पूना पैक्ट: डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच सांप्रदायिक समझौता

पूना पैक्ट हस्ताक्षर के बाद येरवडा जेल के बाहर डॉ. भीमराव अंबेडकर (बाएं से तीसरे), एम.आर. जयकर, तेज बहादुर सप्रू और अन्य नेताओं की 1932 की ऐतिहासिक छवि।
डॉ. अंबेडकर (बाएं से तीसरे) अन्य के साथ येरवडा जेल के बाहर पूना पैक्ट हस्ताक्षर करने के बाद.

 

पूना पैक्ट क्या है?

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 1932 में हुआ “पूना पैक्ट” भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण समझौता था। यह समझौता दलित समुदाय के अधिकारों, उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व, और भारतीय समाज में उनकी स्थिति को लेकर किया गया था। इस समझौते का भारतीय समाज और दलित चेतना पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर दिया।

 

पूना पैक्ट की पृष्ठभूमि

 

पूना पैक्ट से पहले की राजनीतिक घटनाएँ

 

1932 में, ब्रिटिश सरकार ने “कम्यूनल अवार्ड” की घोषणा की, जिसके तहत भारतीय चुनावों में विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates) बनाए गए थे। इस योजना के अनुसार, दलितों, जिन्हें उस समय “अछूत” कहा जाता था, के लिए भी एक अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई थी।
डॉ. अंबेडकर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया क्योंकि इससे दलितों को अपनी आवाज़ उठाने का मौका मिलता और वे अपने अधिकारों के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुन सकते थे। वहीं, महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि इससे हिंदू समाज में बंटवारा हो जाएगा और दलित मुख्यधारा से अलग हो जाएंगे।

 

अलग निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास

 

गांधी जी का 1932 का अनशन केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक और सामाजिक बहस का परिणाम था। इस अनशन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए, हमें “अलग निर्वाचन क्षेत्र” (Separate Electorates) के इतिहास और इसके भारतीय राजनीति पर प्रभाव पर भी ध्यान देना होगा।

अलग निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास:

मॉर्ले-मिंटो सुधार और पूना पैक्ट की नींव

1909 में ब्रिटिश सरकार ने मॉर्ले-मिंटो सुधारों के तहत भारतीय विधान परिषदों (Legislative Councils) में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था की। इस कानून के तहत, मुस्लिम समुदाय के लोग अपने प्रतिनिधि स्वयं चुन सकते थे, जबकि अन्य समुदायों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र होते थे। इसने भारतीय राजनीति में अलग निर्वाचन क्षेत्र की परंपरा की नींव रखी।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार का प्रभाव

1919 के मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने अलग निर्वाचन क्षेत्रों की अवधारणा को और विस्तारित किया। इसमें न केवल मुस्लिम समुदाय के लिए बल्कि सिख, एंग्लो-इंडियन, और यूरोपीय समुदायों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था की गई। यह निर्णय ब्रिटिश सरकार की “बांटो और राज करो” नीति का हिस्सा था, जो विभिन्न समुदायों के बीच फूट डालकर अपने शासन को बनाए रखने का प्रयास था।

राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में पूना पैक्ट का उल्लेख

1930 से 1932 के बीच आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों का मुद्दा उठाया गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलित समुदाय के लिए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए स्वतंत्र रूप से लड़ सकें।

1932 का कम्यूनल अवार्ड:

16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने “कम्यूनल अवार्ड” की घोषणा की, जिसमें दलितों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई। इस अवार्ड के तहत दलित समुदाय को यह अधिकार दिया गया कि वे अपने लिए अलग से प्रतिनिधि चुन सकते थे।

 

गांधी जी का अनशन और अलग निर्वाचन क्षेत्र की भूमिका

 

गांधी जी के अनशन का निर्णय और कारण

 

गांधी जी ने “कम्यूनल अवार्ड” का विरोध करते हुए 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। उनका मानना था कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हिंदू समाज को विभाजित करेगा और दलित समुदाय को मुख्यधारा से अलग कर देगा।

अनशन की गंभीरता:

गांधी जी का यह अनशन अत्यधिक गंभीर था, क्योंकि वे भारतीय राजनीति में अलग निर्वाचन क्षेत्रों की अवधारणा को समाप्त करना चाहते थे। उन्होंने इसे हिंदू समाज की एकता के लिए खतरनाक माना और इसे ब्रिटिश शासन की “बांटो और राज करो” की नीति का हिस्सा समझा।

महात्मा गांधी का 1932 का आमरण अनशन भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित घटनाओं में से एक है। यह अनशन ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित “कम्यूनल अवार्ड” के खिलाफ था, जिसमें दलितों (जिन्हें तब ‘अछूत’ कहा जाता था) के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates) बनाए जाने की बात थी। गांधी जी को डर था कि यह निर्णय हिंदू समाज को विभाजित कर देगा और दलित समुदाय को मुख्यधारा से अलग कर देगा।

 

अनशन की पृष्ठभूमि:

 

कम्यूनल अवार्ड: 16 अगस्त 1932 को, ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने “कम्यूनल अवार्ड” की घोषणा की। इस योजना के तहत, मुस्लिम, सिख, भारतीय ईसाई, यूरोपीय, एंग्लो-इंडियन और दलित समुदाय के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए थे।गांधी जी का विरोध: गांधी जी ने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उन्हें लगा कि यह भारत में विभिन्न समुदायों के बीच विभाजन को और गहरा करेगा। खासकर दलित समुदाय के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाने को वे हिंदू समाज के लिए खतरनाक मानते थे। उन्होंने इसे “बांटो और राज करो” की नीति के रूप में देखा।

 

अनशन की शुरुआत:

 

गांधी जी के अनशन की शुरुआत और तिथि

 

गांधी जी का फैसला:

गांधी जी ने घोषणा की कि यदि ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को वापस नहीं लिया, तो वे अनशन करेंगे। उन्होंने इसे हिंदू समाज की एकता के लिए आवश्यक बताया।

अनशन की तिथि:

20 सितंबर 1932 को गांधी जी ने यरवदा सेंट्रल जेल, पुणे में आमरण अनशन शुरू किया।

 

पूना पैक्ट के दौरान की प्रमुख घटनाएँ

 

देशभर में चिंता:

गांधी जी के अनशन ने पूरे देश में चिंता फैला दी। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक नेता, जिनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मदन मोहन मालवीय जैसे प्रमुख नेता शामिल थे, स्थिति को संभालने के प्रयास में जुट गए।

डॉ. अंबेडकर की भूमिका पूना पैक्ट में

डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति को समझते हुए गांधी जी से बातचीत के लिए तैयार हुए, क्योंकि गांधी जी के अनशन के कारण दलित अधिकारों के लिए चल रही उनकी लड़ाई को नुकसान हो सकता था।

 

पूना पैक्ट का समझौता और प्रमुख बिंदु

 

24 सितंबर 1932 को डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच “पूना पैक्ट” के रूप में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इस समझौते ने भारतीय राजनीति में दलित समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान सुरक्षित किया और दलितों के राजनीतिक अधिकारों को मान्यता दी।

समझौते के प्रमुख बिंदु:

1.संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र (Joint Electorates):

निर्णय का बदलाव:
पूना पैक्ट में यह निर्णय लिया गया कि दलित समुदाय को अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिलेगा, बल्कि वे संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में शामिल होंगे।

आरक्षित सीटें:

समझौते के तहत प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों के लिए सीटों की संख्या बढ़ाकर 71 से 148 कर दी गई। यह आरक्षित सीटें संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के अंतर्गत आती थीं।

 

2.प्राथमिक चुनाव (Primary Elections):

दलित प्रतिनिधि चयन:

पूना पैक्ट में दलित मतदाताओं के लिए यह व्यवस्था की गई कि वे पहले अपने समुदाय के भीतर एक प्रारंभिक चुनाव करेंगे, जिससे दलित समुदाय के वास्तविक प्रतिनिधि चुने जा सकें। इन उम्मीदवारों की सूची में से सामान्य निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता अंतिम चुनाव करेंगे।

 

3.सामाजिक और आर्थिक सुधार:

शैक्षणिक और रोजगार के अवसर:

समझौते में यह भी तय किया गया कि दलित समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर दिए जाएंगे, जिससे उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर में सुधार हो सके।

सामाजिक और आर्थिक अधिकार:

समझौते में दलितों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर देने की बात भी तय की गई।

 

पूना पैक्ट का दलित चेतना पर प्रभाव

 

1.राजनीतिक प्रतिनिधित्व:

पूना पैक्ट ने दलितों को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। इससे दलित समुदाय को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का मौका मिला और वे मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो सके।

2.राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी:

इस समझौते के बाद, दलित समुदाय ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू किया। यह समझौता उनके लिए एक ऐसा मंच बना, जिसने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ सामाजिक सुधार आंदोलनों में भी सक्रिय भागीदारी करने का अवसर दिया।

3.दलित चेतना का विकास:

पूना पैक्ट के बाद दलित समाज में राजनीतिक और सामाजिक चेतना का विकास हुआ। वे अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हुए और उनके हितों के लिए संघर्षरत होने लगे।

 

पूना पैक्ट और संविधान में आरक्षण की व्यवस्था

 

संविधान सभा में दलित प्रतिनिधित्व:

 

पूना पैक्ट ने दलितों के राजनीतिक अधिकारों को मान्यता दी, जिसने संविधान सभा में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह समझौता आगे चलकर भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes) के लिए आरक्षण की नींव बना।

 

आरक्षण की व्यवस्था:

 

पूना पैक्ट के तहत तय किए गए आरक्षण के प्रावधानों को भारतीय संविधान में शामिल किया गया, जिससे वंचित वर्गों को शिक्षा, रोजगार, और राजनीति में प्रतिनिधित्व मिल सका।

 

पूना पैक्ट का निष्कर्ष और ऐतिहासिक महत्व

 

पूना पैक्ट भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण समझौता था, जिसने दलित समुदाय के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को मजबूत किया। इस समझौते ने न केवल दलितों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर दिया, बल्कि आगे चलकर भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और वंचित वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को भी प्रभावित किया। यह समझौता दलित चेतना के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने भारतीय समाज में उनकी स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की।

 

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