गौतमीपुत्र शातकर्णि: सातवाहन साम्राज्य का पुनरुत्थान और भारत के प्राचीन इतिहास का निर्णायक अध्याय

सातवाहन वंश का संक्रमण काल: शातकर्णि प्रथम से गौतमीपुत्र शातकर्णि तक

 

शातकर्णि प्रथम के बाद सातवाहन वंश लगभग एक शताब्दी तक उस प्रकार के राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक विखंडन और बाहरी दबाव से गुजरता है जिसने उसके संपूर्ण राजनीतिक ढांचे को गहरे स्तर तक क्षतिग्रस्त कर दिया। पुराणों में इस अवधि के 10 से 19 राजाओं का उल्लेख भले मिलता हो, परंतु इन राजाओं में से अधिकांश इतिहास के धुंधले पृष्ठों में विलीन हो चुके हैं। हमें जिन तीन शासकों आपिलक, कुन्तल शातकर्णि तथा हाल का स्पष्ट प्रमाण मिलता है, वे भी इस संक्रमण काल के अस्पष्ट कैनवास में सीमित रोशनी भरते हैं। आपिलक के तांबे के सिक्के मध्य प्रदेश क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं, जो न केवल उनके राजनीतिक अधिकार क्षेत्र की सीमा का संकेत देते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि सातवाहन सत्ता कभी मध्य भारतीय भूभाग में भी अपने प्रभाव का विस्तार कर चुकी थी। कुन्तल शातकर्णि का उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र में मिलता है, जो यह दर्शाता है कि सातवाहन शासक न केवल राजनीतिक सत्ता, बल्कि संस्कृति और सामाजिक जीवन में भी अपना स्थान बनाए हुए थे।

यदि प्रारंभिक सातवाहन राजाओं में शातकर्णि प्रथम युद्ध के क्षेत्र में सर्वोच्च थे, तो शांति काल में हाल सबसे महान थे। हाल का व्यक्तित्व और योगदान इस संक्रमण काल की सांस्कृतिक धारा को समझने में विशेष महत्त्व रखता है। प्राकृत साहित्य में उनकी अमिट छाप के कारण वे सातवाहन इतिहास में विशिष्ट स्थान प्राप्त करते हैं। उनकी प्राकृत भाषा में गाथासप्तशती नामक एक मुक्तक काव्य संग्रह की रचना न केवल तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रेमाभिव्यक्ति की परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती है, बल्कि दक्कन क्षेत्र की भावनात्मक और साहित्यिक चेतना के विकास को भी उजागर करती है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और शर्ववर्मन के कातन्त्र का हाल के दरबार से संबंध यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक शक्ति भले कमजोर हो चुकी थी, परंतु सातवाहन दरबार में सांस्कृतिक उत्थान और बौद्धिक संरक्षण की परंपरा जीवित थी। यह वह समय था जब दक्कन ज्ञान और साहित्य की जीवंत प्रयोगशाला बना हुआ था, एक ऐसा बौद्धिक वातावरण जिसने आगे चलकर सातवाहन पुनरुत्थान के लिए सांस्कृतिक आधार तैयार किया।

किंतु यही वह समय भी था जब राजनीतिक दृष्टि से सातवाहन शक्ति का क्षरण प्रारंभ हो चुका था। शकों विशेषतः क्षहरात शाखा का पश्चिमी भारत पर आक्रमण सातवाहन इतिहास की दिशा को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। मालवा, महाराष्ट्र, काठियावाड़ और पश्चिमी तटीय प्रदेश सातवाहनों से निकलकर शकों के अधीन चले गए। यह केवल क्षेत्रीय हानि नहीं थी; यह पश्चिमी भारत के व्यापार मार्गों, बंदरगाहों और आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण खोने का संकट भी था। सातवाहनों का केंद्र, जो कभी प्रतिष्ठान (पैठण) के आसपास सुदृढ़ था, अब अस्थिर और विस्थापित हो चुका था। व्यापार मार्गों का नियंत्रण क्षहरातों के हाथों में चला गया, जिससे सातवाहन राजकोष की आय तेजी से घटने लगी। संभव है कि इसी कालखंड में सातवाहनों ने परिस्थितियोंवश शकों की अधीनता भी स्वीकार कर ली हो।

यह लगभग एक संपूर्ण शताब्दी, प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध से लेकर प्रथम शताब्दी ईस्वी के आरंभ तक, सातवाहन वंश के लिए “अपमान” और “हास” का काल माना जा सकता है। यहीं वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बनती है जो गौतमीपुत्र शातकर्णि के उदय को असाधारण महत्त्व प्रदान करती है। एक साम्राज्य जब अत्यधिक पतन और विखंडन के कगार पर पहुँच जाता है, तब उसका पुनरुत्थान केवल राजनीतिक शक्ति का विषय नहीं रहता, वह सांस्कृतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया बन जाता है। गौतमीपुत्र का उदय इसी व्यापक ऐतिहासिक ऊर्जा का परिणाम था।

गौतमीपुत्र शातकर्णि के उदय से पहले सातवाहन सत्ता कैसे विकसित हुई,  सातवाहन साम्राज्य का उदय और विस्तार
में विस्तार से पढ़ें।

 

सातवाहन सत्ता का पुनरुद्धार: गौतमीपुत्र शातकर्णि का ऐतिहासिक उदय

 

पुराणों में वर्णित सातवाहन राजवंश की सूची में गौतमीपुत्र शातकर्णि तेईसवें शासक के रूप में उल्लिखित हैं, परंतु इतिहास उन्हें केवल एक राजा के रूप में नहीं, बल्कि सातवाहन सत्ता के “दूसरे संस्थापक” के रूप में देखता है। उनके पिता शिवस्वाति और माता गौतमी बलश्री का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है, विशेषकर नासिक गुहा अभिलेखों में, जो उनके जीवन, शासन और सैन्य उपलब्धियों के बारे में लगभग संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनके शासन से प्राप्त तीन प्रमुख अभिलेख, नासिक के 18वें और 24वें वर्ष के दान अभिलेख तथा कार्ले का अभिलेख, इतिहासलेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उनका शासन सातवाहन इतिहास की सबसे निर्णायक और उन्नत अवधि थी।

गौतमीपुत्र शातकर्णि की राजनीतिक भूमिका को समझने के लिए सातवाहन साम्राज्य के प्रमाणिक स्रोतों पुराण, अभिलेख और सिक्कों की गहन व्याख्या अत्यंत आवश्यक है। इनके विस्तृत अध्ययन के लिए सातवाहन इतिहास के स्रोत और उनकी प्रमाणिकता पर आधारित लेख देखा जा सकता है।

राज्यारोहण के आरंभिक वर्षों में गौतमीपुत्र ने एक विस्तृत और संगठित सैन्य तैयारी की। सातवाहनों की पूर्व की असफलताओं और क्षेत्रीय क्षरण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से यह समझ लिया था कि क्षहरातों और शकों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के बिना सातवाहन सत्ता पुनर्स्थापित नहीं हो सकती। इसलिए अपने आरंभिक लगभग 16 वर्षों तक उन्होंने सेना के पुनर्गठन, विस्तार और प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया। यह वह चरण था जिसने आगे चलकर नहपान से हुए निर्णायक युद्ध की नींव रखी।

गौतमीपुत्र शातकर्णी के सिक्के
गौतमीपुत्र शातकर्णी के सिक्के, ये सिक्के नहपान के चाँदी के सिक्कों पर पुनः अंकित किए गए थे। (साभार: विकिपीडिया)

गौतमीपुत्र शातकर्णि और क्षहरात नहपान का निर्णायक संघर्ष: सातवाहन-क्षहरात युद्ध का चरम रूप

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि के राजनीतिक जीवन का केन्द्रीय बिंदु क्षहरात नहपान के विरुद्ध लड़ा गया वह महान युद्ध है जिसने न केवल सातवाहन सत्ता को पुनः शक्तिशाली बनाया, बल्कि पश्चिमी भारत के शक्ति-संतुलन को भी निर्णायक रूप से बदल दिया। क्षहरात नहपान, जो उस समय पश्चिमी भारत, विशेषकर उत्तर कोकण, दक्षिणी गुजरात, नर्मदा घाटी और भरुकच्छ जैसे महत्त्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्रों, पर दृढ़ता से शासन कर रहा था, सातवाहनों का सबसे गंभीर प्रतिद्वंद्वी था। नहपान के अभिलेखों तथा उसके द्वारा प्रचारित सिक्कों की प्रचुर मात्रा यह दर्शाती है कि वह रोम-भारत व्यापार के सुवर्णकाल में असाधारण आर्थिक शक्ति का स्वामी था। उसकी यह आर्थिक-सैन्य क्षमता ही सातवाहन वंश के लिए सबसे बड़ा खतरा थी।

अभिलेखों के अनुसार, गौतमीपुत्र ने अपने राज्यारोहण के सत्रहवें वर्ष में क्षहरात सत्ता पर निर्णायक आक्रमण किया। यह आक्रमण नासिक और गोवर्धन क्षेत्र के आसपास निर्णायक रूप से लड़ा गया। आपकी मूल कथा में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं था; यह सातवाहनों के लिए अपने खोए हुए सम्मान, भू-भाग और राजनीतिक प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का समग्र अभियान था। नहपान के दामाद और दक्षिणी प्रांतों के अधीक्षक उषवदात ने अनेक धार्मिक दान-लेनदेन और गुफा निर्माण करवाए थे, जिनसे उसके प्रभाव और प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है। इसलिए जब गौतमीपुत्र शातकर्णि ने युद्ध प्रारंभ किया, तो यह संघर्ष तत्कालीन पश्चिमी भारत की दो महान शक्तियों के मध्य श्रेष्ठता की निर्णायक भिड़ंत बन गया।

युद्ध का परिणाम इतिहास में गौतमीपुत्र की अद्वितीय कीर्ति के रूप में सुरक्षित है। नहपान और उषवदात की पराजय केवल सामरिक विजय नहीं थी; वह सातवाहन साम्राज्य की खोई हुई शक्ति का पुनरारोपण था। जोगलांबी (जोगलघांबी) के मुद्रा-भांड का उल्लेख इस विजय का साक्ष्य प्रदान करता है। जिसमें लगभग 13,250 मुद्राएं (सिक्के) प्राप्त हुए हैं। इन मुद्राओं में से दो-तिहाई से अधिक नहपान के सिक्के गौतमीपुत्र द्वारा पुनःअंकित (overstruck) पाए गए। यह पुनर्मुद्रण भारतीय इतिहास के उन दुर्लभ प्रमाणों में से है जो किसी विजयी शासक द्वारा पराजित शत्रु की राजनीतिक स्मृति को नष्ट कर देने का प्रतीकात्मक उपकरण बन जाता है। गौतमीपुत्र ने नहपान के सिक्कों पर अपने प्रतीकों की मुहर अंकित कर यह प्रमाणित कर दिया कि क्षहरात सत्ता न केवल पराजित हो चुकी है, बल्कि सातवाहन सर्वश्रेष्ठता अब पुनःनिर्विवाद रूप से स्थापित है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बिंदु जोड़ना आवश्यक है, कई आधुनिक इतिहासकार इस युद्ध को संपूर्ण उत्तर-पश्चिमी दक्कन के पुनर्संरचना का निर्णायक क्षण मानते हैं। रोम और अरब जगत के साथ होने वाले व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र भरुकच्छ था। आवश्यक सूत्र की टीका नियुक्ति में वर्णित एक गाथा से भी ज्ञात होता है कि सातवाहन नरेश ने नहपान की राजधानी भरुकच्छ (वर्तमान भरूच) पर आक्रमण करके उसके कोषागार पर अधिकार कर लिया। जब गौतमीपुत्र ने नहपान को हटाकर इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया, तो सातवाहन साम्राज्य को पुनः समुद्री व्यापार और समृद्धि के उन मार्गों का अधिकार प्राप्त हुआ जिन पर उसका पूर्व में प्रभुत्व था। इस आर्थिक वापसी ने सातवाहन पुनरुत्थान को स्थायी किया, यही कारण है कि नासिक प्रशस्ति में गौतमी बलश्री अपने पुत्र को “सातवाहन कुल की प्रतिष्ठा का पुनरुद्धारक” कहती हैं।

 

विजित प्रदेशों का व्यापक विस्तार: नासिक अभिलेख का भू-राजनीतिक विश्लेषण

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि के पुत्र पुलुमावी के शासनकाल के उन्नीसवें वर्ष में उत्कीर्ण नासिक गुहा अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा विजित निम्नलिखित प्रदेशों के नाम स्पष्ट रूप से मिलते हैं।

(१) ऋषिक (कृष्णा नदी का तटीय प्रदेश), (२) अस्मक (गोदावरी नदी का तटीय प्रदेश), (३) मूलक (पैठण के समीपवर्ती भाग), (४) सुराष्ट्र (दक्षिणी काठियावाड़ क्षेत्र),  (५) कुकुर (पश्चिमी राजपूताना का भाग), (६) अपरान्त (उत्तरी कोकण क्षेत्र),  (७) अनूप (नर्मदा नदी घाटी), (८) विदर्भ (बरार या विदर्भ प्रदेश), (९) आकर (पूर्वी मालवा), (१०) अवन्ति (पश्चिमी मालवा)।

गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा विजित प्रदेशों की सूची सातवाहन साम्राज्य की भू-राजनीति को समझने में अत्यंत उपयोगी है। यह सूची केवल नामों का संकलन नहीं है; यह दक्कन, पश्चिमी भारत और मध्य भारतीय पठार के उस व्यापक भूभाग की ओर संकेत करती है, जहाँ सातवाहन सत्ता एक बार फिर निर्णायक हो उठी। ऋषिक और अस्मक जैसे प्रदेश दक्कन की नदियों, कृष्णा और गोदावरी के तटीय भागों में स्थित थे, जहाँ सातवाहन प्रशासन का प्राचीन आधार स्थापित था। मूलक (प्राचीन पैठण क्षेत्र) सातवाहन राजधानी के आसपास का केंद्र था,  जिसकी पुनःप्राप्ति राजनीतिक नियंत्रण के लिए अत्यंत आवश्यक थी।

सुराष्ट्र (काठियावाड़), कुकुर (पश्चिमी राजपूताना का भाग), अपरान्त (उत्तरी कोकण क्षेत्र), अनूप (नर्मदा घाटी), आकर (पूर्वी मालवा) और अवन्ति (पश्चिमी मालवा) जैसे प्रदेशों का उल्लेख दिखाता है कि गौतमीपुत्र की विजय केवल सातवाहनों की पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं थी; उन्होंने उन क्षेत्रों को भी पुनःजीत लिया था जहाँ शक-क्षहरातों तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों का वर्चस्व स्थापित हो चुका था।

यहाँ आवश्यक है कि हम इन प्रदेशों के व्यापक सामरिक महत्त्व को समझें:

  • अपरान्त: समुद्री व्यापार मार्गों का प्रवेश-द्वार।
  • सुराष्ट्र: काठियावाड़ का रणनीतिक प्रायद्वीप, जहाजरानी और मोती व्यापार का केंद्र।
  • अनूप: नर्मदा घाटी, जो मध्य भारत का उत्तर-दक्षिण व्यापार मार्ग नियंत्रित करती थी।
  • आकर और अवन्ति: मालवा क्षेत्र, जहाँ से पश्चिमी भारत और उत्तरी भारत के बीच व्यापार होता था।
  • विदर्भ: सातवाहन सत्ता का सांस्कृतिक और राजनीतिक आधार क्षेत्र।

इन सभी प्रदेशों की पुनःप्राप्ति ने सातवाहनों की आर्थिक, सामरिक और क्षेत्रीय शक्ति को पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ किया।

सातवाहन राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी की माता रानी गौतमी बलश्री द्वारा संघ को समर्पित और निर्मित की गई नासिक की गुफा नंबर ३।
नासिक स्थित गुफा नंबर 3, गौतमीपुत्र विहार

नासिक प्रशस्ति और गौतमीपुत्र शातकर्णि का दिग्विजयी स्वभाव

 

नासिक प्रशस्ति अभिलेख गौतमीपुत्र शातकर्णि के व्यक्तित्व, पराक्रम और दिग्विजयी स्वभाव का सबसे स्पष्ट और विश्वसनीय ऐतिहासिक साक्ष्य है। अभिलेख में उल्लिखित पर्वत श्रृंखलाओं, विन्ध्य, ऋक्षवत, पारियात्र, सह्य, मलय और महेन्द्र, का उल्लेख मात्र काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं मानी जानी चाहिए। यद्यपि अभिलेखीय भाषा में परंपरागत अतिशयोक्तियाँ मिलती हैं, परंतु इन पर्वतीय सीमाओं का प्रयोग उस व्यापक भौगोलिक क्षेत्र को रेखांकित करता है जहाँ गौतमीपुत्र का सत्ता-व्याप्त प्रभाव मान्य था। जब अभिलेख में कहा जाता है कि “उनके वाहनों ने तीनों समुद्रों का जल पिया,” तो उसका आशय है कि उनका प्रभाव उत्तर में विन्ध्य से लेकर दक्षिण में सागर तटों तक विस्तृत था, एक ऐसा साम्राज्य जो दक्कन के राजनीतिक इतिहास में अभूतपूर्व माना जाता है।

गौतमीपुत्र शातकर्णि ने नासिक क्षेत्र में ‘वेणकटक’ (या ब्रेणाकटक)’ नामक एक नगर भी बसाया था। यह केवल शहरीकरण का उदाहरण नहीं है; यह दक्कन में उस शाही उपस्थिति को दर्शाता है जो प्रशासनिक स्थैर्य, व्यापारिक प्रोत्साहन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के केंद्र के रूप में कार्यरत थी। नासिक प्रशस्ति में उनका वर्णन “जिसकी विजयिनी पताका कभी पराजित नहीं हुई” जैसी उपाधियों से युक्त है, जो शास्त्रीय भारतीय राजप्रशस्ति परंपरा का हिस्सा अवश्य है, परंतु इसे केवल अलंकार समझकर खारिज करना उचित नहीं। सातवाहनों ने क्षहरातों को जिस निर्णायकता से पराजित किया, उससे उनके समकालीनों पर उनकी शक्ति का व्यापक प्रभाव पड़ा और दक्कन में एक नयी राजनीतिक-सामरिक ऊर्जा का संचार हुआ।

 

शासन व्यवस्था और प्रशासनिक पुनर्संरचना

 

आहार प्रणाली का महत्व

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि न केवल महान विजेता थे, बल्कि एक असाधारण प्रशासक भी थे। ‘आहार’ प्रणाली सातवाहन प्रशासन की मूल इकाई थी। प्रत्येक आहार का नेतृत्व एक योग्य अमात्य अथवा प्रशासनिक अधिकारी के हाथ में होता था। यह व्यवस्था न केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का संकेत देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि गौतमीपुत्र जैसे शासक, इतने विशाल साम्राज्य को संचालित करने के लिए स्थानीय प्रशासन को भी महत्व देते थे।

इतिहासकारों का मत है कि सातवाहन प्रशासन में, विशेषकर गौतमीपुत्र शातकर्णि के समय, स्थानीय प्रमुखों की स्वायत्तता सीमित कर दी गई थी, ताकि वे पुनः विद्रोह न कर सकें, जैसा कि क्षहरातों के उदय के दौर में हुआ था। अतः उनका शासन एक सुदृढ़ और नियंत्रित प्रशासनिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।

 

 कर-व्यवस्था और धर्मशास्त्रीय अनुपालन

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि ने अपने शासनकाल में निर्धनों, निर्बलों तथा दुखी लोगों के उत्थान और कल्याण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। वे एक ऐसे सम्राट थे जो अपनी प्रजा के सुख में स्वयं सुखी और दुख में दुखी हो जाते थे (प्रजा-निविषेष-सम-सुख-दुःख)। उन्होंने शास्त्रों के आदेशों और विधियों के अनुसार शासन चलाया, प्रजा पर कोई अन्यायपूर्ण या अनुचित कर नहीं लगाया। यह वक्तव्य शासन की नैतिकता के साथ-साथ उनके धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है। सातवाहन शासन ब्राह्मण-धर्म की परंपरा से गहरे रूप से प्रभावित था, जहाँ राजा को धर्मरक्षक और न्यायकर्ता माना जाता था। नासिक अभिलेख में ‘धर्मोपजित-कर-विनियोग’ का उल्लेख यह दर्शाता है कि संचित कर का उपयोग धर्म और समाज की उन्नति के लिए किया जाता था।

अनेक आधुनिक विद्वानों ने इस बात पर जोर दिया है कि सातवाहन प्रशासन का मूल उद्देश्य राजकोषीय लाभ कमाना नहीं था, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करना था, विशेषकर तब जब साम्राज्य को पुनः एकीकृत किया जा रहा था। इस दृष्टि से गौतमीपुत्र शातकर्णि की नीतियाँ एक दूरदर्शी शासक की नीतियाँ थीं।

 

धार्मिक नीति: ब्राह्मणीय परंपरा और बौद्ध उदारता का समन्वय

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि के समय दक्कन में वैदिक धर्म का पुनरुत्थान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्हें ‘आगम-आनिलय’ कहा गया है, जो वेदों और आगमों के संरक्षणकर्ता का द्योतक है। किंतु यह धारणा कि वे केवल एक रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी शासक थे, पूरी तरह सही नहीं है। उनके अभिलेखों में बौद्ध संघों को दिए गए दानों का स्पष्ट उल्लेख है, जिनमें ग्राम, भूमि और नकद धन शामिल थे।

यह समन्वय सातवाहनों की व्यापक धार्मिक नीति का आधार था। दक्कन की सामाजिक संरचना विविध जनजातीय समूहों, श्रमण परंपराओं और वैदिक धर्म के सम्मिश्रण से निर्मित थी। अतः किसी एक कठोर धार्मिक नीति का थोपना राजनीतिक रूप से भी अव्यवहार्य होता। गौतमीपुत्र की धार्मिक नीति दक्कन की सामाजिक-धार्मिक बहुलता को ध्यान में रखते हुए निर्मित थी।

उल्लेखनीय है कि सातवाहन शासक बौद्ध दान-परंपरा में इतने सक्रिय थे कि अमरावती, नासिक, कन्हेरी और कार्ले जैसे बौद्ध केंद्रों में उनके दान अभिलेख बड़ी संख्या में मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे दक्कन के सांस्कृतिक उत्थान और धार्मिक सौहार्द को प्राथमिकता देते थे।

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि का व्यक्तित्व और आदर्श चरित्र

 

ऐतिहासिक और अभिलेखीय दृष्टि से

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि की प्रतिभा बहुमुखी और बहुआयामी थी। नासिक अभिलेख में उनके व्यक्तित्व का वर्णन अत्यंत सराहनीय है। इसमें उनके शारीरिक सौष्ठव, मुखमंडल की कान्ति, उदारता, मातृभक्ति और न्यायप्रियता की सराहना की गई है। यह प्रशस्ति केवल राजनीतिक महिमा-मंडन मात्र नहीं है, बल्कि उस आदर्श राजधर्म की ओर भी संकेत करती है जिसे सातवाहन शासन सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करता था।

उनकी विशेषताएँ जैसे “प्रजा के सुख-दुःख में सहभागी होना,” “निर्भीकता प्रदान करना,” और “अपराधियों को क्षमा कर देना”, भारतीय राजपरंपरा के उच्च आदर्शों को प्रस्तुत करती हैं। आधुनिक इतिहासकार भी मानते हैं कि गौतमीपुत्र शातकर्णि के शासनकाल में राजनीतिक स्थिरता का स्तर अन्य सातवाहन राजाओं की तुलना में कहीं अधिक था, और इसके पीछे उनकी विशिष्ट व्यक्तित्व-शक्ति ही मुख्य कारण थी।

गौतमीपुत्र के सुधारों का सातवाहन समाज, अर्थव्यवस्था और धर्म पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका विस्तृत अध्ययन सातवाहन काल का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन में देखा जा सकता है।

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि के शासनकाल की तिथि-निर्धारण और ऐतिहासिक समय-सीमा

गौतमीपुत्र शातकर्णि के शासनकाल की तिथि-निर्धारण का प्रश्न इतिहासकारों के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। आपकी मूल सामग्री में अत्यंत सटीक तर्क दिया गया है, नहपान के जुन्नार अभिलेख से ज्ञात होता है कि 124 ईस्वी में वह महाराष्ट्र पर शासन कर रहा था। दूसरी ओर, गौतमीपुत्र शातकर्णि के नासिक अभिलेख से स्पष्ट है कि उन्होंने अपने राज्यारोहण के अठारहवें वर्ष में ही नहपान को पराजित कर दिया था। इसका अर्थ है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि का राज्यारोहण लगभग 106 ईस्वी के आसपास हुआ होगा।

नासिक से प्राप्त उनके 24वें वर्ष के अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि उन्होंने कम से कम 24 वर्षों तक शासन किया। इस प्रकार 106-130 ईस्वी का काल उनका संभावित शासनकाल माना जा सकता है।

आधुनिक इतिहासकार इस तिथि-निर्धारण को स्वीकार करते हैं, क्योंकि यह सातवाहन और पश्चिमी क्षत्रप अभिलेखों दोनों के साथ संगति रखता है। दक्कन के राजनीतिक इतिहास में प्रथम-तृतीय शताब्दी ईस्वी विशेष रूप से उथल-पुथल का समय था, और इसी दौर में सातवाहन-क्षत्रप संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। अतः गौतमीपुत्र शातकर्णि का शासनकाल दक्कन के राजनीतिक पुनरुत्थान के विस्तृत भूगोल में एक निर्णायक कालखंड बन जाता है।

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि के पश्चात: वासिष्ठिपुत्र पुलुमावी और सातवाहन शक्ति का पुनर्संतुलन

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि की मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी वासिष्ठिपुत्र पुलुमावी ने सातवाहन साम्राज्य की गद्दी संभाली। पुराणों में उन्हें “पुलोमावी” नाम से संदर्भित किया गया है। पुलुमावी का शासनकाल 28–29 वर्षों तक फैला हुआ माना जाता है, और इस अवधि में सातवाहन शक्ति यद्यपि स्थायी रही, परंतु उत्तरी सीमाओं पर शकों की पुनरुत्थानशीलता ने साम्राज्य पर निरंतर दबाव बनाए रखा।

पुलुमावी दो शक शासकों चष्टन तथा रुद्रदामन के समकालीन थे, इसलिए इन दोनों के साथ उन्हें संघर्ष का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप पुलुमावी को अपने कुछ महत्वपूर्ण प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा। चष्टन और रुद्रदामन के विरुद्ध संघर्ष इस काल की भू-राजनीतिक वास्तविकता को स्पष्ट करते हैं। चष्टन के सिक्कों का व्यापक प्रसार गुजरात, काठियावाड़ और पुष्कर क्षेत्र में मिलता है, जो यह दर्शाता है कि उसने पुलुमावी को इन प्रदेशों से विस्थापित कर दिया था। प्राचीन भूगोलवेत्ता टॉलेमी द्वारा चष्टन को उज्जैन (ओजेने) का शासक कहना भी उसी दिशा में संकेत करता है।

महाक्षत्रप रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख विशेष महत्त्व रखता है। इसमें वह स्पष्ट रूप से दावा करता है कि उसने दक्षिणापथ के स्वामी शातकर्णि को दो बार पराजित किया। अधिकांश इतिहासकार इस शातकर्णि को पुलुमावी ही मानते हैं। यह पराजय सातवाहनों की उत्तरी सीमाओं पर नियंत्रण के क्षरण का संकेत देती है, क्योंकि इस अवधि में कुकुर, सुराष्ट्र, अवन्ति, आकर और मरु जैसे प्रदेश शकों द्वारा पुनः अधिग्रहित कर लिए गए थे।

फिर भी, दक्कन में सातवाहन शक्ति इस अवधि में अत्यंत स्थिर बनी रही। पुलुमावी के सिक्कों का व्यापक वितरण विशेष रूप से कृष्णा नदी के मुहाने, अमरावती, बेलारी और आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में मिलता है। यह इस तथ्य का प्रमाण है कि पुलुमावी के समय सातवाहन सत्ता दक्षिण भारत में अपना प्रभाव निरंतर बढ़ाती रही। उनके सिक्कों पर अंकित “दो पतवारों वाले जहाज” का चित्र यह दर्शाता है कि सातवाहनों की समुद्री शक्ति भी इस काल में विकसित हो चुकी थी।

इसी काल में अमरावती स्तूप के सौंदर्यीकरण और विस्तार के प्रमाण मिलते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि सातवाहन कला, वास्तुकला और बौद्ध धार्मिक परंपराओं का संरक्षण पुलुमावी के समय भी जारी रहा। दक्कन की बौद्ध धरोहर का यह वह चरण है जो आगे चलकर नागार्जुनकोंडा और अमरावती जैसे सांस्कृतिक केंद्रों को विश्वप्रसिद्ध बनाता है।

 

यज्ञश्री शातकर्णि: सातवाहन वंश का अंतिम शक्तिशाली अध्याय

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि और वासिष्ठिपुत्र पुलुमावी के बाद दक्कन में सातवाहन शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई, किंतु यह पूर्णतः विलुप्त नहीं हुई। यज्ञश्री शातकर्णि वह अंतिम महान सातवाहन शासक था जिसने शकों को पुनः पराजित किया और पश्चिमी भारत के अनेक भागों पर अपना अधिकार पुनः स्थापित किया।

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले से प्राप्त उनके शासनकाल के 27वें वर्ष का एक अभिलेख, इस बात का प्रमाण है कि पूर्वी और पश्चिमी दक्कन पर उनका प्रभाव व्यापक था। नासिक और कन्हेरी से उनके शासन के क्रमशः सातवें तथा १६वें वर्ष के अभिलेख मिले हैं। जिससे उनके शासनकाल के सुदृढ़ प्रशासनिक संकेत मिलते हैं। गुजरात, काठियावाड़, मालवा और मध्य प्रदेश से प्राप्त उनके चाँदी के सिक्के पश्चिमी भारत पर उनकी आर्थिक-सामरिक पकड़ का द्योतक हैं।

यज्ञश्री शातकर्णि के शासन का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने क्षत्रप शक्ति के विरुद्ध सातवाहन प्रतिष्ठा को अंतिम बार पुनर्जीवित किया। यदि उनके पश्चात योग्य उत्तराधिकारी मिल जाते, तो संभव था कि सातवाहन साम्राज्य कुछ और दशकों तक अखंड बना रहता।

 

सातवाहन साम्राज्य का पतन: विघटन के कारक और ऐतिहासिक निष्कर्ष

 

यज्ञश्री शातकर्णि के पश्चात सातवाहन साम्राज्य का विघटन तीव्र गति से आरंभ हो गया। पुराणों में उल्लिखित उत्तरवर्ती राजाओं विजय, चंद्रश्री और पुलोमा की शासन-क्षमता दक्कन की विशाल राजनीतिक संरचना को थामने में असमर्थ सिद्ध हुई। साम्राज्य के विघटन के प्रमुख कारण थे:

  • उत्तराधिकार संघर्ष और आंतरिक कलह
  • प्रशासनिक ढांचे में बिखराव
  • स्थानीय सरदारों की बढ़ती स्वायत्तता
  • शकों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों का पुनरुत्थान
  • राजकोषीय संसाधनों का क्षरण

इन सभी कारकों के सम्मिलित प्रभाव से सातवाहन सत्ता तृतीय शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में विघटित होकर छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गई। दक्कन का राजनीतिक परिदृश्य पुनः बहु-राज्यीय संरचना में परिवर्तित हो गया, जहाँ से आगे चलकर वाकाटक, इक्ष्वाकु, चूटु और अन्य राजवंश उभरते हैं।

 

समग्र मूल्यांकन: गौतमीपुत्र शातकर्णि का ऐतिहासिक महत्व

 

गौतमीपुत्र शातकर्णि केवल सातवाहन इतिहास ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण दक्कन के प्राचीन इतिहास की सबसे निर्णायक हस्तियों में से एक हैं। उन्होंने उस काल में सत्ता संभाली थी जब सातवाहन साम्राज्य लगभग टूट चुका था, महत्वपूर्ण प्रदेश हाथ से निकल चुके थे, और आर्थिक स्रोतों पर शकों का अधिकार हो चुका था। ऐसे समय में उन्होंने न केवल क्षहरात शक्ति का उन्मूलन किया, जिसका प्रमाण overstruck coins से मिलता है, बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों, नर्मदा घाटी और दक्कन के उन प्रमुख भूभागों पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया जो दक्कन की राजनीतिक पहचान को परिभाषित करते थे।

उनका शासन सातवाहन वंश का पुनरुत्थान ही नहीं, दक्कन के सांस्कृतिक और धार्मिक समन्वय का भी उत्कर्ष बिंदु था। उनकी प्रशासनिक दक्षता, धार्मिक उदारता, सैन्य प्रतिभा और राजनीतिक दृष्टि ने दक्कन में एक सुसंगठित साम्राज्य की नींव रखी, जिसका प्रभाव आगे चलकर चालुक्यों और राष्ट्रकूटों तक दिखाई देता है।

इतिहास में बहुत कम शासक ऐसे होते हैं जो अपने साम्राज्य को केवल विस्तारित ही नहीं करते, बल्कि उसके चरित्र को पुनः परिभाषित भी करते हैं। गौतमीपुत्र शातकर्णि ऐसे ही दुर्लभ शासकों में से एक थे, एक ऐसे सम्राट जिन्होंने न केवल सातवाहन वंश को पुनर्जीवन दिया, बल्कि दक्कन की ऐतिहासिक धारा को भी पुनर्निमित किया।

 

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