सातवाहन काल का सामाजिक आर्थिक और धार्मिक जीवन
दक्षिणापथ के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए सातवाहन काल का सामाजिक आर्थिक और धार्मिक जीवन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्ययन विषय है। इस सामाजिक-धार्मिक संरचना को समझने के लिए यह भी आवश्यक है कि सातवाहनों के राजनीतिक उभार और भू-क्षेत्रीय विस्तार की प्रक्रिया को पहले देखा जाए, जिसके लिए सातवाहन साम्राज्य का उदय और विस्तार एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान करता है।
ईसा पूर्व पहली शताब्दी से ईसा की तीसरी शताब्दी तक फैले इस काल में दक्कन में राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक पुनर्गठन, धार्मिक सहिष्णुता और आर्थिक विस्तार की अनेक प्रक्रियाएँ एक साथ विकसित हुईं। नासिक, नानेघाट, कार्ले और कन्हेरी के अभिलेखों के साथ-साथ रोमन ग्रंथ पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी (Periplus of the Erythraean Sea) तथा टालमी की जियोग्राफिया (Geographia) इस काल के स्वरूप को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन सभी स्रोतों पर आधारित विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सातवाहन युग दक्कन के इतिहास में एक संरचनात्मक संक्रमण और समन्वयकारी विस्तार का काल था।
सातवाहन काल का सामाजिक जीवन
वर्णाश्रम संरचना का विकास और उसका दक्षिणापथीय अनुकूलन
सातवाहन काल के समाज की संरचना का मुख्य आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी, परंतु दक्कन में इसका स्वरूप उत्तर भारत की तुलना में अधिक अनुकूलित और कम कठोर था। परम्परागत चारो वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में ब्राह्मणो का स्थान सर्वोपरि था। सातवाहन नरेश स्वयं ब्राह्मण थे। नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र शातकर्णि को “अद्वितीय ब्राह्मण” तथा “वर्णाश्रम धर्म का पुनर्स्थापक” कहा गया है, जिसने समाज में वर्णाश्रम धर्म को प्रतिष्ठित करने तथा वर्णसंकरता को रोकने का प्रयास किया था। यह स्पष्ट करता है कि सातवाहन राज्य ने वर्णव्यवस्था को राजनीतिक शक्ति के एक उपकरण के रूप में भी इस्तेमाल किया। गौतमीपुत्र शातकर्णि की नीति-निर्माण क्षमता, प्रशासनिक दृष्टिकोण और दक्कन समाज पर उनके प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण गौतमीपुत्र शातकर्णि: सातवाहन सत्ता का पुनरुत्थान लेख में देखा जा सकता है, जो इस सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करता है।
फिर भी यह व्यवस्था व्यवहार में पूर्णतः कठोर नहीं थी। अभिलेखों से ज्ञात अंतर्जातीय विवाह (शातकर्णि प्रथम–नागनिका; पुत्तलमावी–रुद्रदामन की पुत्री) बताते हैं कि सामाजिक संरचना में यथेष्ट लचीलापन विद्यमान था। इसका एक कारण यह भी था कि दक्षिण भारत में आर्य-वैदिक वर्णव्यवस्था का प्रवेश अपेक्षाकृत देर से हुआ और स्थानीय समाज, विशेषकर कृषि एवं शिल्प आधारित जाति-व्यवस्थाओं की पूर्व परंपराएँ प्रभावी बनी रहीं।
जाति-पेशागत समूहों का विस्तार और श्रेणी-आधारित सामाजिक संगठन
सातवाहन समाज का एक विशिष्ट तत्व व्यावसायिक जातियों का सुदृढ़ संगठन था। पुरातात्त्विक व अभिलेखीय साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि कुम्भकार, चर्मकार, स्वर्णकार, धानिक, गंधिक, कासाकार, कोलिक (बुनकर), काष्ठशिल्पी आदि पेशागत समुदायों ने ‘श्रेणी’ (Guild) नामक संगठन विकसित कर लिया था।
नासिक और कार्ले अभिलेखों में उल्लेख मिलता है कि श्रेणियाँ केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक व धार्मिक जीवन में भी स्थान रखती थीं। उनका कार्यालय ‘निगमसभा’ कहलाता था और श्रेणी प्रमुख ‘श्रेष्ठिन्’। श्रेणियों के आंतरिक नियमों को ‘श्रेणी-धर्म’ कहा गया है, जिसे राज्य मान्यता देता था, यह आर्थिक स्वायत्तता का स्पष्ट प्रमाण है।
यह संगठनात्मक ढाँचा दक्कन समाज में जाति-पेशागत समूहों को स्थिरता प्रदान करता था। श्रेणियाँ न केवल उत्पादन नियंत्रित करती थीं, बल्कि ऋण, जमा, ब्याज और दान कार्यों में भी सक्रिय थीं।
शकों, यवनों और पार्थियों का सामाजिक समावेशन
सातवाहन काल बाहरी जातियों के भारतीयकरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पश्चिमोत्तर भारत से आए शक, यवन और पार्थियन समुदाय दक्कन के समाज में घुलमिल गए। अभिलेखों में उनके भारतीयीकृत नाम धर्मदेव, ऋषभदत्त, अग्निवर्मन् स्पष्ट संकेत देते हैं कि विदेशी समुदाय दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक पैटर्न में पूर्णतः समाहित हो चुके थे। हिन्दुओं के समान ही वे तीर्थ-यात्रा पर जाते थे, यज्ञों का अनुष्ठान करते थे तथा ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते थे।
यह सामाजिक समावेशन आर्थिक और राजनीतिक कारणों से भी प्रेरित था। विदेशी व्यापारी दक्कन के व्यापारिक मार्गों में सक्रिय थे और समुद्री व्यापार का बड़ा भाग उनके हाथों में था। इससे स्थानीय समाज और विदेशी समुदायों के बीच अंतर्संपर्क स्वाभाविक हो गया।
सातवाहन काल में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति
सातवाहन युग में स्त्रियों की स्थिति उल्लेखनीय रूप से उच्च थी। नागनिका ने अपने पति की मृत्यु के बाद शासन का संचालन किया था। बलश्री ने अपने पुत्र गौतमीपुत्र के साथ मिलकर शासन किया था। नानेघाट (नानाघाट) अभिलेख में नागनिका का यज्ञों की आयोजक, दानदात्री और राजकुल की प्रमुख सदस्य के रूप में वर्णन यह सिद्ध करता है कि स्त्रियाँ केवल घरेलू नहीं बल्कि राजनीतिक व धार्मिक क्रियाओं में सक्रिय थीं।
गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख, जो अपने पुत्र गौतमीपुत्र शातकर्णि की प्रशस्ति के साथ-साथ उसकी नीतियों का समर्थन करता है, दर्शाता है कि स्त्रियाँ राज्य-नीति के निर्माण में भी परोक्ष भूमिकाएँ निभाती थीं।
सातवाहन राजाओं के नाम का मातृप्रधान होना स्त्रियो की सम्मानपूर्ण सामाजिक स्थिति का सूचक माना जा सकता है। इस समय के अभिलेखों में स्त्रियों द्वारा प्रभूत दान दिये जाने का उल्लेख है। इससे ऐसा लगता है कि वे सम्पत्ति की भी स्वामिनी होती थी। मूर्तियो में हम उन्हें अपने पतियों के साथ बौद्ध प्रतीको की पूजा करते हुये; सभाओ में भाग लेते हुये तथा अतिथियों का सत्कार करते हुये पाते है। उनके सार्वजनिक जीवन को देखते हुये ऐसा स्पष्ट है कि वे पर्याप्त शिक्षित होती थी तथा पर्दाप्रथा से अपरिचित थी।
सातवाहन काल का धार्मिक जीवन
वैदिक परंपरा का पुनरुत्थान और राज्य-प्रायोजित यज्ञ
सातवाहन शासक वैदिक धर्म के अनुयायी थे और उनका राजनीतिक वैधता-निर्माण भी वैदिक अनुष्ठानों पर आधारित था। नानेघाट के अभिलेख में शातकर्णि प्रथम द्वारा सम्पन्न किए गए राजसूय, अश्वमेध, वाजपेय और अग्निष्टोम जैसे वैदिक यज्ञों का व्यवस्थित विवरण मिलता है। इस अवसर पर उसने गौ, हस्ति, भूमि आदि दक्षिणा स्वरूप प्रदान की थी। उसने अपने एक पुत्र का नाम वेदश्री रखा तथा संकर्षण, वासुदेव, इन्द्र, सूर्य और चन्द्र की पूजा की।
दक्षिण में वैदिक यज्ञों के इतने व्यापक आयोजन का यह पहला प्रत्यक्ष प्रमाण है। इससे पता चलता है कि सातवाहन शासन ने वैदिक परंपरा के दक्षिणापथीय विस्तार को नई दिशा दी।
शासकों ने ब्राह्मणों को भूमि, स्वर्ण, गौ, धातु और कृषि-उत्पाद दान किए। ‘गाथा सप्तशती’ में शिव, गौरी, कृष्ण, इन्द्र और पशुपति की पूजा का उल्लेख मिलता है, जिससे शैव, वैष्णव और गौरी-पूजा की परंपराओं का फैलाव समझा जा सकता है। गौतमीपुत्र शातकर्णि को नासिक प्रशस्ति में ‘वेदों का आश्रय’ तथा ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ कहा गया है। सातवाहन लेखों में शिव पालित, शिवदत्त, कुमार आदि नाम मिलते है जिनसे शिव तथा स्कन्द की पूजा की सूचना मिलती है। इसी प्रकार विष्णुपालित जैसे नामो से विष्णु-पूजा का संकेत मिलता है।
बौद्ध धर्म का उत्कर्ष और सातवाहन संरक्षण
स्वयं ब्राह्मण होते हुये भी सातवाहन नरेश अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु थे। सातवाहन काल बौद्ध धर्म के लिए दक्षिण भारत का वास्तविक स्वर्णयुग था। उन्होंने अपने शासन में बौद्ध धर्म को भी सरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान किया था। ईसा की प्रथम दो शताब्दियो-जो सातवाहनों के पुनरुत्थान का काल था, इस में इस धर्म का सर्वाधिक विकास हुआ। यह दो सौ वर्षों का काल दक्षिण में बौद्ध धर्म के लिये सर्वाधिक गौरवशाली युग था। इस समय पश्चिमी दकन में क्षहरातों तथा सातवाहनों में विहारों का निर्माण कराने के लिये पारस्परिक होड सी लग गयी। सातवाहन काल में दकन की सभी गुफाये बौद्ध धर्म से ही सम्बन्धित है। कार्ले तथा नासिक में अनेक गुहा-विहारों तथा गुहा चैत्यो का निर्माण हुआ।
कार्ले का चैत्यगृह, जिसकी वास्तुकला में स्तंभ-शिल्प, छतों की नक्काशी और अपरांत स्तूप व्यवस्था स्पष्ट झलकती है, सातवाहन संरक्षण का उत्तम उदाहरण है। इस चैत्य का निर्माण केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि यह व्यापारियों, समुद्री यात्रियों और बौद्ध संघों के लिए संपर्क-स्थल भी था, अर्थात् धार्मिक वास्तुकला और आर्थिक जीवन गहराई से जुड़े थे।
बौद्ध सम्प्रदायों का विकास और संघ-व्यवस्था
इस काल में बौद्ध धर्म में कई सम्प्रदाय सक्रिय थे – महासांघिक, भद्रायनीय, धम्मोत्तरीय आदि। नासिक और कार्ले अभिलेख बताते हैं कि अनेक विहारों में कई सम्प्रदायों के भिक्षु एक साथ रहते थे, जिससे धार्मिक सहिष्णुता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।
संघ को दान देने वालों में व्यापारी, गिल्ड, स्त्रियाँ और स्थानीय कृषि-समुदाय शामिल थे। इससे बौद्ध धर्म की सामाजिक पहुँच का अनुमान मिलता है।
प्रतीक-पूजा, स्तूप-परंपरा और तीर्थयात्राएँ
बुद्ध की मूर्ति-पूजा अभी विकसित हो ही रही थी, पर प्रतीक-पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी, धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, स्तूप, बुद्ध-चरणचिह्न और धातु-अवशेष इस काल के प्रमुख प्रतीक थे।
बौद्ध-तोर्थ स्थलो की यात्रा इस समय की एक सामान्य प्रथा थी। इस समय बौद्ध संघ के अन्तर्गत कई सम्प्रदाय हो गये थे, जैसे-भद्रायनीय (ये नासिक तथा कन्हेरी में रहते थे) धम्मोत्तरीय (ये मोपारा में निवास करते थे) तथा महासांघिक (कार्ले तथा उसके आस-पास निवास करते थे)। परन्तु इन सम्प्रदायों के बीच आपसी कलह अथवा विद्वेष की भावना नहीं थी और कभी-कभी एक ही विहार में कई सम्प्रदाय के भिक्षु निवास करते थे।
बौद्ध तीर्थयात्राएँ दक्कन के व्यापारिक मार्गों की गतिविधियों से जुड़ी हुई थीं, क्योंकि कारवाँ मार्गों में स्थित विहार व्यापारिक यात्राओं के लिए विश्राम-स्थल का काम करते थे।
सातवाहन काल का आर्थिक जीवन
कृषि व्यवस्था, भूमि-स्वामित्व और कर-संरचना
सातवाहन युग दक्षिण भारत के इतिहास में समृद्धि एवं सम्पन्नता का युग था। इस काल के लेखों में भूमि तथा ग्राम दान में दिये जाने के अनेक उल्लेख प्राप्त होते है। इससे भूमि को महत्ता प्रतिपादित होती है। राजा के पास अपनी निजी भूमि होती थी। किसान भी भूमि के स्वामी होते थे। यदि राजा किसी दूसरे की भूमि का दान करना चाहता था तो उसे उसके स्वामी से खरीदना पड़ता था।
राजा कृषको के उपज का 1/6 भाग कर के रूप में प्राप्त करता था, हालांकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन संभव था। सिंचाई के लिए टैंक-प्रणाली (जलाशय-आधारित सिंचाई) का निर्माण सातवाहन शासन में तेज़ी से हुआ, जिससे कृषि की विश्वसनीयता बढ़ी।
श्रेणी-व्यवस्था (Guild Economy) और दक्षिण भारत में प्रौद्योगिकीय विभाजन
कृषि की उन्नति के साथ ही साथ व्यापार-व्यवसाय की बहुत अधिक प्रगति हुई। मिलिन्दपञ्ह में 75 व्यवसायों का उल्लेख हुआ है जिनमें लगभग 60 प्रकार के व्यवसाय, विभिन्न कला-कौशलो से सबद्ध थे। महावस्तु में राजगृह के पास निवास करने वाले 36 प्रकार के शिल्पियों का विवरण दिया गया है। तत्कालीन लेखों में भी कुम्भकार, लोहार, स्वर्णकार, धानिक (अनाज के व्यवसायी), बंशकर (बांस का काम करने वाले), तिलपिसक (तेली), चर्मकार, कासाकार (कासे के बर्तन बनाने वाले), गंधिक (गन्धी), कोलिक (बुनकर) आदि व्यवसायियों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक व्यावसायिक संघ की अलग-अलग श्रेणी (Guild) होती थी जिसका प्रधान ‘श्रेष्ठिन्’ कहा जाता था। श्रेणी के कार्यालय को ‘निगमसभा कहते थे। श्रेणियों के अपने अलग व्यापारिक नियम होते थे जिन्हें ‘श्रेणी धर्म’ कहा जाता था। इन्हें राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त थी। वे बैंको का भी काम करती थी और इस रूप में रुपया जमा करती तथा ब्याज पर धन उधार देती थीं। नासिक लेख से पता चलता है कि गोवर्धन में बुनकरों की एक श्रेणी के पास 2000 काहापणो (कार्षापणों) को एक अक्षयनिधि एक प्रतिशत मासिक ब्याज की दर पर जमा को गयी थी। इसी प्रकार एक अन्य निधि 1000 काहापणों की थी जिस पर 3/4 प्रतिशत मासिक ब्याज देय था। श्रेणियाँ अपने नाम से दान दे सकती थी।
सातवाहन श्रेणियाँ उपमहाद्वीप की सर्वाधिक विकसित गिल्ड प्रणाली थीं। श्रेणियाँ न केवल शिल्प उत्पादन नियंत्रित करती थीं, बल्कि व्यापार, ब्याज, ऋण, और दान के क्षेत्रों में भी सक्रिय थीं। नासिक अभिलेख से ज्ञात बुनकर संघ, दक्षिण भारतीय वित्तीय जीवन की परिपक्वता का संकेत देती हैं।
यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि गिल्डें आर्थिक स्वायत्तता रखती थीं, और राज्य केवल नियमन का कार्य करता था, प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं। इससे दक्कन का व्यापारिक उत्पादन अत्यंत स्थिर हुआ।
मुद्रा-प्रचलन और सिक्का-व्यवस्था
व्यापार-व्यवसाय में चौदी एवं ताँबे के सिक्कों का प्रयोग होता था जिन्हे ‘कार्यापण’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त सातवाहनों ने सीसे के भी सिक्के ढलवाये क्योकि दक्षिण में चाँदी अनुपलब्ध होने से सीसा ही एकमात्र विकल्प था। ये सिक्के आर्थिक लेन-देन में अधिक उपयुक्त थे। कई सिक्कों पर आकृतियाँ विशेषकर जहाज, यह दर्शाती हैं कि समुद्री व्यापार सातवाहन अर्थव्यवस्था की मुख्य धुरी था।
आंतरिक व्यापार, शहरीकरण और दक्कन का आर्थिक विस्तार
सातवाहन काल में आन्तरिक तथा वाह्य दोनों ही व्यापार उन्नति पर था। देश के भीतर पेठन (प्रतिष्ठान), तगर, जुन्नार, करहाटक, नासिक, वैजयन्ती, धान्यकटक, विजयपुर आदि अनेक व्यापारिक नगर थे। वे एक दूसरे से चौड़ी सड़कों द्वारा जुड़े हुये थे। एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाने एवं ले आने की सुन्दर व्यवस्था थी। सड़क-मार्गों के सुदृढ़ नेटवर्क से दक्कन के पूर्व और पश्चिम का आर्थिक एकीकरण हुआ।
चार-चक्के वाले वाहनों से माल परिवहन और व्यापारिक कारवाँ दक्कन की आर्थिक गतिशीलता को दर्शाते हैं। पेरीप्लस के अनुसार इन क्षेत्रों की जनसंख्या घनी, समृद्ध और व्यापार-उन्मुख थी।
समुद्री व्यापार और इंडो–रोमन संपर्क
साम्राज्य के पूर्वी तथा पश्चिमी किनारों पर अनेक प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। टालमी और पेरीप्लस के विवरण सातवाहन काल के समुद्री व्यापार की व्यापकता का प्रमुख प्रमाण हैं। टालमी गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के डेल्टा के बीच स्थित अनेक बन्दरगाहों का उल्लेख करता है तथा बताता है कि इन स्थानों से मलयद्वीप तथा पूर्वी द्वीपों के लिये जहाज जाते थे। पूर्वी दकन के प्रसिद्ध बन्दरगाह कन्टकोस्सील, कोदूर, अल्लोसिंगे आदि थे। पश्चिमी दकन में बेरीगाजा (भड़ौच), सोपारा, कल्यान जैसे प्रसिद्ध बन्दरगाह स्थित थे। यहाँ से पश्चिमी देशों के लिये जहाज आते-जाते थे। पहली शताब्दी ईस्वी में एक यूनानी नाविक हिप्पोलस ने भारतीयों को अरब सागर में चलने वाली मानसूनी हवाओं के विषय में बताया। फलस्वरूप भारतीय व्यापारी अरब सागर होकर पश्चिमी एशिया के बन्दरगाह पर पहुँचने लगे। भारत का व्यापार मिस्र, रोम, चीन तथा पूर्वी द्वीप समूहों के साथ होता था। सातवाहन नरेशों के कुछ सिक्को पर ‘दो पतवारो नाले जहाज’ के चित्र मिलते है। यह समुद्री व्यापार के विकसित होने का सूचक है। दकन से रोम के निवासी अपने लिये रत्न, मलमल तथा विलासिता की सामग्रियाँ प्राप्त करते और इनके बदले में मुँह-माँगा सोना देते थे। भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओ में रेशमी कपड़े तथा मलमल, चीनी, इलायची, लौंग, हीरे, मानिक, मोती आदि थी। आयात की वस्तुओ में रोमन मदिरा, ताँबा, राँगा, सीसा, दवायें आदि प्रमुख थीं। यह व्यापार भारत क लिये लाभकारी था। इस व्यापार के फलस्वरूप सातवाहन साम्राज्य आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध बन गया। समुद्री व्यापार इतना व्यापक था कि रोमन स्वर्ण-निक्षेप भारत में बड़ी मात्रा में एकत्र हो गए, यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर रोमन व्यापार के प्रभाव का स्पष्ट संकेत है।
जनसंख्या और नगरीय विकास
पेरीप्लस से पता चलता है कि सातवाहन साम्राज्य के पूर्वी तथा पश्चिमी भागों की जनसंख्या सघन थी तथा लोग समृद्धिशाली थे। चार पहिये वाले गाड़ियो में पैठन से बहुत अधिक मात्रा में इन्द्रगोप मणि, तगर से मलमल तथा अन्य वस्त्र पश्चिमी भाग में स्थित व्यापारिक नगरों में पहुँचते थे तथा वहां से उन्हें भड़ौच भेजा जाता था। पश्चिमी देशो से मालवाहक जहाज भी भड़ौच पहुँचते थे। भड़ौच से स्थल मार्गों द्वारा सामान अन्य स्थानों में भेजा जाता था। इस प्रकार भड़ौच इस काल का प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय बन्दरगाह एवं व्यापारिक केन्द्र था।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सातवाहन काल का सामाजिक आर्थिक और धार्मिक जीवन दक्कन की सांस्कृतिक संरचना का एक समन्वित व परिपक्व रूप प्रस्तुत करता है। सामाजिक स्तर पर वर्णाश्रम, पेशागत संघटन और स्त्री-स्थिति का विकास स्पष्ट दिखाई देता है; धार्मिक क्षेत्र में वैदिक परंपरा और बौद्ध धर्म का समानांतर उत्कर्ष देखने को मिलता है; और आर्थिक संरचना में कृषि, श्रेणी-व्यवस्था, मुद्रा-प्रचलन तथा इंडो-रोमन व्यापार का अद्वितीय विस्तार इस युग को दक्षिण भारत का सर्वाधिक समृद्ध काल सिद्ध करता है। इस प्रकार सातवाहन युग का सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक ढाँचा दक्कन के ऐतिहासिक विकास की स्थिर रीढ़ बन गया।
Vivek Singh is the founder of Tareek-e-Jahan, a Hindi history blog offering evidence-based and exam-oriented perspectives on Indian history.
