कुषाण सम्राट कनिष्क का शासनकाल भारतीय कला के इतिहास में केवल एक राजकीय चरण नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक परिवर्तन का काल है। इसी युग में कनिष्क कालीन कला ने प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर मूर्त रूप धारण किया और धार्मिक विचारधाराओं, दार्शनिक अवधारणाओं तथा राजसत्ता के संरक्षण के संयुक्त प्रभाव में एक नवीन कलात्मक परंपरा को जन्म दिया। यह वही काल था जब बौद्ध धर्म, विशेषतः महायान संप्रदाय, ने बुद्ध को निराकार सिद्धांत से हटाकर साकार, मानवीय और पूज्य रूप में स्वीकार किया। इस वैचारिक परिवर्तन ने मूर्तिकला को केवल सौंदर्य की विधा न रहने देकर धार्मिक अनुष्ठान और बौद्धिक संवाद का माध्यम बना दिया।
कनिष्क के शासनकाल में कला का विकास किसी एक केंद्र या एक शैली तक सीमित नहीं रहा। उत्तर-पश्चिमी भारत में विकसित गंधार कला शैली और मध्य गंगा-यमुना दोआब में पुष्पित मथुरा कला शैली, दोनों ने समान धार्मिक प्रेरणा के बावजूद भिन्न कलात्मक मार्ग अपनाए। जहाँ गंधार कला में यूनानी यथार्थवाद और बाह्य शिल्प तकनीक की प्रधानता दिखाई देती है, वहीं मथुरा कला भारतीय परंपरा, आध्यात्मिक अनुभूति और भावात्मक अभिव्यक्ति की निरंतरता को रेखांकित करती है। इन दोनों शैलियों का तुलनात्मक अध्ययन न केवल कुषाण कालीन मूर्तिकला को समझने के लिए आवश्यक है, बल्कि यह भारतीय कला की उस ऐतिहासिक क्षमता को भी उजागर करता है, जिसके माध्यम से विदेशी प्रभावों को आत्मसात कर उन्हें भारतीय चेतना के अनुरूप ढाला गया।

गंधार कला शैली : कनिष्क कालीन कला में यूनानी यथार्थवाद और बौद्ध विषयवस्तु
गंधार कला का उद्भव और ऐतिहासिक संदर्भ
कनिष्क कालीन कला के अंतर्गत गंधार कला शैली का उदय उत्तर-पश्चिमी भारत (वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान) के उन क्षेत्रों में हुआ, जहाँ ईसा पूर्व से ही यूनानी, ईरानी और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का निरंतर संपर्क बना हुआ था। सिकंदर के आक्रमण के बाद स्थापित इंडो-ग्रीक राज्यों और रोमन व्यापारिक संपर्कों ने इस क्षेत्र को एक बहुसांस्कृतिक प्रयोगशाला में बदल दिया। इसी पृष्ठभूमि में गंधार कला शैली का विकास हुआ, जिसमें भारतीय बौद्ध विषयों को यूनानी शिल्प तकनीक और यथार्थवादी दृष्टिकोण के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया।
पाश्चात्य विद्वानों की एक धारा यह मानती रही है कि बुद्ध की प्रथम मानवाकार मूर्तियाँ गंधार में ही निर्मित हुईं। किंतु इस मत के समर्थन में कोई ठोस अभिलेखीय या संवत्-आधारित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत, वासुदेव शरण अग्रवाल ने तार्किक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि बुद्ध प्रतिमा निर्माण की परिकल्पना सर्वप्रथम मथुरा के धार्मिक परिवेश में विकसित हुई, जहाँ पहले से यक्ष, नाग और वैष्णव प्रतिमाओं की परंपरा विद्यमान थी। इस दृष्टि से गंधार कला को बुद्ध मूर्ति की उत्पत्ति का स्रोत नहीं, बल्कि उसके विस्तार और प्रसार का माध्यम माना जाना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
विषयवस्तु और शिल्पगत विशेषताएँ
गंधार कला शैली की विषयवस्तु लगभग पूर्णतः बौद्ध है। इस शैली के अंतर्गत बुद्ध तथा बोधिसत्वों की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण हुआ, जिनमें मैत्रेय, अवलोकितेश्वर और पद्मपाणि की प्रतिमाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये मूर्तियाँ मुख्यतः स्लेटी पाषाण, चूना-पत्थर और पकी मिट्टी से निर्मित की गई हैं, जो इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों को प्रतिबिंबित करती हैं।
बुद्ध को ध्यान, पद्मासन, धर्मचक्र प्रवर्तन, वरद और अभय मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। साथ ही, बुद्ध के जीवन और पूर्व जन्मों से संबंधित घटनाओं लुम्बिनी यात्रा, जन्म, महाभिनिष्क्रमण, संबोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन और महापरिनिर्वाण का क्रमबद्ध और नाटकीय अंकन भी इसी शैली में मिलता है। इन दृश्यों में कथा-तत्व की प्रधानता है, जो गंधार कला को केवल मूर्तिकला तक सीमित न रखकर एक दृश्यात्मक धर्मोपदेश का रूप प्रदान करती है।
तपस्यारत बुद्ध : यथार्थवाद की चरम अभिव्यक्ति
गंधार कला का सर्वोत्तम उदाहरण तपस्यारत बुद्ध की वह प्रतिमा मानी जाती है, जिसमें उपवास के कारण क्षीण हो चुके शरीर का अत्यंत यथार्थ चित्रण किया गया है। उभरी हुई नसें, स्पष्ट पसलियाँ, भीतर धँसा हुआ उदर और तनावग्रस्त मांसपेशियाँ कलाकार की शारीरिक संरचना पर गहरी पकड़ को दर्शाती हैं। इसके विपरीत, मुखमंडल पर व्याप्त शांति और संयम इस मूर्ति को केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संघर्ष का प्रतीक बना देते हैं।
यही द्वैत शारीरिक यथार्थ और मानसिक स्थिरता गंधार कला को विशिष्ट बनाता है। यह मूर्ति यह भी स्पष्ट करती है कि गंधार कलाकारों का उद्देश्य केवल सौंदर्य प्रदर्शन नहीं था, बल्कि तपस्या और आत्मसंयम की बौद्ध अवधारणा को मूर्त रूप देना भी था।
यूनानी प्रभाव और कलात्मक पहचान
गंधार शैली की सबसे विशिष्ट विशेषता इसका यूनानी शिल्प प्रभाव है। मानव शरीर का अनुपातिक गठन, मांसपेशियों का उभार, लहरदार और घुँघराले बाल, मूँछें, यूनानी वस्त्र शैली, पैरों में जूते तथा शरीर से सटे हुए झीने वस्त्र, ये सभी तत्व इस शैली को भारतीय परंपरा से अलग पहचान देते हैं। बुद्ध का चेहरा कई बार यूनानी देवता अपोलो से साम्य रखता हुआ प्रतीत होता है, जिससे गंधार कला को ‘ग्रीको-बौद्ध’ या ‘ग्रीको-रोमन’ कला भी कहा गया।
इन मूर्तियों में प्रभामंडल प्रायः सादा और अलंकरण-रहित है, जिससे ध्यान चेहरे की संरचना और शारीरिक सौंदर्य पर केंद्रित रहता है। यही कारण है कि अनेक विद्वानों ने यह टिप्पणी की है कि गंधार की बुद्ध मूर्तियाँ अपने सूक्ष्म विस्तार के बावजूद कुछ हद तक यांत्रिक और भावनात्मक रूप से दूरी बनाए हुए प्रतीत होती हैं। भरहुत, साँची या अमरावती की मूर्तियों में जो सहजता और आत्मीयता दिखाई देती है, वह गंधार कला में अपेक्षाकृत कम है।
देवी प्रतिमाएँ और सांस्कृतिक समन्वय
बुद्ध और बोधिसत्व प्रतिमाओं के अतिरिक्त गंधार शैली में कुछ देवी-मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इनमें हारिती तथा रोमा (या एथेना) देवी की प्रतिमाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हारिती को मातृदेवी और सौभाग्य-समृद्धि की अधिष्ठात्री के रूप में पूजा जाता था, जो लोकधार्मिक विश्वासों के समावेशन को दर्शाता है। अग्रवाल के अनुसार, लाहौर संग्रहालय में सुरक्षित रोमा देवी की प्रतिमा गंधार कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक है, जिसमें यूनानी प्रतीकों के साथ भारतीय भावाभिव्यक्ति का समन्वय दिखाई देता है।
गंधार कला का मूल्यांकन और ऐतिहासिक सीमाएँ
समग्र रूप से देखा जाए तो गंधार कला शैली में शारीरिक यथार्थवाद और बौद्धिक सौंदर्यबोध की प्रधानता दिखाई देती है, जो इसे भारतीय परंपरा की भावप्रधान मूर्तिकला से भिन्न पहचान प्रदान करती है। अपने यूनानी स्वरूप के कारण यह भारतीय कला की मुख्य धारा से कुछ हद तक पृथक रही और इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी भारत तक सीमित रहा। मार्शल का यह कथन उल्लेखनीय है कि यूनानी और रोमन कलाओं ने गंधार शैली को जन्म देने के अतिरिक्त भारतीय कला पर वैसा व्यापक प्रभाव नहीं डाला, जैसा उन्होंने पश्चिमी एशिया या यूरोप में डाला।
फिर भी, गंधार कला का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं आँका जा सकता। इसका प्रभाव मध्य एशिया, चीन, कोरिया और जापान की बौद्ध कला में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मार्शल के अनुसार, गंधार की पाषाण कला का ह्रास चौथी शती ईस्वी के प्रारंभ में हो गया, किंतु इसकी विरासत एशियाई बौद्ध मूर्तिकला में लंबे समय तक जीवित रही।

मथुरा कला शैली : कनिष्क कालीन कला में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सशक्त अभिव्यक्ति
मथुरा का धार्मिक-सांस्कृतिक परिवेश
कनिष्क कालीन कला के अध्ययन में मथुरा कला शैली का महत्व केवल एक क्षेत्रीय कला केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय मूर्तिकला परंपरा के वैचारिक स्रोत के रूप में है। कुषाण काल में मथुरा उत्तर भारत का एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था, जहाँ बौद्ध, जैन और वैष्णव परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हो रही थीं। इस बहुधार्मिक परिवेश ने मथुरा की कला को एक व्यापक, असाम्प्रदायिक और समन्वयकारी स्वरूप प्रदान किया।
ईसा पूर्व प्रथम शती से ही मथुरा भक्ति आंदोलन का एक सशक्त केंद्र था। यहाँ संकर्षण, वासुदेव तथा पंचवीरों (बलराम, कृष्ण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब) की प्रतिमाओं के साथ-साथ जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी पूर्णतः विकसित हो चुकी थीं। यही पूर्ववर्ती मूर्ति परंपरा आगे चलकर बुद्ध प्रतिमा निर्माण की वैचारिक पृष्ठभूमि बनी। यदि गंधार कला में बुद्ध का स्वरूप शारीरिक यथार्थ के माध्यम से गढ़ा गया, तो मथुरा में वही बुद्ध आध्यात्मिक अनुभूति और धार्मिक भावबोध का सजीव प्रतीक बन जाता है।
बुद्ध मूर्ति निर्माण : धार्मिक माँग और ऐतिहासिक प्रमाण
वासुदेव शरण अग्रवाल का यह तर्क कि “कोई भी मूर्ति तब तक नहीं बनाई जाती जब तक उसके पीछे धार्मिक माँग न हो”, मथुरा कला की मूल आत्मा को स्पष्ट करता है। उनके अनुसार बुद्ध प्रतिमा निर्माण किसी आकस्मिक शिल्प प्रयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि यह दीर्घकालीन धार्मिक और वैचारिक विकास की परिणति थी।
कनिष्क के शासनकाल में महायान बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरूप मूर्तिकला और विहार निर्माण को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। महायान दर्शन में बुद्ध को प्रतीक मात्र न मानकर साकार, मानवीय रूप में पूज्य स्वीकार किया गया। अब बौद्ध समुदाय केवल स्तूप, चिह्न या प्रतीकों से संतुष्ट नहीं रह सकता था; उसे बुद्ध को मानव मूर्ति के रूप में देखने की आवश्यकता प्रतीत हुई। इसी धार्मिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए मथुरा के शिल्पियों ने पहले बोधिसत्व और तत्पश्चात बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किया।
मथुरा से प्राप्त अनेक बोधिसत्व प्रतिमाओं पर कनिष्क संवत् की प्रारंभिक तिथियाँ उत्कीर्ण हैं, जो यह प्रमाणित करती हैं कि मथुरा की बौद्ध प्रतिमाएँ गंधार कला से प्राचीन हैं। इसके विपरीत, गंधार मूर्तियों पर किसी भी सुविख्यात संवत् का अभाव इस तथ्य को और सुदृढ़ करता है कि बुद्ध प्रतिमा निर्माण की मूल परिकल्पना मथुरा में विकसित हुई।
प्रतिमालक्षण और भारतीय परंपरा
मथुरा की बुद्ध और बोधिसत्व प्रतिमाओं में जो प्रतिमालक्षण दिखाई देते हैं जैसे- पद्मासन, ध्यान मुद्रा, नासाग्र दृष्टि, उष्णीष और धर्मचक्र, उनका स्रोत स्पष्ट रूप से भारतीय है, न कि यूनानी या ईरानी। यदि बुद्ध मूर्तियों की उत्पत्ति गंधार में विदेशी कलाकारों द्वारा हुई होती, तो इन विशुद्ध भारतीय प्रतीकों की उपस्थिति संभव नहीं थी।
अग्रवाल महोदय ने मथुरा की बुद्ध और बोधिसत्व प्रतिमाओं का स्रोत यक्ष प्रतिमाओं को माना है, विशेषतः विशालकाय यक्ष मूर्तियों को, जिनमें मानवाकार दिव्यता की अवधारणा पहले से विद्यमान थी। इस प्रकार मथुरा कला शैली भारतीय धार्मिक चेतना की स्वाभाविक निरंतरता के रूप में सामने आती है।
शिल्पगत विशेषताएँ और भावात्मक गहराई
मथुरा से बुद्ध और बोधिसत्वों की खड़ी तथा बैठी दोनों प्रकार की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं में बुद्ध का स्वरूप एक साथ चक्रवर्ती सम्राट और योगी संन्यासी, दोनों आदर्शों को अभिव्यक्त करता है। कटरा से प्राप्त बुद्ध प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसकी चौकी पर उत्कीर्ण लेख में उसे ‘बोधिसत्व’ कहा गया है।
इस प्रतिमा में बुद्ध भिक्षु वेश में बोधिवृक्ष के नीचे सिंहासन पर विराजमान हैं। दायाँ हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है, जबकि हथेलियों और तलवों पर धर्मचक्र तथा त्रिरत्न के चिह्न अंकित हैं। दोनों ओर चँवर धारण किए हुए उपासक और ऊपर से देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा का दृश्य इस मूर्ति को केवल शिल्पकृति नहीं, बल्कि धार्मिक अनुभव का मूर्त रूप बना देता है।
गंधार मूर्तियों के विपरीत, मथुरा की प्रतिमाएँ आध्यात्मिकता और भावप्रधानता से परिपूर्ण हैं। यहाँ यथार्थवाद गौण और आंतरिक अनुभूति प्रधान है।
कलात्मक विविधता और बाह्य प्रभावों का आत्मसात
मथुरा के शिल्पियों ने ईरानी और यूनानी कला के कुछ प्रतीकों को अवश्य ग्रहण किया, किंतु उन्हें पूर्णतः भारतीय संवेदना में ढाल दिया। यही कारण है कि कुछ बुद्ध प्रतिमाओं में मूँछें या पैरों में चप्पल दिखाई देती हैं, परंतु उनके चेहरे की शांति और मुद्राओं की आध्यात्मिकता भारतीय परंपरा से जुड़ी रहती है।
यहाँ केवल बौद्ध नहीं, बल्कि हिंदू और जैन प्रतिमाओं का भी व्यापक निर्माण हुआ। विष्णु, शिव, सूर्य, कुबेर, नाग, यक्ष तथा जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ मथुरा के कलाकारों की असाम्प्रदायिक दृष्टि को दर्शाती हैं। जैन तीर्थंकरों की खड़ी (कायोत्सर्ग) और बैठी (पद्मासन) प्रतिमाओं पर अंकित ‘श्रीवत्स’ चिह्न उनकी धार्मिक पहचान को स्पष्ट करता है।

शाही प्रतिमा और राजनीतिक अभिव्यक्ति
मथुरा से प्राप्त कनिष्क की सिररहित प्रतिमा इस शैली की एक विशिष्ट उपलब्धि है, जो कुषाण शासक की शाही गरिमा और राजनीतिक वैधता को कलात्मक रूप में व्यक्त करती है। इस प्रतिमा पर उत्कीर्ण ‘महाराज राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क’ लेख कुषाण शासक की दैवी सत्ता और राजनीतिक वैधता को दर्शाता है। घुटने तक का कोट, भारी जूते, एक हाथ में गदा और दूसरे में तलवार, ये सभी तत्व शाही गरिमा और साम्राज्यवादी शक्ति के प्रतीक हैं। इस प्रतिमा में मानव शरीर का यथार्थ चित्रण होते हुए भी यूनानी प्रभाव नगण्य है, जो मथुरा कला की स्वतंत्रता को रेखांकित करता है।
मथुरा कला का मूल्यांकन और ऐतिहासिक महत्व
अग्रवाल के शब्दों में, “अपनी मौलिकता, सौंदर्य और रचनात्मक विविधता के कारण मथुरा कला का स्थान भारतीय कला में अत्यंत ऊँचा है।” मथुरा की कलाकृतियाँ सारनाथ, श्रावस्ती और अन्य केंद्रों तक पहुँचीं और आगे चलकर गुप्तकालीन कला की आधारशिला बनीं।
यदि गंधार कला ने तकनीकी यथार्थवाद दिया, तो मथुरा कला ने भारतीय आध्यात्मिक आत्मा प्रदान की। यही कारण है कि कनिष्क कालीन कला का सबसे स्थायी और व्यापक प्रभाव मथुरा परंपरा के माध्यम से भारतीय कला की मुख्यधारा में दिखाई देता है।
निष्कर्ष
समग्र दृष्टि से देखने पर स्पष्ट होता है कि कनिष्क कालीन कला भारतीय कला इतिहास का वह चरण है जहाँ धार्मिक विचार, राजनीतिक संरक्षण और सांस्कृतिक संपर्क एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इस काल में मूर्तिकला का विकास किसी आकस्मिक सौंदर्यबोध का परिणाम नहीं था, बल्कि वह महायान बौद्ध धर्म की दार्शनिक आवश्यकताओं और सामाजिक अपेक्षाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। बुद्ध और बोधिसत्व प्रतिमाओं का उद्भव इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में संभव हुआ।
गंधार कला शैली ने भारतीय कला को यथार्थवादी तकनीक, शारीरिक संरचना की वैज्ञानिक समझ और बाह्य रूपांकन की नवीन दृष्टि प्रदान की। यद्यपि इसकी भावात्मक गहराई सीमित रही, फिर भी मध्य एशिया और पूर्वी एशिया की बौद्ध कला पर इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा। इसके विपरीत, मथुरा कला शैली ने भारतीय मूर्तिकला को वह आध्यात्मिक आत्मा दी, जिसने आगे चलकर सारनाथ, अमरावती और गुप्तकालीन कला के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। मथुरा की प्रतिमाओं में निहित चक्रवर्ती-योगी आदर्श भारतीय दर्शन की उस समन्वयकारी प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करता है, जो लौकिक सत्ता और आध्यात्मिक मुक्ति के बीच संतुलन स्थापित करती है।
इस प्रकार, यदि गंधार और मथुरा को अलग-अलग नहीं बल्कि परस्पर पूरक परंपराओं के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कनिष्क कालीन कला भारतीय कला की मुख्यधारा के निर्माण में एक संक्रमणकालीन नहीं, बल्कि निर्माणकारी युग थी। इसी काल में भारतीय कला ने पहली बार वैश्विक संवाद स्थापित किया, बिना अपनी मूल आत्मा को त्यागे। यही इसकी ऐतिहासिक विशेषता है और यही कारण है कि कनिष्क कालीन कला आज भी भारतीय कला इतिहास में एक मानक संदर्भ के रूप में प्रतिष्ठित है।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
