हड़प नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी का औपनिवेशिक विस्तारवाद और भारतीय रियासतों का पतन

हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स): लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति और भारतीय राज्यों का विलय

 

लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद सिद्धांत रहा है। इस सिद्धांत के माध्यम से, ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत के कई राज्यों को अपने अधीन कर लिया। यह सिद्धांत ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे भारतीय राज्यों का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में हुआ।

1848 में जब लॉर्ड डलहौजी भारत के गवर्नर जनरल बने, तब ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण पहले से ही बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी तक सीमित था। लेकिन डलहौजी ने “हड़प नीति” के माध्यम से भारत के विशाल भूभाग को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की नीति अपनाई। यह नीति ब्रिटिश औपनिवेशिक विस्तारवाद (Colonial Expansionism) का सबसे स्पष्ट उदाहरण थी। हड़प नीति ने न केवल प्रशासनिक संरचना को बदला बल्कि 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की।

 

हड़प नीति – ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तारवादी औज़ार

 

हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) एक नीति थी, जिसके तहत ब्रिटिश साम्राज्य ने उन भारतीय राज्यों को अपनी संपत्ति में शामिल कर लिया, जिनके पास प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं थे। इसके अनुसार, यदि किसी राज्य का शासक बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी के मरता था, तो वह राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिल जाता था, खासकर अगर शासक ने बिना ब्रिटिश सरकार की अनुमति के दत्तक पुत्र गोद लिया हो।

डलहौजी का तर्क था कि कंपनी को “सर्वोच्च संप्रभु” (Paramount Power) का दर्जा प्राप्त है, इसलिए उसे ऐसे राज्यों पर अधिकार है जिनके शासक बिना स्वाभाविक उत्तराधिकारी के मर जाते हैं।

 

ब्रिटिश औपनिवेशिक कानून और अंग्रेज़ी Feudal Law से प्रेरणा

 

इस विचार की जड़ें अंग्रेज़ी feudal law में थीं, जिसमें किसी भूमि का उत्तराधिकारी न होने पर वह भूमि राजा की संपत्ति मानी जाती थी। डलहौजी ने इसे ‘कानूनी औचित्य’ (legal pretext) का रूप दिया, पर वास्तव में यह एक राजनीतिक हथियार था, जिसने कंपनी को भारतीय रियासतों को निगलने का अवसर दिया।

 

लॉर्ड डलहौजी – हड़प नीति (Doctrine of Lapse) के जनक और ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल (1848-1856)
लॉर्ड डलहौजी – हड़प नीति (Doctrine of Lapse) के माध्यम से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने वाले गवर्नर जनरल। (साभार: विकिपीडिया)

लॉर्ड डलहौजी का दृष्टिकोण और भारतीय राज्यों की श्रेणियाँ

 

डलहौजी ने भारत में हिंदू राज्यों की तीन श्रेणियाँ निर्धारित की थीं:

  1. पहली श्रेणी के राज्य – ये राज्य कभी भी किसी उच्च शक्ति के अधीन नहीं थे और करदाता नहीं थे।
  2. दूसरी श्रेणी के राज्य – ये राज्य ब्रिटिश सरकार को अपनी सर्वोच्च शक्ति मानते थे, जैसे दिल्ली के सम्राट या पेशवा।
  3. तीसरी श्रेणी के राज्य – ये राज्य ब्रिटिश सरकार के सनद (अनुदान) द्वारा बनाए गए या पुनर्जीवित किए गए थे।

 

दत्तक ग्रहण और उत्तराधिकार पर डलहौजी की हड़प नीति

 

1854 में डलहौजी ने इस नीति को फिर से स्पष्ट किया। उनके अनुसार:

  • पहली श्रेणी के राज्यों में दत्तक पुत्र को गोद लेने का अधिकार नहीं था।
  • दूसरी श्रेणी के राज्यों में शासक को दत्तक पुत्र गोद लेने के लिए ब्रिटिश सरकार से सहमति प्राप्त करनी होती थी।
  • तीसरी श्रेणी के राज्यों में दत्तक ग्रहण के माध्यम से उत्तराधिकार स्वीकार नहीं किया जा सकता था।

डलहौजी ने यह तर्क दिया कि जो शक्ति देती है, वह उसे वापस लेने का भी अधिकार रखती है। इसका मतलब था कि यदि कोई राज्य दत्तक उत्तराधिकारी के रूप में एक व्यक्ति को स्वीकार करता है, तो ब्रिटिश साम्राज्य उसे स्वीकार करने का निर्णय ले सकता था।

 

हड़प नीति के सामाजिक और धार्मिक प्रभाव

 

दत्तक ग्रहण (Adoption) हिन्दू समाज में एक धार्मिक और पितृधर्म संबंधी कर्तव्य माना जाता था। मनुस्मृति और नारद स्मृति में यह स्पष्ट रूप से वर्णित था कि यदि पुत्र न हो तो दत्तक पुत्र को सभी धार्मिक और उत्तराधिकार अधिकार प्राप्त होंगे। डलहौजी ने इस प्रथा को नकारकर न केवल राजनीतिक हस्तक्षेप किया, बल्कि भारतीय धार्मिक कानूनों को भी चुनौती दी। इससे भारतीय समाज में यह धारणा बनी कि ब्रिटिश शासन भारतीय परंपराओं को नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास कर रहा है।

 

ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार: हड़प नीति के तहत रियासतों का विलय

 

डलहौजी ने व्यपगत के सिद्धांत का पूरी तरह पालन किया और कई राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। यही कारण था कि 1848 से लेकर 1854 तक कई प्रमुख भारतीय राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बने। इनमें से प्रमुख राज्य थे: सतारा (1848), जैतपुर और संभलपुर (1849), बघाट (1850), उदयपुर (1852), झाँसी (1853) और नागपुर (1854)।

 

सतारा का विलय (1848): हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) की पहली प्रयोगशाला

 

सतारा पहला राज्य था, जिसे 1848 में ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। यह पहला राज्य था जहाँ हड़प नीति  नीति लागू हुई। दिलचस्प बात यह थी कि सतारा वही मराठा राज्य था जिसने कभी पेशवा बाजीराव द्वितीय के पतन के बाद ब्रिटिशों की सहायता से पुनर्जीवित किया गया था। इसलिए इसका विलय भारतीयों में गहरे असंतोष का कारण बना। सतारा के राजा अप्पा साहिब की मृत्यु के बाद, उन्होंने बिना ब्रिटिश सरकार की अनुमति के एक दत्तक पुत्र गोद लिया था। इस कारण डलहौजी ने सतारा को ‘अधीनस्थ राज्य‘ मानते हुए उसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इस निर्णय को सही ठहराया और इसे ब्रिटिश हितों के लिए बेहतर बताया।

 

संभलपुर और जैतपुर का विलय (1849)

 

संभलपुर राज्य के राजा नारायण सिंह की मृत्यु के बाद बिना किसी दत्तक पुत्र के, राज्य को 1849 में ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। डलहौजी ने इसे हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) के तहत लागू किया।

बुंदेलखंड स्थित जैतपुर रियासत भी 1949 में हड़प नीति का शिकार बना जब वहां के अंतिम राजा खेत सिंह बिना वारिस दिए चल बसे।

 

झाँसी का विलय (1853): रानी लक्ष्मीबाई और प्रतिरोध का आरंभ

 

झाँसी का राज्य भी डलहौजी के नीति से प्रभावित हुआ। झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद, उनके दत्तक पुत्र के दावे को अस्वीकार कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, झाँसी राज्य को 1853 में ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष इस नीति के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध का प्रतीक बना। उन्होंने अंग्रेज़ों को चेतावनी दी, मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।”

 

 नागपुर का विलय (1854): आर्थिक लाभ और साम्राज्यवादी दृष्टि

 

नागपुर राज्य में 1853 में बड़ा बदलाव आया। रघुजी तृतीय की मृत्यु के बाद, राज्य में कोई दत्तक पुत्र नहीं था। डलहौजी ने नागपुर राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया और राज्य की संपत्ति को ‘सरकार के निपटान में’ घोषित किया गया। बाद में, नागपुर महल की लूटपाट हुई और इसके गहनों और फर्नीचर की नीलामी की गई, जिससे £200,000 की राशि प्राप्त हुई। नागपुर का विलय आर्थिक दृष्टि से सबसे लाभकारी रहा क्योंकि यह कपास, लोहा और हीरों का प्रमुख क्षेत्र था।

 

डलहौजी की हड़प नीति: योगदान, आलोचना और आर्थिक प्रभाव

 

डलहौजी के इस व्यपगत सिद्धान्त ने ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में फैलाने में मदद की। उनकी नीति ने भारतीय शासकों के अधिकारों पर चोट की और कई राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गए। हालांकि, इस नीति की आलोचना भी की गई। कुछ आलोचकों का कहना था कि यह एक ‘अधिकार पर बल की जीत’ थी। हाउस ऑफ कॉमन्स में जोसेफ ह्यूम ने इस विलय को लेकर कड़ी आलोचना की, लेकिन अंततः इसे स्वीकार कर लिया गया।

 

आर्थिक दृष्टि से हड़प नीति

 

डलहौजी की नीति ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की। विलय किए गए राज्यों से प्राप्त कर और संसाधनों ने ब्रिटिश वित्त को स्थिर किया। उदाहरण के लिए, नागपुर और बरार से प्राप्त कर राजस्व से ईस्ट इंडिया कंपनी को लगभग 50 लाख रुपये की वार्षिक आय होने लगी। इस नीति ने ब्रिटिश भारत की राजस्व प्रणाली को और केंद्रीकृत किया, जिससे “भूमि राजस्व नीतियाँ” को लागू करना आसान हो गया।

 

हड़प नीति पर विचार और ऐतिहासिक टिप्पणियाँ

 

हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) पर कई तरह की टिप्पणियाँ की गई हैं, जो इसे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार और भारतीय राज्यों के विलय के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस नीति का उद्देश्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार था, और इसे इस दृष्टिकोण से देखा जाता है कि कैसे ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय शासकों के अधिकारों और परंपराओं का उल्लंघन किया।

 

भारतीय अधिकारों और परंपराओं का उल्लंघन

 

ब्रिटिश प्रभुत्व के दौरान, ईस्ट इंडिया कंपनी ने बार-बार आश्वासन दिया था कि भारतीयों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और उनकी परंपराओं का सम्मान किया जाएगा। दत्तक ग्रहण का अधिकार हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान था। इसे बहुत सम्मान और मान्यता प्राप्त थी। हालांकि, डलहौजी ने इस प्रथा को नया रूप दिया और साम्राज्यवादी उद्देश्य से इसका उपयोग किया। हड़प नीति को एक सामंती कानून के पुनरुद्धार के रूप में देखा जाता है, जिसे ‘कानूनीता के आवरण में लूट’ माना जाता है। यह एक अप्रचलित प्रथा थी, जिसे डलहौजी ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अपनाया।

 

‘आश्रित राज्यों’ और ‘संरक्षित सहयोगियों’ के बीच की पतली रेखा

 

इस नीति में एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि ‘आश्रित राज्यों’ और ‘संरक्षित सहयोगियों’ के बीच की रेखा बहुत पतली थी। हालाँकि इन दोनों की परिभाषा में बहुत सूक्ष्म अंतर था, लेकिन लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) ने इन सीमाओं को जानबूझकर धुंधला कर दिया। किसी भी विवादित व्याख्या के मामले में ईस्ट इंडिया कंपनी का निर्णय अंतिम था और उसकी व्याख्या हमेशा बाध्यकारी थी। इस प्रणाली में कोई स्वतंत्र न्यायालय नहीं था, जिससे किसी भी निष्पक्ष निर्णय की उम्मीद करना मुश्किल था।

  1. आश्रित राज्य (Dependent States):
    ये वे रियासतें थीं जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी ने सनद या अनुदान के माध्यम से अस्तित्व प्रदान किया था।
  • इन राज्यों की संप्रभुता नाममात्र की थी।
  • उनके शासक ब्रिटिश गवर्नर-जनरल की अधीनता स्वीकार करते थे।
  • उन्हें अपनी सीमाओं, उत्तराधिकार और प्रशासनिक निर्णयों के लिए कंपनी की अनुमति लेनी होती थी।
  • उदाहरण: सतारा, झाँसी, नागपुर, संभलपुर आदि।
    इन राज्यों पर हड़प नीति आसानी से लागू की जा सकती थी क्योंकि कंपनी उन्हें अपने “आश्रित” मानती थी।
  1. संरक्षित सहयोगी (Protected Allies):
    इन रियासतों का अस्तित्व ब्रिटिश संधियों से पहले का था, और वे ब्रिटिश साम्राज्य के साथ सुरक्षा या सैन्य सहायता की शर्तों पर जुड़ी थीं।
  • इन्हें “स्वतंत्र” या “अर्ध-स्वतंत्र सहयोगी” माना जाता था।
  • ब्रिटिश इन्हें बाहरी खतरों से सुरक्षा देने का वादा करते थे, बदले में ये कूटनीतिक और सैन्य मामलों में ब्रिटिश सलाह स्वीकार करते थे।
  • उदाहरण: हैदराबाद, मैसूर, ग्वालियर और भोपाल।
    इन राज्यों पर हड़प नीति सीधे लागू नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वे पूर्णतः कंपनी के अधीन नहीं थे।
  1. दोनों के बीच की धुंधली सीमा:
    डलहौजी की प्रशासनिक व्याख्या ने “आश्रित” और “संरक्षित सहयोगी” के बीच की रेखा को मिटा दिया। उन्होंने यह दावा किया कि ब्रिटिश साम्राज्य “Paramount Power” है, अतः हर भारतीय राज्य, चाहे वह आश्रित हो या सहयोगी, अंततः ब्रिटिश नियंत्रण में आता है। यही कारण था कि जब अवध या करौली जैसे राज्यों का विलय हुआ, तो यह स्पष्ट नहीं था कि वे “संरक्षित सहयोगी” थे या “आश्रित राज्य”, और यह अस्पष्टता डलहौजी के साम्राज्यवादी उद्देश्यों को पूरा करने का साधन बन गई।

यह अस्पष्ट वर्गीकरण ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रणनीति का हिस्सा था। डलहौजी ने इसे कानूनी व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन वस्तुतः यह राजनीतिक हेरफेर था, ताकि किसी भी राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का “कानूनी” आधार तैयार किया जा सके।

 

साम्राज्यवादी विचारों से प्रेरित निर्णय

 

लॉर्ड डलहौजी ने कई बार पूर्ववर्ती प्रथाओं को तोड़ा और साम्राज्यवादी विचारों से प्रेरित होकर कई निर्णय लिए। सतारा और नागपुर के मामलों में उनके साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चार्ल्स प्रथम के ‘व्यक्तिगत शासन‘ की तरह, यह भी एक साम्राज्यवादी नीति थी, जो भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूती से स्थापित करने के लिए अपनाई गई थी।

 

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का हस्तक्षेप और मतभेद

 

कई मामलों में, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने अपनी मंजूरी दी, लेकिन कुछ मामलों में जैसे करौली के विलय (1855) और बघाट और उदयपुर (1852) के मामले में, उन्होंने विलय को अस्वीकार कर दिया। इन मामलों में राज्य को संरक्षित सहयोगी के रूप में माना गया, न कि आश्रित राज्य के रूप में। यह दिखाता है कि डलहौजी के उद्देश्यों को हमेशा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा मंजूरी नहीं मिलती थी।

हाउस ऑफ कॉमन्स में जोसेफ ह्यूम और सर चार्ल्स वुड जैसे सदस्यों ने इस नीति की आलोचना करते हुए कहा कि यह “अत्यधिक हस्तक्षेपवादी” (Interventionist) है। लेकिन साम्राज्यवादी वर्ग ने इसे “राजनीतिक आवश्यकता” बताया। यह दिखाता है कि ब्रिटिश संसद में भी इस नीति को लेकर मतभेद थे।

 

भारतीय राज्यों का विलय: लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति

 

लॉर्ड डलहौजी का हड़प नीति भारतीय राज्यों के विलय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। यह नीति उनके साम्राज्यवादी उद्देश्यों का हिस्सा थी। डलहौजी का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के लिए ज्यादा से ज्यादा राज्य हासिल करना था। जहां हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) लागू नहीं हो सका, वहां उन्होंने ‘शासितों के हित‘ के नाम पर राज्य का विलय किया। भारतीय शासकों का मानना था कि उनके राज्यों का विलय न केवल हड़प नीति के कारण हुआ, बल्कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी की नैतिकता की लापरवाही का परिणाम था।

 

भारतीय प्रतिरोध और 1857 के विद्रोह से संबंध

 

1857 के विद्रोह के कई कारणों में से एक कारण हड़प नीति भी था। जिन रियासतों को जबरन विलय किया गया था, वहाँ के सैनिक और नागरिक गहरे असंतोष में थे। झाँसी, अवध और नागपुर के सिपाही बाद में 1857 के विद्रोह के प्रमुख केंद्र बने। इस नीति ने भारतीयों को यह अहसास कराया कि ब्रिटिश शासन केवल “कानूनीता” का मुखौटा पहनकर “राजनीतिक अधिग्रहण” कर रहा है।

 

 उपाधियों और पेंशनों का उन्मूलन 

 

हड़प नीति के तहत देसी रियासतों की नाममात्र की संप्रभुताओं को समाप्त कर दिया गया। डलहौजी ने भारत में कई महत्वपूर्ण शाही उपाधियों और पेंशनों को समाप्त किया।

  • कर्नाटक के नवाब की मृत्यु (1853): डलहौजी ने यह फैसला लिया कि नवाब का कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा और उनके राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाएगा।
  • तंजौर के राजा (1855): राजा की मृत्यु के बाद, उनकी उपाधि समाप्त कर दी गई।
  • बहादुर शाह द्वितीय (1857): बहादुर शाह की मृत्यु के बाद, उनकी शाही उपाधि को समाप्त करने का निर्णय लिया गया था, हालांकि कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इसे अस्वीकार कर दिया।
  • पेशवा बाजी राव द्वितीय (1853): उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें दी जाने वाली पेंशन को उनके दत्तक पुत्र नाना साहिब को नहीं हस्तांतरित किया गया।

बरार का विलय (1853): हैदराबाद के निज़ाम की मजबूरी

 

1853 में, हैदराबाद के निज़ाम ने ब्रिटिश सरकार को बरार के क्षेत्र को सौंपने के लिए मजबूर किया। यह कदम मुख्यतः उनके बढ़ते हुए ऋण और ब्रिटिश सहायक बल की आपूर्ति के लिए किया गया। इस क्षेत्र से कंपनी को क़रीब 50 लाख रुपये की आय होने का अनुमान था।

 

 अवध का विलय (1856): ‘कुशासन’ का बहाना और राजनीतिक नियंत्रण

 

अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का मुख्य कारण वहां के प्रशासन में कुशासन था। डलहौजी ने इस कारण का उपयोग करते हुए अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किया। इसके बाद, लखनऊ के रेजिडेंट, कर्नल स्लीमैन, ने अवध में कुशासन के आरोपों की जांच की। इसके बाद, डलहौजी ने नवाब वाजिद अली शाह से त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा और राज्य का विलय कर लिया।

 

अवध का विलय (1856): ‘कुशासन’ का बहाना और राजनीतिक नियंत्रण

 

अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य के साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारतीय राज्यों को नियंत्रित करने के लिए एक और कदम माना जाता था। इसके द्वारा, ब्रिटिश साम्राज्य ने न केवल राज्य का प्रशासन संभाला, बल्कि एक बार फिर से भारतीयों को यह संदेश दिया कि ब्रिटिश शासन को चुनौती देने की कोई संभावना नहीं थी।  यद्यपि यह विलय ‘कुशासन’ के नाम पर किया गया, पर वास्तव में यह नीति का विस्तार मात्र था, जिसने नवाब वाजिद अली शाह की लोकप्रियता को ब्रिटिशों के लिए खतरा माना।

 

निष्कर्ष : हड़प नीति का दीर्घकालिक प्रभाव

 

हड़प नीति और अन्य विलय प्रक्रियाओं के जरिए, डलहौजी ने भारतीय राज्यों का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में किया। यह एक साम्राज्यवादी नीति थी, जिसे भारतीय शासकों और उनके अधिकारों की उपेक्षा करते हुए लागू किया गया। हालांकि, डलहौजी के फैसले ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में सहायक साबित हुए, लेकिन इन नीतियों की भारतीय समाज और राजनीति पर गहरी छाप पड़ी। भारतीयों के लिए यह न केवल उनके अधिकारों का उल्लंघन था, बल्कि एक ऐसी नीति थी, जो उनके अस्तित्व और स्वतंत्रता के लिए खतरा बन गई थी।

हड़प नीति ने ब्रिटिश साम्राज्य को भारत के लगभग एक-तिहाई भूभाग पर प्रत्यक्ष नियंत्रण दिलाया। लेकिन दीर्घकाल में इसने औपनिवेशिक शासन की नींव कमजोर कर दी, क्योंकि इसने भारतीयों में व्यापक असंतोष, राष्ट्रवादी चेतना और स्वतंत्रता की आकांक्षा को जन्म दिया। हड़प नीति अंततः वही कारण बनी जिसने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सबसे बड़े विद्रोह, 1857 का सशस्त्र विद्रोह को जन्म दिया।

 

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