकार कर लिया और सुंदर पांड्य को राज्य से निष्कासित कर दिया। अपनी पराजय के पश्चात सुंदर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान से सहायता की याचना की। इस आंतरिक संघर्ष ने मलिक काफूर को वही अवसर प्रदान किया जिसकी उसे आवश्यकता थी।

 

कठिन मार्ग और होयसाल सहयोग

माबर की ओर बढ़ने वाला मार्ग अत्यंत कठिन था और इस यात्रा में लगभग एक वर्ष का समय लगा। मलिक काफूर ने होयसाल शासक बल्लाल तृतीय को विवश किया कि वह सेना का मार्गदर्शन करे। यह तथ्य यह दर्शाता है कि द्वारसमुद्र की अधीनता केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि सल्तनत की सैन्य आवश्यकताओं के अनुसार उसका उपयोग भी किया गया। इस प्रकार माबर अभियान केवल एक स्वतंत्र आक्रमण नहीं था, बल्कि पूर्ववर्ती अभियानों की कड़ी में आगे बढ़ा हुआ चरण था।

 

वीर पांड्य के विरुद्ध प्रयास और सीमाएँ

मलिक काफूर ने सुंदर पांड्य का पक्ष लेकर वीर पांड्य को पकड़ने और निर्णायक रूप से पराजित करने का प्रयास किया। किंतु वह इस उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। वीर पांड्य न तो निर्णायक रूप से पराजित हुआ और न ही उस पर कोई स्थायी शर्तें थोपी जा सकीं। यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक दृष्टि से माबर अभियान सीमित सफलता वाला था। पांड्य राज्य की राजनीतिक संरचना को स्थायी रूप से नियंत्रित करना संभव नहीं हो सका।

 

नगरों, मंदिरों और संपदा की व्यापक लूट

राजनीतिक सीमाओं के बावजूद आर्थिक दृष्टि से यह अभियान अत्यंत सफल सिद्ध हुआ। मलिक काफूर ने माबर राज्य के नगरों, भवनों और मंदिरों की व्यापक लूट की। अमीर खुसरो के अनुसार उसने अपार मात्रा में हाथी, घोड़े, बहुमूल्य रत्न और आभूषण प्राप्त किए।

बरनी का कथन है कि “दक्षिण से प्राप्त संपत्ति इतनी अधिक थी कि मुसलमानों के द्वारा दिल्ली पर अधिकार किए जाने के बाद पहले कभी इतना विशाल कोष एकत्र नहीं किया गया था।” यह कथन इस अभियान के आर्थिक चरमोत्कर्ष को रेखांकित करता है।

 

बल्लाल तृतीय का दिल्ली प्रस्थान और सम्मान

माबर अभियान के पश्चात मलिक काफूर होयसाल शासक बल्लाल तृतीय को भी अपने साथ दिल्ली ले गया। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने बल्लाल तृतीय का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उसे विशेष खिलत, मुकुट और छत्र प्रदान किए। इसके अतिरिक्त उसे दस लाख टंके भेंट स्वरूप दिए गए। यह व्यवहार अलाउद्दीन खिलजी की उस नीति का प्रमाण है जिसमें पराजित शासकों को अपमानित करने के बजाय उन्हें सहयोगी बनाकर प्रयोग किया जाता था।

 

माबर अभियान का ऐतिहासिक मूल्यांकन

राजनीतिक दृष्टि से माबर अभियान सीमित महत्व का था, क्योंकि न तो वीर पांड्य पर निर्णायक नियंत्रण स्थापित किया जा सका और न ही पांड्य राज्य को सल्तनत में मिलाया गया। किंतु आर्थिक दृष्टि से यह अभियान असाधारण रूप से सफल रहा। इस अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया कि अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान मूलतः धन-संग्रह और प्रभुत्व-स्थापना पर केंद्रित था, न कि स्थायी प्रशासनिक विस्तार पर। माबर अभियान इस नीति का चरम उदाहरण था।

 

देवगिरि पर तृतीय आक्रमण (1312-1313 ई.): अधीनता से विलय की दिशा

 

माबर अभियान से लौटने के कुछ ही समय पश्चात दक्षिण भारत की राजनीतिक स्थिति में पुनः अस्थिरता उत्पन्न हो गई। 1312 ई० में अलाउद्दीन खिलजी के निष्ठावान सहयोगी और देवगिरि के यादव शासक रामचंद्र देव का निधन हो गया। उसके पश्चात उसका पुत्र सिंघण देव सिंहासन पर बैठा। यद्यपि देवगिरि पूर्व में सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर चुका था, तथापि नए शासक ने शीघ्र ही इस अधीनता के सभी प्रतीकों को त्याग दिया और स्वतंत्र शासक की भाँति आचरण करने लगा। इस प्रकार देवगिरि एक बार फिर दिल्ली सल्तनत के लिए चुनौती बन गया।

 

सिंघण देव की शत्रुता के कारण

सिंघण देव की नीति केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें व्यक्तिगत कारण भी निहित थे। उसकी मंगेतर देवल रानी के दिल्ली ले जाए जाने से उसके मन में सल्तनत के प्रति तीव्र द्वेष उत्पन्न हो गया था। इस अपमान ने उसके हृदय में पहले से विद्यमान असंतोष को और प्रबल कर दिया। सिंघण देव ने सिंहासनारूढ़ होते ही कर देना बंद कर दिया और देवगिरि को स्वतंत्र राज्य के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। यह स्थिति अलाउद्दीन खिलजी के लिए अस्वीकार्य थी, क्योंकि देवगिरि अब दक्षिण नीति का आधार बन चुका था।

 

मलिक काफूर का पुनः दक्षिण प्रस्थान

इसी समय तेलंगाना के शासक प्रतापरुद्र देव ने भी शिकायत की कि मलिक काफूर को कर वसूलने के लिए पुनः दक्षिण भेजा जाए। परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने एक बार फिर मलिक काफूर को ही इस कार्य के लिए नियुक्त किया। मलिक काफूर ने मार्ग के छोटे-छोटे शासकों को परास्त करते हुए देवगिरि की ओर प्रस्थान किया। यह अभियान अपेक्षाकृत शीघ्र और निर्णायक सिद्ध हुआ।

 

देवगिरि की निर्णायक पराजय और सिंघण देव का अंत

देवगिरि पहुँचने पर मलिक काफूर ने सिंघण देव को पराजित किया। युद्ध में सिंघण देव मारा गया और यादव सत्ता का प्रभावी अंत हो गया। इसामी का यह कथन कि सिंघण देव ने बिना युद्ध किए देवगिरि खाली कर दिया, संदिग्ध प्रतीत होता है, क्योंकि जब तक मलिक नायब दक्षिण में रहा, सिंघण देव के विषय में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होती। सिंघण देव की मृत्यु के साथ ही देवगिरि की स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका समाप्त हो गई।

 

दक्षिण में आतंक और सल्तनती प्रभुत्व की स्थापना

देवगिरि की विजय के पश्चात मलिक काफूर ने तेलंगाना और होयसाल राज्यों के आसपास के नगरों पर आक्रमण किए। इन अभियानों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि दक्षिण के निवासियों में ऐसा आतंक उत्पन्न करना था जिससे दिल्ली सल्तनत के प्रति किसी भी प्रकार का विरोध शेष न रहे। इस चरण में दक्षिण भारत में सल्तनती प्रभुत्व पहले की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष और प्रभावी रूप में दिखाई देता है।

 

देवगिरि में सल्तनती प्रशासन का प्रयोग

इस अभियान के पश्चात मलिक काफूर ने देवगिरि को अपना मुख्यालय बनाया। उसने तेलंगाना और कर्नाटक की रियासतों से कर वसूल कर राजधानी भेजा। यह पहली बार था जब दक्षिण भारत में किसी स्थान को सल्तनत के प्रशासनिक केंद्र के रूप में प्रयोग किया गया। मलिक काफूर 1314 ई० तक दक्षिण में रहा। इसके पश्चात अलाउद्दीन खिलजी ने उसे दिल्ली बुला लिया और देवगिरि के शासन की जिम्मेदारी रामचंद्र देव के दामाद हरपाल देव को सौंप दी।

 

तृतीय देवगिरि अभियान का ऐतिहासिक महत्व

देवगिरि पर तृतीय आक्रमण अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। यह पहला अवसर था जब सल्तनत ने किसी दक्षिणी राज्य को केवल अधीनता तक सीमित न रखकर उसे अपने प्रशासनिक ढाँचे में सम्मिलित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इस अभियान से यह स्पष्ट हो जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति समय के साथ विकसित होती गई, प्रारंभिक चरण में केवल लूट और कराधान, किंतु अंततः रणनीतिक विलय की ओर झुकाव।

 

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति : उद्देश्य, स्वरूप और ऐतिहासिक अर्थ

 

इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान दक्षिणी राज्यों पर क्रमिक विजय के माध्यम से उत्तर और दक्षिण भारत को कम-से-कम एक राजनीतिक सूत्र में बाँध देता है। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने दक्षिण भारत के साथ इतने व्यापक और व्यवस्थित संबंध स्थापित किए। किंतु यह संबंध स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण पर आधारित नहीं था, बल्कि प्रभुत्व, भय और आर्थिक अधीनता के माध्यम से स्थापित किया गया था। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान केवल सैन्य घटनाओं की श्रृंखला न होकर एक सुविचारित नीति का परिणाम था।

 

प्रारंभिक उद्देश्य : लूट और धन-संग्रह

1296 ई० में देवगिरि पर प्रथम आक्रमण के समय अलाउद्दीन खिलजी का उद्देश्य स्पष्ट रूप से धन-संग्रह था। दक्षिण की संपन्नता सर्वविदित थी और मंदिर अपार संपत्ति के केंद्र थे। यद्यपि धन अन्य क्षेत्रों से भी प्राप्त किया जा सकता था, किंतु जिस सरलता और प्रचुरता के साथ दक्षिण भारत से संपत्ति प्राप्त हुई, वह अन्य किसी क्षेत्र में संभव नहीं थी। यह धन अलाउद्दीन खिलजी के लिए केवल वैभव का साधन नहीं था, बल्कि उसकी प्रशासनिक और सैन्य नीतियों की आधारशिला भी बना।

 

दक्षिणी अभियानों का व्यापक प्रभाव

मलिक काफूर के अभियानों ने दक्षिण भारत की प्रमुख शक्तियों यादव, काकतीय, होयसल और पांड्य की राजनीतिक और सैन्य संरचना को गंभीर रूप से प्रभावित किया। अपार संपत्ति दिल्ली ले जाई गई और दक्षिणी राज्यों की आर्थिक शक्ति क्षीण हो गई। इन अभियानों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि दक्षिण भारत में सल्तनत की सैन्य श्रेष्ठता की छवि स्थापित हो गई, जिससे भविष्य में प्रतिरोध की संभावनाएँ कमजोर पड़ गईं।

 

दक्षिणी राज्यों की पराजय के कारण

दक्षिण भारत की पराजय का प्रमुख कारण केवल तुर्की सैन्य शक्ति नहीं था, बल्कि दक्षिणी राज्यों की आंतरिक दुर्बलताएँ भी थीं। यादव, काकतीय, होयसल और पांड्य शासक निरंतर परस्पर संघर्षों में उलझे रहते थे। वे न तो आपसी सहयोग स्थापित कर सके और न ही किसी बाह्य शत्रु के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध प्रस्तुत कर पाए।

स्थिति यह थी कि वे अक्सर अपने ही पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध दिल्ली सल्तनत से सहायता प्राप्त करते थे। उदाहरणस्वरूप, देवगिरि के यादवों ने वारंगल अभियान में मलिक काफूर की सहायता की, होयसल शासक ने माबर अभियान में मार्गदर्शन प्रदान किया और सुंदर पांड्य ने अपने भाई के विरुद्ध सुल्तान से सहायता माँगी। इस प्रकार दक्षिण की पराजय में आंतरिक फूट की भूमिका निर्णायक थी।

 

तुर्की सेना की संगठनात्मक श्रेष्ठता

दक्षिणी सेनाओं की तुलना में तुर्की सेना अधिक संगठित, अनुशासित और युद्ध-कौशल में दक्ष थी। तुर्क सैनिक नियमित वेतनभोगी थे, उनमें कठोर अनुशासन था और वे रणनीतिक युद्ध-पद्धतियों में प्रशिक्षित थे। इटली के यात्री मार्को पोलो ने दक्षिण भारतीय सेनाओं की सीमाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वे प्रायः हल्के हथियारों से सुसज्जित होते थे और संगठित युद्ध की अपेक्षा धार्मिक अनुष्ठानों को अधिक महत्व देते थे। यद्यपि उसके वर्णन में अतिशयोक्ति हो सकती है, फिर भी यह तथ्य अस्वीकार्य नहीं है कि सैन्य संगठन के स्तर पर तुर्की सेना दक्षिणी सेनाओं से श्रेष्ठ थी।

 

प्रशासनिक विलय से परहेज़ : नीति की व्यावहारिकता

अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण भारत को प्रत्यक्ष रूप से सल्तनत में मिलाने का इच्छुक नहीं था। इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण थे, दक्षिण की भौगोलिक दूरी, यातायात साधनों का अभाव, स्थानीय जनता की धार्मिक-सांस्कृतिक संरचना और दिल्ली से नियंत्रण की कठिनाइयाँ। इसलिए उसने दक्षिणी राज्यों को पूर्णतः नष्ट करने के बजाय उन्हें करदाता और अधीन राज्य बनाए रखने की नीति अपनाई। मलिक काफूर को स्पष्ट आदेश दिए गए थे कि जो शासक अधीनता स्वीकार करें, उनके साथ उदार व्यवहार किया जाए।

 

दक्षिण नीति का विकसित स्वरूप

यद्यपि प्रारंभिक चरण में दक्षिण नीति लूट और कराधान तक सीमित थी, किंतु समय के साथ इसमें परिवर्तन दिखाई देता है। देवगिरि पर तृतीय आक्रमण और वहाँ सल्तनती प्रशासन की स्थापना इस नीति के विकसित स्वरूप को दर्शाती है। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति स्थिर नहीं रही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती गई।

 

दक्षिण नीति का समग्र मूल्यांकन

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति ने दिल्ली सल्तनत को अपार आर्थिक संसाधन प्रदान किए और उसकी सैन्य तथा प्रशासनिक शक्ति को सुदृढ़ किया। राजनीतिक दृष्टि से दक्षिण भारत में स्थायी विलय नहीं हुआ, किंतु सल्तनत का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से स्थापित हो गया। यह नीति आगे चलकर मुहम्मद तुगलक के दक्षिणी प्रयोगों की पृष्ठभूमि भी तैयार करती है, जहाँ अलाउद्दीन खिलजी की सीमाएँ और उसकी नीति की व्यावहारिकता दोनों स्पष्ट रूप में सामने आती हैं।

 

अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत अभियान के परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव

 

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान तत्कालीन घटनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके परिणाम दिल्ली सल्तनत और दक्षिण भारतीय राजनीति, दोनों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालते रहे। यद्यपि इस अभियान से दक्षिण भारत का स्थायी विलय नहीं हुआ, तथापि इसने उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक संबंधों की दिशा को निर्णायक रूप से बदल दिया।

 

आर्थिक परिणाम : सल्तनत के कोष का अभूतपूर्व विस्तार

दक्षिण अभियानों का सबसे प्रत्यक्ष और महत्वपूर्ण परिणाम अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति था। देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और माबर से जो संपत्ति दिल्ली लाई गई, उसने सल्तनत के राजकोष को अत्यंत समृद्ध बना दिया। समकालीन इतिहासकार बरनी और अमीर खुसरो दोनों इस बात पर सहमत हैं कि इससे पूर्व कभी भी दिल्ली सल्तनत को इतनी विशाल मात्रा में धन प्राप्त नहीं हुआ था।

इसी संपत्ति के बल पर अलाउद्दीन खिलजी ने,

  • विशाल स्थायी सेना बनाए रखी
  • मंगोल आक्रमणों का प्रभावी प्रतिरोध किया
  • बाजार-नियंत्रण (मूल्य नियंत्रण) जैसी कठोर आर्थिक नीतियों को लागू किया

इस प्रकार दक्षिण भारत अभियान सल्तनत की आंतरिक शक्ति का आर्थिक आधार बना।

 

राजनीतिक परिणाम : प्रभुत्व बिना स्थायी विलय

राजनीतिक दृष्टि से यह अभियान एक विशिष्ट प्रकृति का था। दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य यादव, काकतीय, होयसल और पांड्य सल्तनत की अधीनता स्वीकार करने को विवश हुए, किंतु उन्हें प्रत्यक्ष रूप से साम्राज्य में सम्मिलित नहीं किया गया। यह स्थिति दर्शाती है कि अलाउद्दीन खिलजी की नीति विस्तारवादी साम्राज्यवाद से अधिक प्रभुत्व-आधारित नियंत्रण पर केंद्रित थी। दक्षिणी राज्यों से नियमित कर वसूली और राजनीतिक अधीनता ही सुल्तान के लिए पर्याप्त थी।

 

दक्षिण भारत की राजनीतिक संरचना पर प्रभाव

मलिक काफूर के अभियानों ने दक्षिण भारत की पारंपरिक शक्ति-संरचना को गंभीर रूप से प्रभावित किया। यादव राज्य का अंत हो गया, काकतीय और होयसल शक्तियाँ निर्बल हो गईं और पांड्य राज्य स्थायी राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना रहा। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में शक्ति-संतुलन टूट गया। आगे चलकर इसी शून्य ने बहमनी और विजयनगर जैसे नए राजनीतिक केंद्रों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।

 

सैन्य और प्रशासनिक प्रभाव

दक्षिण अभियानों से दिल्ली सल्तनत को न केवल अपार धन मिला, बल्कि दक्षिण भारत की भौगोलिक और सैन्य परिस्थितियों की विस्तृत जानकारी भी प्राप्त हुई। मलिक काफूर के नेतृत्व में किए गए अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुदूर दक्षिण तक संगठित सैन्य शक्ति पहुँचाना संभव है। हालाँकि स्थायी प्रशासन स्थापित नहीं किया गया, फिर भी देवगिरि में सल्तनती मुख्यालय की स्थापना एक महत्वपूर्ण प्रयोग थी, जिसने भविष्य के शासकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

 

सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव

इन अभियानों के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में मुस्लिम उपस्थिति में वृद्धि हुई। व्यापारियों, सैनिकों और अधिकारियों के माध्यम से इस्लामी सभ्यता और संस्कृति का प्रसार हुआ। यद्यपि यह प्रसार प्रारंभिक अवस्था में सीमित था, फिर भी इसने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक संपर्क को बढ़ाया। यह प्रभाव आगे चलकर बहमनी सल्तनत और दक्कनी संस्कृति के विकास में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

 

अस्थायित्व और पुनरावृत्ति की समस्या

अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु से पूर्व ही यह स्पष्ट हो गया था कि दक्षिण भारत में सल्तनती प्रभुत्व स्थायी नहीं है। जैसे ही केंद्र की शक्ति शिथिल हुई, दक्षिणी राज्य पुनः स्वतंत्रता की ओर बढ़ने लगे। यही कारण है कि मुबारक खिलजी और मुहम्मद तुगलक को पुनः दक्षिण अभियानों का सहारा लेना पड़ा। यह तथ्य दर्शाता है कि केवल सैन्य प्रभुत्व और कराधान के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों पर दीर्घकालिक नियंत्रण बनाए रखना कठिन था।

 

महमूद ग़ज़नवी से तुलना : समानता और भिन्नता

दक्षिण भारत अभियानों की तुलना प्रायः महमूद ग़ज़नवी की विजयों से की जाती है। दोनों ही मामलों में आर्थिक उद्देश्य प्रमुख थे। किंतु जहाँ महमूद के अभियान उत्तर भारत तक सीमित रहे, वहीं अलाउद्दीन खिलजी के अभियानों ने संपूर्ण दक्षिण प्रायद्वीप को सल्तनत की परिधि में ला दिया। फिर भी यह भी सत्य है कि मलिक काफूर न तो वीर पांड्य को निर्णायक रूप से पराजित कर सका और न ही वारंगल के दुर्ग पर पूर्ण अधिकार स्थापित कर सका। अतः सैन्य दृष्टि से उसकी सफलताएँ पूर्ण नहीं थीं।

 

दीर्घकालिक ऐतिहासिक महत्व

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान भारतीय मध्यकालीन इतिहास में एक संक्रमणकारी चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इसने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक दूरी को कम किया और यह स्पष्ट कर दिया कि संपूर्ण उपमहाद्वीप एक साझा राजनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। यद्यपि यह प्रभुत्व अस्थायी था, फिर भी इसके प्रभाव दीर्घकालिक सिद्ध हुए और आगे आने वाले शासकों विशेषतः मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों को गहराई से प्रभावित किया।

 

निष्कर्ष : अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान – एक समग्र मूल्यांकन

 

अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। यह अभियान न तो केवल सैनिक विजय की प्रक्रिया था और न ही स्थायी साम्राज्य विस्तार का प्रयास, बल्कि यह आर्थिक आवश्यकता, राजनीतिक अवसरवाद और व्यावहारिक दूरदर्शिता का संयुक्त परिणाम था। इसके माध्यम से पहली बार उत्तर भारत की सल्तनती सत्ता ने संगठित रूप से दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्तियों से संपर्क स्थापित किया और उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया।

सैन्य दृष्टि से यह अभियान उल्लेखनीय सफलताओं से युक्त था। देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और माबर तक तुर्की सेनाओं का पहुँचना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि थी। यद्यपि वारंगल और पांड्य राज्य में पूर्ण तथा स्थायी विजय प्राप्त नहीं की जा सकी, फिर भी दक्षिण की प्रमुख शक्तियाँ सल्तनत की सैन्य श्रेष्ठता और प्रभुत्व को स्वीकार करने के लिए विवश हुईं। इस प्रकार यह अभियान पूर्ण सैन्य अधिग्रहण की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव की नीति में अधिक सफल सिद्ध हुआ।

आर्थिक दृष्टि से अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान उसके शासन की आधारशिला बना। दक्षिण भारत से प्राप्त अपार धन-संपत्ति ने सल्तनत के राजकोष को अभूतपूर्व रूप से समृद्ध किया। इसी आर्थिक शक्ति के बल पर सुल्तान ने विशाल स्थायी सेना का पोषण किया, मंगोल आक्रमणों का प्रभावी प्रतिरोध किया और कठोर आर्थिक तथा प्रशासनिक सुधारों, विशेषतः बाजार नियंत्रण प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू किया। इस दृष्टि से दक्षिण भारत अभियान अलाउद्दीन खिलजी की आंतरिक नीतियों का अनिवार्य आधार था।

राजनीतिक दृष्टि से अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति व्यावहारिक और यथार्थवादी थी। उसने दक्षिणी राज्यों को प्रत्यक्ष रूप से सल्तनत में विलय करने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि वह भौगोलिक दूरी, प्रशासनिक कठिनाइयों और सांस्कृतिक भिन्नताओं से भली-भाँति परिचित था। इसके स्थान पर उसने उन्हें करदाता और अधीन राज्य बनाकर सल्तनत के प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखा। देवगिरि पर तृतीय आक्रमण और वहाँ सीमित सल्तनती प्रशासन की स्थापना यह संकेत देती है कि उसकी नीति समय के साथ विकसित होती गई, किंतु मूलतः वह स्थायी नियंत्रण की अपेक्षा प्रभावी प्रभुत्व पर केंद्रित रही।

दक्षिण भारत की पराजय का कारण केवल तुर्की सेना की संगठनात्मक और सैन्य श्रेष्ठता नहीं था। यादव, काकतीय, होयसल और पांड्य शासकों की आपसी ईर्ष्या, निरंतर संघर्ष और राजनीतिक अदूरदर्शिता ने उन्हें बाह्य आक्रमण के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध प्रस्तुत करने से वंचित कर दिया। कई अवसरों पर दक्षिणी शासकों ने अपने ही पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध दिल्ली सल्तनत से सहायता ली, जिससे अंततः उनकी स्वतंत्रता और शक्ति क्षीण होती चली गई। इस प्रकार दक्षिण भारत की पराजय आंतरिक विघटन और बाह्य आक्रमण दोनों का संयुक्त परिणाम थी।

दीर्घकालिक दृष्टि से अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान भारतीय मध्यकालीन इतिहास में एक संक्रमणकारी चरण सिद्ध हुआ। इसने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक दूरी को कम किया और यह स्पष्ट कर दिया कि संपूर्ण उपमहाद्वीप एक साझा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। यद्यपि यह प्रभुत्व स्थायी नहीं रहा, फिर भी इसके प्रभाव बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य जैसे नए राजनीतिक केंद्रों के उदय में परिलक्षित होते हैं। साथ ही, इस अभियान ने मुहम्मद तुगलक जैसे शासकों को दक्षिण भारत को प्रत्यक्ष रूप से सल्तनत में सम्मिलित करने के लिए प्रेरित किया।

समग्र रूप से देखा जाए तो अलाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत अभियान न तो केवल लूट की आकस्मिक प्रक्रिया था और न ही पूर्ण साम्राज्य विस्तार की सफलता। यह एक सुविचारित, बहुस्तरीय नीति थी, जिसने दिल्ली सल्तनत को आर्थिक शक्ति प्रदान की, दक्षिण भारत की राजनीतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया और भारतीय इतिहास में उत्तर-दक्षिण संबंधों की दिशा को स्थायी रूप से परिवर्तित किया। इसी कारण यह अभियान मध्यकालीन भारतीय राज्य-नीति की परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

 

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