गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनैतिक दशा: विखंडन से साम्राज्य की ओर

गुप्तों से पूर्व भारत के प्रमुख राजवंशों का राजनीतिक मानचित्र
गुप्तों के उदय से पूर्व भारत में राजतंत्र, गणराज्य और क्षेत्रीय शक्तियों का वितरण दर्शाता मानचित्र।

गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए हमें उस संक्रमणकाल की ओर देखना होगा, जो कुषाण साम्राज्य के पतन और गुप्त शक्ति के उभार के बीच फैला हुआ था। यह काल भारतीय इतिहास में केन्द्रीय सत्ता के विघटन, क्षेत्रीय शक्तियों के उभार और दीर्घकालिक राजनीतिक अस्थिरता का युग माना जाता है। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद जो राजनीतिक शून्य उत्पन्न हुआ था, वह कुषाणों के पतन के पश्चात् और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आया।

इस समय सम्पूर्ण भारत में कोई सार्वभौमिक सत्ता विद्यमान नहीं थी। उत्तर भारत से लेकर दक्षिणापथ तक देश अनेक छोटे-बड़े राज्यों में विभक्त था, जिनके बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता था। राजनीतिक विखंडन के इस दौर में भारत में दो प्रमुख प्रकार की राजनीतिक इकाइयाँ सक्रिय थीं,
(1) राजतंत्र, और
(2) गणतंत्र अथवा जनजातीय राज्य।
इसके साथ-साथ कुछ विदेशी शक्तियाँ भी सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभाव बनाए हुए थीं

 

कुषाणोत्तर काल और उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति

 

कुषाणों की शक्ति के क्षीण होते ही उत्तर भारत में कई स्थानीय और क्षेत्रीय राजवंश स्वतंत्र हो गए। यह प्रक्रिया अचानक नहीं थी, बल्कि तीसरी शताब्दी ईस्वी के दौरान क्रमशः विकसित हुई। इस काल की राजनीति का प्रमुख लक्षण था, केन्द्रीय सत्ता का अभाव और क्षेत्रीय शासकों की बढ़ती स्वायत्तता।

 

नागवंशों का राजनीतिक उत्थान

 

कुषाणों के पतन के पश्चात् मध्य भारत और गंगाघाटी में जिन शक्तियों का सर्वाधिक प्रभाव दिखाई देता है, उनमें नागवंश प्रमुख था। गंगाघाटी से कुषाण सत्ता के उन्मूलन का श्रेय प्रायः नागवंश को दिया जाता है। पुराणों के अनुसार पद्मावती, मथुरा और कान्तिपुर नाग कुलों की प्रमुख राजधानियाँ थीं।

पुराण साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि मथुरा में सात तथा पद्मावती में नौ नाग शासकों ने शासन किया। गुप्तों के उदय से ठीक पहले पद्मावती और मथुरा के नाग अत्यंत शक्तिशाली स्थिति में थे। इनमें विशेष रूप से पद्मावती का भारशिव नाग वंश ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।

 

भारशिव नाग और उनकी राजनीतिक भूमिका

पद्मावती की पहचान आधुनिक ग्वालियर के समीप स्थित प‌द्मपवैया से की जाती है। यहाँ के नाग शासक ‘भारशिव’ कहलाते थे, क्योंकि वे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अपने कंधों पर शिवलिंग धारण करते थे। यह तथ्य न केवल उनकी धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि इस काल में राजनीति और धर्म के घनिष्ठ संबंध को भी स्पष्ट करता है।

भारशिवों के वाकाटक वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित थे, जो उस समय की कूटनीतिक राजनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारशिव शासक भनाग (305-340 ई.) की पुत्री का विवाह वाकाटक नरेश प्रवरसेन प्रथम के पुत्र से हुआ था। इससे स्पष्ट होता है कि गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति में वैवाहिक संधियाँ सत्ता-संतुलन का प्रमुख साधन थीं।

समुद्रगुप्त के समय पद्मावती का शासक नागसेन था, जिसका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है। इसी प्रकार मथुरा में गणपतिनाग का शासन था। तीसरी शताब्दी के अंत तक नागों का प्रभाव आगरा, ग्वालियर, झाँसी, कानपुर, बाँदा और इटावा तक फैल चुका था।

 

बडवा का मौखरि वंश

 

नागों की राजधानी पद्मावती के पश्चिम में लगभग 150 मील दूर बडवा (प्राचीन कोटा क्षेत्र) में मौखरि वंश की एक शाखा तीसरी शताब्दी के प्रारंभ में शासन कर रही थी। 239 ईस्वी में इस वंश का शासक महासेनापति बल था। संभवतः ये मौखरि शासक प्रारंभ में नागों अथवा पश्चिमी क्षत्रपों के सामंत रहे होंगे।

मौखरियों का विशेष महत्व इस बात में है कि उनके इतिहास का ज्ञान हमें केवल पाषाण-यूपों पर उत्कीर्ण अभिलेखों से मिलता है। बल के तीन पुत्रों द्वारा किए गए त्रिरात्र यज्ञ इस बात का संकेत हैं कि इस काल में वैदिक परंपराओं को राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जा रहा था।

 

मघराज वंश और कौशाम्बी की राजनीति

 

नाग शक्ति के दक्षिण-पूर्व में मघराज वंश का शासन था, जिसका प्रारंभिक क्षेत्र बघेलखंड (रीवा मंडल) था। इस वंश का प्रथम ज्ञात शासक वाशिष्ठीपुत्र भीमसेन था। उसके उत्तराधिकारी कौत्सीपुत्र पोठसिरि की राजधानी बंधोगढ़ थी।

 

कौशाम्बी पर अधिकार और मघ सत्ता

लगभग 155 ईस्वी में मघ शासक भद्रमघ ने कौशाम्बी को कुषाणों से छीन लिया। यहाँ से प्राप्त शक संवत् 81 (159 ई.) का अभिलेख इस घटना की पुष्टि करता है। मघ शासकों द्वारा सिक्कों का प्रचलन यह दर्शाता है कि वे राजनीतिक रूप से पूर्णतः स्वतंत्र सत्ता के रूप में उभर चुके थे।

यद्यपि मघ वंश का इतिहास क्रमबद्ध रूप में स्पष्ट नहीं है, फिर भी इतना निश्चित है कि कौशाम्बी पर उनका शासन लगभग 250 ईस्वी तक बना रहा, जो गुप्तों के उदय से पूर्व उत्तर भारत की राजनीतिक विविधता को दर्शाता है।

 

अहिच्छत्र और अयोध्या के राजतंत्र

 

इसी काल में अहिच्छत्र (आधुनिक रामनगर, बरेली जिला) तथा अयोध्या भी महत्वपूर्ण राजनीतिक केन्द्र थे। अहिच्छत्र से प्राप्त सिक्कों पर मित्रवंशी राजाओं के नाम मिलते हैं। कुछ सिक्कों पर अंकित ‘अच्यु’ नाम की पहचान प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित अच्युत से की जाती है।

अयोध्या से प्राप्त सिक्कों में धनदेव, विशाखदेव और मूलदेव जैसे शासकों के नाम मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति में प्राचीन नगरों का पुनः राजनीतिक महत्व उभर रहा था।

 

इस प्रकार, कुषाणों के पतन के बाद उत्तर भारत में कोई एकीकृत सत्ता नहीं थी। नाग, मौखरि, मघ और अन्य स्थानीय राजवंशों ने अपनी-अपनी सीमाओं में सत्ता स्थापित कर ली थी। यह स्थिति राजनीतिक विखंडन, सीमित संसाधनों और निरंतर संघर्ष से युक्त थी, जो आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के केंद्रीकरण के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि सिद्ध हुई।

 

उत्तर भारत के समान दक्षिणापथ में भी राजनीतिक विखंडन

 

गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति केवल उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं थी। दक्षिण भारत और दक्कन क्षेत्र भी इसी प्रकार के संक्रमणकालीन राजनीतिक परिवर्तन से गुजर रहे थे। सातवाहन साम्राज्य के पतन के पश्चात् दक्षिणापथ में भी कोई ऐसी शक्ति नहीं उभरी, जो सम्पूर्ण क्षेत्र को एकीकृत कर सके। परिणामस्वरूप यहाँ अनेक क्षेत्रीय राजवंश स्वतंत्र सत्ता के रूप में उभरे।

 

वाकाटक वंश: दक्कन की सबसे सशक्त शक्ति

 

दक्कन की राजनीति में गुप्तों के उदय से पूर्व सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वाकाटक वंश की रही। इस वंश की स्थापना तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य में विष्णुवृद्धि गोत्र के विन्ध्यशक्ति ने की थी। प्रारंभ में वाकाटक सातवाहनों के अधीन स्थानीय शासक थे, किंतु सातवाहन सत्ता के पतन के बाद विन्ध्यशक्ति ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

 

विन्ध्यशक्ति और वाकाटक सत्ता का विस्तार

विन्ध्यशक्ति का साम्राज्य विन्ध्य पर्वत के उत्तर में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था। यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह उत्तर भारत और दक्कन के बीच सेतु का कार्य करता था। यही कारण है कि आगे चलकर वाकाटक गुप्त राजनीति के भी निकट आए।

 

प्रवरसेन प्रथम और वाकाटकों की शक्ति का चरम

विन्ध्यशक्ति के पश्चात् उसका पुत्र प्रवरसेन प्रथम (275–335 ई.) एक अत्यंत शक्तिशाली शासक के रूप में उभरा। उसने ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की, जो उसकी सार्वभौमिक महत्त्वाकांक्षा को दर्शाती है। इस काल में वाकाटक साम्राज्य,

  • उत्तर में मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड,
  • दक्षिण में उत्तरी हैदराबाद तक फैल गया।

वाकाटकों की शक्ति का यह विस्तार इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक दशा में कुछ क्षेत्रीय शक्तियाँ स्थायित्व की ओर अग्रसर थीं, यद्यपि वे सम्पूर्ण भारत को एकीकृत करने में सक्षम नहीं थीं।

 

पल्लव वंश और दक्षिण भारत की राजनीति

 

दक्षिण भारत में एक अन्य प्रमुख शक्ति पल्लव वंश था। प्रारंभ में पल्लव भी सातवाहनों के अधीन थे, किंतु बाद में उन्होंने स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। उनकी राजधानी कांची (आधुनिक कांचीपुरम) थी, जो दक्षिण भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र बन चुकी थी।

 

पल्लव साम्राज्य का विस्तार

पल्लवों का साम्राज्य,

  • उत्तर में आंध्र प्रदेश के एक भाग,
  • पश्चिम में पश्चिमी समुद्र तट,
  • और दक्षिण में तमिल क्षेत्र तक फैला हुआ था।

प्रारंभिक पल्लव शासकों में स्कंदवर्मन का नाम उल्लेखनीय है। समुद्रगुप्त के काल में पल्लव शासक विष्णुगोप था, जिसका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिणापथ के पराजित राजाओं के रूप में किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि गुप्तों के उदय से ठीक पहले पल्लव एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति थे।

 

दक्षिणापथ की अन्य राजनीतिक शक्तियाँ

 

वाकाटक और पल्लवों के अतिरिक्त दक्षिण भारत की राजनीति में कई अन्य राजवंश भी सक्रिय थे। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त द्वारा पराजित दक्षिणापथ के बारह राजाओं का उल्लेख मिलता है, जिनका क्षेत्र दक्षिणी कोसल से कांची तक फैला हुआ था

 

आभीर वंश

 

आभीर वंश की स्थापना ईश्वरसेन ने की थी, जिसने लगभग 248–249 ईस्वी में कलचुरि–चेदि संवत् की शुरुआत की। उसके पिता का नाम शिवदत्त था। नासिक से प्राप्त उसके शासनकाल के नवें वर्ष के अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि आभीरों का अधिकार नासिक क्षेत्र पर था।

आभीरों का प्रभाव,

  • अपरांत,
  • लाट प्रदेश,
  • और महाराष्ट्र के भागों तक फैला हुआ था।

आभीर सत्ता चौथी शताब्दी ईस्वी तक बनी रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे गुप्तों के उदय से पूर्व एक स्थायी क्षेत्रीय शक्ति थे।

 

ईक्ष्वाकु वंश: कृष्णा घाटी की सत्ता

 

ईक्ष्वाकु वंश का शासन कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में था। पुराणों में उन्हें ‘श्रीपर्वतीय’ तथा ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है। प्रारंभ में वे सातवाहनों के सामंत थे, किंतु उनके पतन के बाद स्वतंत्र हो गए।

 

श्रीशांतमूल और वैदिक वैधता

वंश का संस्थापक श्रीशांतमूल था, जिसने अपनी स्वतंत्र सत्ता को वैधता प्रदान करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया। यह इस बात का संकेत है कि इस काल में राजनीतिक प्रभुत्व को वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से वैध ठहराया जा रहा था।

 

वीरपुरुषदत्त और बौद्ध संरक्षण

शांतमूल के पुत्र माठरीपुत्र वीरपुरुषदत्त ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। अमरावती और नागार्जुनकोंड से प्राप्त उसके अभिलेखों में बौद्ध संस्थाओं को दान का उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईक्ष्वाकु शासक धार्मिक सहिष्णुता का पालन करते थे।

ईक्ष्वाकु वंश का अंत तीसरी शताब्दी के अंत तक हो गया और उनका क्षेत्र पल्लवों के अधीन चला गया।

 

चुटुशातकर्णि वंश और अन्य छोटे राजवंश

 

महाराष्ट्र और कुन्तल क्षेत्र में तीसरी शताब्दी ईस्वी के दौरान चुटुशातकर्णि वंश का शासन था। कुछ इतिहासकार उन्हें सातवाहनों की शाखा मानते हैं, जबकि अन्य उन्हें नागकुल से जोड़ते हैं। अंततः उनका शासन कदंबों द्वारा समाप्त कर दिया गया।

इसके अतिरिक्त,

  • बृहत्पलायन (कृष्णा-मसूलिपट्टम् क्षेत्र),
  • शालंकायन (कृष्णा-गोदावरी के मध्य),
    कुछ समय के लिए स्वतंत्र हुए, किंतु अंततः पल्लवों के अधीन हो गए।

सुदूर दक्षिण में चोल, चेर और पांड्य राजवंश निरंतर शासन कर रहे थे, जो यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत की राजनीति अपेक्षाकृत अधिक स्थिर थी, यद्यपि वहाँ भी कोई सार्वभौमिक शक्ति नहीं थी।

 

दक्षिण भारत और दक्कन में गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति का स्वरूप बहुकेन्द्रित सत्ता का था। वाकाटक, पल्लव, आभीर और ईक्ष्वाकु जैसे वंश अपने-अपने क्षेत्रों में सशक्त थे, किंतु परस्पर प्रतिस्पर्धा और सीमित संसाधनों के कारण वे किसी दीर्घकालिक केन्द्रीय साम्राज्य की स्थापना नहीं कर सके।

यह स्थिति गुप्तों के लिए अनुकूल सिद्ध हुई, क्योंकि,

  • उत्तर और दक्षिण दोनों ही क्षेत्रों में राजनीतिक विखंडन था,
  • और किसी भी शक्ति के पास सम्पूर्ण भारत पर नियंत्रण की क्षमता नहीं थी।

 

प्रागुप्त युग में गणराज्य और जनजातीय राज्य

 

गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक दशा का एक विशिष्ट पक्ष गणराज्यों (जनजातीय राज्यों) का अस्तित्व था। ये न तो पूर्णतः केन्द्रीयकृत राजतंत्र थे और न ही असंगठित इकाइयाँ, बल्कि सामूहिक निर्णय-प्रणाली पर आधारित राजनीतिक संरचनाएँ थीं। इनका प्रभाव पूर्वी पंजाब, राजस्थान, मालवा और मध्य भारत के विस्तृत क्षेत्रों में दिखाई देता है।

 

मालव गणराज्य

मालवों का उल्लेख सिकंदर के आक्रमणकाल से मिलता है। कालांतर में वे पूर्वी राजपूताना और दशपुर (मंदसौर) क्षेत्र में स्थापित हुए। पाणिनि ने उन्हें ‘आयुधजीवी संघ’ कहा है, जो उनकी सैन्य प्रकृति को दर्शाता है। उनके सिक्कों पर अंकित ‘मालवानां जय’ जैसे सूत्र इस बात का प्रमाण हैं कि वे राजनीतिक रूप से संगठित और आत्मविश्वासी थे। चौथी शताब्दी के अंत तक उनका अस्तित्व बना रहा, परंतु समुद्रगुप्त द्वारा वे अधीन कर लिए गए।

 

अर्जुनायन, यौधेय और कुणिंद

अर्जुनायन (आगरा-जयपुर क्षेत्र) और यौधेय (उत्तरी राजपूताना-पूर्वी पंजाब) इस काल के प्रमुख गणराज्य थे। यौधेयों के सिक्कों पर ‘यौधेय गणस्य जय’ और ‘जयमंत्रधाराणां’ जैसे अभिलेख मिलते हैं, जो उनके सैन्य गौरव और संगठन को रेखांकित करते हैं। कुणिंद (यमुना-सतलज के मध्य) का उल्लेख टॉलेमी और पुराणों में मिलता है; इनके सिक्के उनकी राजनीतिक स्वायत्तता का संकेत देते हैं।

 

शिवि और लिच्छिवि

शिवि गणराज्य का स्थान परिवर्तन (पंजाब से माध्यमिका-चित्तौड़ क्षेत्र) इस काल की राजनीतिक गतिशीलता को दर्शाता है।
लिच्छिवि पुनः गंगा घाटी में प्रभावशाली हुए, उनके दो केंद्र (वैशाली और नेपाल) थे। चंद्रगुप्त प्रथम का लिच्छिवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह आगे चलकर गुप्त सत्ता के विस्तार में निर्णायक सिद्ध हुआ, यह उदाहरण दिखाता है कि गणराज्यों की प्रतिष्ठा अब भी राजतंत्रों के लिए कूटनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण थी।

 

अन्य गणराज्य

आभीर, मद्रक, प्रार्जुन, सनकानिक, काक, खरपरिक आदि गणराज्यों का क्षेत्रीय महत्व रहा। यद्यपि इनमें से अनेक के सिक्के या विस्तृत अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी उनका अस्तित्व इस तथ्य की पुष्टि करता है कि राजनीतिक बहुलता इस युग की मूल विशेषता थी।

 

विदेशी शक्तियाँ और सीमावर्ती राजनीति

 

गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति पर विदेशी शक्तियों का प्रभाव भी स्पष्ट था, विशेषतः पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में।

 

पश्चिमी क्षत्रप (शक)

गुजरात-काठियावाड़ में पश्चिमी क्षत्रप (कार्दमक शक) सशक्त थे। उनके प्रशासनिक ढाँचे और मुद्रा-प्रणाली ने क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और राजनीति को प्रभावित किया। यह प्रभाव गुप्तों के आरंभिक विस्तार के समय तक बना रहा।

 

सासानी हस्तक्षेप

सासानी शासकों (शापुर प्रथम, बह्राम द्वितीय, शापुर द्वितीय) के आक्रमणों ने उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीति को अस्थिर किया। कई शक-कुषाण शासक सासानी अधीनता में चले गए। अल्टेकर के अनुसार, पेशावर का कुषाण शासक किदार कुछ समय सासानी प्रभाव में रहा, किंतु आगे चलकर स्वतंत्र हुआ, यह संक्रमणकालीन सत्ता-संतुलन को दर्शाता है।

 

किदार कुषाण और ‘देवपुत्रशाहीशाहानुशाही’

किदार कुषाणों का उदय उत्तर-पश्चिम में एक नई शक्ति के रूप में हुआ। प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित ‘देवपुत्रशाहीशाहानुशाही’ का संदर्भ किदार से जोड़ा जाता है। किदार ने अंततः समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की, यह संकेत है कि गुप्त शक्ति सीमावर्ती राजनीति में निर्णायक बन चुकी थी।

 

मुरुंड और अन्य विदेशी समूह

प्रयाग प्रशस्ति में मुरुंड का उल्लेख मिलता है; टॉलेमी उन्हें साकेत का शासक बताता है। चीनी स्रोतों में उनका उल्लेख ‘मेडलिन’ के रूप में मिलता है। ये विवरण दर्शाते हैं कि गुप्तों के उदय से ठीक पहले उत्तर भारत में विदेशी-स्थानीय शक्तियों का जटिल सहअस्तित्व था।

 

समग्र विश्लेषण: गुप्त उदय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध और चौथी शताब्दी के प्रारंभ में भारत की राजनीतिक दशा निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त थी,

  • केन्द्रीय सत्ता का अभाव और बहुकेन्द्रित राजनीति
  • राजतंत्रों और गणराज्यों का सहअस्तित्व
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में विदेशी हस्तक्षेप
  • दीर्घकालिक राजनीतिक अस्थिरता, किंतु साथ ही प्रशासनिक-सैन्य प्रयोग

यही परिस्थितियाँ किसी ऐसी शक्ति के लिए अनुकूल थीं जो स्थिर प्रशासन, सैन्य संगठन और कूटनीति के माध्यम से एकीकरण कर सके।

 

निष्कर्ष: गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति का ऐतिहासिक महत्व

 

इस समग्र अध्ययन से स्पष्ट होता है कि गुप्तों के उदय से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति अराजकता का मात्र पर्याय नहीं थी; यह एक संक्रमणकाल था, जिसमें विविध राजनीतिक प्रयोग हो रहे थे। राजतंत्रों की प्रतिस्पर्धा, गणराज्यों की सामूहिक परंपराएँ और विदेशी शक्तियों की चुनौती, इन सबने मिलकर वह पृष्ठभूमि तैयार की, जिसमें मगध के गुप्त वंश का उदय संभव हुआ।

गुप्तों ने,

  • क्षेत्रीय शक्तियों के विखंडन का लाभ उठाया,
  • वैवाहिक कूटनीति (लिच्छिवि संबंध) का उपयोग किया,
  • और क्रमशः केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया आरंभ की।

इस प्रकार, यह काल भारतीय इतिहास में राजनीतिक पुनर्संरचना की निर्णायक कड़ी सिद्ध हुआ, जो आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के ‘स्वर्णयुग’ का आधार बना।

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top