दक्कन के इतिहास में बहमनी साम्राज्य केवल एक स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह मध्यकालीन भारत की राजनीतिक संरचना, शक्ति-संतुलन और क्षेत्रीय सत्ता-विकास का निर्णायक अध्याय भी था। दिल्ली सल्तनत की केंद्रीकृत सत्ता से अलग होकर दक्कन में जिस स्वतंत्र राजनीतिक परंपरा का उदय हुआ, उसका सबसे सशक्त रूप बहमनी साम्राज्य के रूप में सामने आया।
बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास (1347-1527 ई.) वस्तुतः सत्ता के केंद्रीकरण और विखंडन, अमीर वर्ग की भूमिका, प्रांतीय स्वायत्तता, तथा विजयनगर जैसे समकालीन शक्तिशाली राज्यों के साथ निरंतर संघर्ष की कहानी है। यह साम्राज्य जहाँ एक ओर तुगलक शासन की दक्कनी नीतियों की प्रतिक्रिया था, वहीं दूसरी ओर इसने दक्कन में स्थायी राजनीतिक संस्थाओं और नई सत्ता-संरचनाओं को जन्म दिया।
बहमनी शासन की राजनीति को केवल युद्धों या शासकों की सूची तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। इसके मूल में अमीरान-ए-सदह की शक्ति, दक्खिनी-अफ़ाक़ी गुटबंदी, राजधानी का स्थानांतरण, और प्रांतीय तराफदारों का बढ़ता प्रभुत्व जैसे तत्व सक्रिय थे, जिन्होंने अंततः इस साम्राज्य की दिशा और दशा दोनों को निर्धारित किया।
यह लेख बहमनी साम्राज्य के उदय, सुदृढ़ीकरण, आंतरिक सत्ता-संघर्ष और अंततः पतन का विश्लेषण करता है, ताकि दक्कन की मध्यकालीन राजनीति में बहमनी राज्य की वास्तविक भूमिका को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके। यह विषय UPSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में दक्कन के इतिहास, मध्यकालीन राजनीतिक संरचना और क्षेत्रीय राज्यों के अध्ययन के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बहमनी साम्राज्य उत्तर भारत की सल्तनती परंपरा और दक्षिण की स्थानीय राजनीति के संगम को दर्शाता है।

बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास : तुगलक शासन की दक्कन नीति की पृष्ठभूमि
बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक की दक्कन नीति का विश्लेषण अनिवार्य है। तुगलक सुल्तान ने दक्षिण भारत में केवल सैन्य विजय तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि वहाँ एक सुदृढ़ प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करने का प्रयास किया। इसी क्रम में उसने ‘अमीरान-ए-सदह’ नामक अधिकारियों की नियुक्ति की, जो लगभग सौ ग्रामों के समूह पर प्रशासनिक और सैनिक नियंत्रण रखते थे। ये अधिकारी ‘सादी’ कहलाते थे और उनकी स्थिति सल्तनत के उच्च अमीरों के समकक्ष थी।
इन सादी अमीरों के हाथों में राजस्व वसूली और स्थानीय सैनिक टुकड़ियों की कमान, दोनों का केंद्रीकरण था। परिणामस्वरूप, दक्कन की जनता उन्हें ही शासन का वास्तविक प्रतिनिधि मानने लगी। यह स्थिति तुगलक शासन की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए घातक सिद्ध हुई, क्योंकि जैसे ही केंद्र कमजोर पड़ा, यही अमीर विद्रोह के केंद्र बन गए।
अमीरान-ए-सदह का विद्रोह और दौलताबाद संकट
जब तुगलक साम्राज्य के विभिन्न भागों में विद्रोह भड़क उठे, तब दक्कन के सादी अमीरों ने भी इस अस्थिरता का लाभ उठाया। गुजरात के सादी अमीरों के विद्रोह से प्रेरित होकर दक्कन में भी असंतोष तीव्र हो गया। विद्रोह के दमन हेतु मुहम्मद बिन तुगलक स्वयं भड़ौच पहुँचा और अपने दक्कन वाइसराय अमीर-उल-मुल्क को आदेश दिया कि वह दौलताबाद के अमीरान-ए-सदह के प्रतिनिधियों को भड़ौच भेजे।
किन्तु भड़ौच जाने के स्थान पर इन अमीरों ने रात्रि में गुप्त सम्मेलन किया और तुगलक शासन के विरुद्ध सामूहिक विद्रोह का निश्चय किया। तीन दिनों के भीतर उन्होंने दौलताबाद में नियुक्त तुगलक वाइसराय को पराजित कर दिया। इस विद्रोह के पश्चात् दौलताबाद के वरिष्ठतम अमीर इस्माइल को विद्रोही अमीरों ने अपना नेता स्वीकार किया।
ज़फ़र ख़ाँ का उदय और बहमनी सत्ता की स्थापना
इस्माइल ने विद्रोही संघ के सबसे प्रभावशाली नेता हसन को अमीर-उल-उमरा तथा ज़फ़र ख़ाँ की उपाधियाँ प्रदान कीं। परंतु केवल दौलताबाद पर अधिकार कर लेना पर्याप्त नहीं था, क्योंकि गुलबर्गा, कल्याणी और सागर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र अभी भी तुगलक नियंत्रण में थे। ज़फ़र ख़ाँ ने सैन्य अभियानों द्वारा सागर और गुलबर्गा पर अधिकार कर लिया।
इस स्थिति से चिंतित होकर मुहम्मद बिन तुगलक स्वयं दौलताबाद पहुँचा और किले को घेर लिया। परंतु गुजरात में भड़के विद्रोहों के कारण उसे घेरा उठाकर लौटना पड़ा। इसी अवसर का लाभ उठाकर ज़फ़र ख़ाँ ने दौलताबाद की ओर कूच किया और किले में घिरे इस्माइल को मुक्त कराया।
ज़फ़र ख़ाँ की निरंतर सफलताओं और सैन्य प्रतिष्ठा के कारण उसकी लोकप्रियता अत्यधिक बढ़ गई। अंततः इस्माइल ने स्वेच्छा से सत्ता त्याग कर ज़फ़र ख़ाँ को शासन सौंप दिया। सेना और नगरवासियों के समर्थन से 1346-47 ई. में ज़फ़र ख़ाँ ने ‘अलाउद्दीन हसन बहमन शाह’ की उपाधि धारण की और इस प्रकार दक्कन में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। यहीं से बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास का औपचारिक आरंभ होता है।
अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (1347-1358 ई.) : सत्ता का सुदृढ़ीकरण
अलाउद्दीन हसन बहमन शाह को बहमनी साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसकी उत्पत्ति को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें उसका ईरानी मूल प्रमुख है, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह विवाद गौण है। अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसने तुगलक सत्ता से स्वतंत्र दक्कनी राज्य को संगठित करने की स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत की।
उसने कंधार, कोट्टगिरि, कल्याणी और बीदर पर अधिकार करने के लिए सफल सैनिक अभियान चलाए। वारंगल के शासक कपाय नायक ने भी उससे मैत्री स्थापित की, जिससे बहमनी सत्ता को पूर्वी दक्कन में वैधता मिली। गुलबर्गा में पोचा रेड्डी के दमन और सागर में मुहम्मद बिन आलम के विद्रोह को दबाने से उसकी केंद्रीय सत्ता और सुदृढ़ हुई।
अपने शासन के अंतिम चरण में उसने पश्चिमी समुद्र तट के महत्वपूर्ण बंदरगाह दाबुल पर अधिकार कर लिया, जिससे बहमनी साम्राज्य को समुद्री व्यापार से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ। राजनीतिक दृष्टि से यह कदम अत्यंत दूरगामी था।
अलाउद्दीन हसन बहमन शाह की लोकप्रियता का एक कारण उसकी समावेशी नीति भी थी। उसने हिंदुओं से जजिया न लेने का आदेश दिया, जो उस काल की राजनीति में असाधारण निर्णय था। इससे बहमनी शासन की सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक स्थिरता की नींव पड़ी।
मुहम्मद शाह प्रथम (1358-1375 ई.) : विस्तारवाद और प्रशासनिक संगठन
1358 ई. में अलाउद्दीन हसन बहमन शाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र ज़फ़र ख़ाँ, मुहम्मद शाह प्रथम की उपाधि धारण कर बहमनी सिंहासन पर बैठा। उसका शासनकाल बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में लगातार युद्धों और प्रशासनिक संस्थानीकरण के लिए जाना जाता है।
राजनीतिक दृष्टि से उसका अधिकांश शासनकाल दो मोर्चों पर व्यतीत हुआ, एक ओर दक्कन में तेलंगाना के शासक कपाय नायक तथा उसके उत्तराधिकारी विनायक देव के विरुद्ध संघर्ष, और दूसरी ओर दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य के साथ निरंतर युद्ध।
तेलंगाना के संघर्ष में अंततः कपाय नायक पराजित हुआ और उसे गोलकुंडा के प्रदेश बहमनी साम्राज्य को सौंपने पड़े। इसी युद्ध के परिणामस्वरूप बहमनी सुल्तान को ‘तख़्त-ए-फ़िरोज़ा’ प्राप्त हुआ, जो आगे चलकर बहमनी सुल्तानों का परंपरागत राजसिंहासन बना। इसके विपरीत, विजयनगर के साथ युद्ध निर्णायक सिद्ध नहीं हो सके, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दक्कन की राजनीति अब द्विध्रुवीय शक्ति-संघर्ष के चरण में प्रवेश कर चुकी थी। यह स्थिति दक्कन की राजनीति को विजयनगर और बहमनी साम्राज्य के बीच एक स्थायी द्विध्रुवीय संघर्ष में बदल देती है।
तराफ व्यवस्था : बहमनी राजनीतिक प्रशासन की रीढ़
मुहम्मद शाह प्रथम का सबसे स्थायी योगदान उसकी प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था थी। उसने संपूर्ण बहमनी साम्राज्य को चार तराफों (अतराफों) में विभाजित किया,
- दौलताबाद
- बरार
- बीदर
- गुलबर्गा
प्रत्येक तराफ एक शक्तिशाली प्रांतीय इकाई थी, जिसके प्रमुख को विशिष्ट उपाधियाँ प्रदान की गई थीं। गुलबर्गा का तराफ राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें बीजापुर जैसे सामरिक क्षेत्र सम्मिलित थे और इसे प्रायः सुल्तान के अत्यंत विश्वसनीय अमीर को सौंपा जाता था। यह व्यवस्था एक ओर प्रशासनिक सुविधा प्रदान करती थी, किंतु दूसरी ओर इसने प्रांतीय अमीरों की शक्ति को अत्यधिक बढ़ा दिया, जो आगे चलकर बहमनी साम्राज्य के विघटन का एक प्रमुख कारण बनी।
सैन्य संगठन और बारूद का प्रयोग
इसी काल में बहमनी सेना में बारूद के प्रयोग का आरंभ हुआ, जिसने रक्षा और आक्रमण दोनों की रणनीति को बदल दिया। सेना के सर्वोच्च सेनानायक को अब अमीर-उल-उमरा कहा जाने लगा, जिसके अधीन बरबरदान होते थे, ये आवश्यकता पड़ने पर सैनिक टुकड़ियों को संगठित करते थे।
यह परिवर्तन बहमनी साम्राज्य को दक्कन की अन्य शक्तियों की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाता है और इसे केवल क्षेत्रीय विद्रोही राज्य के स्थान पर एक संगठित सैन्य-राज्य के रूप में स्थापित करता है।
1375-1397 ई. : राजनीतिक अस्थिरता और गुटीय संघर्ष का आरंभ
1375 ई. में मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु के बाद लगभग बाईस वर्षों तक बहमनी राजनीति अत्यंत अस्थिर रही। इस अवधि में पाँच सुल्तान क्रमशः सत्तारूढ़ हुए, जिनमें से अधिकांश का शासन कुछ महीनों तक ही सीमित रहा। इस अपवादस्वरूप केवल मुहम्मद द्वितीय (1378-1397 ई.) का शासन अपेक्षाकृत दीर्घ और शांतिपूर्ण रहा। इस चरण में बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास स्पष्ट रूप से सत्ता-संतुलन से सत्ता-संघर्ष की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषता यह थी कि बहमनी साम्राज्य के दिल्ली सल्तनत से शेष बचे सभी औपचारिक संबंध समाप्त हो गए। अब दक्कन की राजनीति पूर्णतः स्वतंत्र दिशा में आगे बढ़ने लगी।
दक्खिनी बनाम अफ़ाक़ी संघर्ष : राजनीतिक विघटन की जड़
इसी काल में बहमनी दरबार में दो स्पष्ट राजनीतिक गुट उभरकर सामने आए,
- दक्खिनी (घरीब): उत्तर भारत से पहले आकर बसे मुस्लिम अधिकारी
- अफ़ाक़ी: ईरान, अरब और मध्य एशिया से आए नवीन प्रवासी
अफ़ाक़ियों के आगमन से बहमनी राजनीति और संस्कृति पर विदेशी प्रभाव बढ़ा, विशेषतः ईरानी प्रशासनिक और सांस्कृतिक तत्वों का। परंतु इसके साथ ही दक्खिनियों और अफ़ाक़ियों के बीच सत्ता-संघर्ष इतना तीव्र हो गया कि यह केवल प्रशासनिक मतभेद न रहकर राजनीतिक वैमनस्य में बदल गया।
यह संघर्ष बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ, क्योंकि आगे चलकर यही गुटबंदी सुल्तानों की हत्या, षड्यंत्र और अंततः साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण बनी।
ताजुद्दीन फ़िरोज़ शाह बहमनी (1397-1422 ई.) : सत्ता-संतुलन की राजनीति
1397 ई. में ताजुद्दीन फ़िरोज़ के सिंहासनारूढ़ होने के साथ बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक नया चरण प्रारंभ होता है। यह काल अफ़ाक़ियों के बढ़ते प्रभाव और दक्खिनियों के ह्रास का प्रतीक था। फ़िरोज़ ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए विदेशियों के आगमन को प्रोत्साहित किया, जिससे दरबार में शक्ति-संतुलन और अधिक अस्थिर हो गया।
दक्खिनी और अफ़ाक़ी गुटों के बीच बढ़ते वैमनस्य को नियंत्रित करने के उद्देश्य से फ़िरोज़ ने एक राजनीतिक उपकरण के रूप में हिंदुओं के प्रति उदार नीति अपनाई। यह नीति किसी धार्मिक सहिष्णुता से अधिक, सत्ता-संतुलन की व्यावहारिक रणनीति थी, जिसका उद्देश्य दरबारी गुटों की शक्ति को सीमित करना था।
विद्वान सुल्तान, परंतु राजनीतिक रूप से विवश
फ़िरोज़ शाह बहमनी को बहमनी वंश के सर्वाधिक शिक्षित सुल्तानों में गिना जाता है। भाषाओं, विज्ञान और दर्शन में उसकी रुचि तथा विदेशी विद्वानों को संरक्षण देने की नीति ने बहमनी दरबार को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया। स्थापत्य के क्षेत्र में उसने हिंदू-मुस्लिम मिश्रित परंपरा को प्रश्रय दिया और भीमा नदी के तट पर फ़िरोज़ाबाद नगर की स्थापना की।
किन्तु इन सांस्कृतिक उपलब्धियों के समानांतर फ़िरोज़ का शासनकाल राजनीतिक रूप से अत्यंत अशांत रहा। उत्तर में सागर के सामंतों का विद्रोह, खेर्ला के राजा नरसिंह द्वारा मांडू के सुल्तान के साथ मिलकर माहूर तक आक्रमण, तथा दक्षिण में निरंतर विजयनगर दबाव, इन सभी ने सुल्तान की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता को लगातार चुनौती दी।
तेलंगाना, उड़ीसा और विजयनगर : बहु-दिशात्मक संघर्ष
तेलंगाना में वेलम शासकों और विजयनगर के परोक्ष हस्तक्षेप ने बहमनी सत्ता को अस्थिर बनाए रखा। फ़िरोज़ ने इस क्षेत्र में हस्तक्षेप अवश्य किया, किंतु संघर्ष निर्णायक सिद्ध नहीं हुआ। शासन के अंतिम वर्षों में वेलम शासक पेड कोगती वेम के बहमनी पक्ष में आ जाने से स्थिति कुछ समय के लिए अनुकूल हुई और संयुक्त सेनाओं ने उड़ीसा तक अभियान किया।
फिर भी, फ़िरोज़ के अंतिम वर्ष आंतरिक षड्यंत्र, दरबारी राजनीति और उत्तराधिकार संकट से ग्रस्त रहे। अफ़ाक़ी गुट के नेता खलाफ हसन ने सुल्तान के भाई अहमद का समर्थन किया, जिससे फ़िरोज़ को विवश होकर उसे उत्तराधिकारी घोषित करना पड़ा। इसी के साथ गुलबर्गा-युग का अंत हुआ।
शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम (1422-1446 ई.) : राजधानी परिवर्तन और राजनीतिक पुनर्संयोजन
अहमद प्रथम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय गुलबर्गा से बीदर राजधानी स्थानांतरित करना था। यह केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं, बल्कि बहमनी राजनीति के केंद्र में आए संरचनात्मक बदलाव का संकेत था। गुलबर्गा का दरबार षड्यंत्रों से ग्रस्त हो चुका था, जबकि बीदर न केवल भौगोलिक रूप से अधिक केंद्रीय था, बल्कि उसकी जलवायु और सामरिक स्थिति भी अनुकूल थी। नई राजधानी का नाम मुहम्मदाबाद रखा गया। राजधानी परिवर्तन के साथ ही बहमनी दरबार में अफ़ाक़ी प्रभाव तीव्रता से बढ़ा।
वकील-ए-सल्तनत और सांप्रदायिक आयाम
अहमद प्रथम ने खलाफ हसन को वकील-ए-सल्तनत (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया और मलिक-उत-तुज्जार की उपाधि प्रदान की। इस नियुक्ति ने दक्खिनियों और अफ़ाक़ियों के बीच वैमनस्य को चरम पर पहुँचा दिया। स्थिति तब और जटिल हो गई जब सुल्तान ने ईरान से शिया संतों को आमंत्रित करना प्रारंभ किया, जबकि दक्खिनी मुस्लिम बहुसंख्यक रूप से सुन्नी थे। इस प्रकार बहमनी राजनीति में पहली बार गुटीय संघर्ष ने सांप्रदायिक रंग ग्रहण किया, जिसका प्रभाव आगे चलकर सत्ता-संघर्ष और हिंसा के रूप में दिखाई देता है।
सैन्य अभियानों की सीमाएँ और प्रतिष्ठा का ह्रास
अहमद प्रथम के शासनकाल में तेलंगाना, माहूर, मालवा और गुजरात के विरुद्ध अनेक सैन्य अभियान चलाए गए। 1425 ई. में तेलंगाना में बहमनी स्थिति सुदृढ़ अवश्य हुई, परंतु गुजरात के विरुद्ध अभियान पूर्णतः विफल रहे। इन निरर्थक युद्धों से न केवल बहमनी साम्राज्य की सैन्य प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची, बल्कि दरबारी गुटों के बीच अविश्वास भी बढ़ा।
यद्यपि अहमद प्रथम न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक था, जिसके कारण उसे अहमद शाह वली कहा गया, परंतु राजनीतिक दृष्टि से वह गुटीय संघर्ष को नियंत्रित करने में असफल रहा। यह विफलता आगे चलकर बहमनी साम्राज्य के पतन की भूमिका बनती है।
अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (1436-1458 ई.) : सत्ता का क्षरण और निरर्थक युद्ध
शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम के पश्चात् सुल्तान अलाउद्दीन अहमद द्वितीय बहमनी सिंहासन पर बैठा। राजनीतिक दृष्टि से उसका शासनकाल दृढ़ नेतृत्व के अभाव और निरंतर युद्धों के लिए जाना जाता है। अपने पिता के विपरीत वह न तो गुटीय राजनीति को नियंत्रित कर सका और न ही एक स्पष्ट दीर्घकालिक नीति प्रस्तुत कर पाया।
उसके शासनकाल में अफ़ाक़ी अधिकारियों का आगमन पहले से कहीं अधिक बढ़ गया, जिससे दक्खिनियों और विदेशियों के मध्य वैमनस्य और गहरा गया। साथ ही सुल्तान को तेलंगाना, गुजरात, खानदेश, मालवा तथा विजयनगर साम्राज्य के विरुद्ध लगातार युद्धों में उलझना पड़ा। इन संघर्षों का कोई ठोस राजनीतिक लाभ नहीं हुआ, उलटे बहमनी संसाधनों और सैन्य शक्ति का क्षय हुआ।
इसी काल में उड़ीसा के गजपति शासकों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ भी स्पष्ट रूप से सामने आईं। दक्कन की ओर उनके विस्तारवादी प्रयासों ने बहमनी राजनीति को एक नए बाह्य संकट में डाल दिया। इन बहु-दिशात्मक संघर्षों ने बहमनी साम्राज्य को रणनीतिक रूप से रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया।
प्रारंभिक संकेत : महमूद गवां का प्रथम उल्लेख
अलाउद्दीन अहमद द्वितीय के शासनकाल में पहली बार महमूद गवां का उल्लेख मिलता है, जब उसे नलगोंडा के विद्रोह के दमन का दायित्व सौंपा गया। यद्यपि इस समय वह बहमनी राजनीति के केंद्र में नहीं था, तथापि उसकी प्रशासनिक क्षमता और सैन्य कुशलता ने उसे शीघ्र ही एक उभरते हुए राजनेता के रूप में स्थापित कर दिया।
लगातार अभियानों और राजनीतिक दबावों के बीच सुल्तान अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करता रहा और अंततः उसकी अकाल मृत्यु हो गई। उसके शासन का यह अंत बहमनी साम्राज्य में नेतृत्व-संकट को और गहरा कर गया।
हुमायूँ (1458-1461 ई.) : क्रूरता, विद्रोह और प्रशासनिक निर्भरता
अलाउद्दीन अहमद द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हुमायूँ सिंहासन पर बैठा। फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने उसे एक क्रूर शासक बताया है। राजनीतिक दृष्टि से उसका संक्षिप्त शासनकाल अत्यधिक अस्थिर रहा।
राज्यारोहण के तुरंत बाद उसने महमूद गवां को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। यह नियुक्ति बहमनी राजनीति में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। यद्यपि हुमायूँ स्वयं असंतुलित और कठोर था, परंतु महमूद गवां की योग्यता के कारण राज्य संचालन किसी प्रकार संभव हो सका।
अपने केवल तीन वर्षों के शासनकाल में हुमायूँ को तीन बड़े विद्रोहों का सामना करना पड़ा। दक्खिनियों और अफ़ाक़ियों के बीच संघर्ष भी तीव्र होता गया। इन सभी संकटों से निपटने का वास्तविक श्रेय महमूद गवां को जाता है, जिसने प्रशासन और सैन्य संगठन को संभालकर साम्राज्य को तत्काल विघटन से बचाया।
प्रशासनिक परिषद और अल्पवयस्क उत्तराधिकारी की समस्या
हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र निज़ामुद्दीन अहमद मात्र आठ वर्ष का था। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए हुमायूँ ने अपने जीवनकाल में ही एक प्रशासनिक परिषद की स्थापना की थी, जिसमें राजमाता, महमूद गवां और अन्य वरिष्ठ अधिकारी सम्मिलित थे। इस परिषद ने आरंभ में उदारवादी और समझौतावादी नीति अपनाई। पूर्व शासनकाल में राजनीतिक अपराधों के लिए बंदी बनाए गए कई व्यक्तियों को मुक्त कर दिया गया। यद्यपि यह नीति आंतरिक शांति के उद्देश्य से थी, किंतु इसने बहमनी साम्राज्य को बाह्य आक्रमणों के लिए असुरक्षित भी बना दिया।
बाह्य आक्रमण और परिषद की सीमाएँ
परिषद की स्थिति का लाभ उठाकर उड़ीसा के कपिलेश्वर गजपति ने दक्षिण से और मालवा के महमूद खिलजी ने उत्तर से बहमनी साम्राज्य पर आक्रमण किया। कपिलेश्वर गजपति बीदर तक पहुँच गया और युद्ध-हरजाने की माँग की। यद्यपि अंततः बहमनी सेनाओं ने उसे पीछे हटने पर विवश किया, परंतु यह घटना साम्राज्य की सैन्य कमजोरी को उजागर करती है।
मालवा के महमूद खिलजी का आक्रमण कहीं अधिक गंभीर था। उसने उड़ीसा के गजपति और खानदेश के फारूकी सुल्तान के साथ गठबंधन कर दक्कन पर चढ़ाई की। प्रारंभ में प्रशासनिक परिषद ने एकता और साहस का परिचय दिया, किंतु शीघ्र ही आंतरिक मतभेद उभर आए और बहमनी प्रतिरक्षा-व्यवस्था चरमरा गई। बीदर पर खिलजी सेनाओं के घेरे के दौरान राजपरिवार को फ़िरोज़ाबाद में शरण लेनी पड़ी। इस संकटपूर्ण परिस्थिति में महमूद गवां की कूटनीतिक प्रतिभा निर्णायक सिद्ध हुई।
गुजरात से मित्रता : कूटनीति द्वारा साम्राज्य की रक्षा
महमूद गवां ने गुजरात के सुल्तान से सहायता की याचना की, जिसे स्वीकार कर लिया गया। गुजराती और बहमनी सेनाओं के संयुक्त दबाव में महमूद खिलजी को बीदर का घेरा उठाकर मालवा लौटना पड़ा। यही नीति 1462 ई. में मालवा के दूसरे आक्रमण के समय भी सफल सिद्ध हुई। इस प्रकार, महमूद गवां ने यह सिद्ध कर दिया कि बहमनी साम्राज्य की रक्षा केवल युद्ध से नहीं, बल्कि संतुलित कूटनीति और अंतर-राज्यीय गठबंधनों से भी संभव है।
सुल्तान शमसुद्दीन मुहम्मद तृतीय (1463-1482 ई.) : नाममात्र का शासन, वास्तविक सत्ता प्रधानमंत्री के हाथों में
1463 ई. में निज़ामुद्दीन अहमद की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई शमसुद्दीन मुहम्मद तृतीय बहमनी सिंहासन पर बैठा। राज्यारोहण के समय उसकी आयु केवल नौ–दस वर्ष थी। इस प्रकार बहमनी साम्राज्य की वास्तविक सत्ता स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री महमूद गवां के हाथों में केंद्रित हो गई।
राजमाता के राजनीति से संन्यास लेने के पश्चात् महमूद गवां को प्रधानमंत्री तथा ख्वाजा जहाँ की उपाधि प्रदान की गई। इसके साथ ही अगले लगभग दो दशकों तक बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास वस्तुतः महमूद गवां के प्रशासन और नेतृत्व का इतिहास बन गया।
महमूद गवां का युग : प्रशासनिक पुनर्गठन और साम्राज्य विस्तार
महमूद गवां का काल बहमनी साम्राज्य के बुझते हुए दीप की अंतिम उज्ज्वल ज्योति के रूप में जाना जाता है। उसके नेतृत्व में बहमनी साम्राज्य का प्रभाव क्षेत्र पूर्व में उड़ीसा की सीमाओं से लेकर दक्षिण में कांची तक और पश्चिम में अरब सागर तक फैल गया।
यह विस्तार केवल सैन्य विजय का परिणाम नहीं था, बल्कि सुदृढ़ प्रशासन, संतुलित कूटनीति और केंद्रीय नियंत्रण की देन था। उसने तराफदारों की शक्ति को सीमित करने का प्रयास किया और प्रशासनिक पदों पर योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की नीति अपनाई।
दक्खिनी-अफ़ाक़ी संघर्ष को नियंत्रित करने का प्रयास
यद्यपि महमूद गवां स्वयं अफ़ाक़ी था, तथापि उसने दक्खिनियों और अफ़ाक़ियों के मध्य संतुलन बनाए रखने का सचेत प्रयास किया। उसने किसी एक गुट को पूर्ण वर्चस्व देने के स्थान पर राज्य-हित को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि उसके शासनकाल में, लंबे समय बाद, बहमनी राजनीति में एक प्रकार की स्थिरता दिखाई देती है।
साथ ही उसने हिंदू सरदारों और स्थानीय शक्तियों के साथ भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास किया। यह नीति धार्मिक सहिष्णुता से अधिक राजनीतिक यथार्थवाद पर आधारित थी, जिसने साम्राज्य की आंतरिक शांति को सुदृढ़ किया।
सैन्य और कूटनीतिक उपलब्धियाँ
महमूद गवां के काल में बहमनी साम्राज्य ने न केवल बाह्य आक्रमणों का सफल प्रतिरोध किया, बल्कि पड़ोसी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध भी स्थापित किए। उड़ीसा, मालवा और गुजरात जैसे राज्यों के साथ उसकी कूटनीति बहमनी साम्राज्य को रणनीतिक सुरक्षा घेरा प्रदान करती थी। इस युग में बहमनी सत्ता पहली बार दक्कन की सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरती है। यही कारण है कि इतिहासकार महमूद गवां के काल को बहमनी साम्राज्य का स्वर्णकाल मानते हैं।
महमूद गवां की मृत्यु : राजनीतिक संतुलन का अंत
महमूद गवां की प्रशासनिक कठोरता और केंद्रीयकरण की नीति ने अंततः दरबारी गुटों के हितों को चोट पहुँचाई। दक्खिनी और अफ़ाक़ी दोनों ही वर्गों के कुछ प्रभावशाली अमीर उसके विरोधी बन गए। दरबारी षड्यंत्रों और मिथ्या आरोपों के परिणामस्वरूप महमूद गवां को मृत्युदंड दे दिया गया।
यह घटना बहमनी साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। उसके निष्पादन के साथ ही वह शक्ति-संतुलन समाप्त हो गया, जिसने अब तक साम्राज्य को विघटन से बचा रखा था।
पतन की अनिवार्यता : महमूद गवां के बाद की स्थिति
महमूद गवां की मृत्यु के एक वर्ष के भीतर ही सुल्तान मुहम्मद तृतीय की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद बहमनी साम्राज्य तीव्र गति से आंतरिक षड्यंत्र, विद्रोह और प्रशासनिक अव्यवस्था का शिकार हो गया। उसके उत्तराधिकारी शिहाबुद्दीन महमूद (1482-1518 ई.) के शासनकाल में प्रांतीय तराफदारों ने क्रमशः अपनी स्वतंत्रता घोषित करना प्रारंभ कर दिया। केंद्रीय सत्ता नाममात्र की रह गई और बहमनी साम्राज्य वास्तविक रूप से खंडित होने लगा।

पाँच दक्कनी सल्तनतों का उदय
महमूद गवां के पश्चात् उत्पन्न सत्ता-शून्य ने दक्कन में पाँच स्वतंत्र राज्यों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया,
- अहमद निज़ामुलमुल्क → अहमदनगर में निज़ामशाही
- यूसुफ़ आदिल ख़ाँ → बीजापुर में आदिलशाही
- फ़तहउल्ला ख़ाँ इमादुलमुल्क → बरार में इमादशाही
- क़ुतुबुलमुल्क → गोलकुंडा में कुतुबशाही
- क़ासिम बरीद → बीदर में बरीदशाही
यद्यपि 1526 ई. तक बहमनी सुल्तानों का नाम औपचारिक रूप से मिलता है, किंतु वास्तविक सत्ता अब बरीदशाही शासकों के हाथों में केंद्रित हो चुकी थी। बहमनी सुल्तान केवल नाममात्र का शासक रह गया था।
समग्र मूल्यांकन : बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक महत्व
बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास (1347-1527 ई.) दक्कन में स्वतंत्र मुस्लिम सत्ता की स्थापना, उसके सुदृढ़ीकरण और अंततः प्रांतीय शक्तियों में विघटन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इस दीर्घकालीन प्रक्रिया के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बहमनी साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि संस्थाओं और संरचनाओं का इतिहास था। यह साम्राज्य न तो केवल विजयों की कहानी था और न ही केवल षड्यंत्रों का परिणाम, बल्कि यह संरचनात्मक असंतुलन, गुटीय राजनीति और कमजोर उत्तराधिकार व्यवस्था का स्वाभाविक निष्कर्ष था।
इसके बावजूद, बहमनी साम्राज्य ने दक्कन की राजनीति को स्थायी रूप से रूपांतरित किया और परवर्ती दक्कनी सल्तनतों के लिए प्रशासनिक, सैन्य और कूटनीतिक आधार तैयार किया।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
