भारत में पुर्तगालियों का आगमन और विश्व इतिहास का मोड़
15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में पुर्तगालियों का आगमन केवल एक समुद्री यात्रा की सफलता नहीं था, बल्कि यह एशिया और यूरोप के बीच संबंधों की प्रकृति में एक निर्णायक परिवर्तन का संकेत था। 1498 ई. में मालाबार तट पर पहुँचना यूरोपीय इतिहास में उतना ही महत्त्वपूर्ण था जितना भारतीय इतिहास में, क्योंकि पहली बार भारत और यूरोप के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित हुआ।
इस घटना को केवल “यूरोपियों का भारत आगमन” कह देना उसके ऐतिहासिक अर्थ को सीमित कर देता है। वास्तव में, यह आगमन एक ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत थी, जिसकी दिशा उस समय किसी को पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। व्यापार, नौसैनिक शक्ति, राजनीति और धर्म धीरे-धीरे एक-दूसरे में उलझते चले गए, और उसी उलझन से आगे की पूरी कहानी बनी। इसके परिणामस्वरूप हिंद महासागर का वह व्यापारिक संसार, जो सदियों से अपेक्षाकृत खुले और बहुपक्षीय ढंग से संचालित होता था, धीरे-धीरे सशस्त्र नियंत्रण और एकाधिकार की ओर बढ़ने लगा।
इसलिए, भारत में पुर्तगालियों के आगमन को समझने के लिए केवल तिथि और घटना पर्याप्त नहीं हैं; यह देखना आवश्यक है कि यह आगमन किन परिस्थितियों में हुआ, कैसे हुआ, और इसके बाद व्यापार व राजनीति की दिशा किस प्रकार बदली।
1498 ई. में कालीकट पहुँचना: स्वागत, आशाएँ और प्रारंभिक तनाव
कालीकट में पुर्तगालियों का उतरना किसी आकस्मिक या हाशिये की घटना नहीं थी। यह उस लंबे समुद्री प्रयास का परिणाम था, जिसका उद्देश्य एशियाई व्यापार को सीधे यूरोप से जोड़ना था। कालीकट उस समय हिंद महासागर के समुद्री व्यापार मार्गों से जुड़े व्यापार नेटवर्क का एक प्रमुख केंद्र था। इस पृष्ठभूमि को समझे बिना भारत में पुर्तगालियों के आगमन के प्रारंभिक चरणों को सही ढंग से नहीं समझा जा सकता।
कालीकट का व्यापारिक महत्व और ज़मोरिन की नीति
जब वास्को-दा-गामा 1498 ई. में कालीकट पहुँचे, तो वे किसी अनजान या हाशिये के बंदरगाह पर नहीं उतरे थे। कालीकट उस समय हिंद महासागर व्यापार नेटवर्क का एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ अरब, फारसी, गुजराती, मलयाली और अन्य एशियाई व्यापारी नियमित रूप से आते-जाते थे। ज़मोरिन का शासन इस खुले व्यापारिक ढाँचे पर आधारित था, जिसमें विभिन्न समुदायों को स्थान और सुरक्षा मिलती थी।
इसी कारण प्रारंभिक स्तर पर वास्को-दा-गामा का स्वागत हुआ। उन्हें मसालों के व्यापार की अनुमति दी गई और तट पर एक गोदाम (फैक्ट्री) स्थापित करने की भी स्वीकृति मिली। यह अनुमति इस बात का संकेत थी कि ज़मोरिन पुर्तगालियों को भी अन्य व्यापारिक समुदायों की तरह देख रहे थे, न कि किसी विशेषाधिकार-प्राप्त शक्ति के रूप में।
मसाला व्यापार का आर्थिक आकर्षण
वास्को-दा-गामा जो मसाले भारत से लेकर लौटे, उनका मूल्य पूरी समुद्री यात्रा की लागत से लगभग साठ गुना अधिक था। यह आँकड़ा अक्सर उद्धृत किया जाता है, और इसका कारण स्पष्ट है, यह यूरोपीय शासकों को यह दिखाने के लिए पर्याप्त था कि भारत के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार कितनी असाधारण आर्थिक संभावनाएँ रखता है।
लेकिन यहीं से समस्या शुरू होती है। पुर्तगाल का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं था। प्रश्न यह था कि क्या वह एशियाई व्यापारिक व्यवस्था के भीतर रहकर काम करे, या उसे तोड़कर अपने नियम लागू करे। धीरे-धीरे उसने दूसरा रास्ता चुन लिया। यही महत्वाकांक्षा आगे चलकर संघर्ष का कारण बनी।
सहयोग से टकराव की ओर: पुर्तगाली माँगें और कालीकट का प्रतिरोध
प्रारंभिक सहयोग के बावजूद, पुर्तगालियों और कालीकट के बीच संबंध शीघ्र ही तनावपूर्ण हो गए। इसका मुख्य कारण व्यापार की प्रकृति को लेकर दोनों पक्षों की भिन्न दृष्टि थी। जहाँ ज़मोरिन खुले और बहुपक्षीय व्यापार के समर्थक थे, वहीं पुर्तगालियों का लक्ष्य मसाला व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था।
अरब व्यापारियों का प्रश्न और पुर्तगाली दृष्टिकोण
पुर्तगालियों ने शीघ्र ही यह महसूस किया कि कालीकट में अरब व्यापारियों की गहरी जड़ें हैं और मसाला व्यापार पर उनका प्रभुत्व है। यूरोप तक मसालों की आपूर्ति उन्हीं के माध्यम से होती थी। पुर्तगालियों के लिए यह स्थिति अस्वीकार्य थी, क्योंकि उनका लक्ष्य मध्यस्थों को हटाकर सीधे स्रोत से यूरोप तक व्यापार करना था।
इसी संदर्भ में उन्होंने यह माँग रखी कि उन्हें अरब व्यापारियों के जहाज़ों की तलाशी लेने और नियंत्रित करने का अधिकार दिया जाए। यह माँग एशियाई व्यापारिक परंपराओं के बिल्कुल विपरीत थी, जहाँ समुद्र को किसी एक शक्ति की निजी संपत्ति नहीं माना जाता था।
फैक्ट्री पर हमला और पुर्तगाली प्रतिशोध
इन माँगों के कारण कालीकट में तनाव बढ़ा और अंततः हिंसक टकराव हुआ। पुर्तगाली फैक्ट्री में रहने वाले लोगों की हत्या कर दी गई। इसके प्रत्युत्तर में पुर्तगाली जहाज़ों ने कालीकट पर गोलाबारी की और तट से हट गए।
यह घटना प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से व्यापारिक विवाद सैन्य संघर्ष में बदलता है। अब पुर्तगालियों के लिए व्यापार और युद्ध अलग-अलग गतिविधियाँ नहीं रहीं।
1502 ई. का अभियान: खुला व्यापार बनाम सशस्त्र एकाधिकार
1502 ई. में वास्को-दा-गामा का पुनः आगमन इस बदले हुए दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। इस बार वे व्यापारिक प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सशस्त्र शक्ति के रूप में आए थे। 25 जहाज़ों के बेड़े के साथ उन्होंने ऐसी शर्तें रखीं जो कालीकट की पारंपरिक व्यापार नीति के विपरीत थीं।
वास्को-दा-गामा की वापसी और नई शर्तें
1502 ई. में वास्को-दा-गामा 25 जहाज़ों के सशस्त्र बेड़े के साथ कालीकट लौटे। इस बार उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने ज़मोरिन के सामने ऐसी शर्तें रखीं जो किसी भी संप्रभु शासक के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती थीं, कालीकट से सभी मुस्लिम व्यापारियों को निकाल दिया जाए और बंदरगाह को केवल पुर्तगाली व्यापार के लिए खोला जाए।
ज़मोरिन का उत्तर और एशियाई व्यापार अवधारणा
ज़मोरिन का उत्तर एशियाई व्यापारिक सोच को स्पष्ट करता है। उन्होंने कहा कि कालीकट का बंदरगाह सबके लिए खुला है; किसी को भी धर्म या समुदाय के आधार पर व्यापार से नहीं रोका जा सकता। यह कथन केवल एक राजनीतिक जवाब नहीं था, बल्कि उस बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का सार था जो हिंद महासागर में लंबे समय से चली आ रही थी।
कालीकट पर आक्रमण और मालाबार तट पर किले
वास्को-दा-गामा ने इस असहमति का उत्तर क्रूर सैन्य कार्रवाई से दिया। इसके बाद पुर्तगालियों ने कोचीन, क्विलोन आदि स्थानों पर किले बनाकर मालाबार तट के व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। यहीं से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में पुर्तगालियों का आगमन अब केवल व्यापारिक संपर्क नहीं रहा, बल्कि शक्ति-आधारित वर्चस्व की दिशा में बढ़ चुका था।
एशियाई बनाम यूरोपीय व्यापार अवधारणाएँ: खुला समुद्र बनाम सशस्त्र नियंत्रण
भारत में पुर्तगालियों के आगमन के बाद जो संघर्ष दिखाई देता है, उसे केवल “धार्मिक” या “व्यापारिक प्रतिस्पर्धा” तक सीमित करना भ्रामक होगा। इसके मूल में व्यापार और राज्य के संबंधों को लेकर दो भिन्न सभ्यतागत अवधारणाएँ थीं। एक ओर हिंद महासागर क्षेत्र की एशियाई परंपरा थी, दूसरी ओर भूमध्यसागरीय यूरोपीय परंपरा, जिसे पुर्तगाली अपने साथ लेकर आए।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आगे चलकर इसी ने पुर्तगालियों की नीतियों, उनके सैन्य व्यवहार और एशियाई शक्तियों की प्रतिक्रियाओं को आकार दिया।
एशियाई व्यापार अवधारणा: खुलापन, बहुलता और न्यूनतम सैन्य हस्तक्षेप
हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार सदियों से खुले और बहुपक्षीय ढंग से संचालित होता था। अरब, फारसी, गुजराती, तमिल, मलय और चीनी व्यापारी एक ही समुद्री मार्गों और बंदरगाहों का उपयोग करते थे। राज्य इस व्यापार से कर या शुल्क के रूप में लाभ उठाते थे, लेकिन सामान्यतः नौसेना या सेना का प्रयोग करके व्यापार को नियंत्रित नहीं करते थे।
कालीकट इसका प्रतिनिधि उदाहरण था। ज़मोरिन का बंदरगाह सभी व्यापारिक समुदायों के लिए खुला था, चाहे वे किसी भी धर्म या क्षेत्र से आते हों। राज्य की भूमिका व्यापार को सुविधा देने की थी, न कि किसी एक समूह को एकाधिकार दिलाने की।
चीन का उदाहरण इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहाँ विदेशी व्यापार पर राजकीय नियंत्रण अवश्य था, लेकिन उसे सैन्य विस्तार से नहीं जोड़ा गया। आयातित वस्तुओं को ‘उपहार’ के रूप में देखा जाता था और समुद्र को किसी स्थायी सैन्य प्रभुत्व के क्षेत्र के रूप में नहीं समझा गया।
यूरोपीय (भूमध्यसागरीय) दृष्टिकोण: व्यापार और युद्ध का संयोजन
इसके विपरीत, पुर्तगाली जिस व्यापारिक संस्कृति से आए थे, वहाँ व्यापार और सैन्य शक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं थे। भूमध्यसागर में व्यापारिक नगर-राज्य अपने मार्गों और बाजारों की रक्षा के लिए सशस्त्र जहाज़ों और किलों पर निर्भर रहते थे। समुद्र पर प्रभुत्व स्थापित करना व्यापारिक लाभ की शर्त माना जाता था।
पुर्तगालियों ने इसी सोच को हिंद महासागर पर लागू करने की कोशिश की। उनके लिए व्यापारिक सफलता का अर्थ था,
- समुद्री मार्गों पर नियंत्रण
- प्रतिद्वंद्वी व्यापारियों को बाहर करना
- और बल प्रयोग द्वारा नियम लागू करना
यही कारण है कि उन्होंने अरब जहाज़ों की तलाशी, कार्टाज़ प्रणाली और किलों के निर्माण को वैध और आवश्यक माना।
छोटे एशियाई तटीय राज्यों की दुविधा
कालीकट, कोचीन और क्रांगनोर जैसे राज्य यूरोप के कुछ नगर-राज्यों की तरह व्यापार पर अत्यधिक निर्भर थे, लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर के साथ। वे खुले व्यापार पर निर्भर थे, न कि सैन्य समुद्री शक्ति पर। उनके पास ऐसी नौसेनाएँ नहीं थीं जो किसी एक शक्ति को पूरे समुद्र से बाहर कर सकें।
पुर्तगालियों की सशस्त्र नीति ने इन राज्यों को असहज स्थिति में डाल दिया। एक ओर वे व्यापार बनाए रखना चाहते थे, दूसरी ओर वे पुर्तगाली सैन्य दबाव का सामना करने में सक्षम नहीं थे। यही कारण है कि कई स्थानों पर सहयोग, समझौते और सीमित प्रतिरोध, तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।
व्यापारिक टकराव का संरचनात्मक स्वरूप
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि संघर्ष किसी एक घटना या व्यक्ति तक सीमित नहीं था। यह दो व्यापार प्रणालियों का संरचनात्मक टकराव था। लेकिन यह टकराव साफ़ रेखाओं में नहीं बँटा था। कई स्थानों पर सहयोग था, कई जगह चुपचाप समझौते, और कहीं-कहीं अचानक हिंसा।
- एक प्रणाली जो समुद्र को साझा संसाधन मानती थी
- और दूसरी जो समुद्र को नियंत्रित क्षेत्र के रूप में देखती थी
भारत में पुर्तगालियों का आगमन इसी टकराव को प्रत्यक्ष और हिंसक रूप में सामने लाता है। आगे चलकर यही टकराव नौसैनिक युद्धों, किलों की राजनीति और ओटोमन–गुजरात–पुर्तगाल संघर्ष में विस्तृत होता है।
हिंद महासागर में नौसैनिक संघर्ष और 1509 की निर्णायक विजय
भारत में पुर्तगालियों के आगमन के बाद जो टकराव प्रारंभ हुआ, वह शीघ्र ही स्थानीय व्यापारिक विवादों से आगे बढ़कर हिंद महासागर के नियंत्रण के लिए अंतर-क्षेत्रीय संघर्ष में बदल गया। यह संघर्ष केवल पुर्तगाल और कालीकट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें मिस्र, गुजरात, दक्कन की शक्तियाँ और अंततः ओटोमन हित भी जुड़ते चले गए।
इस संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न था, क्या हिंद महासागर पर किसी एक शक्ति का सैन्य वर्चस्व स्थापित हो सकता है, या वह एशियाई परंपरा के अनुसार बहुपक्षीय और खुला बना रहेगा?
मिस्र-गुजरात-कालीकट गठबंधन की पृष्ठभूमि
पुर्तगालियों की बढ़ती नौसैनिक आक्रामकता से सबसे अधिक चिंता ममलूक मिस्र के सुल्तान को थी। मिस्र की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर लाल सागर–लेवांत मार्ग से होने वाले मसाला व्यापार पर निर्भर थी। यदि यह व्यापार सीधे समुद्री मार्ग से यूरोप पहुँचने लगा, तो काहिरा और अलेक्ज़ेंड्रिया की भूमिका कमजोर हो जाती।
इसी कारण मिस्र के सुल्तान ने एक सशक्त नौसैनिक बेड़ा तैयार किया। इस बेड़े में गुजरात के सुल्तान के जहाज़, कालीकट के ज़मोरिन की सहायता और दक्कन के शासकों, विशेषतः बीजापुर और अहमदनगर, का समर्थन भी शामिल था। यह गठबंधन किसी साझा धार्मिक लक्ष्य से अधिक साझा आर्थिक हितों पर आधारित था।
1508 ई. का संघर्ष और अल्माइडा के पुत्र की मृत्यु
संयुक्त एशियाई बेड़े और पुर्तगालियों के बीच प्रारंभिक टकराव 1508 ई. में हुआ। इस संघर्ष में पुर्तगालियों को अस्थायी सफलता नहीं मिली और पुर्तगाली गवर्नर डॉन फ्रांसिस्को द अल्माइडा के पुत्र की मृत्यु हो गई। यह घटना पुर्तगाली नेतृत्व के लिए व्यक्तिगत और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर गहरा आघात थी।
यहीं से पुर्तगालियों की नीति में प्रतिशोध और निर्णायक वर्चस्व का तत्व और अधिक प्रबल हो गया।
1509 ई. की निर्णायक नौसैनिक विजय
1509 ई. में पुर्तगालियों ने संयुक्त मिस्री-गुजराती-कालीकट बेड़े को निर्णायक रूप से पराजित किया। यह संघर्ष अक्सर दीव के समुद्री युद्ध के संदर्भ में देखा जाता है, यद्यपि यह एक व्यापक नौसैनिक अभियान का हिस्सा था।
इस विजय का महत्व केवल तत्काल सैन्य सफलता में नहीं था, बल्कि इसके दूरगामी परिणामों में निहित था। इस जीत के बाद:
- पुर्तगालियों की नौसेना हिंद महासागर की सबसे शक्तिशाली समुद्री शक्ति बन गई
- मिस्र और उसके सहयोगी समुद्री मोर्चे पर रक्षात्मक स्थिति में चले गए
- पुर्तगालियों के लिए फारस की खाड़ी और लाल सागर की ओर बढ़ने का मार्ग खुल गया
यह पहली बार था जब किसी यूरोपीय शक्ति ने हिंद महासागर में एशियाई नौसैनिक गठबंधन को खुले युद्ध में हराया।
नौसैनिक तकनीक और संगठनात्मक बढ़त
यह विजय केवल संख्या के बल पर नहीं मिली। पुर्तगालियों की सफलता के पीछे कई तकनीकी और संगठनात्मक कारण थे:
- उनके जहाज़ों का ढांचा तोपों की मार सहने में सक्षम था
- जहाज़ों पर भारी तोपें स्थायी रूप से लगाई गई थीं, न कि अस्थायी रूप से
- पुर्तगाली नौसैनिक युद्ध को चलते जहाज़ों से तोपबारी के रूप में देखते थे, जबकि एशियाई नौसेनाएँ अधिकतर निकट-संघर्ष पर निर्भर थीं
हालाँकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एशियाई जहाज़ तकनीकी रूप से पिछड़े नहीं थे। समस्या तकनीक से अधिक युद्ध-रणनीति और संगठन की थी।
1509 के बाद शक्ति-संतुलन में परिवर्तन
1509 की विजय के बाद हिंद महासागर का शक्ति-संतुलन निर्णायक रूप से बदल गया। पुर्तगालियों ने:
- समुद्री मार्गों पर नियमित गश्त शुरू की
- व्यापारिक जहाज़ों के लिए अनुमति-पत्र (आगे चलकर कार्टाज़ प्रणाली) लागू की
- और किलों की शृंखला बनाकर समुद्र–थल दोनों स्तरों पर नियंत्रण स्थापित किया
इस बिंदु के बाद भारत में पुर्तगालियों का आगमन एक अस्थायी व्यापारिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक स्थायी सामुद्रिक शक्ति का रूप ले लेता है।
1509 की इस विजय ने शक्ति-संतुलन अवश्य बदला, लेकिन यह एशियाई नौसैनिक शक्तियों के पूर्ण पतन का संकेत नहीं थी। यह समझना आवश्यक है कि 1509 की विजय ने एशियाई शक्तियों को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं किया। उन्होंने समुद्र के बजाय धीरे-धीरे स्थल-आधारित राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। यही कारण है कि आने वाले दशकों में पुर्तगालियों को वास्तविक चुनौती एशियाई शक्तियों से नहीं, बल्कि डच और अंग्रेज़ जैसी नई यूरोपीय समुद्री शक्तियों से मिली।
अल्बुकर्क, किले और गोवा का अधिग्रहण: समुद्र से ज़मीन की ओर विस्तार
1509 की नौसैनिक विजय के बाद पुर्तगालियों के सामने एक नई चुनौती थी। केवल समुद्र पर नियंत्रण बनाए रखना पर्याप्त नहीं था, क्योंकि व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, रसद की निरंतरता और राजनीतिक दबाव, इन सबके लिए स्थलीय आधार आवश्यक था। यहीं से पुर्तगाली नीति में एक निर्णायक बदलाव दिखाई देता है: समुद्र-केंद्रित रणनीति से किले-आधारित क्षेत्रीय नियंत्रण की ओर।
इस परिवर्तन का सबसे स्पष्ट और संगठित रूप हमें अल्फ़ोंसो द अल्बुकर्क की नीतियों में दिखाई देता है।
अल्बुकर्क की रणनीतिक सोच: केवल नौसेना पर्याप्त नहीं
अल्बुकर्क इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि केवल जहाज़ों और तोपों के बल पर हिंद महासागर जैसे विशाल क्षेत्र पर दीर्घकालिक नियंत्रण संभव नहीं है। उनके अनुसार, यदि पुर्तगालियों के पास सुरक्षित बंदरगाह, स्थायी किले और स्थानीय प्रशासनिक केंद्र नहीं होंगे, तो न तो व्यापार स्थिर रह पाएगा और न ही स्थानीय शासकों पर प्रभाव बनाया जा सकेगा।
इसी तर्क के आधार पर उन्होंने एक स्पष्ट रणनीति अपनाई,
- प्रमुख समुद्री मार्गों के चोक-प्वाइंट्स पर किले
- उन किलों को नौसेना से जोड़कर चलायमान शक्ति
- और स्थानीय राजनीति में सीमित, लेकिन निर्णायक हस्तक्षेप
यह रणनीति हिंद महासागर में पहले प्रचलित एशियाई मॉडल से भिन्न थी, जहाँ समुद्र और भूमि को प्रायः अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखा जाता था।
गोवा का चयन: संयोग नहीं, रणनीति
1510 ई. में बीजापुर के आदिल शाह से गोवा पर अधिकार पुर्तगाली विस्तार का निर्णायक मोड़ था। गोवा का चयन केवल इसलिए नहीं किया गया कि वह एक द्वीप था, बल्कि इसलिए कि उसमें कई रणनीतिक विशेषताएँ एक साथ मौजूद थीं।
गोवा:
- एक उत्कृष्ट प्राकृतिक बंदरगाह था, जहाँ बड़े जहाज़ सुरक्षित ठहर सकते थे
- मालाबार तट के व्यापार पर नज़र रखने के लिए आदर्श स्थिति में था
- दक्कन की राजनीति, विशेषतः बीजापुर और अहमदनगर, पर निगरानी संभव बनाता था
- और गुजरात के बंदरगाहों के अपेक्षाकृत निकट था, जिससे पुर्तगाली शक्ति का प्रदर्शन किया जा सके
इन कारणों से गोवा शीघ्र ही एस्टाडो दा इंडिया की राजधानी बना और पुर्तगालियों की एशियाई राजनीति का केंद्र भी। गोवा को राजधानी बनाना कोई तत्काल लिया गया निर्णय नहीं था। प्रारंभ में पुर्तगाली प्रशासन स्वयं आश्वस्त नहीं था कि क्या एक द्वीप-आधारित केंद्र इतने विशाल समुद्री क्षेत्र को संभाल पाएगा। लेकिन विकल्प सीमित थे।
किलों की शृंखला और समुद्र-थल का संयोजन
गोवा पर अधिकार के बाद पुर्तगालियों ने केवल वहीं रुककर संतोष नहीं किया। उन्होंने पश्चिमी तट पर किलों और चौकियों की एक शृंखला विकसित की। दंडा-राजपुरी, दाभोल और अन्य बीजापुरी बंदरगाहों पर हमले और नाकेबंदी इसी नीति का हिस्सा थे।
इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि बीजापुर के समुद्री व्यापार को पंगु करना और उसे गोवा स्वीकार करने के लिए बाध्य करना था। इस तरह, समुद्री नाकेबंदी और स्थलीय किलों का संयोजन पुर्तगाली रणनीति की पहचान बन गया।
हिंद महासागर के अन्य रणनीतिक बिंदु
अल्बुकर्क की दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने हिंद महासागर और उससे जुड़े समुद्री मार्गों पर व्यापक नियंत्रण की योजना बनाई:
- श्रीलंका में कोलंबो को मज़बूत किया गया
- मलय प्रायद्वीप और सुमात्रा के बीच स्थित मलक्का पर अधिकार कर पूर्वी व्यापार मार्गों को नियंत्रित किया गया
- लाल सागर के मुहाने पर सोकोट्रा द्वीप पर ठिकाना बनाया गया
- एडेन पर आक्रमण का प्रयास हुआ, यद्यपि वह असफल रहा
- फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार पर ओर्मुज़ के शासक से किला बनाने की अनुमति ली गई
इन बिंदुओं को जोड़ने पर स्पष्ट होता है कि पुर्तगाली विस्तार किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि समुद्री नेटवर्क के नियंत्रण का प्रयास था।
गोवा से आगे: सीमाएँ और विरोध
यद्यपि गोवा पुर्तगालियों के लिए एक मज़बूत आधार बना, फिर भी उनके स्थलीय विस्तार की स्पष्ट सीमाएँ थीं। वे संख्या में कम थे और इसलिए किसी बड़े भू-आधारित साम्राज्य का निर्माण न तो संभव था और न ही उनकी प्राथमिकता।
इसी कारण पुर्तगाली नीति मुख्यतः:
- द्वीपों
- तटीय किलों
- और व्यापारिक चौकियों
तक सीमित रही। गोवा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है, एक ऐसा केंद्र जो समुद्र के सहारे सुरक्षित था, लेकिन गहराई में भारतीय भूभाग को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं रखता था।
समुद्र से ज़मीन तक, पर सीमित
अल्बुकर्क की नीति ने पुर्तगालियों को हिंद महासागर में एक स्थायी उपस्थिति अवश्य दी, लेकिन यह उपस्थिति चयनित और नियंत्रित थी। समुद्र से ज़मीन की ओर यह विस्तार एशियाई राजनीतिक संरचनाओं को पूरी तरह बदल नहीं सका, परंतु उसने व्यापार, कूटनीति और सैन्य शक्ति के संतुलन को अवश्य प्रभावित किया।
यहीं से स्पष्ट होता है कि भारत में पुर्तगालियों का आगमन केवल नौसैनिक विजय की कहानी नहीं है, बल्कि वह उन प्रयोगों की भी कहानी है जिनमें यूरोपीय शक्तियाँ पहली बार एशियाई भू-राजनीति में स्थायी रूप से प्रवेश करती हैं, हालाँकि सीमाओं के साथ।
ओटोमन-गुजरात-पुर्तगाल संघर्ष और दीव का प्रश्न
16वीं शताब्दी के दूसरे दशक तक हिंद महासागर का संघर्ष केवल पुर्तगालियों और तटीय भारतीय राज्यों तक सीमित नहीं रहा। मिस्र, अरब और लेवांत पर अधिकार के बाद ओटोमन साम्राज्य एक ऐसी स्थिति में आ गया था जहाँ वह लाल सागर और हिंद महासागर की राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर सकता था। इसी पृष्ठभूमि में गुजरात, ओटोमन और पुर्तगाल के बीच त्रिकोणीय संघर्ष उभरता है, जिसका केंद्र दीव बना।
यह संघर्ष धार्मिक से अधिक व्यापारिक और सामरिक था। लाल सागर मार्ग, फारस की खाड़ी और पश्चिमी भारतीय तट, तीनों को जोड़ने वाला यह क्षेत्र मसाला व्यापार की धमनियों पर स्थित था।
ओटोमन साम्राज्य का उदय और हिंद महासागर में प्रवेश
16वीं शताब्दी के आरंभ में ओटोमन साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर था। उन्होंने 1514 में ईरान को पराजित किया, इसके बाद सीरिया, मिस्र और अरब पर अधिकार कर लिया। इससे ओटोमनों को न केवल लाल सागर के मार्गों पर नियंत्रण मिला, बल्कि वे हिंद महासागर के पश्चिमी छोर तक पहुँचने की स्थिति में आ गए।
मिस्र के ममलूक शासकों के पतन के बाद, जिनके हित पहले पुर्तगालियों से टकरा चुके थे, अब वही संघर्ष ओटोमन साम्राज्य की विरासत बन गया। ओटोमन दृष्टि से पुर्तगाली गतिविधियाँ केवल व्यापारिक चुनौती नहीं थीं, बल्कि इस्लामी दुनिया के समुद्री संपर्कों के लिए भी खतरा थीं।
गुजरात की भूमिका और ओटोमन संपर्क
गुजरात उस समय पश्चिमी भारत का सबसे समृद्ध समुद्री राज्य था। सूरत, कंबे और विशेष रूप से दीव जैसे बंदरगाह लाल सागर और फारस की खाड़ी से जुड़े व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। पुर्तगालियों की बढ़ती आक्रामकता से गुजरात की आर्थिक सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडरा रहा था।
इसी संदर्भ में गुजरात के सुल्तान ने ओटोमन सुल्तान को दूत भेजे, सहायता माँगी और पुर्तगालियों के विरुद्ध सहयोग का प्रस्ताव रखा। बदले में ओटोमनों ने भी रुचि दिखाई, क्योंकि यह उन्हें हिंद महासागर में पुर्तगाली वर्चस्व को चुनौती देने का अवसर देता था। इसके बाद दोनों के बीच दूतों और पत्रों का नियमित आदान–प्रदान शुरू हुआ।
दीव: रणनीतिक केंद्र और टकराव का केंद्रबिंदु
दीव केवल एक बंदरगाह नहीं था। यह लाल सागर मार्ग की चाबी माना जाता था। जो शक्ति दीव को नियंत्रित करती, वह गुजरात के समुद्री व्यापार और पश्चिम एशियाई संपर्कों पर प्रभाव डाल सकती थी। इसी कारण पुर्तगालियों की सबसे बड़ी चिंता दीव और कंबे जैसे बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करना था।
1520–21 ई. में पुर्तगालियों ने दीव पर दो बार आक्रमण किया, लेकिन गुजरात के गवर्नर अहमद अयाज़ ने उन्हें सफलतापूर्वक विफल कर दिया। यह असफलता दिखाती है कि पुर्तगाली शक्ति सर्वशक्तिमान नहीं थी और स्थानीय प्रतिरोध अब भी प्रभावी हो सकता था।
1538 ई. का ओटोमन अभियान और दीव की घेराबंदी
ओटोमन–गुजरात सहयोग का सबसे नाटकीय रूप 1538 ई. में सामने आया, जब ओटोमन सुल्तान ने सुलैमान पाशा के नेतृत्व में एक विशाल बेड़ा हिंद महासागर भेजा। इस बेड़े में लगभग 45 गैलियन थे और कहा जाता है कि यह लगभग 20,000 सैनिकों को लेकर आया, जिनमें बड़ी संख्या में जेनिसरी शामिल थे।
1538 में यह बेड़ा दीव पहुँचा और घेराबंदी शुरू की। प्रारंभ में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने सहयोग किया, लेकिन ओटोमन कमांडर के घमंड और व्यवहार से संबंध बिगड़ गए। परिणामस्वरूप स्थानीय समर्थन कमजोर पड़ गया। जब पुर्तगालियों का राहत-बेड़ा आने की सूचना मिली, तो दो महीने की घेराबंदी के बाद ओटोमन सेना पीछे हट गई।
यह घेराबंदी विफल रही, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया कि पुर्तगाली प्रभुत्व अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती झेल रहा था।
बहादुर शाह की मृत्यु और शक्ति-संतुलन में बदलाव
गुजरात की स्थिति इस संघर्ष में अत्यंत जटिल थी। एक ओर ओटोमन सहयोग, दूसरी ओर मुग़ल दबाव। हुमायूँ के गुजरात अभियान के दौरान बहादुर शाह ने पुर्तगालियों से समझौता कर बेसिन द्वीप उन्हें सौंप दिया। बाद में, 1536 ई. में पुर्तगालियों के साथ एक संघर्ष के दौरान बहादुर शाह की मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद गुजरात की स्थिति कमजोर हो गई और दीव पर पुर्तगाली उपस्थिति धीरे-धीरे स्थायी होती चली गई। ओटोमन सहायता के बावजूद गुजरात पुर्तगालियों को निर्णायक रूप से हटाने में असफल रहा।
दीर्घकालिक परिणाम: ओटोमन पीछे हटे, पुर्तगाली टिके
1538 के बाद भी ओटोमन प्रयास पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। अगले दो दशकों तक पुर्तगालियों और ओटोमनों के बीच छिटपुट नौसैनिक संघर्ष चलते रहे। लेकिन अंततः 1566 ई. में दोनों शक्तियों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत उन्होंने पूर्वी व्यापार क्षेत्रों में प्रत्यक्ष संघर्ष से बचने का निर्णय लिया।
इसके बाद ओटोमन साम्राज्य ने अपना ध्यान यूरोप पर केंद्रित किया और हिंद महासागर में पुर्तगाली वर्चस्व को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर लिया।
दीव का प्रश्न और सीमित वैश्विक टकराव
दीव का प्रश्न यह दिखाता है कि भारत में पुर्तगालियों का आगमन केवल भारत–यूरोप का मामला नहीं था, बल्कि उसने एशिया, पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर को जोड़ने वाली राजनीति को सक्रिय कर दिया। फिर भी यह संघर्ष सीमित रहा। ओटोमन–गुजरात गठबंधन, आंतरिक मतभेदों और प्राथमिकताओं के कारण, पुर्तगालियों को निर्णायक रूप से चुनौती नहीं दे सका।
यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि पुर्तगाली शक्ति समुद्र पर प्रभावी थी, लेकिन वह स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर भी थी। यही निर्भरता आगे चलकर उनके पतन और डच–अंग्रेज़ चुनौती की भूमिका तैयार करती है।
कार्टाज़ प्रणाली और हिंद महासागर का व्यापारिक पुनर्गठन
1509 की नौसैनिक विजय और गोवा जैसे स्थायी ठिकानों की स्थापना के बाद पुर्तगालियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि समुद्र पर मिली सैन्य बढ़त को व्यापारिक नियंत्रण में कैसे बदला जाए। इसका उत्तर उन्हें किसी नए व्यापारिक नवाचार में नहीं, बल्कि राजकीय शक्ति के बल पर नियमन में दिखाई दिया। इसी संदर्भ में कार्टाज़ प्रणाली (Cartaz System) का विकास हुआ।
कार्टाज़ प्रणाली को समझे बिना न तो पुर्तगाली समुद्री साम्राज्य (एस्टाडो दा इंडिया) की प्रकृति स्पष्ट होती है, और न ही यह समझ आता है कि हिंद महासागर का व्यापारिक संसार किस प्रकार पुनर्गठित हुआ।
कार्टाज़ प्रणाली का स्वरूप और उद्देश्य
कार्टाज़ मूलतः एक अनुमति-पत्र (पास) था, जिसे पुर्तगाली अधिकारी जारी करते थे। हिंद महासागर में चलने वाले किसी भी व्यापारिक जहाज़ चाहे वह अरब, गुजराती, मलय, या कभी-कभी यूरोपीय भी हो, को वैध व्यापार के लिए यह पत्र आवश्यक माना गया।
कार्टाज़ में सामान्यतः निम्न विवरण होते थे:
- जहाज़ का नाम और स्वामी
- जहाज़ का मार्ग (कहाँ से कहाँ)
- ले जाए जाने वाले माल का प्रकार
- वैध बंदरगाह, जहाँ जहाज़ जा सकता था
जिस जहाज़ के पास कार्टाज़ नहीं होता, या जो उसके नियमों का उल्लंघन करता, उसे युद्ध का वैध शिकार माना जा सकता था, उसे पकड़ा जा सकता था, डुबोया जा सकता था, और उसके यात्रियों को गुलाम बनाया जा सकता था।
व्यापारिक नियमन से समुद्री प्रभुत्व तक
कार्टाज़ प्रणाली का घोषित उद्देश्य समुद्री डकैती रोकना और व्यापार को “सुरक्षित” बनाना था, लेकिन व्यवहार में इसका उद्देश्य प्रतिस्पर्धी व्यापारियों को नियंत्रित करना था। पुर्तगाली चाहते थे कि:
- मलक्का या पूर्वी अफ्रीका जाने वाला हर जहाज़ गोवा से गुज़रे
- वहाँ कर (ड्यूटी) दे
- और पुर्तगाली नौसेना की निगरानी स्वीकार करे
इस प्रकार, समुद्र जो पहले एक साझा व्यापारिक क्षेत्र था, धीरे-धीरे नियंत्रित समुद्री गलियारों में बदलने लगा।
मुस्लिम और एशियाई व्यापारियों पर प्रभाव
कार्टाज़ प्रणाली ने विशेष रूप से अरब और मुस्लिम व्यापारियों को प्रभावित किया, क्योंकि वे लंबे समय से लाल सागर और फारस की खाड़ी के मार्गों पर हावी थे। पुर्तगालियों का लक्ष्य इन्हीं व्यापार मार्गों को कमजोर करना था।
हालाँकि, व्यवहार में पुर्तगाली यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सके। जल्द ही उन्हें यह समझ आ गया कि:
- उनके पास इतने जहाज़ नहीं हैं कि पूरे हिंद महासागर पर निगरानी रख सकें
- एशियाई व्यापारिक नेटवर्क अत्यंत लचीले और अनुकूलनशील हैं
इसलिए कार्टाज़ प्रणाली में व्यावहारिक ढील दी गई। कई मुस्लिम व्यापारियों को भी कार्टाज़ दिए जाने लगे, विशेषतः उन व्यापारियों को जो घोड़ों, कपड़ों, काँच और सुगंधित वस्तुओं का व्यापार करते थे, ऐसी वस्तुएँ जो भारतीय शासकों और बाज़ारों के लिए आवश्यक थीं।
कार्टाज़ प्रणाली की आंतरिक कमजोरियाँ
सैद्धांतिक रूप से सख्त दिखने वाली कार्टाज़ प्रणाली व्यवहार में कई कारणों से कमजोर पड़ने लगी।
पहला, पुर्तगाली राज्य ने मसाले, बारूद, हथियार, धातुएँ और कीमती धातुओं के व्यापार को राजकीय एकाधिकार घोषित कर दिया। लेकिन राजकीय अधिकारी कम वेतन पाते थे और निजी व्यापार की ओर झुकाव स्वाभाविक था। परिणामस्वरूप,
- पुर्तगाली अधिकारी
- निजी पुर्तगाली व्यापारी
- और एशियाई व्यापारी
आपस में मिलकर नियमों को दरकिनार करने लगे। कार्टाज़ प्रणाली धीरे-धीरे भ्रष्ट और छिद्रपूर्ण बन गई।
एशियाई व्यापारिक प्रतिरोध और वैकल्पिक मार्ग
अरब और गुजराती व्यापारियों ने पुर्तगाली नियंत्रण से बचने के रास्ते खोज लिए। पुर्तगाली एडेन पर अधिकार नहीं कर सके, जो लाल सागर का द्वार था। ओटोमन साम्राज्य के सीरिया, मिस्र और अरब पर अधिकार के बाद बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में पुर्तगाली पकड़ और कमजोर हो गई।
पूर्वी छोर पर भी स्थिति ऐसी ही थी। उत्तरी सुमात्रा का अचेह राज्य पुर्तगाली मलक्का को चुनौती देने लगा। जावानी नौसैनिक तकनीकों और ओटोमन तोपों की सहायता से अचेह एक वैकल्पिक मसाला-निर्यात केंद्र बन गया। इससे अरब-गुजराती व्यापारी पुर्तगाली नियंत्रण से बचते हुए मसाले लाल सागर की ओर भेजने लगे।
व्यापारिक पुनर्गठन की सीमाएँ
इस प्रकार, पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के व्यापार को पूरी तरह “कब्ज़े” में नहीं लिया, बल्कि उसे आंशिक रूप से पुनर्गठित किया।
- उन्होंने कुछ मार्गों को नियंत्रित किया
- कुछ बंदरगाहों को अधीन किया
- और कुछ वस्तुओं पर अस्थायी प्रभाव डाला
लेकिन एशियाई व्यापारिक तंत्र की गहराई, स्थानीय शासकों की भूमिका और अंतर-क्षेत्रीय नेटवर्क की मजबूती ने पुर्तगाली नियंत्रण को सीमित कर दिया।
नियंत्रण से अधिक पुनर्वितरण
आधुनिक इतिहासलेखन में यह माना जाता है कि पुर्तगाली प्रणाली उत्पादन या व्यापार का विस्तार नहीं कर सकी। उनका मॉडल मुख्यतः “पुनर्वितरणात्मक” (redistributive) था, अर्थात् दूसरों के व्यापार पर कर और शुल्क लगाकर लाभ कमाना, न कि नए व्यापारिक अवसर खोलना।
इस अर्थ में, भारत में पुर्तगालियों का आगमन हिंद महासागर के व्यापार को पूरी तरह रूपांतरित नहीं करता, बल्कि उसकी दिशा और शक्ति-संतुलन को अस्थायी रूप से मोड़ देता है। वास्तविक विस्तार और संरचनात्मक परिवर्तन 17वीं शताब्दी में डच और अंग्रेज़ कंपनियों के आगमन के साथ दिखाई देता है।
पुर्तगाली शक्ति की सीमाएँ, आंतरिक कमजोरियाँ और एशियाई साझेदारी
16वीं शताब्दी के मध्य तक पुर्तगाली हिंद महासागर में एक प्रमुख नौसैनिक शक्ति बन चुके थे, लेकिन यह शक्ति न तो सर्वव्यापी थी और न ही असीम। किलों, कार्टाज़ प्रणाली और समुद्री गश्त के बावजूद पुर्तगाली नियंत्रण चयनित क्षेत्रों और परिस्थितियों तक ही सीमित रहा। इस सीमित सफलता के पीछे उनकी आंतरिक कमजोरियाँ और एशियाई व्यापारिक समाज की सक्रिय भूमिका, दोनों समान रूप से जिम्मेदार थीं।
भौगोलिक और सैन्य सीमाएँ: समुद्र तक सिमटा प्रभुत्व
पुर्तगाली साम्राज्य का सबसे बड़ा गुण और सबसे बड़ी सीमा दोनों उसका समुद्री स्वरूप था। वे मुख्यतः:
- द्वीपों
- तटीय किलों
- और प्रमुख बंदरगाहों
तक सीमित रहे। उनके पास न तो पर्याप्त जनसंख्या थी और न ही संसाधन कि वे भारत या एशिया के अंदरूनी भूभाग में गहराई तक शासन स्थापित कर सकें। गोवा, दीव, कोचीन जैसे केंद्र समुद्र के सहारे सुरक्षित थे, लेकिन उनका प्रभाव कुछ किलोमीटर अंदर जाते ही क्षीण हो जाता था।
यही कारण है कि पुर्तगाली शक्ति स्थलीय राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित नहीं कर सकी। बड़े भारतीय साम्राज्यों जैसे मुग़ल के साथ उनका संबंध अधिकतर कूटनीतिक और व्यापारिक ही रहा।
सीमित मानव संसाधन और वित्तीय कमजोरी
पुर्तगाल स्वयं एक छोटा देश था। एशिया में तैनात पुर्तगालियों की संख्या कभी भी बहुत अधिक नहीं रही। इसके साथ ही एक और संरचनात्मक समस्या थी पूँजी की कमी।
स्पेन के विपरीत, पुर्तगाल के पास अमेरिका जैसी चाँदी की खदानें नहीं थीं। इसलिए:
- उन्हें जर्मन और इतालवी बैंकरों पर निर्भर रहना पड़ा
- और यूरोप में लिस्बन लाए गए मसालों का वितरण भी अक्सर गैर-पुर्तगाली फर्मों द्वारा किया गया
इसका अर्थ यह था कि हिंद महासागर में किया गया भारी सैन्य और प्रशासनिक खर्च हमेशा अपने अनुपात में लाभ नहीं दे पा रहा था।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और आंतरिक विघटन
एस्टाडो दा इंडिया का प्रशासन काग़ज़ पर केंद्रीकृत दिखता था, लेकिन व्यवहार में वह भ्रष्टाचार और निजी हितों से ग्रस्त था।
कम वेतन पाने वाले अधिकारी:
- निजी व्यापार में लिप्त हो जाते थे
- कार्टाज़ प्रणाली का दुरुपयोग करते थे
- और एशियाई व्यापारियों से सांठ-गांठ करते थे
इससे पुर्तगाली नीति में एक स्पष्ट विरोधाभास पैदा हुआ, राजकीय स्तर पर एकाधिकार की घोषणा, और व्यवहार में उसी एकाधिकार का क्षरण।
एशियाई व्यापारियों की अनुकूलन क्षमता
पुर्तगाली नीति की सबसे बड़ी चुनौती एशियाई व्यापारियों की लचीलापन और रणनीतिक बुद्धिमत्ता थी। अरब, गुजराती, तमिल और मलय व्यापारी:
- मार्ग बदल लेते थे
- छोटे जहाज़ों का प्रयोग करते थे
- या स्वयं पुर्तगाली निजी व्यापारियों के साथ साझेदारी कर लेते थे
उन्होंने यह भी समझ लिया कि पुर्तगालियों से पूर्ण टकराव की बजाय सशर्त सहयोग अधिक लाभदायक हो सकता है। इसी कारण धीरे-धीरे एक ऐसा तंत्र विकसित हुआ जिसमें पुर्तगाली और एशियाई व्यापारी विरोधी नहीं, बल्कि कई मामलों में साझेदार बन गए।
एशियाई साझेदारी: विरोध से सहअस्तित्व की ओर
16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक स्थिति यह हो गई कि:
- कई अरब और गुजराती व्यापारी पुर्तगाली जहाज़ों पर माल लोड करने लगे
- पुर्तगाली अधिकारी एशियाई जहाज़ों का उपयोग कर राजकीय नियमों से बचने लगे
इस प्रकार, हिंद महासागर का व्यापार किसी एक शक्ति के नियंत्रण में न जाकर मिश्रित सहयोग और प्रतिस्पर्धा के ढाँचे में ढल गया। यह सहअस्तित्व पुर्तगाली प्रभुत्व को बनाए रखने में सहायक तो बना, लेकिन उसने उस प्रभुत्व को और अधिक निर्बल भी कर दिया।
ऐतिहासिक मूल्यांकन: क्यों पुर्तगाली प्रभुत्व टिक नहीं सका
इन सभी कारकों भौगोलिक सीमाएँ, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और एशियाई साझेदारी ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि पुर्तगाली शक्ति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं बन सके।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि भारत में पुर्तगालियों का आगमन हिंद महासागर पर स्थायी यूरोपीय नियंत्रण का प्रारंभ नहीं था, बल्कि एक संक्रमणकालीन चरण था। यही संक्रमण आगे चलकर डच और अंग्रेज़ जैसी यूरोपीय शक्तियाँ उभरीं, जिनमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे प्रभावशाली सिद्ध हुई।
भारत में पुर्तगालियों का आगमन – एक संक्रमणकालीन शक्ति
भारत में पुर्तगालियों का आगमन भारतीय इतिहास में न तो पूर्ण परिवर्तन का क्षण था और न ही एक क्षणिक घटना। यह एक संक्रमणकालीन प्रक्रिया थी, जिसने भारत, हिंद महासागर और व्यापक विश्व-व्यवस्था के बीच संबंधों की दिशा अवश्य बदली, लेकिन उन्हें पूरी तरह पुनर्गठित नहीं कर सकी।
1498 ई. में प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की स्थापना ने भारत को पहली बार यूरोप की उभरती समुद्री अर्थव्यवस्था से सीधे जोड़ा। इससे भारतीय व्यापार वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अधिक दृश्यमान हुआ और हिंद महासागर का क्षेत्रीय व्यापार धीरे-धीरे अंतरमहाद्वीपीय राजनीति से जुड़ने लगा। इस अर्थ में पुर्तगालियों का आगमन निर्णायक था। परंतु यह निर्णायकता नियंत्रण की नहीं, संपर्क और हस्तक्षेप की थी।
पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक स्वरूप समुद्र तक सीमित रहा। किले, कार्टाज़ प्रणाली और नौसैनिक गश्त के बावजूद वे न तो एशियाई व्यापारिक नेटवर्क को तोड़ सके, न ही भारतीय राजनीतिक संरचनाओं पर गहरा स्थायी प्रभुत्व स्थापित कर पाए। उनका साम्राज्य द्वीपों, तटीय किलों और चुनिंदा बंदरगाहों तक सिमटा रहा। इसके विपरीत, एशियाई व्यापारिक समाज अरब, गुजराती, तमिल और मलय ने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालते हुए पुर्तगाली चुनौती को सहन भी किया और सीमित रूप से अपने हित में भी उपयोग किया।
इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आता है: पुर्तगाली शक्ति को भारतीय या एशियाई शक्तियों ने निर्णायक रूप से नहीं हटाया। उनका प्रभुत्व 17वीं शताब्दी में डच और अंग्रेज़ जैसी नई यूरोपीय शक्तियों के आगमन के साथ कमजोर पड़ा, जिनके पास अधिक संगठित पूँजी, कंपनी-आधारित ढाँचा और व्यापक संसाधन थे। इससे स्पष्ट होता है कि पुर्तगाली मॉडल स्वयं में दीर्घकालिक नहीं था। अतः भारत में पुर्तगालियों का आगमन को न तो औपनिवेशिक युग की पूर्ण शुरुआत के रूप में देखना चाहिए, और न ही एक सीमांत घटना के रूप में। यह एक ऐसा संक्रमणकालीन चरण था, जिसमें पहली बार यूरोपीय समुद्री शक्ति ने एशियाई व्यापारिक संसार में स्थायी हस्तक्षेप किया सीमाओं के साथ, विरोध के साथ और सहयोग के साथ। इसी संक्रमण ने आगे चलकर औपनिवेशिक विश्व-व्यवस्था के लिए आधार तैयार किया, जिसकी वास्तविक संरचना बाद की शताब्दियों में विकसित हुई।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
